9 July 2013

WISDOM

'सद उद्देश्य के लिये प्रयत्न करने वालों का भगवान ही सहायक होता है | '
      एक बार मनु नाव में वेद रखे हुए जा रहे थे कि समुद्र में तूफान आ गया | तूफान शांत हुआ तो देखा कि एक बड़ी मछली उनकी नाव को सहारा दिये है | मनु ने विनीत भाव से पूछा -"भगवन !आपने मेरी रक्षा की ,आप कौन हैं ?"मत्स्य भगवान दिव्य रूप में प्रकट होकर बोले-"वत्स !तूने ज्ञान की रक्षा का व्रत लिया ,इसलिये तेरी सहायता के लिए  मुझे आना पड़ा | 

STRUGGLE

'जीवन एक चुनौती है ,एक समर है ,एक जोखिम है ,उसे इसी रूप में स्वीकार करना चाहिये | '
      संघर्ष मनुष्य के जीवन का अभिन्न हिस्सा है | जीवन के हर क्षेत्र में ,हर पल जीवित रहने के लिये उसे संघर्ष करना पड़ता है | संघर्ष का मतलब है -जूझना | संघर्ष मनुष्य के जीवन में तब से आरम्भ हो जाता है ,जब वह अपनी माता के गर्भ में आता है |
     जिस व्यक्ति का जीवन जितना संघर्षपूर्ण होता है ,उसका व्यक्तित्व भी उतना ही प्रखर होता जाता है | यदि जीवन में से संघर्ष समाप्त हो जाये तो उसके जीवन में छिपी हुई शक्तियों और विभूतियों से वह अपरिचित रह  जायेगा  ,उन्हें कभी महसूस नहीं कर सकेगा |
     संघर्ष व्यक्ति को महान बनाता है ,लेकिन तभी ,जब वह सही दिशा की ओर ,सही लक्ष्य की ओर किया जाये | संघर्ष व्यक्ति को सही अर्थों में मनुष्य बनाता है ,यदि जीवन में संघर्ष न होगा ,तो जीवन उस मूर्छित व्यक्ति की तरह हो जायेगा जो जीवित तो होगा ,लेकिन कुछ कर नहीं सकेगा | संघर्ष के माध्यम से ही व्यक्ति सफलता के असली आनंद को महसूस कर पाता है |
     संघर्ष जीवन का आरंभ भी है और अंत भी | कभी व्यक्ति को जीवन जीने के लिये संघर्ष करना पड़ता है तो कभी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये | संघर्ष जीवन का दूसरा नाम है ,इसलिये इसे मनुष्य को स्वीकारना पड़ेगा ,इसके महत्व को समझना ही पड़ेगा |
    यदि व्यक्ति संघर्ष करने में प्रसन्न रहने लगे और इसे अपनी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बना ले ,तो न केवल उसका व्यक्तित्व परिष्कृत होगा ,बल्कि वह जीवन की विभूतियों से भी सराबोर होता जायेगा | 

8 July 2013

GRIEF

'बुद्धिमता एक ही है कि संसार को उसके यथार्थ रूप में देखना और जैसा भी कुछ वह है उससे निपटना | '

 'दुःख कैसे घटे '-इस संबंध में सूफी फकीर बायजीद ने बड़ी सुंदर कथा कही है --
उस फकीर ने एक दिन प्रार्थना की,हे मेरे भगवान !मेरे मालिक !  मेरा दुःख किसी और को दे ,मुझे थोड़ा छोटा दुःख दे दो ,मेरे पास बहुत दुःख है | प्रार्थना करते करते उनकी नींद लग गई | उनने स्वप्न देखा कि खुदा मेहरबान है | दुनियाँ के सब लोग आकर उसके पास दुखों की गठरियाँ टांगते चले जा रहें हैं |
      भगवान कह रहें हैं ,अपनी गठरियाँ मेरे पास बांध दो और मनचाही दूसरी लेते जाओ | बायजीद मुस्कराए ,सोचा भगवान ने मन की बात सुन ली | अब मैं भी अपनी दुखों की गठरी वहां बाँधकर ,हलके दुखों वाली गठरी ले आता हूँ | सब अपनी अपनी गठरियाँ बदल रहें हैं तो मैं भी क्यों पीछे रहूँ | बायजीद ने आश्चर्य से देखा कि दुनिया में दुःख तो बहुत हैं ,न्यूनतम दुखों वाली गठरी भी उनकी गठरी से दोगुनी थी |
   सपने में ही वह भागा कि अपनी गठरी पहले उठा लूँ ,कहीं ऐसा न हो  कि मेरे जिम्मे दोगुने दुखों वाली गठरी आ जाये और मेरी गठरी कोई और ले जाये | मांगा तो था मैंने कम दुःख और कोई मुझे अधिक दुःख पकड़ा जाये | 

5 July 2013

WISDOM

'केवल इंद्रियों पर संयम करना काफी नहीं है | संयमी वह है जो विचारों,पर  संयम करना जानता  है '
  इस संबंध में भगवान बुद्ध भिक्षुओं से कहते हैं -"भिक्षुओं ! गलत विचारों पर विजय का एकमात्र मार्ग समय -समय पर मन की गतिविधियों का पर्यवेक्षण करना ,उनपर चिंतन -मनन करना और जो कुछ निम्न एवं हेय है उसको त्यागते हुए श्रेष्ठ का वरण एवं विकास करना है | इस तरह जब भिक्षु अपने बुरे विचारों पर विजयी हो जायेगा ,वह एक दिन अपने मन का स्वामी बनेगा और सदैव के लिये बुराई एवं दुःख से मुक्त हो जायेगा | "

HOW TO GENERATE WILL - POWER

'हम दिव्यता के अंशधार हैं ,हम शाश्वत की संतान हैं | हमारे भीतर अनंत संभावनाएँ विद्दमान हैं ,जिन्हें हमें व्यक्त करना है | हमें अपने अस्तित्व के दिव्य सत्य से प्रेम करना होगा | '
            जीवन की सफलता एवं विफलता के निर्णायक तत्वों में  इच्छा शक्ति का स्थान सर्वोपरि है | इच्छा शक्ति के होने पर व्यक्ति जैसे शून्य में से ही सब कुछ प्रकट कर देता है और इसके अभाव में व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दुर्भाग्य एवं असफलता का रोना रोता रहता है |
       इच्छा शक्ति के विकास के लिये जीवन मूल्यों का उचित ज्ञान व निर्धारण अनिवार्य है ,जो दिशा सूचक के रूप में जीवन को सही दिशा दे सकें अन्यथा अनुचित दिशा में जाने वाला हर कदम जीवन के संकट को और बढ़ाता ही जायेगा | इस विषय में सदगुरुओं की अमृत वाणी ,महापुरुषों का सत्साहित्य व धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय एवं ,चिंतन -मनन बहुत उपयोगी है | इसी के प्रकाश में इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास की प्रक्रिया गति पकड़ती है | इसमें तीन बातें अभिन्न रूप से जुड़ी हैं --
1. सत और असत ,उचित और अनुचित के बीच सतत विवेक ,
2. जो सही है ,उसको करने में संलग्नता
3. जो अवांछनीय व अनुचित है ,उसके प्रतिकार में जागरूकता |
                   इच्छा शक्ति के विकास में एकाग्रता की शक्ति बहुत सहायक है | हम जो भी कार्य करें ,उसे पूरे मन से करें और ऐसे कार्यों से बचें जिनमे ऊर्जा का अनावश्यक अपव्यय होता है जैसे निरर्थक वाद विवाद ,परनिंदा ,परदोष दर्शन आदि से दूर रहें |
                     वास्तव में इच्छा शक्ति के विकास का मुख्य रहस्य ब्रह्मचर्य के उचित अभ्यास में निहित है |
               हमें सर्वशक्तिमान प्रभु से इच्छा शक्ति के लिये प्रार्थना करनी चाहिये | अपने सच्चे प्रयास व प्रभु की कृपा के साथ हम इच्छा शक्ति के विकास पथ पर आगे बढ़ सकते हैं और प्रभु के प्रति समर्पण भाव के अनुरूप इसकी पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं
               जितना हमारा जीवन आत्म जागरण ,विकास एवं भगवदभक्ति की पुण्य क्रिया में संलग्न होगा ,उतनी ही इच्छा शक्ति के विकास का पथ प्रशस्त होता जायेगा और उतना ही हमारा जीवन सच्चे सुख ,शांति व सफलता से परिपूर्ण होता जायेगा | 

4 July 2013

MORAL WISDOM

'मन को स्वच्छ ,निर्विकार ,निर्मल बनाना ईश्वर भक्ति का प्रधान प्रतिफल है | मन की मलिनता जिस मात्रा में घटती जाती है ,उसी अनुपात में विवेकशीलता ,दूरदर्शिता बढ़ती जाती है | इस निर्मल बुद्धि को ही ऋतंभरा प्रज्ञा ,भूमा आदि नामों से प्रशंसित किया गया है | '
                     आचार्य उपकौशल को अपनी पुत्री के लिये योग्य वर की खोज थी | उनके गुरुकुल में कई विद्वान्
           ब्रह्मचारी थे ,किंतु वे कन्यादान के लिये ऐसे सत्पात्र की खोज में थे जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी आत्मा को प्रताड़ित न करे ,सन्मार्ग से विचलित न हो | परीक्षा के लिये उन्होंने सब ब्रह्मचारियों को गुप्त रूप से आभूषण लाने को कहा ,जिसे माता -पिता क्या ,कोई न जाने |
      सब छात्र चोरी से कुछ न कुछ आभूषण लेकर लौटे ,आचार्य ने सारे आभूषण संभालकर रख लिये | अंत में वाराणसी के राजकुमार ब्रह्मदत्त खाली हाथ लौटे | आचार्य ने उनसे पूछा -"क्या तुम्हे एकांत नहीं मिला ?"
ब्रह्मदत्त ने उत्तर दिया -"निर्जनता तो उपलब्ध हुई पर मेरी आत्मा और परमात्मा तो देखते ही थे ,चोरी को ।"
       बस आचार्य को सत्पात्र मिल गया ,जिसकी उन्हें खोज थी |
 ईश्वर को सर्वत्र विद्दमान देखने वाला कभी अनुचित कार्य नहीं कर सकता | 

LEADER

'अंत:करण मनुष्य का सबसे सच्चा मित्र ,नि:स्वार्थ पथप्रदर्शक और वात्सल्यपूर्ण अभिभावक है | वह न कभी धोखा देता है ,न साथ छोड़ता है और न उपेक्षा करता है | पग -पग पर मनुष्य को सजग एवं सचेत बनाता हुआ सही मार्ग पर चलने का प्रयत्न किया करता है | अपने अंत:करण पर विश्वास करके चलने वाले व्यक्ति न कभी पथ भ्रष्ट होते हैं और न किसी आपति में पड़ते हैं | '

     याज्ञवल्क्य राजा जनक की सभा में विराजमान थे | जनक ने पूछा -"प्रकाश का स्रोत क्या है और यदि वह न मिले तो किसका आश्रय लिया जाये ?"
   याज्ञवल्क्य ने कहा -"सूर्य प्रमुख है ,वह न हो तो चंद्रमा ,चंद्रमा न हो तो दीपक ,दीपक न हो तो विद्वानों से पूछकर प्रकाश प्राप्त करें | "
   जनक ने पूछा -"कोई बताने वाला भी न दीखे तब ?    याज्ञवल्क्य ने कहा -"तब अपने अंत:विवेक के आधार पर मार्ग अपनायें | सांसारिक प्रकाश न मिलने पर आत्म ज्योति ही यथार्थता बताती है | "