30 October 2018

WISDOM ----- सन्मार्ग मिलने पर दुराचारी का भी कल्याण होता है

   एक  डाकू  फकीरों  ,  दरवेशों  के  वेश  में  डाके  डालता  था  l  अपना  हिस्सा  वह  गरीबों  में  बाँट  देता  था  l  हाथ  में  माला  लिए  जपता  रहता  l  एक  बार  उसके  दल  ने  काफिला  लूटा  l  एक  व्यापारी के  हाथ  में  ढेर  सारा  रुपया - पैसा  था  l  लूट  चल  रही  थी  l  उसने  फकीर  को  देखा   तो  उसके  पास सारा  धन  लाकर  रख  दिया   l  काफिला  लुट  जाने  के  बाद  वह  धन  लेने  पहुंचा  तो  देखा  कि  वहां  तो  लूट  का  माल  बांटा  जा  रहा  है  ,  सरदार  वाही  था ,  जो  दरवेश  बना  हुआ  था  l   व्यापारी  बोला ---- " हमने  तो  आपको  दरवेश  समझा  था  l  आप तो  कुछ  और  ही  निकले   l  हमने  डाकुओं  के  सरदार  पर  नहीं  ,  फकीर  पर ,  खुदा के  बन्दे  पर  विश्वास  किया  था  l  आदमी  का  भरोसा  साधु , फकीर  पर  से  उठना    नहीं  चाहिए   l  यह  धन  आप  रखिये  ,  पर  आपसे  एक   विनती  है  कि  आप  दरवेश  के  वेश  में  मत   लूटिये  l  नहीं  तो  लोगों  का  विश्वास  ही   इस  वेश  पर  से  उठ  जायेगा  l   वह  डाकू  तत्काल  ही  वास्तव  में  फ़क़ीर  बन  गया   l  उसके  बाद  उसने  कभी  डाका  नहीं  डाला   l  

29 October 2018

WISDOM ------ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

  मनुष्य  की  स्वतंत्रता  कर्म  करने  में  है  ,  उसके  फल  में  नहीं  l  हम  जो  आज  हैं  वह  हमारे  अतीत  में   किये  गए कर्मों  का  ही  परिणाम  है   और  भविष्य  में  हम  जो  भी  होंगे  ,  जिस  स्थिति   में  होंगे  वह  हमारे   वर्तमान  में  किये  गए  कर्मों  का  ही  परिणाम  होगा  l 
   महाभारत  में  महासमर  से  पहले  भगवान  श्रीकृष्ण  शांतिदूत  बनकर  कौरवों  की  सभा  में  गए  l  वहां  उन्होंने  शांति प्रस्ताव  के  कई  रूप  कौरवों  के  सामने  रखे   किन्तु  दुर्योधन  ने  इन्हें   मानने  से  इनकार  कर  दिया  और  अपने  अहंकार  के  वशीभूत  होकर  भगवान  श्रीकृष्ण  को  बंदी  बनाने  का  प्रयत्न  करने  लगा   l   तब  भगवन  ने  कौरव  सभा  में  अपना  विराट  रूप  दिखाया   l   तब  धृतराष्ट्र   को  मन  में  लगने  लगा  कि  यदि  मेरी  अंधता  न  होती  तो  मैं  भी  भगवान  के   दिव्य  रूप  के  दर्शन  कर  सकता  l 
  उन्होंने  भगवान  श्रीकृष्ण  से  पूछा---- "  मेरे  किस  कर्म  के  अशुभ  प्रभाव  से   मुझे  यह  दंड  मिला  है  ?  क्या  प्रकृति  ने  मेरे  साथ  अन्याय  किया  है   ?  "
इस  पर  श्रीकृष्ण  बोले  ---- " प्रकृति  किसी  के  साथ  कोई  अन्याय  नहीं  करती   l "  उन्होंने  कहा --- " मैं  आपके  वर्तमान  जीवन  से  पहले  का  108 वां  जन्म  देख  रहा  हूँ  --- एक  किशोर  बालक   पेड़  के  घोंसले  से  चिड़िया  के  बच्चों  की  आँख  में  काँटा  चुभोकर   उन्हें  अँधा  कर  रहा  है  l  यह  किशोर  और  कोई  नहीं ,  स्वयं  आप  हैं   l  पिछले  जन्मों  में  शुभ  कर्मों  के  कारण  आपका  यह  संस्कार  उभर  नहीं  सका  ,  लेकिन  उसी  पाप  के  परिणामस्वरूप   इस  जन्म  में  आपको  अंधे  के  रूप में  जन्म  लेना  पड़ा   l  "    

28 October 2018

WISDOM ----- यदि भावनाएं परिष्कृत हों तो सेवा स्वयं साधना बन जाती है l

    पूजा - पाठ ,  कर्मकांड  हों  या  समाज कल्याण  के  कार्य ,  यदि  व्यक्ति  का  उद्देश्य   नाम , यश  और  धन  कमाना  है    तो   उससे   आत्मिक  शान्ति  नहीं  मिलेगी,  जीवन  भर  व्यक्ति  शांति  की  तलाश  में  भटकता  ही  रहेगा  l   जो  लोग वास्तव  में     तनाव रहित  जीवन ,  सुख - शांति से  जीना  चाहते  हैं  उनके  लिए  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य   द्वारा  लिखित  अखण्ड  ज्योति  का  यह  अंश  महत्वपूर्ण  है ---- " विकारों  को  एक  स्थान  पर  बैठकर  जप - तप,  पूजा - पाठ  आदि  कर  के  दूर  नहीं  किया  जा  सकता  l  एक  स्थान  पर   इन  विकारों  को  जीतने  का  प्रयत्न  करने  से   इनसे  एक  भयानक  मानसिक  द्वन्द  आरम्भ  हो  जाता  है   और  मनुष्य  की  बहुत  सारी  शक्ति  और  समय   इसी  संघर्ष  से  निपटने  में   व्यय  हो  जाता  है   l
  इन  विकारों  को   विजय  करने  का  सबसे  सरल  तथा  सही  उपाय  एक  ही  है  कि  मनुष्य  समाज  में  अपने  को  मिला  दे   l  जनसेवा  का भाव  लेकर  कर्मक्षेत्र में  उतरे  l  जनसेवा  का  भाव  लेकर   कर्मक्षेत्र  में  उतर  पड़े  l  समाज  में  घुसकर  रहने  से ,  उसमे  सेवा  का  सक्रिय  व्यवहार  अपनाने  से  ,  हानि - लाभ , दुःख - सुख ,  हर्ष - शोक , क्रोध   आदि  के  हजारों  कारण    आयेंगे  ,  लाखों  प्रतिकूल  परिस्थितियों  से  होकर  जाना  पड़ेगा  l  ऐसे   अवसर  पर   अपने  विकारों  पर  संयम   करने  का  स्वस्थ  एवं  सफल  अभ्यास  प्राप्त  होगा  l   निष्कामता  को  अपनाकर  अपने  अहं  पर  चोट  सहता  हुआ  मनुष्य  ज्यों - ज्यों  जनसेवा  की   और  बढ़ता  है  त्यों - त्यों  उसका  आत्मिक  विकास    होता  है   l  आत्मिक  विकास  का  विस्तार  होने  से  धीरे - धीरे    उसके  सम्पूर्ण   विकार  तिरोहित   हो  जाते  हैं   और  वह  आध्यात्मिक  हो  जाता  है  l  "
आचार्यजी  का  स्पष्ट  मत  था --- कर्मयोगी  बनो ,  पवित्र  भावना  से  कार्य  करते  हुए   मन  में  गायत्री मन्त्र  का  जप  करो  ,  यही  सच्ची  उपासना  है   l  

27 October 2018

WISDOM ----- उचित दंड न हो तो अनीति एवं अनाचरण अपने चरम पर पहुँच जायेंगे , अत: इनका दमन आवश्यक है l

    दण्डो  दमयतामस्मि  l  ----श्रीमद् भगवद्गीता  
 गीता में  भगवान  श्रीकृष्ण   कहते  हैं  - मैं  दमन  करने  की  शक्ति  हूँ  l   भगवान  कहते  हैं  दमन  पाशविक  भी  है  और   ईश्वरीय  विभूति  भी  है   l 
 भगवान  कृष्ण  आगे  कहते  हैं  कि  दमन  यदि  विवेकहीन ,  औचित्यहीन ,   व  नीतिहीन  हो  तो   आसुरी  एवं  पाशविकता  का  परिचय  प्रदान  करता  है  ,  घोर  संकट  का  कारण  बन  जाता  है   तथा  मनुष्य  , समाज  एवं  स्रष्टि  को  भारी  क्षति  पहुँचाता  है   l 
  परन्तु   यदि    अन्याय,  अनीति , अनाचार , दुराचार , शोषण , भ्रष्टाचार   का  दमन  किया  जाता  है   तो  दमन  ईश्वरीय  विभूति  के  रूप  में  अलंकृत  होता  है   l  जो  इसे  करने  का  साहस  दिखाता  है   ,  दंड  उसके  हाथों  में   ईश्वरीय  शक्ति  के   रूप  में  शोभित  होता  है  l  
  मनुष्य  का    अनियंत्रित  और  असंतुलित  आचरण  व्यापक  विनाश  का  कारण  बनता  है   l  अत:  स्रष्टि   के  संतुलन  को  बनाये  रखने  के  लिए   भगवान  ने  दंड  विधान  की   व्यवस्था  प्रदान  की  है   l 

26 October 2018

WISDOM ------ समझदारी के अभाव में नकारात्मकता बढ़ती है

  एक  बार  अमेरिकी  राष्ट्रपति   अब्राहम  लिंकन  ने  अपने  एक  सैनिक  अफसर  को  किसी  सहयोगी  व्यक्ति  के  साथ   उग्र  विवाद  में  उलझते   देखा ,  तो  उसे  सख्ती  से  डांटा  l  उनका  कहना  था ------------------- "  कोई  भी  व्यक्ति  जो  अपनी  क्षमता  को  पूरा  विस्तार  देने  के  लिए    प्रतिबद्ध  है  ,  उसके  पास व्यक्तिगत  कलह  के  लिए   समय  नहीं  होना  चाहिए  l  चाहे  इसके  लिए   उसे  अपने   सामान्य  या  निजी  अधिकारों  को  त्यागना   ही  क्यों  न  पड़े   l  "
  लेकिन  कोई  भी  अपने   छोटे -से -छोटे  अधिकार  का  भरपूर  उपयोग  करना  चाहता  है  ,  उसे  त्यागना  नहीं  चाहता  ,  इसलिए  विवादों  में  पड़  जाता  है   l 
  हम  जो  भी  निर्णय  लेते  हैं   या  जो  भी  चाहते  हैं  ,  उससे  सभी  सहमत  नहीं   होते  हैं    l   और  यह  सह्मति,   असहमति  कभी - कभी   या  अक्सर    आपस  में कलह  का  कारण  बन  जाती  है   l 
  बात  थोड़ी  सी  होती  है  ,  लेकिन  समझदारी  के    अभाव  में    वह  बहुत  विकृत  रूप  में  उभरकर   सामने  आती  है   l  इससे  न  केवल  समय  की  बरबादी  होती  है  ,  बल्कि  इससे  आस - पास  का   वातावरण  भी  नकारात्मक   तत्वों  से  भर  जाता  है   l 
 असहमति  होते  हुए  भी     सहमति  के   बिन्दुओं  को    खोजना     ,  कलह  को  न  होने  देने  का    सबसे   अच्छा    तरीका  है   l  

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता l नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ll

  ऋषियों  का ,  आचार्य  का  मत है  कि    जो   व्यक्ति  प्रत्येक  रात्रि  को   सोते  समय   गायत्री  मन्त्र  का  जप  करे  ( भगवत्स्मरण )   करे   तो  उसके  जीवन  की  निद्रा   से  सम्बंधित  समस्याएं ,  अनिद्रा  आदि  व्याधियाँ,  बीमारियाँ  समाप्त  हो  जाती  हैं    और  अध्यात्म  के  क्षेत्र  में  भी  आगे  बढ़ते  हैं   l
  इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है -----  एक  व्यापारी  था  ,  वह   व्यापार    के  सिलसिले  में   एक  नगर  से  दूसरे  नगर  जाता  था   l  इस  बार  वह  अमरकंटक  जा  रहा  था ,  रास्ते  में  सोच  रहा  था  -- " मैंने  जीवन पर्यंत  पाप  ही  पाप  किये  हैं  ,  मदिरापान , वेश्यागमन , मिथ्या भाषण  में  मैं  सबसे  आगे  रहा  l "  ऐसा  चिन्तन  करते  हुए  वह  अमरकंटक  पहुँच  गया   l  संयोगवश  उस  दिन शिवरात्रि  थी   l  मंदिरों  में  अभिषेक , पूजन ,  अर्चन   देखकर  उसे  विचित्र  अनुभव  हुए   क्योंकि  उसने  कभी  इस  तरह  के  कार्य  नहीं  किये  थे   l  यह  सब  देखकर  उसे  विलक्षण  शांति  का  अनुभव  हुआ   l  रात्रि  का  समय  था  ,  वह  मंदिर  के  बाहर  ही     जमीन  पर  लेट  गया   l    उसे  अपने  दूषित  कर्मों  पर  दुःख  हो  रहा  था  ,  साथ  ही  मंदिर  में  होने  वाले   अभिषेक , अर्चन  आदि  से  ईश्वर  का  पवित्र  नाम  उसके  कानों  से  ह्रदय  में  जा  रहा  था  l  शीघ्र  ही  उसे  गहरी  नींद  आ  गई  l  वहां  उसे  एक  काले नाग  ने  काट  लिया   l  लोगों  ने  उसकी  चेतना  लौटाने  के  लिए  अभिषेक  का  पवित्र  जल   उसके  मुँह  पर  छींटा, किन्तु  उसके  प्राण  निकल  चुके  थे  l
      चित्रगुप्त  महाराज  ने  उसके  कर्मों  का  लेखा  पढ़ते  हुए  यमराज  से  कहा  ---- "  यह  महान  पापी  है  ,  इसे  घोर  नरक  में  कष्ट  सहने  के  लिए  डाला  जाये  l  "  किन्तु  चित्रगुप्त  , यमराज  व  दूतों  को  बहुत  आश्चर्य  हुआ   कि  नरक  के  कष्टों  से  उसे  कोई कष्ट  ही  नहीं  हुआ  ,  वह  तो  शांत  और  सुरक्षित  है  l
उसी  समय  नारदजी  आ  गए  ,  उन्होंने कहा --- "   इसमें  आश्चर्य  की  कोई  बात  नहीं  है   l  उसने  निद्रा  में  भगवन   शिव  का  चिंतन   करते  हुए  प्राण  त्यागे ,   उसके  मन  में   अभिषेक , पूजन   अर्चन  के  पवित्र  भाव  के  साथ  अपने  दूषित  कर्मों  के  लिए   प्रायश्चित  भाव  होने  के  कारण  उसका  मन  पवित्र  है l  इसलिए  अब  उसे  नरक  का  कोई  कष्ट  नहीं  है   l  "  रात्रि  को  और  अपने  जीवन  की  अंतिम  निद्रा  को  संवार  लेने  के  कारण  उसका  कल्याण  हुआ  l 
  आचार्य  कहते  हैं -- ईश्वर  को    पवित्र  भावना   प्रिय  है ,  लेटे - लेट  भी  मानसिक  जप  किया  जा  सकता  है   l   

25 October 2018

WISDOM ---- नियत से नियति का निर्माण होता है

 ' नियति  व्यक्ति  के  कर्मों  का  परिणाम  होती  है   l  नियत  के  अनुसार  नियति  होती  है   l  व्यक्ति  का  उद्देश्य  क्या  है  ?  वह  जैसा  सोचता  है , करता  है   ,  वैसी  ही  उसकी   नियति  होती  है  l
  महाभारत  के  उदाहरण  से  इसे  समझा  जा  सकता  है  -----  धृतराष्ट्र   के  पुत्र  ' कौरव '   सदा  ही  षड्यंत्रकारी , फरेबी ,  झूठे   एवं  अहंकारी  थे  l  उनके  जीवन  का  उद्देश्य  अपने  को  स्थापित  करना   और  दूसरों  को  परेशान  करना  था   l  वे  घोर  अधर्मी  थे   l  पाप पूर्ण  आचरण  ही  उनकी  नीति  थी  l
     इसके  विपरीत  पांडु पुत्र   ' पांच  पांडव '  सदाचारी , , सत्य , न्यायप्रिय , त्यागी   एवं  परोपकारी  थे  l  औरों  की  रक्षा  के  लिए  वे  अपने  प्राणों  की  बाजी  लगा  देते  थे  l  धर्म  पर  उनकी  अगाध  आस्था  थी , उनकी  नीति  धर्म  पर  आधारित  थी   l  इसी  नीति  और  आचरण  के  कारण  उनकी  नियति  का  निर्माण  हुआ  l 
   महाभारत  के  युद्ध  में  पांडवों  के  साथ  भगवान  कृष्ण  स्वयं  थे   और  कौरवों के  साथ  महा  पराक्रमी  भीष्म ,  द्रोंण, कर्ण   आदि  महारथी  थे  l   परन्तु  इतने  सारे  महारथी  भी  दुर्योधन  को  विनाश  की  नियति  से  उबार  नहीं  सके  l  जबकि  पांडवों  की  नियति  धर्म  के  साथ  खड़े  होकर  विजय  प्राप्ति  की  थी   l   नियति  के  अनुसार  कौरव  मिट  गए  और  पांडवों  को  विजय पताका  फहराने  का  सुअवसर  प्राप्त  हुआ  l
     सतत  सत्कर्म ,   सदाचरण   एवं  सदभाव  के  द्वारा  हमारी  नियति   श्रेष्ठता  से  परिपूर्ण  हो  जाती  है    और  इसके  विपरीत    आचरण ,  व्यवहार  से   नियति   अत्यंत  कष्ट साध्य  बन  जाती  है  l