पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " शत्रु को आधा कुचलकर छोड़ देने से वह प्राय: प्रतिशोध की ताक में रहता है और फिर से तैयार होकर आक्रमण कर सकता है l आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " दुष्ट शत्रु पर दया दिखाना अपना और दूसरों का अहित करना है l आजकल के व्यवहार शास्त्र का स्पष्ट नियम है कि दूसरों को सताने वाले दुष्ट जन पर दया करना , सज्जनों को दंड देने के समान है क्योंकि दुष्ट तो अपनी स्वभावगत क्रूरता और नीचता को छोड़ नहीं सकता , वह जब तक स्वतंत्र रहेगा और उसमें शक्ति रहेगी , वह निर्दोष व्यक्तियों को सब तरह से दुःख और कष्ट ही देगा l
31 August 2021
29 August 2021
WISDOM ----- मूर्ख के साथ मित्रता दुखदायी होती है
वाराणसी के शासक ब्रह्मदत्त का राजोद्यान देश - देशांतर के दुर्लभ एवं सुन्दर वृक्षों , लताओं का संग्रह था बोधिसत्त्व उसी उद्यान में सपरिषद विश्राम कर रहे थे l उस दिन नगर में एक भव्य उत्सव आयोजित था l बाग़ के मालिक को उत्सव देखने की लालसा थी l उद्यान में बंदरों का एक समूह था l बंदरों के नायक से माली की मैत्री थी l उसने नायक बन्दर को बुलाकर कहा --- " मित्र ! एक दिन तुम अपने समूह के साथ मिलकर उद्यान सींच दो तो मैं उत्सव देख आऊं l " बन्दर ने प्रसन्नता से कार्य करने का वचन दिया l माली चला गया तो नायक ने बंदरों से कहा ---" मित्रों , हमें विवेकपूर्ण सिंचन करना चाहिए , अन्यथा जल का अभाव हो जायेगा , तुम लोग पहले लताओं को उखाड़कर उनकी जड़ों की गहराई देख लो l जो जड़ जितनी गहरी हो , उसके अनुसार ही सिंचन करो l ' बंदरों ने शीघ्र ही लताएं उखाड़ डालीं l माली जब वापस आया तो उसने सिर पीट लिया और समझ गया कि मुर्ख से दोस्ती कितनी हानिकारक है l ऐसी ही एक लघु कथा है ----- एक राजा ने बन्दर से दोस्ती की l राजा जब दोपहर को कुछ देर सोता था तब वह बन्दर उसे पंखा झलता था l एक दिन राजा को गहरी नींद आ गई l बन्दर पंखा झलने लगा l अचानक राजा की नाक पर एक मक्खी आकर बैठ गई l बन्दर पंखा झलकर मक्खी को भगाने की कोशिश करने लगा l मक्खी बार - बार उड़ती और फिर राजा की नाक पर बैठ जाती l बन्दर को बहुत गुस्सा आई l वहीँ पास में राजा की तलवार रखी थी , उसने वह तलवार उठा ली और मन ही मन कहने लगा , -बैठने दो , मक्खी को , अब मैं देखूंगा l जैसे ही मक्खी राजा की नाक पर बैठी बन्दर ने तलवार से वार किया , मक्खी तो उड़ गई , [पर राजा लहूलुहान हो गया l इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि कभी भी किसी मूर्ख से मित्रता नहीं करनी चाहिए l
28 August 2021
WISDOM -----
दुर्बुद्धि का प्रकोप पतन की ओर ले जाता है l व्यक्ति जिस स्तर का है , वह उसी के अनुरूप क्षेत्र को अपनी दुर्बुद्धि की चपेट में ले लेता है l दुर्बुद्धि को मनुष्य अपनी कमजोरियों के कारण स्वयं आमंत्रित करता है l ' महाभारत ' का यह प्रसंग इस सत्य को स्पष्ट करता है ------ ' भोगविलास , जुआखोरी , नशा आदि ऐसे व्यसन हैं कि उनसे होने वाली बुराइयों को जानते हुए भी लोग उनके चक्कर में आ जाते हैं l धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था l इंद्रप्रस्थ के वैभव से दुर्योधन को बहुत ईर्ष्या थी , वह उन्हें आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकता था , इसलिए उसने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर धृतराष्ट्र को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे युधिष्ठिर को चौसर खेलने के लिए आमंत्रित करें l उन दिनों क्षत्रियों में यह नियम था कि खेल के लिए बुलावा मिलने पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता था l फिर युधिष्ठिर को चौसर का व्यसन भी था l खेल शुरू हुआ , दुर्योधन तुरंत बोल उठा --- मेरी जगह मामा शकुनि खेलेंगे लेकिन दांव लगाने के लिए जो धन - रत्न आदि चाहिए वह मैं दूंगा l पासे तो शकुनि के इशारे पर चलते थे l इंद्रप्रस्थ में अपार वैभव था l सम्राट युधिष्ठिर ने दांव लगाना शुरू किया ---- पहले रत्नों की बाजी लगी , फिर सोने - चाँदी के खजानों की , फिर रथों और घोड़ों की , तीनो दांव हार गए l युधिष्ठिर ने नौकर - चाकरों को दांव पर लगाया , फिर सारी सेना और हाथी - घोड़ों की बाजी लगा दी , सब हार गए खेल में युधिष्ठिर एक - एक कर के अपने सारे वैभव की बाजी लगाते गए , यहाँ तक कि अपने देश और देश की प्रजा को भी खो बैठे l लेकिन उनका चस्का न छूटा l शकुनि कपटी था , उसने कहा - अभी तो तुम्हारे चार वीर भाई हैं , उन्हें दांव पर क्यों नहीं लगते l एक - एक कर के युधिष्ठिर ने नकुल , सहदेव , भीम , अर्जुन और उनके शरीर पर जो वस्त्र - आभूषण थे सबको दांव पर लगा दिया , यह बाजी भी हार गए और अंत में स्वयं को भी हार गए l शकुनि ने सभा में खड़े होकर घोषणा की कि अब पाँचों पांडव उसके गुलाम हो चुके हैं l शकुनि बड़ा दुष्टात्मा था , उसने युधिष्ठिर से कहा --- अभी तुम्हारे पास एक चीज और है जो तुमने हारी नहीं है और वो है तुम्हारी पत्नी द्रोपदी , तुम उसको दांव पर क्यों नहीं लगाते ? उसकी बाजी लगाओ तो अपने आप को भी छुड़ा सकते हो l " जुए के नशे में चूर युधिष्ठिर के मुँह से निकला --- ' चलो , अपनी पत्नी द्रोपदी की भी बाजी लगाईं l ' शकुनि यही चाहता था ' तो यह चला ' कहते हुए उसने पासा फेंका और बोला ---- ' लो यह बाजी भी मेरी ही रही l ' अब दुर्योधन बोला ---- ' द्रोपदी अब महारानी नहीं , हमारी दासी है , उसे सभा में ले आओ ------------- विदुर जी ने कहा ---- युधिष्ठिर स्वयं को हार चुके थे , वे स्वयं गुलाम हो गए थे इसलिए उन्हें द्रोपदी को दांव पर लगाने का कोई हक नहीं l ' लेकिन जब व्यक्ति दूसरों का और विशेष रूप से अपनी ही कमजोरियों का गुलाम हो जाता है तो उसको आत्मविश्वास कम हो जाता है तब चालाक और छल -कपट करने वाले इसका फायदा उठाकर नीति और न्याय विरुद्ध कार्य करते हैं l परिणाम ---- महाभारत , विनाश !
27 August 2021
WISDOM -----
समर्थ गुरु रामदास सतारा जा रहे थे l मार्ग में उनका शिष्य भोजन लेने पास के गाँव में गया l उसे लगा कि रास्ते में देर हो सकती है तो खेत से चार भुट्टे तोड़ लाया l उसने भुट्टों को भूनकर स्वामी जी को दिया l धुआँ उठता देख खेत का मालिक भागा -भागा आया और समर्थ स्वामी के हाथ में भुट्टे देखकर उन्हें ही डंडे से मारने लगा l शिष्य कुछ बोलता तो उसे चुप कर समर्थ गुरु ने मार खा ली l दूसरे दिन वे सतारा पहुंचे l उनकी पीठ पर डंडे के निशान थे l शिष्य ने भी वहां पहुंचकर सारी घटना बता दी l छत्रपति तक यह विवरण पहुंचा l उनने सेनानायक से पता लगवा लिया कि यह अपराध किसके द्वारा हुआ है l अभी तक समर्थ गुरु रामदास कुछ बोले न थे l छत्रपति शिवाजी गुरु को प्रणाम करने आये तो वह खेत का मालिक भी पीछे -पीछे लाया गया l शिवाजी ने पूरे राज्य की ओर से क्षमा मांगते हुए पूछा ---- " गुरुवर ! इसे क्या दंड दूँ ? " खेत का मालिक गुरु के चरणों में जा गिरा l समर्थ बोले ---- " इसने हमारे धैर्य और सहन शक्ति की परीक्षा ली l इसने अपना कर्तव्य निभाया है l इसे दंड न देकर चार भुट्टों का हरजाना नगद राशि के रूप में तथा एक कीमती वस्त्र देकर सम्मानित करना चाहिए l " न्याय का यह विलक्षण रूप देखकर छत्रपति गुरु के चरणों में झुक गए l
WISDOM ------
कहते हैं -- जो ' महाभारत ' में है वही इस धरती है l व्यक्ति अपने संस्कार के अनुरूप ही उससे सीखता है l महाभारत का प्रसंग है ---- दुर्योधन के गुरु द्रोणाचार्य से ऐसा कहने पर कि कौरव पक्ष के के अनेक वीर युद्ध में मारे गए लेकिन पांडव पक्ष का ऐसा कोई नुकसान नहीं हुआ , कहीं ये आपका अर्जुन के प्रति मोह तो नहीं ? तब गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की , इस चक्रव्यूह में भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा और अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को सात महारथियों ने मिलकर मार डाला l आसुरी प्रवृति के लोग इसी तरह कभी जाति के आधार पर , कभी धर्म के आधार पर , कभी अपनी विकृत मानसिकता के कारण ऐसे ही कलियुगी चक्रव्यूह रचते हैं l विज्ञान के आविष्कारों ने और संवेदनहीन ज्ञान ने इन चक्रव्यूह का घेरा बहुत बड़ा कर दिया है और धनवानों के लालच व महत्वाकांक्षा ने इस घेरे को मजबूत कर दिया है l कलियुग में दुर्बुद्धि का प्रकोप होता है l पहले घातक हथियारों का निर्माण होता था असुरता के अंत के लिए लेकिन अब संसार पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए , लोगों का दिल जीतकर नहीं , उन्हें डरा - धमका कर अपने नियंत्रण में रखने के लिए घातक हथियार बनते हैं ----- फिर जब बन गए तो उनको बेचना भी जरुरी है ----- अब जब तक उनका प्रयोग नहीं होगा , तब तक और ज्यादा कैसे बिकेंगे ? लाभ कैसे होगा ? यह चक्रव्यूह महाभारत की तरह किसी एक दिन का युद्ध नहीं है l यह तो तब तक चलेगा जब तक लोगों के हृदय में संवेदना नहीं जागेगी l जब मनुष्य में विवेक का जागरण होगा , सद्बुद्धि आएगी तभी यह चक्रव्यूह टूटेगा l शक्ति का सदुपयोग नहीं होगा तो मानवता को नष्ट होने में देर नहीं लगेगी l
26 August 2021
WISDOM -----
एक गाड़ीवान हनुमान जी का बड़ा भक्त था l नित्य उनके मंदिर में दर्शन को जाता था और वहां बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करता था , ताकि हनुमान जी अपने कानों से सुन लें l एक दिन गाड़ीवान अपनी गाड़ी लेकर कहीं दूर गाँव जा रहा था l वर्षा के दिन थे l सड़क जगह - जगह से टूटी हुई थी , गड्ढ़ों में पानी भरा था l रास्ते में एक जगह भारी कीचड़ भरा हुआ था , पहिये उसमें फँस गए l बैल उसे खींच नहीं पा रहे थे l वह स्वयं कीचड़ में उतारकर गाड़ी खींचना नहीं चाहता था l फिर गाड़ी बाहर कैसे निकले l गाड़ीवान उसी में बैठकर जोर - जोर से हनुमान चालीसा पढ़ने लगा l उसका अभिप्राय था कि हनुमान जी आएं और उसकी गाड़ी बाहर निकालें l पाठ करते - करते बहुत देर हो गई , पर हनुमान जी नहीं आए l वह झल्लाने लगा और बुरा बोलने लगा l एक किसान पास के खेत में हल जोत रहा था l उसने यह तमाशा देखा और बोला ---- " मूर्ख ! हनुमान जी तो अनदेखे पर्वत को उखाड़ लाए थे l तू उनका भक्त बनता है तो कीचड़ में उतारकर पहिये को जोर क्यों नहीं लगाता , ताकि धकेले जाने पर वे आगे बढ़ें l हनुमान जी ने तो समुद्र पार कर लिया , तुझसे कीचड़ में नहीं उतरा जाता l " अंध भक्त को चेत हुआ l उसने अपनी गलती समझी और कीचड़ में उतरा l पहिये को जोर लगाया , गाड़ी आगे चली और कीचड़ के पार हो गई l जो काम अपने पुरुषार्थ से हो सकता है , उसके लिए आलसी बनकर देवता को क्यों पुकारा जाये ?
25 August 2021
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " मनुष्य में अच्छाइयां भी होती हैं और बुराइयां भी होती हैं , न कोई पूर्ण रूपेण अच्छा है , और न कोई बिलकुल बुरा l गुण , कर्म स्वाभाव में हर मनुष्य दूसरे से भिन्न होता है किन्तु यदि सामाजिक हित पर व्यक्तिगत इच्छाओं , आकांक्षाओं को वारे जाने का दृष्टिकोण अपनाने पर उसका यह मिश्रित स्वरुप भी उपयोगी और चिरस्मरणीय बन सकता है l l " स्टालिन उसका सटीक उदाहरण है l मार्क्स की पुस्तक ने स्टालिन को क्रांतिकारी बना दिया l उन दिनों रूस की सामाजिक दशा बहुत बिगड़ी हुई थी l जार के अत्याचारों से जनता त्रस्त थी l जार के निरंकुश शासन से मुक्ति दिलाने के लिए स्टालिन ने अपने जीवन के स्वर्णिम 20 वर्ष समर्पित किए l इस दौरान स्टालिन को गालियाँ, चाबुक , मार , यंत्रणाएँ सभी कुछ सहना पड़ा l इस अवधि में उसे उत्तरी ध्रुव से लगी रूस की सीमा के एक गाँव में जेल में रखा गया l इस गाँव के दो सौ मील तक कोई बस्ती नहीं थी , कड़ाके की ठण्ड पड़ती थी l ऐसी भयंकर जेल में स्टालिन ने चार वर्ष गुजारे l जारशाही का अंत हुआ , फिर लेनिन की मृत्यु के बाद शासन सत्ता स्टालिन के हाथ में थी लेकिन उसने अपने कष्ट , त्याग और बलिदान का मुआवजा सुख - वैभव के रूप में नहीं लिया , वह नौकरों के रहने वाले क्वार्टर में ही रहते थे , उन्ही के जैसा खाना खाते थे l आत्मप्रशंसा और आत्म विज्ञापन से वह कोसों दूर था l