स्वामी विवेकानंद अमेरिका यात्रा पर थे l उनके विचारों से प्रभावित होकर एक अमेरिकन ने उनसे उन्हें हिन्दू धर्म में दीक्षित करने को कहा l स्वामीजी ने उत्तर दिया ---- " मैं यहाँ धर्म प्रचार के लिए आया हूँ , धर्म परिवर्तन के लिए नहीं l मैं यहाँ यह सन्देश देने के लिए आया हूँ कि अच्छा इनसान बनने के लिए धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती l मेरी हिन्दू संस्कृति विश्व - बंधुत्व का सन्देश देती है और मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है l तुम अपना धर्म पालन करते हुए भारतीय ऋषियों के इन संदेशों को अपने जीवन में उतारो l वह व्यक्ति उनके कथन से अभिभूत हो गया l
3 September 2017
2 September 2017
WISDOM
बात 1936 की है l महात्मा गाँधी छुआछूत निवारण हेतु दौरे पर थे l उड़ीसा के एक कसबे में ठहरे हुए थे l वहां पंडितों का एक दल उनसे शास्त्रार्थ करने आ गया l वे कह रहे थे --- " शास्त्र में छुआछूत का समर्थन है l " गांधीजी ने मंडली को सम्मानपूर्वक बैठाया और कहा --- " पंडित जनों मैंने शास्त्र तो पढ़ा नहीं , इसलिए आपसे हार मान लेता हूँ , पर यह विश्वास करता हूँ कि संसार के सब शास्त्र मिलकर भी मानवी एकता के सिद्धांत को झुठला नहीं सकते l मानवता एक तरफ और आपके शास्त्र एक तरफ l मेरा धर्म तो यही है और मरते दम तक मैं इस पर अडिग रहूँगा l " उनकी स्पष्ट अभिव्यक्ति सुनकर लज्जित पंडित मंडली भी निरुत्तर वापस लौट गई l
1 September 2017
चैन की नींद का इलाज बताया ----- महात्मा आनंद स्वामी ने
सुप्रसिद्ध गायत्री उपासक , आर्य समाज के एक स्तम्भ महात्मा आनंद स्वामी के पास एक धनपति आये l इनके कई कारखाने थे , सभी लड़के अपने - अपने काम में लगे थे l चारों ओर वैभव का साम्राज्य था , पर VE अन्दर से बड़ा खालीपन अनुभव करते थे l उनकी भूख चली गई थी और रात्रि कि नींद भी l अपनी यह व्यथा उन्होंने स्वामीजी को सुनाई l
महात्मा आनंद स्वामी ने कहा ---- " आपने जीवन में कर्म और श्रम को तो महत्व दिया , पर भावना को नहीं l सत्संग , कथा - श्रवण आदि से तो विचारों को पोषण भर मिलता है l अन्दर कि शुष्कता कम करने के लिए अब प्रेम , धन , श्रम लुटाना आरम्भ कीजिये l अपने आपे का विस्तार कीजिये l सबको स्नेह दें , अनाथों - निर्धनों के बीच जाएँ और उन्हें स्वावलंबी बन सकने योग्य सहायता दें l अपना शरीर - श्रम जितना इस पुण्य कार्य में लग सके , लगाइए l दिनचर्या सुव्यवस्थित रखें l फिर देखिये आपकी भूख लौट आएगी तथा नित्य चैन की नींद सोयेंगे l आपका स्वास्थ्य भी ठीक हो जायेगा l "
सेठजी ने ऐसा ही किया l इस चमत्कारी परिवर्तन ने उन्हें जो सेहत , शांति व प्रसन्नता दी , वह पहले कभी नहीं मिली l
महात्मा आनंद स्वामी ने कहा ---- " आपने जीवन में कर्म और श्रम को तो महत्व दिया , पर भावना को नहीं l सत्संग , कथा - श्रवण आदि से तो विचारों को पोषण भर मिलता है l अन्दर कि शुष्कता कम करने के लिए अब प्रेम , धन , श्रम लुटाना आरम्भ कीजिये l अपने आपे का विस्तार कीजिये l सबको स्नेह दें , अनाथों - निर्धनों के बीच जाएँ और उन्हें स्वावलंबी बन सकने योग्य सहायता दें l अपना शरीर - श्रम जितना इस पुण्य कार्य में लग सके , लगाइए l दिनचर्या सुव्यवस्थित रखें l फिर देखिये आपकी भूख लौट आएगी तथा नित्य चैन की नींद सोयेंगे l आपका स्वास्थ्य भी ठीक हो जायेगा l "
सेठजी ने ऐसा ही किया l इस चमत्कारी परिवर्तन ने उन्हें जो सेहत , शांति व प्रसन्नता दी , वह पहले कभी नहीं मिली l
31 August 2017
WISDOM ------ कल्पनाएँ सार्थक हों
महर्षि अरविन्द ने अपने शिष्य नलिनी कान्त गुप्त से कहा था ---- " यदि किसी देश , समाज अथवा व्यक्ति के जीवन में यह पहचान करनी हो कि वह कितना विकास कर पायेगा तो यह परखो कि उसकी कल्पनाओं का स्तर एवं स्वरुप क्या है ? "
महर्षि ने कहा था ---- " अपनी कल्पनाओं के स्तर को नीचे मत गिरने दो l विषय - विलास , रास - रंग की कल्पनाओं से मानसिक ऊर्जा का क्षय होता है , जीवनी शक्ति बरबाद होती है l " उन्होंने कहा ---- ' सत्य पर आस्था रखो कि कल्पनाएँ साकार हो सकती हैं l बस ! इसके लिए योजनाबद्ध रूप से काम करने की जरुरत है l
बीसवीं सदी के दूसरे दशक में राबर्ट गोडार्ड ने रॉकेट की कल्पना की थी और अंतरग्रही यात्रा की सुनिश्चित संभावना बताई थी l उनके इस कथन के प्रकाशित होने पर अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स ने खिल्ली उड़ाई थी और कहा था --- ' यह कहने वाला स्कूली बच्चों से भी कम जानकार मालूम होता है l पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बारे में जिसे कुछ पता होगा , वह ऐसी बेसिर -पैर कि कल्पना नहीं करेगा l "
इस टिपण्णी के पचास वर्ष के भीतर ही जब कैप केनेडी से चंद्रमा पर यात्रा करने वाला अन्तरिक्ष यान रवाना हुआ तो न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी पुरानी टिप्पणी भूल सुधार के साथ व गोडार्ड से माफी मांगते हुए छापी थी और लिखा --- किसी भी नई परिकल्पना को ऐसे मजाक में उड़ा नहीं देना चाहिए l गंभीरतापूर्वक चिंतन करना चाहिए l कल्पनाओं ने ही तो विज्ञान का वर्तमान स्वरुप खड़ा किया है l
महर्षि ने कहा था ---- " अपनी कल्पनाओं के स्तर को नीचे मत गिरने दो l विषय - विलास , रास - रंग की कल्पनाओं से मानसिक ऊर्जा का क्षय होता है , जीवनी शक्ति बरबाद होती है l " उन्होंने कहा ---- ' सत्य पर आस्था रखो कि कल्पनाएँ साकार हो सकती हैं l बस ! इसके लिए योजनाबद्ध रूप से काम करने की जरुरत है l
बीसवीं सदी के दूसरे दशक में राबर्ट गोडार्ड ने रॉकेट की कल्पना की थी और अंतरग्रही यात्रा की सुनिश्चित संभावना बताई थी l उनके इस कथन के प्रकाशित होने पर अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स ने खिल्ली उड़ाई थी और कहा था --- ' यह कहने वाला स्कूली बच्चों से भी कम जानकार मालूम होता है l पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बारे में जिसे कुछ पता होगा , वह ऐसी बेसिर -पैर कि कल्पना नहीं करेगा l "
इस टिपण्णी के पचास वर्ष के भीतर ही जब कैप केनेडी से चंद्रमा पर यात्रा करने वाला अन्तरिक्ष यान रवाना हुआ तो न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी पुरानी टिप्पणी भूल सुधार के साथ व गोडार्ड से माफी मांगते हुए छापी थी और लिखा --- किसी भी नई परिकल्पना को ऐसे मजाक में उड़ा नहीं देना चाहिए l गंभीरतापूर्वक चिंतन करना चाहिए l कल्पनाओं ने ही तो विज्ञान का वर्तमान स्वरुप खड़ा किया है l
29 August 2017
WISDOM ----- धर्मराज कौन ?
भगवान श्रीकृष्ण से एक बार एक यादव बन्धु ने प्रश्न किया आप युधिष्ठिर को धर्मराज क्यों कहते हैं ? भगवन बोले कि महाभारत के अनुभव से मैंने यह जाना कि युद्ध के दौरान प्रति सांयकाल युधिष्ठिर वेश बदलकर कहीं जाया करते थे l पांडवों ने इसका रहस्य पता लगाने कि सोची l उनका पीछा किया तो पता चला कि वे युद्ध क्षेत्र में पड़े घायलों कि सेवा - शुश्रूषा करते थे l शेष चारों भाइयों ने उनसे वेश बदलकर यह शुभ कार्य करने का कारण पूछा और कहा कि सांय युद्ध की थकान मिटाने के स्थान पर आप क्यों अपना समय शत्रु पक्ष की सेवा में लगाते
हैं ? धर्मराज बोले ---- " घायलों में कौरव भी हैं और पांडव भी l दोनों ही मनुष्य हैं l यदि मैं प्रकट रूप में होता तो कौरव न मुझे कष्ट बताते और न ही सेवा करने देते l पांडव पक्ष की सेना भी प्रकट रूप में संभवतः सेवा स्वीकार न करती l सच्ची सेवा के अधिकार से वंचित न रह जाऊं , इसलिए ऐसा करना पड़ा l "
इस घटना को सुनाने के बाद श्रीकृष्ण ने कहा कि धर्म और परमार्थ परस्पर आश्रित हैं l जो आदर्शों की पराकाष्ठा पर पहुँचने हेतु परमार्थ करता हैं , उसे धर्मराज कहते हैं और धर्म मंत्रणा में उसे सदैवं शीर्ष स्थान दिया जाता है l
हैं ? धर्मराज बोले ---- " घायलों में कौरव भी हैं और पांडव भी l दोनों ही मनुष्य हैं l यदि मैं प्रकट रूप में होता तो कौरव न मुझे कष्ट बताते और न ही सेवा करने देते l पांडव पक्ष की सेना भी प्रकट रूप में संभवतः सेवा स्वीकार न करती l सच्ची सेवा के अधिकार से वंचित न रह जाऊं , इसलिए ऐसा करना पड़ा l "
इस घटना को सुनाने के बाद श्रीकृष्ण ने कहा कि धर्म और परमार्थ परस्पर आश्रित हैं l जो आदर्शों की पराकाष्ठा पर पहुँचने हेतु परमार्थ करता हैं , उसे धर्मराज कहते हैं और धर्म मंत्रणा में उसे सदैवं शीर्ष स्थान दिया जाता है l
28 August 2017
क्रांति ----- अत्याचार और अनौचित्य के विनाश के लिए
शहीद भगतसिंह ने कहा था ----- " क्रांति उन लोगों के दिलों में बसती है , जो सच्चे और साहसी हैं , जिन्हें अनीति व अत्याचार से समझौता करना नहीं आता और क्रांतिकारी वह है , जो अपने दिल में लगी हुई क्रांति की आग दूसरे के दिलों में लगाना जानता है , जो अपने मन - मस्तिष्क में छिपे हुए क्रांति के विचार - बीज दूसरे के मन - मस्तिष्क में बोना जानता है l "
उनका कहना था --- " श्रीमद्भगवद्गीता क्रांति और क्रांतिकारियों लिए बड़ी आशाओं का स्रोत है l यह बताती है कि अन्यायी कितने ही अपने क्यों हों , उनका साथ देने वाले कितने ही पूज्य क्यों हों , उनसे जूझा जाना चाहिए l वे कहते थे ---- " हिरण्यकश्यप कि निरंकुशता को अस्वीकार करने वाला प्रह्लाद भी सच्चा क्रांतिकारी था l इस युग के स्वामी विवेकानन्द क्रांति के सच्चे पथ - प्रदर्शक हैं l उनका कहना था ---- ' अगले दिनों क्रांति बम - पिस्तौल से नहीं , विचारों से होगी l
उनका कहना था --- " श्रीमद्भगवद्गीता क्रांति और क्रांतिकारियों लिए बड़ी आशाओं का स्रोत है l यह बताती है कि अन्यायी कितने ही अपने क्यों हों , उनका साथ देने वाले कितने ही पूज्य क्यों हों , उनसे जूझा जाना चाहिए l वे कहते थे ---- " हिरण्यकश्यप कि निरंकुशता को अस्वीकार करने वाला प्रह्लाद भी सच्चा क्रांतिकारी था l इस युग के स्वामी विवेकानन्द क्रांति के सच्चे पथ - प्रदर्शक हैं l उनका कहना था ---- ' अगले दिनों क्रांति बम - पिस्तौल से नहीं , विचारों से होगी l
27 August 2017
WISDOM
मिथिलांचल में यह मान्यता है कि वहां दो ही राजा हुए हैं ----- एक राजा जनक एवं दूसरे रामेश्वर प्रसाद सिंह l दरभंगा उन दिनों बहुत बड़ी रियासत थी l रामेश्वर प्रसाद सिंह तंत्र शास्त्र के विद्वान् थे l उनकी सारी पढ़ाई इंग्लॅण्ड में हुई l पर यहाँ आकर उन्होंने भारतीय वाड्मय का पूरा अध्ययन किया l सर जाँन वुडरफ उन्हें अपने गुरु समान मानते थे l राजा रामेश्वर प्रसाद हर तीर्थ में भ्रमण कर के आये और हर स्थान पर एक दरभंगा भवन स्थापित कराया l उनके राज्य में एक हजार पंडित राज्य एवं समष्टि के कल्याण के लिए सतत उपासना करते रहते थे l उनकी साधना का लक्ष्य व्यक्ति नहीं , सारे राज्य के जन - जन थे , जिन्हें पुण्य फलों का भागीदार बनाया गया था l
एक बार दरभंगा नदी की बाढ़ में डूबने के कगार पर आ गया l वे पूजन कर निकल रहे थे l लोगों ने बताया कि नदी उफन रही है l नेपाल से पानी तेजी से आ रहा है l वे नदी के किनारे टहलने लगे l बोले ----- " नदी मेरी माँ से ताकतवर नहीं हो सकती l " लगभग तीन मील किनारे - किनारे घूमे l उतनी ही नदी की धारा बदलती गई l पूरा दरभंगा राज्य बच गया l साधना में शक्ति हो तो प्रकृति को भी बदला जा सकता है , अपने अनुकूल बनाया जा सकता है l
एक बार दरभंगा नदी की बाढ़ में डूबने के कगार पर आ गया l वे पूजन कर निकल रहे थे l लोगों ने बताया कि नदी उफन रही है l नेपाल से पानी तेजी से आ रहा है l वे नदी के किनारे टहलने लगे l बोले ----- " नदी मेरी माँ से ताकतवर नहीं हो सकती l " लगभग तीन मील किनारे - किनारे घूमे l उतनी ही नदी की धारा बदलती गई l पूरा दरभंगा राज्य बच गया l साधना में शक्ति हो तो प्रकृति को भी बदला जा सकता है , अपने अनुकूल बनाया जा सकता है l
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