पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " स्वर्ग और नरक कोई स्थान नहीं , बल्कि मन: स्थितियां हैं , जिनके कारण मनुष्य के जीवन में सुखद या दुःखद परिस्थितियां बनती हैं l " मनुष्य के जीवन में ऐसा संभव नहीं है कि हमेशा पूर्ण रूप से वह सुखी रहे l कोई न कोई कष्ट , कठिनाइयाँ निरंतर बनी रहती हैं l यदि हमारी सोच सकारात्मक है तो हम उन दुःख और कष्टों में भी सुख की कोई किरण खोजकर अपने मन को शांत रख सकेंगे लेकिन यदि मन नकारात्मक विचारों से घिरा हुआ है तो थोडा सा कष्ट भी मनुष्य को विचलित कर देता है और अपनी नकारात्मक सोच से वह उस कष्ट को और अधिक विशाल बना देता है , जीवन कष्टप्रद हो जाता है l इसलिए जरुरी है कि हम दुःख और कष्ट को नहीं उसके पीछे छुपे सुख को ढूंढें , देखें l ईश्वर ने हमें जो दिया है उसके लिए ईश्वर को हर पल धन्यवाद दें , इससे जीवन धीरे -धीरे सुखमय होता जायेगा l एक कथा है ----- भगवान के तीन सच्चे भक्त मंदिर में भगवान को धन्यवाद दे रहे थे l एक ने कहा --- " प्रभु ! आप आप बड़े कृपालु हैं l आप का लाख -लाख धन्यवाद कि मेरी पत्नी बहुत धार्मिक है , वह मेरे पूजा , पाठ , यज्ञ , हवन , सत्संग में कभी बाधक नहीं बनती l मैं एकाग्र होकर पूजा , ध्यान , दान -पुण्य सब करता हूँ और आनंद पूर्वक जीवन जीता हूँ l " दूसरा भक्त कह रहा था --- " हे प्रभु ! आपने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया कि मुझे कर्कशा पत्नी मिली l वो इतनी कर्कशा है की मुझे विरक्ति हो गई और मैं आपके ध्यान , चिन्तन में लीन हो सका l यदि पत्नी प्रेम करने वाली होती तो मैं उसकी आसक्ति में डूब जाता और आपसे दूर हो जाता l इसलिए हे प्रभु आपका बारंबार धन्यवाद , आपने मुझे सद्बुद्धि दी कि मैं अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए आपका ध्यान कर सकूँ l ध्यान से मुझे सच्चा आनंद मिलता है l " तीसरा भक्त भगवान से कह रहा था --- हे प्रभु ! आप ने मुझ पर बड़ी कृपा की l मेरे तो बीबी -बच्चे ही नहीं हैं , जो आपके और मेरे बीच दीवार बनते l मेरा मन और जीवन आप के चरणों में समर्पित है l आपकी पूजा और ध्यान से मुझे जो आत्मिक सुख मिलता है , वह बीबी -बच्चों और धन -दौलत से नहीं मिल पाता l " ---- महात्मा जी ने लोगों को समझाया कि देखो ! अलग -अलग परिस्थितियों में रहते हुए भी ये तीनों प्रसन्नचित , ईश्वर के प्रति कृतज्ञ और भक्ति में लीन हैं l इनके मन में ईश्वर के प्रति या परिस्थिति के प्रति कोई शिकायत नहीं है l आचार्य श्री कहते हैं --- ' परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों , हमें अपनी मन: स्थिति ठीक और सकारात्मक रखना चाहिए l "
30 December 2024
29 December 2024
WISDOM ----
पुराण की विभिन्न कथाएं हमें जीवन जीना सिखाती हैं l मनुष्यों में ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार , स्वार्थ , लालच , बदले की भावना आदि ऐसे दुर्गुण हैं जिनके वशीभूत होकर वह लोगों को पीड़ा , दुःख देने वाला व्यवहार करता है l लेकिन जो इस सत्य को समझता है कि जिसके पास जो है वह वही देगा , इसलिए हमें मान -अपमान में तटस्थ रहना चाहिए , उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है तभी हम शांति से जी सकेंगे l ----- राजा उत्तानपाद के दो रानियाँ थीं , सुनीति और सुरुचि l राजा छोटी रानी सुरुचि को चाहते थे और उसकी अनुचित बातों का भी समर्थन करते थे l एक दिन सुरुचि का पुत्र उत्तम राजसभा में महाराज की गोद में बैठा था , उसी समय बड़ी रानी सुनीति का पांच वर्षीय पुत्र ध्रुव भी खेलते हुए आए और महाराज की गोद में बैठ गए l यह देखकर सुरुचि को बहुत ईर्ष्या हुई , उसने तुरंत ध्रुव को राजा की गोद से खींचकर उतार दिया और फटकारते हुए कहा --- " महाराज की गोद में बैठना है तो मेरी कोख से जन्म लेना होगा l " महाराज और सारी सभा चुप देखती रही और ध्रुव अपमानित होकर रोते हुए अपनी माँ सुनीति के पास गए और सब बात कही l तब माँ ने समझाया ----- " पुत्र ! पिता की गोद से सौतेली माँ तुम्हे उतार सकती है लेकिन जो परम पिता की गोद में बैठता है उसे उनकी गोद से कोई नहीं उतार सकता l इस स्रष्टि के राजा भगवान हैं , उन्ही परम पिता को तुम पुकारो , प्रार्थना करो l वे तुम्हारी प्रार्थना अवश्य सुनेंगे l माता की प्रेरणा से पांच वर्षीय बालक ध्रुव तपस्या के लिए वन की ओर चल पड़े , सारे महल में हाहाकार मच गया l राजा ने और सभी ने उन्हें वापस लौटने के लिए बहुत प्रयास किया लेकिन ध्रुव का निश्चय अटल था l मार्ग में उन्हें नारदजी मिल गए l उन्होंने ध्रुव को मन्त्र और ध्यान आदि की सब विधि समझा दी l बालक ध्रुव की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान उनके सामने प्रकट हो गए और ध्रुव को वरदान दिया कि दीर्घकाल तक राज्य भार स्संभालना होगा फिर तुम्हे वह अटल , स्थिर ध्रुव पद प्राप्त होगा जहाँ से तुम्हे कोई हटा नहीं सकेगा और संसार को दिशा प्राप्त होगी l
28 December 2024
WISDOM -----
कहते हैं कि इस संसार में एक पत्ता भी हिलता है तो वह ईश्वर की मर्जी से हिलता है लेकिन जो अहंकारी हैं , शराफत का मुखौटा लगाकर रहते हैं , लोगों को बिना वजह सताते हैं , उत्पीड़ित करते हैं , धोखा देना , हक छीनना , किसी को सुख -चैन से जीने न देना ---- जैसे घ्रणित अपराध करते हैं , वे सोचते हैं कि वे ही भगवान हैं , जो चाहे वह कर सकते हैं , अपने धन और शक्ति से वे कानून से भी बच सकते हैं और ऐसा होता भी है लेकिन वे यह नहीं जानते कि ईश्वर हजार आँखों से उनके हर कर्म को देख रहा है l जो पाप कर्म करते हैं उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है , वे स्वयं अपने हर गलत कदम से अपने पाप के घड़े को भरते जाते हैं l ईश्वर चाहते हैं कि दुनिया में अच्छाई हो , लोग शांति से रहें इसलिए ऐसे लोगों को सुधरने के अनेक मौके भी देते हैं l कुकर्म करते रहने से उनके पाप का घड़ा पूरा भर जाता है और पुण्य का खाली हो जाता है और तब उन्हें ईश्वर की लाठी पड़नी शुरू हो जाती है l यह सब ईश्वरीय विधान है किसी को कष्ट , दुःख , पीड़ा देकर उसे सद्बुद्धि भी देते हैं कि इन कष्टों को चुनौती मानकर अपने व्यक्तित्व को निखारो , कष्टों की अग्नि में तपकर स्वर्ण बनो और दूसरी ओर पापियों की बुद्धि भ्रष्ट कर उन्ही के हाथों उनका पाप का घड़ा भरवा देते हैं और फिर उन्हें पापों का दंड देते हैं l जो भी व्यक्ति ईश्वर के इस विधान को समझ जाता है , वह सिर्फ ईश्वर से ही भय खाता है , वह संसार में किसी से नहीं डरता है l
27 December 2024
WISDOM ------
विज्ञान ने हमें सुख - सुविधा के अनेकों साधन दिए हैं लेकिन विज्ञानं के पास वो तकनीक नहीं है जो मनुष्य को शांति और आनंद दे सके l संसार में अनेक लोग ऐसे हैं जिनके पास शक्ति है , पद , प्रतिष्ठा , सुख -वैभव , भोग -विलास के सब साधन हैं लेकिन उनके मन में शांति नहीं है , जीवन में आनन्द नहीं है l शांति और आनंद के अभाव में व्यक्ति जितने बड़े क्षेत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है उतने क्षेत्र में अशांति को फैलाता है l मानव जाति के इतिहास में युद्ध और रक्तपात का हिस्सा सबसे अधिक है जो मनुष्यों के अशांत मन का ही परिणाम है l बाहरी शांति के लिए भीतर से शांत होना बहुत जरुरी है लेकिन इस महत्वपूर्ण तथ्य पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया l जीवन में संतुलन जरुरी है l एक पक्षीय विकास में विनाश के बीज विद्यमान होते हैं , बुद्धि बेलगाम हो जाती है , मनुष्य स्वयं ही अपने पतन के मार्ग पर चल देता है l
25 December 2024
WISDOM -------
यह संसार कर्मभूमि है l यदि हमें विधाता के बनाए इस कर्म विधान को समझना है तो ' महाभारत ' का अध्ययन -मनन अवश्य करना चाहिए l हम सबसे जाने -अनजाने अनेक गलतियाँ हो ही जातीं हैं उनके परिणाम स्वरुप जीवन में सुख -दुःख आते रहते हैं और जीवन अपनी गति से चलता रहता है l लेकिन जो अपराध सोच -समझकर , योजनाबद्ध तरीके से , षड्यंत्र रचकर , धोखा देकर किए जाते हैं , उन अपराधों की कोई क्षमा नहीं मिलती और वैसे भी प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l दुर्योधन आदि कौरवों ने बचपन से ही पांडवों के विरुद्ध अनेक षड्यंत्र रचे , हर पल उन्हें अपमानित किया , उनका हक छीना , चौसर के खेल में छल से पांडवों को पराजित कर द्रोपदी को अपमानित किया l अत्याचार की अति हो गई l इस अति का अंत तो होना ही था l पांडवों ने अपने जीवन की डोर भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में सौंप दी l ईश्वर की प्रेरणा से ही महाभारत का महायुद्ध रचा गया , कौरव वंश समूल नष्ट हो गया l जिसने भी कौरवों का साथ दिया , उन सबका अंत हो गया l कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है l परिवारों में , संस्थाओं में , समूचे संसार में --- जहाँ कहीं भी अशांति है , वहां उसके पीछे किसी न किसी का अहंकार है l रावण , दुर्योधन और उनके जैसा कोई भी अहंकारी हो उसके पास बाहरी सुख -वैभव अवश्य होता है लेकिन उनके मन में शांति नहीं होती l अपने अहंकार के पोषण के लिए उनके भीतर एक आग सी जलती रहती है l अब वो महाभारत का युग बीत गया l अब जरुरी है कि मनुष्य का विवेक जागे l इतनी हाय -तौबा किस लिए ? यदि मन की शांति नहीं है तो सुख -वैभव का यह दिखावा किस लिए ? ईश्वर ने हमें चयन की स्वतंत्रता दी है , यह निर्णय हमें ही करना है कि हम कौरवों के मार्ग पर चलें या पांडवों की तरह सत्य और धर्म के मार्ग पर चलें l मार्ग तो दोनों ही कठिन हैं , अंतर केवल इतना है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से ईश्वर की प्रत्यक्ष कृपा का लाभ मिल जाता है l
17 October 2024
WISDOM -----
इस धरती पर ही नहीं , देवलोक में भी इन्द्रासन के लिए देवताओं और असुरों में युद्ध छिड़ा रहता है l अहंकार , अति की महत्वाकांक्षा , स्वार्थ , लालच सुख -भोग की लालसा ---- ऐसे अनेक कारण इन युद्धों के लिए उत्तरदायी हैं l त्रेतायुग , द्वापर युग में असुरों की एक पहचान थी l अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए युद्ध हुआ करते थे l उन युद्धों में कायरता नहीं थी , वे निर्दोष प्राणियों , महिलाओं , बच्चों , गर्भ में पल रहे बच्चों पर आक्रमण नहीं किया करते थे लेकिन अब असुरता लोगों के भीतर समा गई है , धर्म और अधर्म का भेद करना मुश्किल है l नैतिकता और मर्यादा अंधकार में खो गई है l अब पापकर्म कर के भी व्यक्ति ठप्पे से समाज में रहते हैं और सम्मान पाते हैं l अब देवत्व तो मुट्ठीभर हैं , असुरता सम्पूर्ण धरती पर व्याप्त है l इस युग में न्याय ' जिसकी लाठी उसकी भैंस ' है , ईश्वर के दरबार में भी अनेक कारणों से अपराधियों को दंड देने में बहुत देर लगती है , इस कारण असुरता को फलने -फूलने का पर्याप्त मौका मिल जाता है l धरती माँ , प्रकृति , सम्पूर्ण पर्यावरण इस असुरता से दुःखी है l
WISDOM -------
एक गुरु के दो शिष्य थे l दोनों ही बड़े ईश्वर भक्त थे l ईश्वर उपासना के बाद वे आश्रम में रोगियों की चिकित्सा में गुरु की सहायता किया करते थे l एक दिन उपासना के समय ही कोई कष्ट से पीड़ित रोगी आ पहुंचा l गुरु ने पूजा कर रहे शिष्यों को बुलाने के लिए आदमी भेजा l शिष्यों ने कहलवा भेजा कि अभी थोड़ी पूजा बाकी है , पूजा समाप्त होते ही आ जाएंगे l ' गुरूजी ने दोबारा फिर आदमी भेजा l इस बार शिष्य आ गए , पर उन्होंने अकस्मात बुलाए जाने पर असंतोष ब्यक्त किया l गुरु ने कहा --- " मैंने तुम्हे इस व्यक्ति की सेवा के लिए बुलाया था l प्रार्थनाएं तो देवता भी कर सकते हैं , किन्तु कष्ट पीड़ितों की सहायता तो मनुष्य ही कर सकते हैं l सेवा , प्रार्थना से अधिक ऊँची है क्योंकि देवता सेवा नहीं कर सकते l " शिष्य अपने कृत्य पर बड़े लज्जित हुए और उस दिन से प्रार्थना की अपेक्षा सेवा को अधिक महत्त्व देने लगे l
11 October 2024
WISDOM -----
मानव जीवन सरल नहीं है , समस्याओं से घिरा हुआ है l व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब हो , किसी भी जाति या धर्म का हो , किसी भी देश का रहने वाला हो , सब की अपनी समस्याएं हैं l इन समस्याओं से भागकर चैन नहीं है , आप इनसे भागेंगे तो ये पीछा नहीं छोड़ेंगी , किसी न किसी रूप में ये सामने आएँगी l यह कर्मों का भुगतान है जो हमें चुकाना ही पड़ता है l इसलिए हम समस्याओं से भागें नहीं , हम जागरूक हों , अपनी विवेक बुद्धि को जगाएं और ' समाधान ' पर ध्यान केन्द्रित करें l ----- एक बार चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस अपने कुछ शिष्यों के साथ ताई नामक पहाड़ी से कहीं जा रहे थे l एक स्थान पर वे सहसा रुक गए और शिष्यों से कहा ---- " कहीं पर कोई रो रहा है l " इतना कहकर वे जिस दिशा से रोने की आवाज आ रही थी उस ओर चल पड़े l शिष्यों ने भी उनका अनुगमन किया l कुछ दूर जाकर उन्होंने देखा कि एक स्त्री रो रही है l उन्होंने बड़ी सहानुभूति से उससे रोने का कारण पूछा l स्त्री ने बताया कि इसी स्थान पर उसके पुत्र को चीते ने मार डाला l कन्फ्यूशियस ने कहा ----- " किन्तु तुम अकेली ही दीखती हो तुम्हारे परिवार के अन्य सदस्य कहाँ हैं ? " स्त्री ने दुःखी होकर कहा --- " अब उसके परिवार में है ही कौन l इस पहाड़ी पर उसके ससुर और पति को भी चीते ने फाड़ डाला था l " कन्फ्यूशियस ने बड़े आश्चर्य से कहा --- " तो तुम इस भयंकर स्थान को छोड़ क्यों नहीं देतीं ? " स्त्री बोली -- " इस स्थान को इसलिए नहीं छोड़ती क्योंकि यहाँ पर किसी अत्याचारी का शासन नहीं है l " महात्मा कन्फ्यूशियस यह सुनकर चकित हो गए l उन्होंने अपने शिष्यों से कहा --- " निश्चित रूप से यह स्त्री करुणा और सहानुभूति की पात्र है l इसकी बात ने हम लोगों को एक महान सत्य प्रदान किया है l वह यह है कि अत्याचारी शासक , एक चीते से अधिक भयंकर होता है l अत्याचारी शासन में रहने की अपेक्षा अच्छा है कि किसी पहाड़ी अथवा वन में रह लिया जाए , किन्तु यह व्यवस्था सार्वजनिक नहीं हो सकती l इसलिए जनता को चाहिए कि सत्ताधारी को अपना सुधार करने के लिए विवश करने का उपाय करे l अत्याचारी शासन को भय के कारण सहन करने वाला समाज किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता l विकासहीन जीवन बिताता हुआ वह युगों तक नारकीय यातना भोगा करता है और सदा अवनति के गर्त में पड़ा रहकर जिस -तिस प्रकार का जीवन व्यतीत करता रहता है l इसलिए अनिवार्य है कि जनता जागरूक रहे l "
9 October 2024
WISDOM -----
जानसन नामक एक सज्जन अपने उत्साहित कर देने वाले भाषणों के कारण जाने जाते थे l एक बार ब्रिटेन के एक कसबे में उनका भाषण होने वाला था l उन्हें लेने के लिए एक व्यक्ति कार से स्टेशन आया l कार में बैठकर उसने एक भारी कपड़ा अपने सिर पर बाँध लिया l कार चलाते -चलाते वह बार -बार अपना सिर खिड़की के आगे कर लेता l जानसन ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा ---- "खिड़की का शीशा खराब है l आपको ठंडी हवा से बचाने के लिए ऐसा कर रहा हूँ l " जानसन ने उससे कहा ---- " मेरे लिए इतना कष्ट उठाने की आवश्यकता तुम्हे नहीं है l " वह बोला ----- " आपके लिए कष्ट उठाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है l किसी समय मैं भिखारी था l एक दिन मैंने आपका उद्बोधन सुना और उससे इतना प्रेरित हुआ कि मेरा जीवन बदल गया l आज मैं जो कुछ भी हूँ , आपके कारण हूँ l " शब्द यदि प्रेरणादायक हों तो मनुष्य को नवजीवन दे सकते हैं l
4 October 2024
WISDOM ------
राजा ऋषभ देव के 100 पुत्र थे l उन्होंने यह व्यवस्था कर दी थी कि उनकी मृत्यु उपरांत ज्येष्ठ पुत्र भरत को राजगद्दी दी जाए और शेष पुत्र गृह त्याग कर संन्यासी हो जाएँ l पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वरिष्ठ पुत्रों ने संन्यास ले लिया l बाहुबली को यह निर्णय स्वीकार नहीं हुआ l उसने भरत के साथ ज्ञान की प्रतियोगिता रखवाई l उसमें वह जीत गया l इससे भरत को ईर्ष्या हुई l उसने बाहुबली को युद्ध के लिए ललकारा l बाहुबली ताकतवर था l उसने जैसे ही भरत को मारने के लिए हाथ उठाया , उसे यह विचार आया कि यदि मैंने अपने भाई के प्राण लेकर राजगद्दी संभाली तो राज्य की जनता यही कहेगी कि जो राजा बनने के लिए अपने भाई का खून कर सकता है , वह जनता की सेवा क्या करेगा ? वह महत्वाकांक्षा को त्यागकर भरत को राजगद्दी सौंपकर मानवता की सेवा हेतु चल पड़ा और तीर्थंकर कहलाया l
3 October 2024
WISDOM -----
एक किसान ने अपनी गाड़ी में बैलों की जगह भैंसों को जोत दिया l उसके संगी -साथियों ने उसे बहुतेरा समझाया , पर उसे कुछ भी समझ नहीं आया , वह बोला ---- " तुम लोग लकीर के फकीर हो l कौन सी किताब में लिखा है कि भैंस से खेत नहीं जोत सकते l भैंसों में ज्यादा ताकत होती है , म मैं तो इन्ही से काम लूँगा l " बड़े शान से वह भैंसों को लेकर खेतों की ओर चल पड़ा l रास्ते में दलदल पड़ा तो भैंसे रास्ता बदलकर दलदल में जा घुसे l किसान ने लाख कोशिश की लेकिन भैंसों पर कोई असर नहीं l सूरज ढलने पर वे खुद बाहर निकल आए l किसान के मित्र बोले ---- " परंपरा का आँख मूंदकर पालन करना सही नहीं है , पर जो सत्य सामने खड़ा हो , उससे मुँह फेर लेना मूर्खता है l अब किसान को बात समझ में आई l
30 September 2024
WISDOM ----
यमराज ने एक बार मृत्यु को एक क्षेत्र से पांच हजार आदमी मारकर लाने के लिए भेजा l जब वह झोली भरकर लाई तो गिनने पर वो पंद्रह हजार निकले l जवाब तलब हुआ कि इतने अधिक क्यों ? मृत्यु ने सबूत सहित सिद्ध किया कि बीमारी से तो पांच हजार ही मरे हैं l शेष तो डर के मारे बिना मौत ही मर गए और परलोक आने वाली भीड़ के साथ जुड़ गए l
29 September 2024
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " कायरता मनुष्य का बहुत बड़ा कलंक है l कायर व्यक्ति ही संसार में अन्याय , अत्याचार तथा अनीति को आमंत्रित किया करते हैं l संसार के समस्त उत्पीड़न का उत्तरदायित्व कायरों पर है l " कलियुग की अनेक विशेषताएं हैं लेकिन यह एक ऐसी विशेषता है जिससे कोई भी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी संस्था , संगठन , कार्यालय , कला, साहित्य , राजनीति ------- आदि कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं बचा है l लोग स्वयं को सर्वश्रेष्ठ , सभ्य , संभ्रांत दिखाने के चक्कर में भीतर से खोखले हो गए हैं l ऐसे लोग सामने से , प्रत्यक्ष रूप से कोई विवाद नहीं करते , उनका आचरण इतना उच्च कोटि का होगा कि आप यह समझ ही न पाओगे कि उनके भीतर कौन सा असुर छिपा है l सामने मीठा बोलते हुए वे कायरों की भांति पीठ में खंजर भोंकते हैं l दूसरों की योग्यता से ईर्ष्या , अहंकार , लालच , योग्यता न होने पर दूसरों को धक्का देकर आगे बढ़ने की प्रबल महत्वाकांक्षा ---ये ऐसे कारण है कि व्यक्ति धोखा , छल , कपट षड्यंत्र रचता है जिससे उसका असली चेहरा समाज के सामने न आए और उसका उदेश्य भी पूरा हो जाए l आचार्य श्री लिखते हैं ---- " सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता l मनुष्य के व्यक्तित्व में इतने छिद्र हैं जहाँ से होकर सत्य बाहर आ ही जाता है l " कुछ वर्षों पहले जब डाकुओं की समस्या थी तब अनेक डाकू ऐसे थे जो यह घोषणा कर के आते थे कि हम अमुक गाँव में डाका डालेंगे , उनके अपने सिद्धांत थे लेकिन शिक्षा के प्रचार -प्रसार से लोगों को यह अच्छा नहीं लगा कि समाज और आने वाली पीढियां उन्हें ऐसे अपराधी के रूप में पहचाने l इसलिए अब ऐसी प्रवृत्ति के लोगों ने अपने ऊपर सफ़ेद पोश ओढ़ लिया l इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पहले डाकू एक निश्चित क्षेत्र में होते थे , उनकी पहचान थी लेकिन अब शराफत का आवरण ओढ़ लेने के कारण वे सम्पूर्ण समाज में व्याप्त हो गए और लोगों को लूटने के भी नए -नए तरीके हो गए l अब यह समस्या कैसे हल होगी ? यह तो समझ के बाहर है l कलियुग की सबसे बड़ी जरुरत है कि सब लोग ईश्वर से सद्बुद्धि की प्रार्थना करें l
27 September 2024
WISDOM ------
स्वार्थ , लालच , अहंकार , तृष्णा , कामना , वासना , लोभ , ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा --- ये बुराइयाँ थोड़ी - बहुत तो सभी में होती हैं l अल्प मात्र में इनका होना नुकसानदेह नहीं होता , इनकी वजह से ही व्यक्ति तरक्की की राह पर आगे बढ़ता है l यही बुराइयाँ जब किसी व्यक्ति में अति की हो जाती हैं तो उससे उसका नुकसान तो बहुत बाद में होता है , ऐसे दुर्गुणों से ग्रस्त व्यक्ति अपना संगठन बना लेते हैं l बुराई में तुरत लाभ के कारण इस क्षेत्र में आकर्षण तीव्र होता है और ऐसे लोग बहुत जल्दी एक बड़ा संगठन बनाकर समाज में धोखा , छल , कपट , षड्यंत्र जैसे छुपे हुए अपराधों का हिस्सा बन जाते हैं l इन दुर्गुणों की अति से व्यक्ति की संवेदना समाप्त हो जाती है , वह केवल अपना स्वार्थ देखता है l इस स्वार्थ पर किसी की भी जिन्दगी पर खतरा आ जाए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता l भ्रष्टाचार , बड़े -बड़े घोटाले , जघन्य अपराध , परिवार में होने वाली हत्याएं , मुकदमे आदि इन दुर्गुणों की अति के ही दुष्परिणाम है l सन्मार्ग पर चलने वालों की संख्या बहुत कम है , आसुरी तत्व उन्हें चैन से जीने नहीं देते l वे हमेशा भयभीत रहते हैं कि प्रकाश होगा तो अंधकार का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा l आसुरी प्रवृत्ति के लोगों की संख्या बहुत अधिक होने से सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि कौन किसे दंड दे , किसकी शिकायत करे ? सब एक नाव में सवार हैं l ऐसे में कोई ईश्वरीय चमत्कार ही परिवर्तन ला सकता है l
26 September 2024
WISDOM -------
इस धरती पर अनेक सभ्यताओं का उदय हुआ और अस्त हुआ l ईश्वर कभी विनाश नहीं चाहते , उन्हें इस स्रष्टि में धरती बहुत प्रिय है , वे इसे बहुत सुंदर , खुशहाल देखना चाहते हैं लेकिन कभी ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती हैं कि ईश्वर भी निर्लिप्त भाव से इस विनाश को देखते हैं l एक अति प्राचीन सभ्यता जो बहुत विकसित थी , युगों तक कायम रही लेकिन अचानक कुछ हुआ कि उस सभ्यता का नामोनिशान मिट गया l यह सब अचानक नहीं हुआ , उसकी किवदंती है ------ उस प्राचीन सभ्यता में सब लोग बहुत खुश थे , स्वस्थ थे l प्रेम था , भाईचारा था l शिक्षा , कला , साहित्य ----- जीवन का प्रत्येक क्षेत्र बहुत विकसित , सुंदर , सुहावना था l लोग इस सत्य को जानते थे कि ये धरती , ये मिटटी , हवा , जल , आकाश को हम नहीं बना सकते , कोई अज्ञात शक्ति है जिसने यह सब बनाया , वो सर्वसमर्थ है इसलिए हमें उस अज्ञात शक्ति के आगे अपना शीश झुकाना चाहिए l तब उस सभ्यता के जो बुद्धिजीवी थे उन्होंने अपने -अपने विचारों के अनुसार उस अज्ञात शक्ति को एक रूप दिया l अनेक रूप थे और जिसको जो अच्छा लगा , वह उसके आगे शीश झुकाने लगा l वह सभ्यता अति संपन्न थी , जैसे लोग बड़े महलों में सुखपूर्वक रहते थे वैसे ही उन्होंने उस अज्ञात शक्ति के लिए भी बड़े -बड़े महल बना दिए l बड़ा मोहक वातावरण था l इस अति की सुख -शांति की खबर आसुरी शक्तियों को मिल गई , सीधे रास्ते बात बन नहीं रही थी , उन्होंने अपने तरीकों से लोगों के मन और विचारों में गंदगी भरनी शुरू कर दी l विचारों की इस गंदगी को व्यवहारिक रूप देना था और संसार में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ भी दिखाना था , इसके लिए उन्होंने अज्ञात शक्ति के लिए जो बड़े -बड़े महल बने थे , उन्हें निशाना बनाया l सामान्य जन तो अभी भी वहां श्रद्धा से अपना शीश झुकाने जाता था , उसके प्रति अपना आभार व्यक्त करता कि हे धरती माँ , जल ,वायु , आकाश हम आपके ऋणी है लेकिन आसुरी प्रवृति के लोगों ने उन विशाल महलों की अपनी कामना , वासना , लालच , स्वार्थ , महत्वाकांक्षा और अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति का स्थान बना लिया l सामान्य जन को उनकी इन करतूतों की भनक न लग जाए इसकी भी पर्याप्त व्यवस्था की , और यदि जनता को खबर लग जाये तो उन्हें कंट्रोल करने के साधन भी एकत्रित कर लिए l सामान्य जन तो बेखबर था लेकिन ईश्वर तो सब देख रहे थे l पाप , अनाचार की अति हो गई , प्रकृति से यह सब सहन नहीं हुआ l भयंकर आँधी , तूफ़ान , वर्षा , प्रलय की स्थिति आ गई और एक भयानक भूकंप के साथ वह सभ्यता धरती में समा गई l कुछ लोग जो बच गए वे आकाश की ओर देखकर बार -बार पूछ रहे थे , प्रार्थना कर रहे थे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? उनकी आँखों से निरंतर आँसू गिर रहे थे , ऐसा क्यों हुआ ? क्या कुसूर था ? ब्रह्माण्ड से एक ही आवाज आई --- ईश्वर को धोखा दिया , धोखा --- ---- उनकी पवित्रता को नष्ट किया , सामान्य जन भी जागरूक नहीं था l '
24 September 2024
WISDOM ------
आज संसार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य की चेतना सुप्त हो गई है l प्रत्येक व्यक्ति केवल धन के पीछे दौड़ रहा है , कितना धन कमा ले , उससे कितना ऐश कर ले , कितना आगे की पीढ़ियों के लिए छोड़ दे l यह छोड़ना भी एक मज़बूरी है , व्यक्ति का वश चले तो वह भी बांधकर ले जाए l इस तृष्णा ने सारी सीमाएं तोड़ दी हैं l जो हथियार बनता है , वह चाहता है कितने युद्ध हों ताकि उसका धन का भंडार बढ़ता जाए l दवाई , इंजेक्शन बनाने वाले की इच्छा है कि कितने ज्यादा लोग बीमार हो , बीमारी , महामारी हो जिससे वह अपनी अमीरी की छाप छोड़ सके l बिल्डिंग आदि निर्माण से जुड़ा व्यक्ति सोचता है , जल्दी टूटने वाली हो जिससे आमदनी का स्रोत बना रहे l शिक्षक , कलाकार , व्यापारी हर व्यक्ति अपनी बुद्धि से अपने क्षेत्र में अतिरिक्त धन कमाने के उचित -अनुचित किसी भी तरीके से अमीर बनने के रास्ते खोज लेता है l केवल जीवन का यही उदेश्य रह गया है l धन जीवन के लिए बहुत जरुरी है , , सभी आवश्यकताएं धन से ही पूरी होती हैं लेकिन अपनी अनंत आवश्यकताओं के लिए व्यक्ति अनैतिक , अमानवीय तरीके इस्तेमाल करता है , वह गलत है l धन के बल पर व्यक्ति कानून से भी बच जाता है , गलत रास्ते पर चलकर भी सम्मानित जीवन जीता है l लेकिन ईश्वर का न्याय तो होता है l इस युग में मनुष्य की चेतना सुप्त इसलिए कही जाती है क्योंकि ऐसे लोगों के जीवन में कोई बड़ा दुःख आ जाये , भयंकर बीमारी आ जाये तब भी वे लोग सुधरते नहीं l उनके अहंकार के कारण यह बात उनके चिन्तन में ही नहीं आती कि उनके गलत कार्यों की वजह से ही प्रकृति उन्हें दंड दे रही है l l मरणासन्न स्थिति में पहुंचकर यदि पुन: थोड़े भी स्वस्थ हो जाएँ तो फिर से पाप कर्म में जुट जाते हैं l कलियुग की यही सबसे बुरी बात है कि व्यक्ति सुधरना ही नहीं चाहता l संसार में ऐसे लोगों की अधिकता है l सन्मार्ग पर चलने वाले बहुत कम हैं l यह युग का असर है कि सन्मार्ग पर चलने वालों को आसुरी शक्तियां अपने दलदल में घसीटने की जी -तोड़ कोशिश करती हैं l असत्य का बोलबाला है , सत्य उपेक्षित है l
22 September 2024
WISDOM -------
इस धरती पर एक -से -बढ़कर एक महान ऋषि -मुनि , योगी , तपस्वी हुए हैं , जिनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ l इन महान आत्माओं ने संसार को जो दिया वह अमूल्य है और आज भी वे अप्रत्यक्ष रूप से इस धरा को बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं l आज स्थिति भयावह है क्योंकि मनुष्य इतना बुद्धिमान हो गया है कि अब मनुष्य , मनुष्य से ही भयभीत है l कलियुग की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि इस युग में मनुष्य इतना चतुर हो गया है कि वह भगवान को भी धोखा दे सकता है , फिर घर -परिवार में , समाज में और संसार में धोखा देना , छल -कपट , षड्यंत्र रचना उसके बांये हाथ का खेल है l रावण के तो दस शीश संसार के सामने स्पष्ट थे लेकिन आज मनुष्य के जितने शीश हैं उनकी तह तक पहुंचना असंभव है l व्यक्ति सामने कुछ है और परदे के पीछे उसका दूसरा रूप है l यह स्थिति समाज के लिए तो घातक है ही लेकिन उस व्यक्ति के लिए महा घातक है क्योंकि अनेक रूप होने से व्यक्ति स्वयं भूल जाता है कि वह वास्तव में है कौन ? और यहाँ से शुरू हो जाता है मानसिक असंतुलन , बीमारी , विकृति , तनाव l मनुष्य की अतृप्त कामनाएं , वासना , तृष्णा , महत्वाकांक्षा उसे विभिन्न रूप रखने को विवश करती हैं l ------- बार -बार रंग बदलने की अपनी पटुता का प्रदर्शन करते हुए गिरगिट ने कछुए से कहा ---- महाशय ! देखा मैं संसार का कितना योग्य व्यक्ति हूँ l " कछुए ने धीरे से कहा --- " महाशय ! दूसरों को धोखा देने की इस योग्यता से तो तुम अयोग्य ही बने रहते तो अच्छा था l कम -से -कम लोग भ्रम में तो न पड़ते l
21 September 2024
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी की अमृतवाणी के कुछ अंश ------ तप का अर्थ है --आत्म परिष्कार के लिए तितिक्षा करना , कष्ट सहना l तपाने से ईंट मंदिर की नींव में लगती है l तपाने से भस्म खाने योग्य बनती है l हमें अपना जीवन मुसीबतों से खिलवाड़ करने वाला बनाना चाहिए l शक्तियों का बिखराव हम रोकें एवं उन्हें सृजन में नियोजित करें l व्यावहारिक जीवन जीते हुए , संघर्ष करते हुए , दुःखों का सामना करते हुए जो तपकर कुंदन की तरह दमकता है , वही सही अर्थों में तपस्वी है l ' ' मनुष्य जीवन पानी का बुलबुला है l वह पैदा भी होता है और मर भी जाता है l किन्तु शाश्वत रहते हैं उसके कर्म और विचार l सदविचार ही मनुष्य को सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं और सत्कर्म ही मनुष्य का मनुष्यत्व सिद्ध करते हैं l मनुष्य के विचार ही उसका वास्तविक स्वरुप होते हैं l ये विचार ही नए -नए मस्तिष्कों में घुसकर ह्रदय में प्रभाव जमाकर मनुष्य को देवता बना देते हैं और राक्षस भी l जैसे विचार होंगे मनुष्य वैसा ही बनता जायेगा l ' ' मानव जीवन दुबारा नहीं मिलता l वह क्षय हेतु नहीं , गरिमा के अनुरूप शानदार जीवन जीने को मिला है l यह हमें स्वयं ही निश्चित करना है कि पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष ? असुरता प्रिय है या देवत्व ? क्षुद्रता चाहिए या महानता ? इसके निर्माता तुम स्वयं हो l पतन के पथ पर नारकीय मार सहनी पड़ेगी , उत्कर्ष के पथ पर स्वर्ग जैसी शांति की प्राप्ति होगी l ' ' कहाँ छिपा बैठा है सच्चा इनसान , ढूंढते जिसे स्वयं भगवान l '
WISDOM ----
राजा रणजीत सिंह का शासन काल था l प्रजा सुखी थी l उनके पराक्रम व न्यायप्रियता की ख्याति सर्वत्र थी l एक दिन वे नगर भ्रमण को निकले कि एक पत्थर उनके सिर पर आकर लगा l खून की धारा बह निकली l सैनिकों ने अपराधी को पकड़ा तो पता चला कि वह एक गरीब विधवा महिला थी l उसे राजा के सम्मुख प्रस्तुत किया गया l राजा रणजीत सिंह ने उससे पत्थर फेंकने का कारण पूछा तो वह महिला महिला बोली ---- " महाराज ! मैं विधवा हूँ l मेरे दो छोटे -छोटे बच्चे हैं l आमदनी का मेरे पास कोई साधन नहीं है l मेरे बच्चों को भूख लगी थी l सामने बेर के पेड़ पर पके बेर देखकर उन पर निशाना लगाकर पत्थर फेंका , पर वह भूलवश आपको लग गया l यदि मुझे पता होता कि आप यहाँ से निकल रहे हैं , तो मैं कदापि ऐसा नहीं करती l मुझे मेरे इस जघन्य अपराध के लिए मृत्यु दंड दिया जाए , परन्तु मेरे दोनों बच्चों को माफ कर इन्हें आप अपनी शरण में रख लें l " उस विधवा की बातें सुनकर राजा रणजीत सिंह बोले ---- " इस घटना में दो अपराधी हैं l पत्थर फेंकने का अपराध महिला का है और उसे पत्थर फेंकने के लिए विवश करने का अपराध मेरा है l मैं राजा हूँ , मेरे रहते प्रजा में किसी को भूखे नहीं रहना चाहिए l मेरे अपराध का दंड यह पत्थर मुझे दे चुका l इस महिला के अपराध के एवज में मैं इसके पूरे परिवार के भरण -पोषण की पूरी जिम्मेदारी लेता हूँ l " महाराजा रणजीत सिंह के वचनों को सुनकर वह महिला भावविभोर हो गई और समस्त नागरिक महाराज की प्रशंसा करने लगे l
19 September 2024
WISDOM ----
ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार जैसे दुर्गुणों से ऋषि , मुनि , देवता भी नहीं बचे हैं l लेकिन वे श्रेष्ठ इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गलतियों को समझा , उन्हें स्वीकार किया और फिर से उन गलतियों को न दोहराने का संकल्प लेकर प्रायश्चित भी किया , तब कहीं जाकर वे राजर्षि , महर्षि जैसे सम्मान के अधिकारी बने l पुराण की कथा है ---- ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के पास नंदिनी गौ थी , उसकी सामर्थ्य से वे अपने आश्रम की , आश्रम में आने वाले आगंतुकों आगंतुकों की और आश्रम में विद्या अध्ययन करने वाले छात्र -छात्राओं की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे l जब विश्वामित्र राजा थे और अपनी विशाल सेना के साथ ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में पहुंचे थे तब ऋषि वसिष्ठ ने उनका भी भव्य स्वागत -सत्कार किया था l विश्वामित्र ने देखा की एक तपस्वी ने इतना भव्य स्वागत कैसे किया , उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब नंदिनी गौ की कृपा से है l तब उन्होंने ऋषि वसिष्ठ से कहा कि नंदिनी को आप हमें दे दो l ऋषि वसिष्ठ ने साफ इनकार कर दिया , तब तो विश्वामित्र का हठ और अहंकार उनके सिर चढ़ गया l उन्होंने नंदिनी गौ को प्राप्त करने की ठान ली और पहले अपने सैन्य बल का प्रयोग किया , उसमें असफल हुए l फिर तप किया , अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किए , लेकिन ऋषि वसिष्ठ के ब्रह्म दंड के आगे उनकी एक न चली , बुरी तरह असफल हुए l इसके बाद उन्होंने तप के अनेक प्रयोग किए , न जाने कितनी तरह की विद्याएँ प्राप्त कीं और सभी का एक साथ उन्होंने ऋषि वसिष्ठ पर प्रयोग किया , लेकिन उन्हें असफलता ही मिली l जितना वे असफल हो रहे थे उनका वैर , हठ और अहंकार उतना ही बढ़ता जा रहा था l उन्होंने ऋषि वसिष्ठ के सौ पुत्रों का विनाश किया l ऋषि वसिष्ठ में गजब का धैर्य और सहनशीलता थी , वे विश्वामित्र से रुष्ट नहीं हुए और बड़े धैर्य के साथ इस महाशोक को सहन किया l विश्वामित्र का वैर नहीं मिटा और एक पूर्णिमा की रात्रि को वे ऋषि वसिष्ठ की हत्या करने उनके आश्रम पहुंचे l विश्वामित्र ने महान तप किया था , लेकिन हठ और अहंकार की वजह से वे हत्या जैसा दुष्कृत्य करने को उतारू थे l जब वे ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में पहुंचे , उस समय ऋषि अपनी पत्नी अरुंधती से कह रहे थे --- " देवी ! देखो आज चंद्रमा सब ओर निर्मल , धवल प्रकाश फैला रहा है l इस प्रकाश की निर्मलता , शीतलता , धवलता ऋषि श्रेष्ठ विश्वामित्र के महान तप की तरह है l " यह सुनकर विश्वामित्र का ह्रदय ग्लानि से भर गया l ऋषि वसिष्ठ पर उन्होंने इतने वार किए , उन्हें कष्ट दिया , वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं l विश्वामित्र चमकती कृपाण लेकर ऋषि वसिष्ठ के सम्मुख आए और कृपाण सहित उनके चरणों चरणों में गिर पड़े l ऋषि वसिष्ठ ने उनको उठाते हुए कहा ---- " हे ब्रह्मर्षि ! उठो l " गायत्री महामंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं l अपने महान तप के कारण वे ब्रह्मर्षि के पद पर पहुंचे l
18 September 2024
WISDOM ------
' अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं l वे समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस दोहरी नीति को समझ नहीं सकता l वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं l अपने को इस प्रकार बुद्धिमान समझना बहुत बड़ी मूर्खता है l वास्तविकता छिपी नहीं रह सकती l इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है l सामने से अच्छा व्यवहार करना और पीठ में खंजर भोंकना , ये सोच समझ कर किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते l महाभारत में ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ दुर्योधन ने अपने ही भाइयों पांडवों के विरुद्ध अनेक षड्यंत्र रचे , लाक्षाग्रह में भेजकर तो वे पांडवों के जलकर मर जाने की ख़ुशी मन -ही-मन मना रहे थे l लेकिन ऐसी कुटिल नीति का अंत अच्छा नहीं होता l अपने भीतर की असुरता को मनुष्य संसार से चाहे कितना भी छुपा ले , लेकिन ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है l उनसे कुछ नहीं छुपा , कर्म का फल अवश्य मिलता है l
15 September 2024
WISDOM ------
अनंत ब्रह्माण्ड पर आधिपत्य जमाने की मनुष्य की व्यर्थ चेष्टा पर उसे चेताते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार बट्रेंड रसेल ने लिखा है ----- " अच्छा होता कि हम अपनी धरती ही सुधारते और बेचारे चंद्रमा को उसके भाग्य पर छोड़ देते l अभी तक हमारी मूर्खताएं धरती तक ही सीमित रही हैं l उन्हें ब्रह्माण्डव्यापी बनाने में मुझे कोई ऐसी बात प्रतीत नहीं होती , जिस पर विजय उत्सव मनाया जाए l चंद्रमा पर मनुष्य पहुँच गया तो क्या ? यदि हम धरती को ही सुखी नहीं बना पाए तो यह प्रगति बेमानी है l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " प्रगति के नाम पर विकृति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाए चल रहे इनसान के लिए बट्रेंड रसेल की यह पंक्तियाँ आज बहुत सार्थक प्रतीत होती हैं l विज्ञानं ने हमारे जीवन को सुख -सुविधा और विलासिता की चीजों से भर दिया है l भौतिक प्रगति तो हुई है लेकिन हम आंतरिक रूप से कंगाल हो चुके हैं l मनुष्य भावनाओं और संवेदनाओं से रहित एक रासायनिक यंत्र बन गया है l l विज्ञान का प्रभाव क्षेत्र कितना ही व्यापक और उपलब्धियां कितनी ही चमत्कारी क्यों न हों , इसके अलावा भी जीवन में भावनात्मक संतुष्टि , मानवीय संवेदना जरुरी है , जिसके अभाव में जिंदगी पंगु हो जाएगी l " विज्ञान की उपलब्धियों के संबंध में बंट्रेंड रसेल का कथन है ----- " हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच हैं , जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता l मानव जाति अब तक जीवित रह सकी तो अपने अज्ञान और अक्षमता के कारण ही , परन्तु यदि ज्ञान व क्षमता मूढ़ता के साथ युक्त हो जाएँ तो उसके बचे रहने कोई संभावना नहीं है l अत: विज्ञानं के साथ विवेक एवं औचित्य पूर्ण क्रियाकुशालता की भी आवश्यकता है l "