संसार के कल्याण के लिए समय - समय पर वैज्ञानिकों ने ऋषि - महर्षियों ने विभिन्न अनुसन्धान एवं प्रयोग किये हैं l यह भी एक अनुसन्धान का विषय है कि वैज्ञानिक अनुसन्धान करने वाले चाहे संवेदनशील हों लेकिन जब उन अविष्कारों का प्रयोग किया जाता है तो सृजन कम और विनाश अधिक होता है l जैसे -- परमाणु बम के निर्माण के लिए उद्देश्य था कि जर्मनी के तानाशाह हिटलर को डराया जा सकेगा , उसकी विनाशक -हिंसक गतिविधि पर रोक लगेगी लेकिन इसका गलत प्रयोग हुआ और महाविनाश हुआ l इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में वैज्ञानिक मानव जाति के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए नई - नई दवाइयों आदि की खोज करते हैं , बनाते हैं लेकिन इनका प्रयोग जब मनुष्यों पर होता है तो एक ही दवा से कुछ स्वस्थ हो जाते हैं , कुछ और बीमार हो जाते हैं ----- क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक और मानसिक शक्ति भिन्न - भिन्न है l शारीरिक क्षमता का तो पता लगाया जा सकता है लेकिन मानसिक क्षमता को समझना आसान नहीं है क्योंकि हमारा मन वातावरण आदि अनेक बातों से प्रभावित होता है l यदि हमें विश्वास है तो दवा के रूप में पानी भी दिया जायेगा तो हम स्वस्थ हो जायेंगे लेकिन यदि भ्रष्टाचार आदि अनेक कारणों से हम दवा आदि के प्रति विश्वस्त नहीं हैं , हमारा मन उसे स्वीकार नहीं कर रहा है तो अच्छी से अच्छी दवा भी जीवन के लिए खतरा होगी l लेकिन आध्यात्मिक प्रयोगों से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वे मानव के लिए सदैव कल्याणकारी होते हैं , हमारे आध्यात्मिक ऋषियों की वैज्ञानिक देन है --- योग - विज्ञान। महर्षि पतंजलि व्याकरण शास्त्र - ध्वनिशास्त्र में विशेषज्ञ होने के साथ शरीर शास्त्र व चिकित्सा शास्त्र में प्रवीण थे इसके अतिरिक्त व्यवहार शास्त्र और मनुष्य की मनोदशाओं को सूक्ष्मता से समझने के विशेषज्ञ थे l उन्होंने अपने गुरु आत्रेय पुनर्वसु के नाम से लिखे शरीर चिकित्सा के ग्रन्थ का संशोधन कर उसे ' चरक - संहिता ' नाम दिया अर्थात ' चरैवेति ' -- जो गतिशील रहता है , वह नीरोगी होता है , समृद्धि को प्राप्त करता है l अपने जीवन के उत्तरकाल में उन्होंने मन , वाणी एवं काया के दोषों के निवारण के लिए योग - विज्ञान की रचना की l इसके लिए उन्होंने अपने शिष्यों के साथ अनेक जटिल - कठिन प्रयोग किए l प्रयोगों ने जिसे प्रामाणिक कहा , वही उनके लिए प्रामाणिक था l उनके द्वारा प्रवर्तित यह योग का वैज्ञानिक विधान उनके लिए था जो आस्तिक हैं , उनके लिए भी था जो नास्तिक हैं , इसके क्रियान्वयन में जाति , वर्ण , क्षेत्र , स्त्री - पुरुष का कोई प्रतिबन्ध नहीं था l जब यह ग्रन्थ पूर्ण हो गया तो उनके शिष्यों ने पूछा --- ' आचार्यवर ! आपके द्वारा रचित 195 सूत्रों में प्रमुख एवं प्रधान सूत्र क्या है ? ' महर्षि ने कहा ---- ' वह प्रथम सूत्र है -- ' अथ योगानुशासनम ' --- क्योंकि योग विज्ञानं उन्ही के लिए है , जो योग विज्ञानं के वैज्ञानिक प्रयोगों का अनुशासन स्वीकारते हैं l '
23 June 2021
WISDOM -------
चीन में एक लड़का अपनी दादी के साथ रहता था l दादी ने एक बगीचा लगा रखा था l एक दिन दादी बीमार हो गईं तो उन्होंने उसे बगीचे की देखभाल के लिए भेजा l अगले दिन उन्होंने बगीचे में जाकर देखा तो उन्हें पता चला कि उनके पोते ने किसी भी पेड़ की जड़ में पानी नहीं डाला l पौधे सूखते हुए दिखाई पड़ रहे हैं l उन्होंने उसे बुलाकर इसका कारण पूछा तो वह बोला ----- " दादी ! मैंने हर पौधे की पत्तियां पोंछी थीं और उनकी जड़ों में रोटी के टुकड़े भी डाले थे l " उसकी दादी बोलीं ---- " बेटा ! पेड़ों की जड़ों में रोटी के टुकड़े डालने से और पत्तियां पोंछने से पेड़ नहीं बढ़ते l तुम्हे पेड़ की जड़ों में पानी डालना चाहिए था l " लड़का सोच में पड़ गया l उसने दादी से पूछा --- " दादी ! क्या मनुष्य की भी जड़ें होती हैं ? " दादी बोलीं --- " हाँ बेटा ! हमारे मन के साहस में हमारी जड़ें होती हैं l जब इनको रोज पोषण दिया जाये तो हम ताकतवर बन सकते हैं l " उस लड़के ने फैसला किया कि वह अपने मन को साहस से भरपूर रखेगा l यही लड़का आगे चलकर चीन का राष्ट्राध्यक्ष , माओत्से तुंग बना l
22 June 2021
WISDOM -----
आयुर्वेद में वर्णन आता है ----- संसार के प्राणी रोगों से दुखी होकर हिमालय पहुंचे ल सभी ऋषि , महर्षि उनके साथ थे l देवराज इंद्र ने सभी का स्वागत किया और उनकी चिंता का समाधान करते हुए कहा कि --- ब्रह्मा ने सबसे पहले प्रजापति को आयुर्वेद का ज्ञान दिया l फिर प्रजापति ने अश्विनी कुमारों को और उन दोनों ने मुझे जन कल्याण हेतु आयुर्वेद का उपदेश दिया l इसके बाद इंद्र ने असंख्य दिव्य औषधियों की जानकारी दी एवं स्वयं चलकर सभी को दिखाया l इंद्र ने कहा ---- " इन औषधियों से मनुष्य तरुण रहेगा , शरीर वर्ण सुंदर होगा , बल की वृद्धि होकर सभी आकांक्षाएं पूर्ण होगीं l हमारा आयुर्वेद रत्नों की खान है l इंडोनेशिया में एक मान्यता है कि आयुर्वेद के सभी ग्रंथों के रचयिता श्री गणेश जी हैं l वहां प्रचलित धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार भगवान शिव बीमार पड़े तो उन्होंने नवग्रहों को बुलाकर अपनी चिकित्सा करने को कहा , किन्तु वे सभी असफल रहे l तब उनने संसार की सभी जड़ी बूटियों को बुलाया और कहा कि तुम अपने - अपने गुणों का बखान करो l जब यह क्रम चल रहा था तब गणेश जी इसे लिपिबद्ध कर रहे थे l यही विवरण ' प्रमानतरु ' नामक एक विशाल ग्रन्थ बन गया l इंडोनेशिया के सभी वैद्य इस पुस्तक को अपने पास रखते हैं एवं जड़ी - बूटियों से इलाज करते हैं l आयुर्वेद इंडोनेशिया में सर्वाधिक प्रचलित चिकित्सा पद्धति है l
WISDOM -----
डॉ. ए. पी. जे. कलाम अपनी रचना ' अदम्य साहस ' में लिखते हैं ----- " एक छात्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए मैंने कहा कि विज्ञान की कोशिश है कि लोगों का भौतिक जीवन बेहतर हो , जबकि अध्यात्म का प्रयास है कि प्रार्थना आदि उपायों से इनसान सच्ची राह चले l विज्ञान और अध्यात्म के मिलन से तेजस्वी नागरिक का निर्माण होता है l तर्क और युक्ति विज्ञान और अध्यात्म के मूल तत्व हैं l धार्मिक व्यक्ति का लक्ष्य आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करना है , जबकि वैज्ञानिक का मकसद कोई महान अविष्कार करना होता है l यदि जीवन के ये दो पहलू आपस में मिल जाएँ तो हम चिंतन के उस शिखर पर पहुँच जायेंगे , जहाँ उद्देश्य एवं कर्म एक हो जाते हैं l " -----------
21 June 2021
WISDOM -----
जाति प्रथा और छुआछूत की भावना से हमारे देश का कितना अहित हुआ है , यह संकीर्णता राष्ट्र के लिए कितनी घातक है , इसकी कल्पना नहीं की जा सकती ---- इसे स्पष्ट करता हुआ यह प्रेरणाप्रद दृष्टांत है ----- ग्यारहवीं शताब्दी का द्वितीय शतक l सोमनाथ पट्टन निवासी विजय भट्ट नामक विद्वान् जब अपने नित्य कर्म से निपटकर वेद पाठ करने बैठता , तो उसकी शूद्र सेविका का आठ वर्षीय पुत्र देवा उसे देखकर स्वयं भी वैसा ही विद्वान् बनने के सपने देखने लगा l एक दिन उसने डरते - डरते विजय भट्ट से उसे भी संस्कृत पढ़ाने का निवेदन किया l विजय भट्ट ने उसे कठोरता से उत्तर दिया ---- " तुम शूद्र हो l शूद्रों को देव भाषा पढ़ने और सुनने का अधिकार नहीं है l " विजय भट्ट की एक कन्या शोभना देवा की समवयस्क थी l देवा को पढ़ने की ललक थी l जब विजय भट्ट अपनी कन्या को संस्कृत पढ़ाते तो देवा मकान के एक कोने में छिप जाता और बड़े ध्यान से सब सुनता , समझता l जो कुछ समझ में नहीं आता , वह अवसर पाकर शोभना से पूछ लेता l बच्चों का मन निर्मल होता है , वह पिता की अनुपस्थिति में उसे सब बता देती l इस तरह जिज्ञासु देवा एक दिन संस्कृत पढ़ गया , धर्मशास्त्रों को समझने लगा , फिर उसने अपने समाज में ज्ञान का प्रसार करना आरम्भ किया l एक शूद्र द्वारा वेद मन्त्रों का उच्चारण करना , देव भाषा संस्कृत का अध्यापन करना रूढ़िवादी पंडितों को सहन नहीं हुआ l उन्होंने देवा को चेतावनी दी कि वह धर्म के विरुद्ध कार्य न करे l देवा ने उन्हें शास्त्रों का प्रमाण देकर बताया कि शूद्र जन्म से नहीं कर्म से होते हैं l लेकिन रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने उसे बहुत अपमानित किया और मारापीटा भी l अकारण ही इस अपमान और तिरस्कार की प्रतिक्रिया स्वरुप देवा के मन में प्रतिशोध की भावना उत्पन्न हो गई और उसके हृदय में सोमनाथ पट्टन के ब्राह्मणों से बदला लेने की आग धधक उठी l दुर्योग से अपमानित और तिरस्कृत देवा की भेंट महमूद गजनवी के एक गुप्तचर से हो गई l महमूद गजनवी सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण करना चाहता था , इसी उद्देश्य से उसने गुप्तचर भेजे थे l जब देवा ने अपने साथ हुए हिन्दू समाज के दुर्व्यवहार की चर्चा उसने की l तो गुप्तचर ने उससे कहा ---- ' तुम इतने विद्वान् हो , फिर भी इन लोगों ने तुम्हारा इतना तिरस्कार किया , तुम मुसलमान क्यों नहीं बन जाते ? हम तुम्हारे अपमान का बदला लेंगे l ' देवा के मन में बदले की आग थी उसने तुरंत इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और देवा से फतह मुहम्मद हो गया l पाटन नरेश भीमदेव चौलुक्य ने महमूद गजनवी के आक्रमण से सोमनाथ मंदिर की रक्षार्थ अपनी सेना सजा रखी थी l सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था के कारण महमूद गजनवी सोमनाथ पर अधिकार करने में सफल नहीं हो पा रहा था l देवा जो अपमान के कड़वे घूंट पीकर फतह मुहम्मद हो गया था वह सोमनाथ पट्टन के सब रहस्य जानता था उसने वह सब जानकारी और गुप्त द्वार का रास्ता महमूद गजनवी को बता दिया l गजनवी की पूरी सेना बाढ़ की तरह अंदर घुस गई , राजपूतों की हार हुई l सोमनाथ की मूर्ति तोड़ दी गई l असीमित धन सम्पदा , हीरे , जवाहरात सब लूटकर महमूद अपने साथ ले गया l यदि देवा का इतना अपमान नहीं किया होता तो वह क्यों महमूद गजनवी की सहायता करता l महमूद गजनवी की सफलता में यहाँ के लोगों की रूढ़िवादिता , छुआछूत व संकीर्ण मानसिकता सहायक हुई थी l
WISDOM -----
आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं , जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जहाँ विज्ञानं न पहुंचा हो l कब तूफ़ान आना है , कब चक्रवात मौसम आदि की भविष्यवाणी तो बहुत पहले से हो रही हैं l चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान के एक से बढ़कर एक कीर्तिमान हैं l पहले हैजा , चेचक , प्लेग , पोलियो आदि घातक महामारियों की भविष्वाणी नहीं होती थीं , वे अचानक आती थीं , उनके आने का और विशाल क्षेत्र को अपने चपेट में लेने का कारण भी स्पष्ट था l इसी कारण उनका प्रामाणिक इलाज हुआ , मानव समाज को इन बीमारियों से मुक्ति का रास्ता मिला l अब विज्ञानं में भविष्य को देखने की क्षमता है l अब भविष्यवाणी हो जाती है कि कौनसी महामारी कब आ रही है l लेकिन यह क्यों आ रही है ? मानव समाज की किन भूलों ने , किन गलतियों ने उसे आने का न्योता दिया है ? हर मर्ज का इलाज संभव है लेकिन जब कारण स्पष्ट होता है तभी उसका निवारण होता है l संसार में विद्वानों की , विषय विशेषज्ञों की कमी नहीं है l हृदय में संवेदना हो तो संसार की सभी समस्याएं सुलझ सकती हैं l पुराणों में अनेक उदाहरण हैं ---- जब समुद्र से रास्ता देने के लिए भगवान राम ने तीन दिन तक प्रार्थना की और उसने नहीं सुना तब भगवान ने अग्निबाण का संधान किया कि अब समुद्र को सुखाकर रास्ता लेंगे l इससे दसों दिशाओं में हाहाकार मच गया तब सब देवता , ऋषिगण उपस्थित हुए , समुद्र देवता ने उन्हें पुल बनाने का उपाय बताया l फिर अग्निबाण को भगवान ने निर्जन क्षेत्र में छोड़ा , कहते हैं वही क्षेत्र अब मरुस्थल है l इसी तरह पौराणिक युद्धों में जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग होता था तब सारे संसार में हाहाकार मच जाता था जीव जंतु , वनस्पति सब कुछ नष्ट होने लगता था तब देवतागण आकर दोनों पक्षों को समझाते , प्राणी मात्र की रक्षा का उपदेश देते तब वे अपने -अपने बाण वापस बुला लेते थे l आज भी संसार के किसी न किसी कोने में बड़े - बड़े प्रयोग होते है जिनकी प्रतिक्रिया स्वरुप वातावरण दूषित होता है लेकिन अब संवेदना , करुणा का महत्त्व समझाने भगवान नहीं आते , अब मनुष्यों को स्वयं जागरूक होना पड़ेगा l
20 June 2021
WISDOM------ समर्पण सक्रियता का नाम है
गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन का प्रसंग है ---- बात उस समय की है जब रामचरितमानस की रचना नहीं हुई थी l नवरात्री के दिनों में वे स्वयं वाल्मीकि रामायण का नौ दिन का पाठ कर रहे थे l उन दिनों के लिए उन्होंने यह निश्चय किया था कि भिक्षाटन नहीं करेंगे , अपनी कुटीर से सरयू नदी के तट तक आने जाने में कुछ मिल गया तो खा लेंगे अन्यथा मागेंगे नहीं l परायण का पांचवां दिन था , श्री नरहर्यानन्द जी वहां पधारे , उन्होंने तुलसीदास जी से सब हाल पूछा फिर कहा --- ' जब आप कहीं मांगने नहीं जायेंगे तो भोजन कहाँ से आएगा ? ' तुलसीदास जी बोले --- ' आएगा महाराज l यदि राम की अनुकम्पा हुई तो वे स्वयं लेकर आएंगे l इसी समर्पण योग का अभ्यास इन दिनों चल रहा है l ' श्री नरहर्यानन्द जी ने कहा ---- ' समर्पण की तुम्हारी परिभाषा अत्यंत संकीर्ण है , इससे तो संसार में निष्क्रियता पनपेगी , यह समर्पण योग नहीं है l जो समर्पण योग की दुहाई देकर निकम्मेपन का प्रपंच रचते हैं उनका इस लोक और परलोक कहीं भी कल्याण नहीं होता l समर्पण स्वार्थों का , इच्छाओं का , वासनाओं , तृष्णाओं और अहंताओं का होता है l समर्पण किसी को निष्क्रिय व निष्चेश्ट नहीं बनाता और न ही इसकी शिक्षा देता है l फिर भी जहाँ ऐसी निष्क्रियता दिखाई पड़े तो उसे ढकोसला ही समझना चाहिए l इसलिए तुम समर्पण के उच्च आदर्श को अपनाओं इसी में तुम्हारा और विश्व का कल्याण है l " तुलसीदास जी के आग्रह पर श्री नरहर्यानन्द जी ने उन्हें दीक्षा दी l उसी दिन तुलसीदास जी ने वाल्मीकि रामायण के परायण को अधूरा छोड़ा और समाज के लिए कुछ करने और देने की ललक से काशी चले गए l उनके मन में बड़ी उहापोह थी कि समाज को क्या दें ? एक दिन श्री हनुमान जी उनके सम्मुख प्रकट हुए और कहा ---- " आप अच्छे कवि हैं , फिर किस उधेड़बुन में पड़े हैं ? क्यों नहीं लोकभाषा में वाल्मीकि रामायण का प्रणयन कर डालते हैं l यह अद्भुत ग्रन्थ है , इससे समाज को प्रकाश मोलेगा और तुम्हारा यश दसों दिशाओं में फैलेगा ----------- -