एक कुष्ठी भिक्षा मांग रहा था l उधर से जो भी निकलता , कुष्ठी अपना हाथ फैलाकर कहता , जो दे उसका भी भला , जो न दे उसका भी भला l एक युवक ने एक सिक्का उसके हाथ पर डालते हुए पूछा ---- क्यों भाई , तुम्हारा पूरा शरीर गला जा रहा है l हाथ और पैर की उँगलियाँ तक अब ऐसी न रहीं कि कुछ काम कर सको l फिर इस कष्ट का जीवन जीने से क्या लाभ ? यह तो जीवित अवस्था में लाश ढोने जैसी स्थिति है l कुष्ठी ने कहा ----- ' मित्र ! तुम बात तो ठीक कहते हो और कभी - कभी मेरे मन में भी इस प्रकार का प्रश्न उठता है , पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर मुझे इसलिए जीवित रखे हुए है कि लोग कम से कम मुझे देखकर यह समझ सकें कि मूर्ख , इस संसार में कभी तू भी मेरे जैसा हो सकता है , अत: इस संसार में काया की सुंदरता का घमंड करने से कोई लाभ नहीं है l
7 September 2021
6 September 2021
WISDOM ------
मरते समय मनुष्य को जिस पीड़ा का अनुभव होता है , वह पीड़ा मरने की नहीं , बल्कि चले गए जीवन की होती है l कबीर दास जी ने कहा है ---- कहत कबीर अंत की बारी l हाथ झारि जस चलै जुआरी l l कबीर दास जी कहते हैं ---- अंत में मृत्यु के समय ऐसे जाना पड़ता है , जैसे जुआरी को अपने खेल के अंत में अपना सब कुछ गँवा कर लौटना पड़ता है l जुए में जो जीतता है वह भी हारता है और जो हारता है वह तो हारता ही है l यह छल है क्योंकि हारने वाला यह सोचता है कि अभी हार गए तो कोई बात नहीं , अगली बार जीत निश्चित है , एक बार और भाग्य आजमा लूँ l ठीक यही बात जीतने वाला सोचता है , अभी एक बार और , अपनी जीत तो पक्की है l इस एक बार का सिलसिला तब तक चलता है , जब तक कि सब कुछ गँवा नहीं दिया जाता l जीवन भी ऐसा ही है l हम सारा जीवन कुछ पाने के लिए भागते रहते हैं , जो कुछ पाया भी वह भी अंत में छूट जाता है , खाली हाथ चले जाते हैं l
WISDOM ------
एक बार विक्रमपुर के राजा के सैनिक पड़ाव पर एक डाकू ने धावा बोलने का साहस किया , सैनिकों ने उसे पकड़कर राजा के सामने प्रस्तुत किया l राजा ने गुस्से में पूछा ----- ' तुम यह घृणित कार्य क्यों करते हो ? ' यह सुनकर डाकू बोला ---- " आपको यह पूछना शोभा नहीं देता , क्योंकि आपको देखकर ही हम यह कार्य करते हैं l आपसे ही हम ने ऐसा करना सीखा है l " राजा क्रोधित होकर बोला ---- " क्या मैं डाकू हूँ ? क्या मैं कहीं डाका डालता हूँ ? " डाकू बोला ---- " हमारी शक्ति कम है , हम छोटे डाकू हैं l आपके पास अधिक शक्ति है इसलिए आप पड़ोसी राज्य पर अकारण आक्रमण कर उसकी सम्पत्ति पर कब्ज़ा करते हैं l " राजा यह सुनकर लज्जित हुआ l उसने डाकू को खेती करने के लिए जमीन दे दी और स्वयं भी दूसरे राज्यों पर आक्रमण करना छोड़ दिया l
5 September 2021
WISDOM---------
हमेशा ख़तरा अपनों से होता है , अपनों के विश्वासघात के कारण ही चाहे परिवार हो समाज हो अथवा राष्ट्र हो , उस पर मुसीबत आती है l जयचंद , मीरजाफर जैसे अपने राष्ट्र से विश्वासघात करने वाले भी अनेक हुए जिनके कारण राष्ट्र पर मुसीबतें आईं l इस सत्य को समझाने वाली एक कथा है ------ कुछ लकड़हारे लकड़ी काटने के लिए जंगल में घूम रहे थे l वृक्षों का निरीक्षण कर रहे थे l वृक्ष दुःखी हो गए l उनने एक पुराने वटवृक्ष से कहा ---- " पितामह ! अब हमारा क्या होगा ? काट डाला जायेगा l " वटवृक्ष ने कहा ---- " तुम चिंता मत करो l यह हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते l हम इतने मजबूत हैं की ये हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते l " कुछ दिन बाद उनके तम्बू लग गए एवं लोहे की कुल्हाड़ियाँ आ गईं l फिर वे चिंतित हो गए , उन्होंने वयोवृद्ध वृक्ष से पूछा -- अब क्या होगा ? ' बटवृक्ष ने कहा ---- " तब तक कुछ नहीं होगा , जब तक हम में से कोई इनका साथ नहीं देगा , ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते l " कुछ ही दिनों बाद पड़ोस के जंगल से पेड़ काटकर उनके हत्थे कुल्हाड़ियों में लग गए , उनकी धार तीखी की जाने लगी l वटवृक्ष बोला ---- " अब तो ब्रह्मा भी आ जाएँ तो हमें बचाया नहीं जा सकता l " वृक्षों ने पूछा ---- " क्यों पितामह ? " वटवृक्ष बोला ----- " पहले केवल लकड़हारे और कुल्हाड़ी थीं , किन्तु अब हमारे ही कुल का पड़ोस के जंगल काष्ठ कुल्हाड़ी का बेंट बनकर हमारे विनाश का सरंजाम जुटा रहा है l हमेशा खतरा अपनों से ही होता है l इस विश्वासघात के कारण ही हमारा सर्वनाश होने जा रहा है l " कुछ दिनों बाद जंगल पूरी तरह काट दिया गया l
4 September 2021
WISDOM -----
एक लघु कथा है ----- रास्ते से जौहरी गुजरा l उसने देखा की एक कुम्हार गधे के गले में हीरा बाँधकर चला जा रहा है , चकित होकर जौहरी ने कुम्हार से पूछा ---- " कितने पैसे लेगा इस पत्थर के ? " कुम्हार ने कहा --- " एक रुपया l ' जौहरी बोला --- ' आठ आने लेगा l ' कुम्हार ने कहा --- ' चलो बारह आने सही l ' जौहरी का लोभ जागा , उसने सोचा -- मूर्ख हीरे को पत्थर समझ कर बेच रहा है l अभी लौटेगा तो आठ आने में दे जायेगा l किन्तु किसी दूसरे ने वह हीरा पूरे एक रूपये में खरीद लिया l जौहरी को सदमा बैठ गया , कुम्हार से बोला ----- ' मूर्ख , तू कोरा गधा ही निकला l लाखों का हीरा कौड़ियों में बेच दिया l ' कुम्हार बोला ---- ' यदि मैं गधा न होता तो क्या हीरा गधे के गले में बांधता , किन्तु आपको क्या कहा जाये ? जब आपको पता था कि हीरा लाखों का है , फिर भी कौड़ियों में दाम चुकाने में कोताही बरतते रहे ? ' ------- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- हम में से कितने ही व्यक्ति कुम्हार और जौहरी की तरह हैं , कुछ तो अनजाने में ही इस हीरे की भांति बहुमूल्य को गँवा देते हैं आओर कुछ जानते - समझते हुए भी उसे बरबाद होते देखते रहते हैं l '
3 September 2021
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शास्त्रों में कहा गया है --- ' दुष्टों से न दोस्ती अच्छी , न दुश्मनी l उनसे सतर्क रहे l एक कथा है ---- ' एक पंडित जी नदी में नहा रहे थे l उन्होंने देखा कि एक बिच्छु पानी में बहता जा रहा है l उन्हें उस पर दया आ गई , उन्होंने उसे बचाने के लिए उसे पानी से निकाल कर अपने हाथ में रखा l पानी से निकलते ही बिच्छू ने उनके हाथ में काट लिया और महात्मा जी के हाथ से छूटकर पुन: पानी में जा गिरा l महात्मा जी ने उसे तीन बार निकाला और तीनों बार उसने उनके हाथ में काट लिया l शिष्य उन्हें अचरज से देख रहे थे l महात्मा जी ने उन्हें समझाया कि --- ' प्रत्येक घटना हमें कुछ शिक्षा देती है , यह घटना हमें सिखाती है कि प्राणी चाहे वह मनुष्य हो या कोई अन्य प्राणी , अपनी मूल प्रवृति नहीं छोड़ता , अपना स्वाभाव नहीं बदलता l बिच्छू पर कितनी भी दया करो , वह मौका मिलने पर डंक मारने से नहीं चूकेगा , इसलिए ऐसे लोगों से हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए l
WISDOM ------
सौराष्ट्र के राजकवि हेमचन्द्र सूरि का सम्मान स्वयं नरेश करते थे और प्रजा भी उन्हें हृदय से प्रेम करती थी l एक बार वे एक गांव में प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने हेतु निकले l गांववासियों को जैसे ही ज्ञात हुआ कि कविराज आ रहे हैं , वे सभी कुछ न कुछ लेकर कविराज के दर्शनों हेतु उमड़ पड़े l इसी क्रम में एक ग्रामीण , जो स्वयं फटेहाल वस्त्रों में था , उसने एक हस्तनिर्मित परिधान राजकवि के चरणों में समर्पित किया l एक नजर उस टाट जैसे मोठे कपड़े पर तो दूसरी तरफ अपने वस्त्र - आभूषण पर नजर डालते हुए राजकवि की आँखें भर आईं l राजकवि मन ही मन सोचने लगे --- " कितनी घोर विषमता है ! कहाँ हम कीमती व बहुमूल्य परिधानों से सुसज्जित हैं और कहाँ यह परिश्रमी किसान तन ढकने के वस्त्रों से वंचित है l सत्य तो यह है कि हमारा अस्तित्व इसकी श्रमशीलता के कारण ही है , किन्तु हम इसे ही सुरक्षित जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं l " ऐसा विचार करते हुए राजकवि ने वह परिधान अपने माथे से लगाया और धारण कर लिया l जब राजकवि दरबार में पहुंचे तो उनके वस्त्रों पर दृष्टि जाते ही महाराज बोले ---- "कविवर ! ऐसे दरिद्र वस्त्र आपको शोभा नहीं देते हैं , आपने ऐसे वस्त्र क्यों पहने हैं ? " कविराज बोले ---- " महाराज ! हमारे राज्य की अधिकांश प्रजा ऐसे ही साधारण वस्त्र पहनती है , तो फिर मुझे यह बहुमूल्य वस्त्र पहनने का अधिकार किसने दिया ? मैंने निश्चय किया है कि अब मैं ऐसे ही वस्त्र पहनूंगा l " कविराज की करुणापूर्ण बातों ने महाराज के अंतर्मन को छू लिया और उन्होंने निश्चय किया कि अब वे किसान , मजदूर , प्रजाजन आदि सबके हितों का ध्यान रखेंगे और उनकी पीड़ा निवारण का हर संभव प्रयत्न करेंगे l