22 April 2024
WISDOM ----
20 April 2024
WISDOM -----
इस संसार में आरम्भ से ही देवता और असुरों में संघर्ष चला आ रहा है l असुर भी सामान्य मनुष्य की तरह ही होते हैं , उनके कहीं कोई सींग , विशेष आकृति नहीं होती l वास्तव में असुरता एक प्रवृत्ति है l कैसे समझें की असुरता कहाँ है ? पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " ज्ञान , शक्ति और सामर्थ्य का जहाँ दुरूपयोग हो रहा है , वहीं असुरता है l " आचार्य श्री लिखते हैं --- " ज्ञान का अर्जन दुर्लभ है , परन्तु उसका समुचित उपयोग अति दुर्लभ है l इस स्रष्टि में प्रतिभा की , कला की , विद्या -ज्ञान -शक्ति और सामर्थ्य की कोई कमी नहीं है l असुरों से श्रेष्ठ तपस्वी इस संसार अन्यत्र कहीं नहीं है लेकिन उनका सारा ज्ञान , उनकी समूची सामर्थ्य उनके अहंकार की तुष्टि और भोग -विलास के साधन जुटाने में खप रही है l " आज संसार में ज्ञान , शक्ति और सामर्थ्य का ही दुरूपयोग हो रहा है , सारे संसार में असुरता का बोलबाला है , देवत्व तो कहीं छिप गया है l अब असुर ही आपस में लड़ रहे हैं l असुरों के पास ज्ञान है , धन संपदा अथाह है लेकिन दया , करुणा , संवेदना आदि सद्गुणों की कमी है इसलिए वे आपस में ही लड़ रहे हैं l आज संसार की सबसे बड़ी जरुरत ' सद्बुद्धि ' की है l सद्बुद्धि होगी तो लड़ाई -झगड़े , वैर -भाव सब समाप्त हो जाएंगे l
19 April 2024
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पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " लोकसेवा की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लोकसेवी आम जनता की जिन्दगी से कितना जुड़े हैं l गरीब जनता से दूर ऐशोआराम में रहने पर उनकी आँखों पर पट्टी चढ़ जाती है और वे जनता की दुःख -तकलीफों को देखना बंद कर देते हैं l फिर धीरे -धीरे लोकसेवा व्यवसाय बन जाती है और लोकतंत्र भ्रष्टतंत्र बन जाता है l " यदि कोई सच्चा लोकसेवी होगा तो उसका आत्मबल इतना अधिक होगा कि वह रावण की सोने की लंका को भी ढहा दे l इस सत्य को बताने वाली एक कथा है ----- अयोध्या के प्राचीन राजा और भगवान श्रीराम के पूर्वज महाराज चक्कवेण की कथा है l राजा चक्कवेण बहुत प्रतापी राजा थे , उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी - संपन्न थी किन्तु राजा स्वयं बहुत सादगी से एक झोंपड़ी में रहते थे और राजकाज से जो समय मिलता उसमें वे अपने जीविकोपार्जन के लिए खेती कर लेते l उनकी धर्मपत्नी भी बहुत सादगी से रहती थीं l जब कभी वे किसी काम से बाहर जातीं तो नगर के धनाढ्य परिवारों की महिलाएं उन्हें टोकती कि आपके शरीर पर कोई आभूषण नहीं है , यदि महाराज अपनी मर्यादा में ऐसा नहीं करते तो आप कहें तो हम आपके लिए आभूषण बनवा दें l नगर की महिलाओं के बार -बार कहने के कारण महारानी ने आभूषणों की बात महाराज चक्कवेण से कह दी l राजा यह सुनकर चिंता में पड़ गए , उन्होंने कहा --- महारानी आभूषणों के लायक तो हमारी आर्थिक स्थिति है नहीं , फिर भी तुमने जीवन में पहली बार मुझसे कुछ माँगा है , तो कुछ तो करना होगा l राजा ने अपने प्रमुख मंत्री को बुलाया और कहा --- " हम अपने सुख के लिए अपने राज्य की जनता से अधिक कर नहीं वसूल सकते l तुम ऐसा करो कि लंका के राजा रावण से कर वसूल करो l उसने स्वर्ण की बहुत जमाखोरी की है , इसलिए तुम उसी से स्वर्ण ले आओ l " मंत्री राजा की बात मानकर लंका गया और वहां जाकर उसने रावण से कहा ---- " हमारे महाराज चक्कवेण ने तुमसे कर लेने को भेजा है l " दम्भी रावण यह सुनकर बहुत हँसा और बोला --- " तुम्हारे भिखारी राजा की यह मजाल की रावण से कर वसूल करने की सोचे l " रावण की बात सुनकर मंत्री ने कहा --- " तुम हमारे महाराज के प्रभाव को जानते नहीं हो , हम तुम्हे कुछ नमूना दिखाते हैं , देखकर हिल जाओगे l फिर मंत्री बोला --- " यदि हमारे महाराज चक्कवेण सच्चे लोकसेवी और तपस्वी हैं तो लंका का उत्तरी और दक्षिणी हिस्सा ध्वस्त हो जाये l " मंत्री के ऐसा कहते ही सोने की लंका ढहने लगी l न कोई सेना , न मन्त्र शक्ति , सिर्फ सच्ची लोकसेवा के साथ तप और त्याग का ऐसा प्रभाव ! रावण यह देखकर घबरा गया , उसे आश्चर्य भी हुआ l उसने बहुत सारा स्वर्ण देकर मंत्री को विदा किया l मंत्री ने वापस आकर महाराज व महारानी को यह घटना सुना दी l यह सुनकर महाराज चक्कवेण ने महारानी से कहा --- " महारानी सच आपके सामने है , अब आप चाहें तो आभूषण पहन लें , लेकिन आपके आभूषण पहनते ही मेरी सच्ची लोकसेवा और तपस्या का यह प्रभाव समाप्त हो जायेगा l " महारानी को यथार्थ समझ में आ गया , उन्होंने आभूषण पहनने से स्पष्ट इनकार कर दिया l इस पर महाराज चक्कवेण ने कहा --- " महारानी ! तप -त्याग , सादगी , सदाचार ही लोकसेवी की सच्ची संपत्ति है l "
18 April 2024
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समय परिवर्तनशील है , वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है l एक समय था जब विभिन्न सत्ताधारियों के अहंकार और महत्वाकांक्षा के कारण बड़े -बड़े युद्ध होते थे जैसे रावण के अहंकार के कारण ही राम -रावण युद्ध और दुर्योधन के अहंकार के कारण महाभारत हुआ l इस युग में भी सिकंदर , हिटलर आदि के अहंकार ने ही संसार में तबाही मचाई l लेकिन वर्तमान के युद्धों में अहंकार , महत्वाकांक्षा जैसी कोई बात स्पष्ट नहीं है l अहंकार जैसे दुर्गुण को भी ' धन ' ने खरीद लिया l यदि हम सामान्य द्रष्टि से भी देखें तो इन युद्धों में धन -वैभव संपन्न लोगों का , राजा , बड़े अधिकारी , शक्ति सम्पन्न , समर्थ लोगों का कोई नुकसान नहीं होता , वे सब सुख -वैभव और आराम की जिन्दगी जीते हैं l निर्दोष प्रजा , कमजोर लोग ही मारे जाते हैं , मानों वे ही बड़ी हुई जनसँख्या और धरती पर बोझ हैं l वक्त के साथ युद्ध के मायने ही बदल गए l मारक हथियार , बम आदि भी बोलने लगे हैं कि जल्दी इस्तेमाल करो ताकि और नए , पहले से भी घातक बने जिससे ' फालतू ' जनसँख्या को देख लें l इस तरह के युद्ध एक छिपी हुई चाहत को दिखाते हैं कि यह धरती केवल धन और शक्ति , वैभव संपन्न लोगों के लिए है यहाँ प्रकृति , पर्यावरण , छोटे -मोटे प्राणी किसी की कोई जरुरत नहीं है , कृत्रिम से काम चलेगा l यह सत्य है कि ' धन से व्यक्ति सब कुछ खरीद सकता है l ' लेकिन धन से उस अज्ञात शक्ति , परम पिता परमेश्वर को भी कोई खरीद सकता है क्या ? इसका उत्तर ' वक्त ' के हाथ में है l
17 April 2024
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महाबली रावण ने माता जानकी को धोखे से बंदी बना लिया l सीता जी ने स्वयं को अशोक वाटिका में सीमित कर लिया , परन्तु रावण उनको मोहित करने के लिए भांति -भांति के रूप धारण कर के उनके पास जाता l रावण के सारे उपाय विफल हो गए l सीता जी ने भगवान श्रीराम के अतिरिक्त और किसी पर कोई ध्यान नहीं दिया l यह देख रावण के एक मंत्री ने रावण को सुझाव दिया ---- " महाराज ! आप क्यों न राम का वेश धर कर सीता से मिलें , तब तो उन्हें आपकी ओर देखना ही पड़ेगा l " रावण बोला ---- " तुम्हे क्या लगता है कि यह विचार मेरे मन में नहीं आया होगा लेकिन जब राम का रूप धारण करता हूँ तो मेरा मन भी वैसा ही हो जाता है l उनका रूप धरते ही ब्रह्म पद भी तुच्छ नजर आने लगता हैं , फिर पराई स्त्री की तो बात ही क्या ? " जिनका रूप धारण कर के मन के भाव शुद्ध हो जाते हैं , उनका ध्यान यदि सही में किया जाए तो क्या होगा ?
16 April 2024
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पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " बदला जाए द्रष्टिकोण तो इनसान बदल सकता है , द्रष्टिकोण में परिवर्तन से जहान बदल सकता है l यदि हमारा नजरिया , हमारा द्रष्टिकोण सकारात्मक है तो जीवन की दिशा ही बदल जाती है , जीवन की रंगत निखरती है और यदि नजरिया नकारात्मक हो तो जीवन की दिशा उस गर्त में जाती है जहाँ से उबरना , निकलना आसान नहीं होता है l यह निर्णय हमें लेना है कि हमें किस नजरिए को अपनाना है l महाभारत में जब जुए में हारने पर पांडवों को वनवास हुआ तो उन्होंने इसका दुःख नहीं मनाया , विलाप नहीं किया , अपने दुःख के लिए किसी को दोष नहीं दिया l उन्होंने इस कठिन समय को चुनौती माना और तपस्या कर दिव्य अस्त्र प्राप्त किए , अपनी शक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ाया l दूसरी ओर दुर्योधन आदि कौरव राजमहल में सुख - भोग में रहे , उन्होंने छल , कपट , षड्यंत्र की नकारात्मक राह का चयन कर स्वयं अपने पतन की कहानी लिख ली l मनुष्य का जैसा द्रष्टिकोण होता है वह उसी के अनुसार जीवन की व्याख्या करता है , उसी के अनुरूप कार्य करता है और उसी के अनुसार फल भोगता है l गुरु द्रोणाचार्य कौरव , पांडव सभी को अस्त्र -शस्त्र की शिक्षा देते थे l एक बार उनका मन दुर्योधन और युधिष्ठिर की परीक्षा लेने का हुआ , उन्होंने राजकुमार दुर्योधन को अपने पास बुलाकर कहा --- " वत्स ! तुम समाज में अच्छे आदमी की परख करो और वैसा एक व्यक्ति खोजकर मेरे सामने उपस्थित करो l " दुर्योधन ने कहा --- ' जैसी आज्ञा ' l और वह अच्छे आदमी की खोज में निकल पड़ा l कुछ दिनों बाद दुर्योधन आचार्य के पास आकर बोला --- " गुरुदेव ! मैंने कई नगरों और गांवों का भ्रमण किया , परन्तु कहीं भी कोई अच्छा आदमी नहीं मिला l इस कारण मैं किसी को आपके पास नहीं ला सका l " इसके बाद द्रोणाचार्य ने राजकुमार युधिष्ठिर को अपने पास बुलाया और कहा --- " बेटा ! तुम कहीं से भी कोई बुरा आदमी खोजकर ला दो l " युधिष्ठिर गुरु की आज्ञा से बुरे आदमी की खोज में निकल पड़े l काफी दिनों बाद वे लौटे और आचार्य से कहा ----" गुरुदेव ! मैंने सब जगह बुरे आदमी की खोज की , पर मुझे कोई भी बुरा आदमी नहीं मिला l इस कारण मैं खाली हाथ लौट आया l " शिष्यों ने पूछा --- " गुरुदेव ! ऐसा क्यों हुआ कि दुर्योधन को कोई अच्छा आदमी नहीं मिला और युधिष्ठिर कोई बुरा आदमी खोज नहीं सके l " आचार्य द्रोणाचार्य ने कहा ---" जो व्यक्ति जैसा होता है , उसे सारे लोग वैसे ही दिखाई पड़ते हैं इसलिए दुर्योधन को कोई अच्छा व्यक्ति नहीं दिखा और युधिष्ठिर को कोई बुरा आदमी नहीं मिल सका l " वास्तव में हमें संसार वैसा ही दिखाई देता है , जैसा हमारा देखने का नजरिया होता है l
15 April 2024
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बादशाह अब्बास अपने एक पदाधिकारी के यहाँ दावत में गए l वहां उन्होंने और सब साथियों ने इतनी मदिरा पी ली कि किसी के होश -हवाश दुरुस्त नहीं रहे l नशे की झोंक में बादशाह खड़े हो गए और उस पदाधिकारी के अंत:पुर की ओर जाने लगे , लेकिन दरवाजे पर उस पदाधिकारी का नौकर इस प्रकार खड़ा था कि उसे हटाये बिना बादशाह भीतर नहीं घुस सकते थे l उन्होंने नौकर से कहा --- " अभी यहाँ से हट जा वरना मैं तलवार से तेरा सिर उड़ा दूंगा l " नौकर ने सिर झुककर कहा ---- " हुजूर , आप मेरे देश के स्वामी हैं , इसलिए मैं आप पर हाथ तो नहीं उठा सकता , पर यह निश्चय है कि आप मेरी लाश पर पैर रखकर ही भीतर जा सकेंगे l याद रखिए कि भीतर जाने पर बेगमें तलवार लेकर आपका मुकाबला करेंगी , क्योंकि जब उनकी इज्जत पर हमला किया जायेगा तो वे अपना बचाव जरुर करेंगी l " बादशाह का नशा सेवक की खरी बातों को सुनकर ठंडा पड़ गया और वे वापस चले गए l दूसरे दिन उस पदाधिकारी ने बादशाह से कहा ---- " मेरे जिस नौकर ने कल आपके साथ बेअदबी की थी उसे मैंने नौकरी से निकाल दिया है l " बादशाह ने कहा ----- " यह तो बहुत अच्छा हुआ l मैं उसे आपसे मांगकर अपने अंगरक्षकों का सरदार बनाना चाहता था l आप उसे बुलाकर मेरे पास भेज दीजिए l सच्चे व्यक्ति की कद्र सब जगह होती है l