नगर का नामी अमीर हजरत इब्राहीम के पास बेशुमार हीरे -जवाहरात और अशरफियों की थैलियाँ लेकर पहुंचा और उनको हजरत के पैरों में रखकर आशीर्वाद की याचना करने लगा | हजरत बोले -"ये सब हटा ले !मैं भिखारियों की लाई सौगात नहीं लेता | "अमीर चकित हुआ ,कहने लगा -"हुजूर !आपको शायद गलतफहमी हुई है ,मैं तो नगर का सबसे अमीर आदमी हूं | "हजरत बोले -"तू अमीर है तो किस आशीर्वाद की याचना करता है ?"सेठ बोला -"आपकी कृपा हो जाती तो मैं राज्य का सबसे अमीर व्यापारी बन जाता | "हजरत इब्राहीम मुस्कराए और बोले -"जब तेरी हसरतों का ठिकाना ही नहीं है तो अपने आप को भिखारियों की गिनती से क्यों जुदा करता है !"ऐसे ही अनेक मनुष्य ,अपना जीवन कामनाओं -वासनाओं की पूर्ति हेतु गुजारते हैं ,पर कामना यह करते हैं कि उनकी गिनती कुलीनों ,बड़ों की श्रेणी में की जाये | ऐसा आडम्बर सिर्फ आत्म पतन के मार्ग की ओर ले जाता है ,उन्नति की ओर नहीं |
11 April 2013
10 April 2013
STRUGGLE IN LIFE
जीवन के संघर्ष और समुद्री तूफान की आँधियों से दुखी एक नाविक जहाज से उतर कर आया तो द्वीप के किनारे खड़ी एक अविचलित ,अडिग चट्टान को देखकर बड़ी शांति को प्राप्त हुआ | स्वच्छ ,सुंदर सी उस चट्टान पर खड़े होकर ,वह चारों ओर देखने लगा | उसने देखा कि द्वीप के कोने में स्थित उस चट्टान पर निरंतर समुद्र की लहरों का आघात हो रहा है ,तो भी चट्टान के मन में न कोई रोष है ,न बैर | | न कोई ऊब ,न दुःख | मरने की भी उसने कभी इच्छा नहीं की | नाविक का ह्रदय श्रद्धा से भर गया | उसने चट्टान से पूछा -"तुम पर चारों ओर से आघात लग रहे हैं ,फिर भी तुम परेशान नही हो | तुम्हारी इस सहनशीलता का कारण क्या है ?"चट्टान की आत्मा धीरे से बोली -"तात !हम निराश हो गये होते तो एक क्षण ही सही दूर से आये आप जैसे अतिथियों को विश्राम देने ,उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते | | संघर्षों से लड़ने में ही हमें आनंद आता है | नाविक ने उत्साहित होकर स्वयं से कहा -"जीवन में कितने ही संघर्ष आयें ,मैं भी अब इस चट्टान की तरह जीऊंगा ,ताकि हमारी भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा हो सके |
9 April 2013
IMANDARI KI KAMAI
कुशीनगर का राजा लोगों के पुण्य खरीदने के लिये प्रसिद्ध था | उसने तराजू लगा रखी थी | पुण्य बेचने वाले अपनी ईमानदारी की कमाई का विवरण लिखकर एक पलड़े में रखते ,उस कागज के अनुरूप तराजू स्वयं स्वर्ण मुद्रा देने की व्यवस्था कर देती |
जयनगर पर शत्रुओं का आक्रमण हुआ और वहां के राजा को पत्नी -बच्चों समेत रात्रि के अँधेरे में भागना पड़ा | पास में कुछ न था | रानी ने राजा से कहा -'आपने जीवन भर दान -पुण्य किया ,उसी में से थोड़े कुशीनगर नरेश को बेचकर धन प्राप्त कर लिया जाये | कुशीनगर तक कैसे पहुँचा जाये ?इसके लिये रानी ने उपाय किया कि वह ग्रामीणों के घर कार्य करेंगी ,राजा रोटी बनायेंगे | 'एक दिन राजा रोटी सेंक रहे थे ,उसी समय एक भिखारी आ गया ,राजा संकोच में थे ,तभी रानी आ गईं और कहा -"हम एक दिन और भूखे रह लेंगे यह रोटी भिखारी को दे दो | "राजा ने सारी रोटियां भिखारी को दे दीं और भूखे पेट वे लोग चल पड़े |
कुशीनगर पहुंचकर राजा ने अपना आने का कारण बताया | उत्तर मिला कि "धर्म -कांटे पर चले जाओ ,जो ईमानदारी की कमाई हो उसे तराजू के एक पलड़े में रख देना ,कांटा आपको उसी आधार पर स्वर्ण मुद्रा दे देगा | "जयनगर के राजा ने अपने अनेक पुण्य का विवरण तराजू में रखा ,पर उनसे कुछ न मिला | तब पुरोहित ने कहा -आपने जो परिश्रमपूर्वक कमाया और दान किया हो ,उसी का विवरण लिखें | तब राजा ने पिछले दिनों भिखारी को जो रोटियां दी थीं ,उसका ब्योरा लिखकर तराजू में रखा | दूसरे पलड़े में उसके बदले 1 0 0 (सौ )स्वर्ण मुद्राएँ आ गईं | पुरोहित ने कहा -"उसी दान का पुण्य फल होता है ,जो ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक कमाया गया हो | "राजा को पुण्य का सही अर्थ ज्ञात हुआ और प्रतिफल भी मिला |
जयनगर पर शत्रुओं का आक्रमण हुआ और वहां के राजा को पत्नी -बच्चों समेत रात्रि के अँधेरे में भागना पड़ा | पास में कुछ न था | रानी ने राजा से कहा -'आपने जीवन भर दान -पुण्य किया ,उसी में से थोड़े कुशीनगर नरेश को बेचकर धन प्राप्त कर लिया जाये | कुशीनगर तक कैसे पहुँचा जाये ?इसके लिये रानी ने उपाय किया कि वह ग्रामीणों के घर कार्य करेंगी ,राजा रोटी बनायेंगे | 'एक दिन राजा रोटी सेंक रहे थे ,उसी समय एक भिखारी आ गया ,राजा संकोच में थे ,तभी रानी आ गईं और कहा -"हम एक दिन और भूखे रह लेंगे यह रोटी भिखारी को दे दो | "राजा ने सारी रोटियां भिखारी को दे दीं और भूखे पेट वे लोग चल पड़े |
कुशीनगर पहुंचकर राजा ने अपना आने का कारण बताया | उत्तर मिला कि "धर्म -कांटे पर चले जाओ ,जो ईमानदारी की कमाई हो उसे तराजू के एक पलड़े में रख देना ,कांटा आपको उसी आधार पर स्वर्ण मुद्रा दे देगा | "जयनगर के राजा ने अपने अनेक पुण्य का विवरण तराजू में रखा ,पर उनसे कुछ न मिला | तब पुरोहित ने कहा -आपने जो परिश्रमपूर्वक कमाया और दान किया हो ,उसी का विवरण लिखें | तब राजा ने पिछले दिनों भिखारी को जो रोटियां दी थीं ,उसका ब्योरा लिखकर तराजू में रखा | दूसरे पलड़े में उसके बदले 1 0 0 (सौ )स्वर्ण मुद्राएँ आ गईं | पुरोहित ने कहा -"उसी दान का पुण्य फल होता है ,जो ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक कमाया गया हो | "राजा को पुण्य का सही अर्थ ज्ञात हुआ और प्रतिफल भी मिला |
PURE MEAL
आहार शुद्ध होने से अंत:कारण की शुद्धि होती है और इससे विवेक -बुद्धि ठीक काम करती है | आहार के संबंध में तीन शब्द कहे जाते हैं --हित ,मित और ऋत |
हितभोजी वह है ,जो स्वास्थ्य के अनुकूल एवं उपयोगी पदार्थ ग्रहण करता है | ऐसा व्यक्ति स्वाद के लिये नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिये खाता है | मितभोजी वह है ,जो थोड़ा खाता है ,जितना आवश्यक है उतना खाता है | आहार के संबंध में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -ऋत | --ऋत का संबंध पवित्रता एवं चेतना की निर्मलता से है | ऋत का अर्थ भोजन में समाई भावनाओं में निहित है | भोजन बनाने वाले की भावनाएं क्या हैं ?इसलिये इस भोजन को वही खा सकता है ,जो मुफ्त की नहीं खाता | दूसरों का शोषण नहीं करता | दूसरों की आह ,दूसरों का हक छीनकर ,कष्ट देकर जो भोजन हमारे पेट में जाता है ,वह हमारी भावनाओं को विकृत बनाता है ,इसी के परिणामस्वरूप शारीरिक कष्ट और असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं |
वस्तुत:आहार का मूल्यांकन चेतना के विकास का मूल्यांकन है | ऋत आहार का स्वरुप ही हमारी चेतना को विकृत या परिष्कृत करता है |
हितभोजी वह है ,जो स्वास्थ्य के अनुकूल एवं उपयोगी पदार्थ ग्रहण करता है | ऐसा व्यक्ति स्वाद के लिये नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिये खाता है | मितभोजी वह है ,जो थोड़ा खाता है ,जितना आवश्यक है उतना खाता है | आहार के संबंध में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -ऋत | --ऋत का संबंध पवित्रता एवं चेतना की निर्मलता से है | ऋत का अर्थ भोजन में समाई भावनाओं में निहित है | भोजन बनाने वाले की भावनाएं क्या हैं ?इसलिये इस भोजन को वही खा सकता है ,जो मुफ्त की नहीं खाता | दूसरों का शोषण नहीं करता | दूसरों की आह ,दूसरों का हक छीनकर ,कष्ट देकर जो भोजन हमारे पेट में जाता है ,वह हमारी भावनाओं को विकृत बनाता है ,इसी के परिणामस्वरूप शारीरिक कष्ट और असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं |
वस्तुत:आहार का मूल्यांकन चेतना के विकास का मूल्यांकन है | ऋत आहार का स्वरुप ही हमारी चेतना को विकृत या परिष्कृत करता है |
8 April 2013
TOTAL TREATMENT
'जो जैसा सोचता है और करता है वह वैसा ही बन जाता है | '
मानवी मस्तिष्क से उत्पन्न होने वाली विद्दुत सम्पूर्ण शरीर का कार्य संचालित करती है | अवचेतन मस्तिष्क से संबंधित असंख्य तार शरीर के प्रत्येक घटक तक पहुँचते हैं और इसकी सुव्यवस्था बनाये रखते हैं | रोग निवारण के लिये शरीर के साथ मन का उपचार भी अति आवश्यक है | ईर्ष्या ,द्वेष ,असंयम बरतने पर मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और एक विशिष्ट प्रकार के हारमोंस का स्राव होने लगता है जो रोगों की उत्पति का कारण बन जाता है |
शरीर को स्वस्थ रखने के लिये मानसिक स्तर की स्वस्थता अति आवश्यक है | रोगियों के चिंतन में यदि 'सकारात्मक सोच 'का प्रादुर्भाव कर दिया जाये तो बड़े ही चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं | श्रेष्ठ ,पवित्र विचार शरीर की जैविक रासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाते हैं ,इससे शरीर में कई तरह के रासायनिक स्राव उत्पन्न होते हैं जो मानवी स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं
मानवी मस्तिष्क से उत्पन्न होने वाली विद्दुत सम्पूर्ण शरीर का कार्य संचालित करती है | अवचेतन मस्तिष्क से संबंधित असंख्य तार शरीर के प्रत्येक घटक तक पहुँचते हैं और इसकी सुव्यवस्था बनाये रखते हैं | रोग निवारण के लिये शरीर के साथ मन का उपचार भी अति आवश्यक है | ईर्ष्या ,द्वेष ,असंयम बरतने पर मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और एक विशिष्ट प्रकार के हारमोंस का स्राव होने लगता है जो रोगों की उत्पति का कारण बन जाता है |
शरीर को स्वस्थ रखने के लिये मानसिक स्तर की स्वस्थता अति आवश्यक है | रोगियों के चिंतन में यदि 'सकारात्मक सोच 'का प्रादुर्भाव कर दिया जाये तो बड़े ही चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं | श्रेष्ठ ,पवित्र विचार शरीर की जैविक रासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाते हैं ,इससे शरीर में कई तरह के रासायनिक स्राव उत्पन्न होते हैं जो मानवी स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं
7 April 2013
PARISHRAM
माली के पुत्र ने पिता को बाग में मेहनत करते देखकर पूछा -"पिताजी !आप गुलाब के पौधे पर इतनी मेहनत करते हैं ,वर्ष भर देखभाल करने के बाद ही पौधा तैयार होता है | इसकी जगह बेशरम की झाड़ियाँ क्यों नहीं लगाते ,वो तो बिना किसी तैयारी के ही उग आती हैं | "माली हँसा और बोला -"बेटा !श्रेष्ठ संपदाएं और विभूतियां हमेशा परिश्रम के बाद ही प्राप्त होती हैं | दुर्गुण और अवांछित तत्व तो बिना प्रयास के ही मिल जाते हैं | "
IMPORTANCE OF LABOUR
श्रम का महत्व अपार है जिससे अभाव ,दरिद्रता ही नहीं ,बीमारियों तक को भगाया जा सकता है |
पहाड़ की अनुमति से बीमारियाँ पर्वत पर रहने लगीं | कुछ दिन बीते ,एक किसान को कृषि योग्य भूमि की कुछ कमी पड़ी | पहाड़ बहुत सारी जमीन दबाए खड़ा है ,यह देखकर परिश्रमी किसान पहाड़ काटने और उसे चौरस बनाने में जुट गया | किसान ने बहुत सी भूमि कृषि योग्य कर ली | यह देखकर दूसरे किसान भी जुट पड़े | किसानों की संख्या देखते -देखते सैकड़ों तक जा पहुँची | पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा | कुछ और तो समझ में नहीं आया ,उसने सब बीमारियों को एकत्र कर फावड़े और कुदाल चलाते हुए किसानों की ओर संकेत किया और कहा ,यह रहे मेरे शत्रु ,तुम सबकी सब इनपर झपट पड़ो और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो |
अपने -अपने आयुध लेकर बीमारियाँ आगे बढीं और किसानों के शरीर से लिपट गईं ,पर किसान तो अपनी धुन में थे ,वे फावड़ा जितनी तेजी से चलाते ,पसीना उतना ही अधिक निकलता और सारी बीमारियाँ धुलकर नीचे गिर जातीं | बहुत प्रयत्न किया ,पर बीमारियों की एक न चली | पहाड़ ने जब देखा कि बीमारियाँ उसकी रक्षा नहीं कर सकीं ,तो वह बढ़ा कुपित हुआ और अपने पास से भगा दिया | तब से बीमारियाँ गंदगी में ,आलसी में प्रश्रय पाती हैं |
पहाड़ की अनुमति से बीमारियाँ पर्वत पर रहने लगीं | कुछ दिन बीते ,एक किसान को कृषि योग्य भूमि की कुछ कमी पड़ी | पहाड़ बहुत सारी जमीन दबाए खड़ा है ,यह देखकर परिश्रमी किसान पहाड़ काटने और उसे चौरस बनाने में जुट गया | किसान ने बहुत सी भूमि कृषि योग्य कर ली | यह देखकर दूसरे किसान भी जुट पड़े | किसानों की संख्या देखते -देखते सैकड़ों तक जा पहुँची | पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा | कुछ और तो समझ में नहीं आया ,उसने सब बीमारियों को एकत्र कर फावड़े और कुदाल चलाते हुए किसानों की ओर संकेत किया और कहा ,यह रहे मेरे शत्रु ,तुम सबकी सब इनपर झपट पड़ो और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो |
अपने -अपने आयुध लेकर बीमारियाँ आगे बढीं और किसानों के शरीर से लिपट गईं ,पर किसान तो अपनी धुन में थे ,वे फावड़ा जितनी तेजी से चलाते ,पसीना उतना ही अधिक निकलता और सारी बीमारियाँ धुलकर नीचे गिर जातीं | बहुत प्रयत्न किया ,पर बीमारियों की एक न चली | पहाड़ ने जब देखा कि बीमारियाँ उसकी रक्षा नहीं कर सकीं ,तो वह बढ़ा कुपित हुआ और अपने पास से भगा दिया | तब से बीमारियाँ गंदगी में ,आलसी में प्रश्रय पाती हैं |
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