पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है --- ' हमारी भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि यहां भिन्न - भिन्न रूपों में उपासना ' बहुदेववाद ' के माध्यम से प्रचलित है l हम चाहे किसी को भी मानें, भाव परमपिता परमेश्वर के प्रति समर्पण का हो , उनके कार्य को आगे बढ़ाने का ही हो l ------ सुप्रसिद्ध तंत्रसाधक स्वामी सर्वानंद काली के उपासक थे l राजा कृष्ण उपासक थे l राजधर्म के अंतर्गत सभी को श्रीकृष्ण को ही आराध्य देव मानने का राज्यादेश था l उनसे किसी ने शिकायत की कि यह साधु अपनी ही चलाता है , राजधर्म का पालन नहीं करता l राजा ने पूछा तो सर्वानंद ने कहा कि जो आप करते हैं , वही हम करते हैं l राजा ने कहा ---- हम उपासना स्थली देखेंगे l काली का फोटो आपके यहाँ है कि नहीं यह भी देखेंगे l सर्वानंद स्वामी ने सब कुछ महामाया पर छोड़ दिया l राजा के साथ आये सभी लोगों ने काली की मूर्ति देखी , पर राजा को वहां श्री कृष्ण की मूर्ति दिखाई दी l बाहर आकर बोले ---- हमने देख लिया , वह कृष्ण का ही उपासक है l तुम जबरदस्ती उसकी शिकायत करते हो l राजा को वहां श्रीकृष्ण दीखे और लोगों को काली l भिन्न - भिन्न रूपों में भगवान की शक्तियां हैं , पर एक सच्चा योगी सभी में परमपिता परमेश्वर के दर्शन करता है l यदि यह एकात्मता का भाव बना रहे तो धर्म के नाम पर होने वाले झगड़े पैदा ही न हों l
30 December 2020
29 December 2020
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष हर मनुष्य की प्रकृति में बड़ी गहराई से अपनी जड़ें जमाए बैठे हैं और हर युग में उनका रूप देखने को मिलता है ll त्रेतायुग में इनका स्वरुप दुर्बल और कमजोर था लेकिन वर्तमान समय में इनका रूप अत्यंत भयावह , भीषण एवं विकृत हो चुका है l रामायण हो या महाभारत उनमे ऐसे अनेक पात्र मिल जायेंगे जिनमे ये मनोविकार आश्रय पा रहे थे ------- राजा दशरथ महाप्रतापी और धर्मपरायण राजा थे , परन्तु वे महारानी कैकेयी के सौंदर्य पर मुग्ध थे , और अपने पुत्र राम के अतिशय मोह में थे l मंथरा में ईर्ष्या का दुर्गुण अपने चरम पर था l वह सदैव भगवान राम से ईर्ष्या करती थी और भरत को अधिक महत्व देती थी l महारानी कैकेयी राम पर अधिक वात्सल्य लुटाती थीं , परन्तु क्रोध , अहंकार और कुसंग ऐसे महविष हैं जो पवित्र दिव्य प्रेम पर भी ग्रहण लगा देते हैं l सबसे अधिक घातक था --- मंथरा जैसी निकृष्ट दासी का कुसंग l इसी कुसंग ने महारानी कैकेयी के अहंकार व क्रोध को इतना भड़का दिया कि वे राजा दशरथ से राम को वनवास और भारत को राजगद्दी मांग बैठीं l आचार्य श्री लिखते हैं --- प्रकृति सत्पात्रों का चयन श्रेष्ठता और सृजन के लिए करती है l कैकेयी ने वरदान माँगा , इसी वजह से भगवान राम ने वन में रहकर रावण आदि असुरों का विनाश किया और रामराज्य की स्थापना की l आचार्य श्री कहते हैं --- जिसकी चेतना जितनी परिष्कृत होगी उसमे इन मनोविकार की जड़ें उतनी कमजोर होगी l इस युग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों की चेतना मूर्च्छित है इसलिए ये मनोविकार और आसुरी प्रबृति का भयावह रूप सामने है l
WISDOM ------
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ईश्वर और धर्म में विश्वास नहीं करते थे l उन्होंने काशी की संस्कृत पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की थी l देश - विदेश भ्रमण करने के पश्चात् वे अस्सीघाट स्थित अपनी पुरानी पाठशाला में अपने बचपन के एक नेत्रहीन मित्र से मिलने पहुंचे l मित्र ने उनसे पूछा ---- " दुनिया घूम आए , कोई नई बात बताओ l " राहुल सांकृत्यायन बोले ---- " नई बात यह है कि विज्ञान ने ईश्वर को मार डाला है l " उनके मित्र उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले ----- " मेरा अनुभव भी सुनो l असमय मेरी आँख चली गईं और मैं बिना आँखों के काशी जैसे नगर में आया l सोचता था कि मुझ जैसे नेत्रहीन व्यक्ति का गुजारा इतने बड़े नगर में कैसे होगा l परन्तु एक रात मैंने आँखें न होते हुए भी देखा कि एक धनुर्धारी युवक मेरे कमरे में खड़ा है और मुझे निश्चिंत होने को कह रहा है l वो मेरे इष्टदेव श्रीराम थे l अब तुम मेरे इष्टदेव को नकारने का साहस न करना l " ऐसा कहते हुए उनके मित्र रो पड़े l राहुल सांकृत्यायन की आँखें भी सजल हो उठीं और वे बोले ---- " नहीं मित्र ! अब मैं तुम्हारी आस्था को कभी ठेस नहीं पहुंचाऊंगा l "
28 December 2020
WISDOM -----
वर्तमान में सामान्य मनुष्य से लेकर नेता , सेठ , साहूकार पुण्य कार्य तो बहुत करते हैं इससे संसार में सुख - शांति होनी चाहिए लेकिन भ्रष्टाचार और बेईमानी इस सुख - शांति की राह में दीवार है ----- एक कहानी है ---- एक गाँव में एक सेठ जी थे l बहुत वैभव था उनके पास l सत्संग में उनने सुन रखा था कि दान - पुण्य करने से मृत्यु में कष्ट नहीं होता और भगवान के दूत लेने आते हैं l इसलिए वे अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों के गरीबों के बच्चों की शिक्षा , , इलाज , रहने की व्यवस्था आदि के लिए अपने अति विश्वासपात्र लोगों के माध्यम से धन भिजवाते थे और कुछ गरीबों को अपने घर में अपने हाथ से भोजन परोसते थे l सत्संग का प्रभाव था , सेठ जी बड़े निश्चिन्त थे कहते थे हमारे लिए तो सीधा वैकुण्ठ से विमान आएगा , विष्णु भगवान के दूत आएंगे और ले जायेंगे l उनके चापलूस उनकी बड़ी तारीफ़ करते और गरीबों की संख्या भी बढ़ाते जाते l मृत्यु तो निश्चित है , आखिर वो दिन भी आ गया l भगवान के दूत तो नहीं आये , दरवाजे पर डरावने यमदूत खड़े थे उन्होंने बड़ी बेरहमी से सेठ की आत्मा को खींचा और घसीटते हुए ले चले l सेठ बहुत चिल्लाया ---देखो मेरे लिए लोग कितने दुःखी हैं , मैंने कितने पुण्य किये हैं , मैं देख लूंगा l ' यमदूतों ने उन्हें चित्रगुप्त महाराज के दरबार में पटक दिया l हो - हल्ला सुनकर महाराज सेठ के पास आये पूछा - क्या बात है ? सेठ ने पूरी कथा - गाथा कही कि मैं तो पुण्यात्मा हूँ , आपके दूतों ने बड़ा कष्ट दिया l ' महाराज ने कहा --- चलो , रजिस्टर देखें , प्रकृति में इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई ? ' जब रजिस्टर देखा तो महाराज ने सेठजी को दिखाया कि देखो , तुमने धन भेजा , लेकिन पीड़ितों का कालम तो खाली है , उन्हें तो मिला ही नहीं l ' अब सेठ बहुत विलाप करने लगा , मामला धर्मराज के पास पहुंचा l धर्मराज ने बहुत गहराई से अध्ययन किया और कहा देखो , तुम्हारे अन्नदान का तो पुण्य है लेकिन तुमने स्वयं बेईमानी से धन अर्जित किया इस कारण तुम लोगों को सच्चाई व ईमानदारी नहीं सिखा पाए l तुम्हारी मदद पहुँचने से पहले ही दबंगों ने विभिन्न तरीकों से पीड़ितों का धन हड़प कर उन्हें और पीड़ित किया इसलिए तुम्हारे खाते में पाप का स्तर बढ़ गया l अब तो सेठ सिसक -सिसक कर रोने लगा पर अब पछताए क्या होत , जब चिड़िया चुग गई खेत l धर्मराज ने कहा ---- प्रकृति के दंड विधान के अनुसार जो भोग है उससे कोई भी नहीं बचा है l जब फिर से धरती पर जन्म हो तो लोगों के विचारों को परिष्कृत करने का कार्य करो , स्वयं सच्चाई की राह पर चलकर , अपने आचरण से लोगों को शिक्षा दो l सच्चाई और ईमानदारी की कमाई ही फलती और पुण्य देती है l
27 December 2020
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपने एक लेख में अक्टूबर 1972 में लिखा था ---- ' आज सर्वत्र भय का साम्राज्य है l हर व्यक्ति बेतरह डरा हुआ है l अवांछनीय और अनुचित को जानते - मानते हुए भी उसे अस्वीकार करने का साहस नहीं होता l अपनी मौलिकता मानो मनुष्य ने खो ही दी है l अपने पास उसकी कोई समझ ही नहीं है l जो कुछ कहा , बताया और कराया जा रहा है , उसे ही पालतू जानवर की तरह मानने और करने को तैयार रहने वाली मनोभूमि एक प्रकार से पराधीनता के पाश में जकड़ी हुई ही है l ऐसा बंधित और बाधित व्यक्ति शिक्षित कैसे कहा जाए ? -------- पुरानी दुनिया अब टूट रही है l युद्धों से --- दांव - पेचों से --- अभाव - दारिद्र्य से ---- शोषण - उत्पीड़न से ---- छल - प्रपंच से आदमी आजिज आ गया है l सुविधा - साधनों की अभिवृद्धि के साथ -साथ दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृतियों की बढ़ोत्तरी भी बेहिसाब हो रही है l जो चल रहा है , उसे चलने दिया जाये तो आज का समय कल शोषण , वीभत्स और नग्न रक्तचाप के रूप में सामने आ खड़ा होगा और मानवीय सभ्यता बेमौत मर जाएगी l उस स्थिति को बदले बिना कोई चारा नहीं है l नई दुनिया अगर न बनाई जा सकी तो इस बढ़ती हुई घुटन से मनुष्यता का दम घुट जायेगा l '
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ---- ' प्रौढ़ता का संबंध आयु से नहीं विवेक से है l बड़प्पन होना चाहिए l ' एक कहानी है ----- एक बार नदी के किनारे की रेत पर कुछ बच्चे खेल रहे थे l उन्होंने उस रेत पर ही रेत के मकान बनाए थे , और उन बच्चों में से हर एक यह कह रहा था , यह वाला घर मेरा है , कोई कह रहा था वह वाला मेरा है और वही सबसे अच्छा है , उसके जैसा दूसरा कोई भी नहीं है l इसे कोई नहीं पा सकता l ऐसे ही कई तरह की बातें करते हुए वे बच्चे खेलते रहे l जब उनमें से किसी ने किसी का घर तोड़ दिया तो उनमे लड़ाई - झगड़ा भी खूब हुआ l लेकिन तभी सांझ का अँधेरा घिरने लगा l अब तो बच्चों को अपने घर की याद सताने लगी l अपने घर की याद आते ही उन्हें झूठे घरों से तनिक भी मोह न रहा l पूरे दिन जिन घरों के लिए उन्होंने न जाने कितने इंतजाम किए थे , सरंजाम जुटाए थे , वे सभी जैसे के तैसे पड़े रह गए l इन सारे रेत के घरों में उनमें से किसी का कोई मेरा - तेरा न रहा l वहीँ पास में कुछ दूर खड़े एक साधु बच्चों का यह सारा घटना प्रसंग देख रहे थे l वह सोचने लगे कि संसार के प्रौढ़ लोग भी क्या बच्चों की तरह रेत के घर - भवन - महल नहीं बनाते रहते ! इन बच्चों को तो फिर भी सूरज डूबने के साथ अपने घर की याद आ गई , परन्तु जिन्हें प्रौढ़ कहा जाता है , उनका तो जिंदगी की सांझ ढलने पर भी विवेक जाग्रत नहीं होता और ज्यादातर लोग अपने अहंकार और अपने स्वार्थ के साथ मेरा- तेरा कहते हुए संसार छोड़ देते हैं l इसलिए कहते हैं कि प्रौढ़ता का संबंध आयु से नहीं , विवेक से है l
25 December 2020
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मार्टिन लूथर ईसाई धर्म के प्रसिद्ध एवं विचारक हुए हैं l जब उन्होंने कुछ प्रचलित रूढ़िवादी मान्यताओं के विरुद्ध आवाज उठाई तो कुछ पुरातन पंथियों ने न केवल उनका विरोध करना शुरू किया , बल्कि उनको व उनके सहयोगियों को भाँति - भाँति से प्रताड़ित करना भी प्रारम्भ कर दिया l इन सबसे दुःखी होकर उनके एक शिष्य ने उनसे एक दिन कहा ---- " अब बहुत हो चुका ! आपकी प्रार्थना तो भगवान सुनते हैं , आप उनसे इन दुष्टों की मृत्यु का आशीर्वाद मांग लीजिए l " मार्टिन लूथर बोले ---- " यदि मैं भी ऐसी कामना करूँ तो मुझमें और इन नासमझों में क्या अंतर रह जायेगा ? " उनका शिष्य पुन: बोला ---- " पर आप इन जल्लादों की प्रवृति तो देखिए l ये आप जैसे संत , दयालु और परोपकारी के साथ कैसा दुर्व्यवहार करते हैं ? " मार्टिन लूथर बोले ----- " इनके और मेरे कर्मों का हिसाब उसे ही रखने दो , जिसने यह दुनिया बनाई है l हमारा कार्य है राग व द्वेष से मुक्त होकर शुभ व श्रेष्ठ कर्मों को करना l धर्म की राह पर चलने वाला अंतत: विजयी ही होता है l " यह सुन कर उनके शिष्य का माथा स्वत: ही उनके चरणों में झुक गया l