लघु कथा ---- सुबह -सुबह एक लोहार घर से बाहर निकला l रास्ते में उसे लोहे के दो टुकड़े मिल गए , उसने उन्हें उठा लिया और घर लौटने पर लोहार ने एक टुकड़े से तलवार बनाई और दूसरे को ढाल बना दिया l कुछ दिनों बाद एक योद्धा आकर तलवार और ढाल खरीदकर ले गया l उस योद्धा ने कई युद्धों में उनका उपयोग किया l एक युद्ध में तलवार टूट गई लेकिन ढाल ज्यों की त्यों सलामत रही l टूटी तलवार को योद्धा घर ले आया और तलवार व ढाल दोनों को पास -पास रख दिया l रात में जब सब सो गए , तब तलवार कराहती हुई ढाल से बोली --- बहिन , देखो मेरी कैसी दुर्दशा हो गई और एक तू है जो ज्यों -की -त्यों सुरक्षित है l ढाल ने कहा ---हम दोनों में एक फर्क जो है l वह क्या ? तलवार पूछ बैठी l ढाल ने कहा --- तू सदैव किसी को मारने -काटने का काम करती रही है और मैं बचाने का l यह ख्याल रखो कि मारने वाले से बचाने वाले की आयु ज्यादा है l
29 November 2022
28 November 2022
WISDOM ---
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता l किसी भी स्थिति में उसका कोई अहित नहीं होता l मैं सदा उसके साथ रहता हूँ l जो सच्चे ईश्वर भक्त हैं उनके मन में सतत विश्वास रहता है कि जब प्रभु साथ हैं तो कुछ भी अन्यथा नहीं होगा l एक कथा है ---- एक सेठ जी थे , ईश्वर विश्वासी थे l ईमानदारी से व्यापार करते और और काम करने के साथ मन में निरंतर भगवान का नाम स्मरण करते l उनके रुई के कई गोदाम थे l एक दिन उनका मुनीम अचानक दौड़ता हुआ उनके कक्ष में पहुंचा और बोला --- " सेठ जी ! बड़ी बुरी खबर है l तार आया है कि हमारे गोदामों में आग लग गई , संभवतः लाखों का नुकसान हो गया हो l " यह सुनकर सेठ जी जरा भी विचलित नहीं हुए और बोले --- " जैसी प्रभु की इच्छा , वैसा ही होगा l " मुनीम को ऐसा देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ l l एक घंटे बाद मुनीम फिर से सेठजी के कमरे में दौड़ा आया और बोला --- " सेठ जी ! अभी -अभी खुशखबरी आई है l हमारे सारे गोदाम सुरक्षित हैं l पहला वाला तार हमें गलती से मिल गया था l सेठजी ने फिर वही शांत भाव से उत्तर दिया --- " जैसी प्रभु की इच्छा होती है , वैसा ही होता है l " मुनीम को समझ में आ गया जो सब कुछ ईश्वर की इच्छा मानकर उन पर छोड़ देते हैं वे मन:स्थिति में शांत रहते हैं l
27 November 2022
WISDOM ----
वस्तुओं के प्रति आकर्षण का , अतृप्त इच्छाओं का नाम तृष्णा है l तृष्णा प्राय: अपनी स्थिति से अधिक ऊँची सामर्थ्य वाली वस्तुओं के लिए हुआ करती है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने में कुबेर की सम्पदा और इंद्र की सामर्थ्य भी कम पड़ती है l तृष्णा कभी तृप्त नहीं होतीं l उन्हें व्रत , संकल्प और प्रतिरोध की छड़ी से ही काबू में लाया जा सकता है l " एक कथा है ------ एक राजा ने एक बकरी पाली और प्रजाजनों की परीक्षा लेने का निर्णय किया l यह घोषणा की गई कि जो इस बकरी को तृप्त कर देगा उसे सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएँ उपहार में मिलेंगी l परीक्षा की अवधि पंद्रह दिन रखी गई और बकरी घर ले जाने की छूट दे दी l जो ले जाते वे पंद्रह दिन तक उसका पेट भली प्रकार भर देते l इतने पर भी जब वह दरबार में पहुँचती तो अपनी आदत के अनुरूप वहां रखे हुए हरे चारे में मुंह मारती l प्रयत्न असफल चला जाता l इस प्रकार कितनों ने ही प्रयत्न किया , पर वे सभी निराश होकर लौट गए l एक बुद्धिमान उस बकरी को ले गया , वह पीछे छुपकर बकरी को चारा डाल देता , उसका पेट भर देता लेकिन जब वह सामने से आता , उसके हाथ में चारा होता तब वह बकरी की छड़ी से अच्छी खबर लेता l उसे देखते ही बकरी खाना भूल जाती और मुंह फेर लेती l यह नया अभ्यास जब पक्का हो गया तो वह बकरी को लेकर दरबार में पहुंचा l छड़ी हाथ में थी l उसके सामने हरा चारा रखा गया तो छड़ी को ऊँची उठाते ही बकरी ने मुंह फेर लिया , राजा समझ गया कि वह पूर्ण तृप्त हो गई और उस बुद्धिमान को इनाम मिल गया l इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए राजपुरोहित ने बताया कि तृष्णायें बकरी के सद्रश हैं l वे कभी तृप्त नहीं होतीं l उन्हें व्रत , संकल्प और प्रतिरोध की छड़ी से ही काबू में लाया जा सकता है l
25 November 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " दूसरों का सहारा लेकर बहुत ऊँचे पहुंचे हुए लोगों में वो साहस और द्रढ़ता नहीं होती जो अपने आप विकसित हुए व्यक्ति में स्थायी रूप से होती है l सफलता की मंजिल भले ही देर से मिले पर अपने पैरों की गई यात्रा -विकास यात्रा अधिक विश्वस्त होती है l संसार में कार्य करने के लिए स्वयं का विश्वासपात्र बनना आवश्यक है l आत्म शक्तियों पर जो जितना अधिक विश्वास करता है , वह उतना ही सफल और बड़ा आदमी बनता है l " एक कथा है ---- किसी चिड़िया ने चोंच में दबाकर पीपल का एक बीज नीम के खोखले तने में डाल दिया l वहां थोड़ी मिटटी , थोड़ी नमी थी l बीज उग आया और धीरे -धीरे उस वृक्ष से ही आश्रय लेकर बढ़ने लगा l सीमित साधनों में वह पीपल का पौधा थोड़ा ही बढ़कर रह गया l एक दिन उसने बड़े वृक्ष को डांटते हुए कहा ---- " दुष्ट ! तू स्वयं तो आकाश छूने जा रहा है और मुझे थोड़ा भी बढ़ने नहीं देता l अब तूने शीघ्र ही मुझे विकास के और साधन न दिए तो तेरा सत्यानाश कर दूंगा l " नीम के वृक्ष ने समझाया ----" मित्र ! औरों की दया पर पलने वाले इतना ही विकास कर सकते हैं जितना तुमने किया है l इससे अधिक करना हो तो नीचे उतरो और अपनी नींव आप बनाओ , अपने पैरों पर खड़े हो l " पौधे से वह तो नहीं बना , हाँ , वह उसे कोसने अवश्य लगा लेकिन नीम के वृक्ष को इतनी फुरसत कहाँ थी कि वह पीपल के पौधे की गाली -गलौज सुनता l एक दिन हलकी सी आंधी आई l नीम का वृक्ष थोड़ा ही हिला था , पीपल के पौधे की नींव कमजोर थी अत" वह धराशायी होकर मिटटी चाटने लगा l उधर से एक राहगीर निकला l उसने नीम के वृक्ष की ओर देखा और उसके खोखले तने से गिरे हुए पीपल के पौधे को देखा और धीरे से कहा --- " जो परावलंबी हैं , औरों के आश्रय में बढ़ने की आशा करते हैं , उनकी अंत में यही गति होती है l " आचार्य श्री लिखते हैं ---- "जो दूसरों के सहारे उठते हैं उन्हें बात -बात पर गिर जाने का भय बना रहता है l अपने आप बढ़ने में सच्चाई और ईमानदारी रहती है , वह घबराता नहीं , परेशान भी नहीं होता l
24 November 2022
WISDOM ----
एक कथा है ---- विधाता ने मनुष्य बनाया और उसे धरती पर भेजने लगे तो भेजते हुए बोले ---" पुत्र ! तू मानव जीवन का उपयोग आत्म कल्याण के लिए करना ताकि मृत्यु आने पर पछताना न पड़े l " मनुष्य ने कहा -- " जी प्रभु ! पर आप मृत्यु आने से पूर्व चेतावनी जरुर दे देना , ताकि मैं समय रहते संभल सकूँ l " विधाता ने हामी भरी l पृथ्वी पर आते ही मनुष्य अपने पथ से भटक गया और मात्र इन्द्रिय सुखों में रस लेने लगा l जीवन पूरा हुआ और मृत्यु के बाद वह कर्मों का लेखा -जोखा के लिए विधाता के समक्ष उपस्थित हुआ l उसने विधाता से कहा --- "आपने वचन दिया था कि आप मृत्यु आने पर चेतावनी देंगे , पर मुझे तो कोई ऐसा संदेश नहीं मिला l " विधाता बोले --- " तेरी आँखों से दीखना , कानों से सुनना कम पड़ने लगा , हाथ -पैर कम काम करने लगे पर तब भी तू उन्हें भूलकर सुखों में रस लेता रहा तो इसमें किसका दोष है l यही तो तेरे लिए चेतावनी थी l सत्य है कि परमात्मा मनुष्य को हर घड़ी चेताते हैं , पर वह ही अपना बहुमूल्य जीवन व्यर्थ गँवा देता है l
संसार में ऐसे अनेक व्यक्ति हुए जिन्होंने मृत्यु को स्वीकार किया --- जर्मनी के प्रसिद्ध नाटककार गेटे अपने लक्ष्य में आजीवन पूरे मन और निष्ठां से लगे रहे l जब उनकी मृत्यु का समय आया तब भी उन्हें नाटक ही दीख रहा था l अंतिम साँस छोड़ते हुए उन्होंने उपस्थित लोगों से कहा --- " लो , अब पर्दा गिरता है , एक मजेदार नाटक का अंत होता है l "
23 November 2022
WISDOM -----
लघु कथा ---- कुछ समय पूर्व की बात है , वर्षा ऋतु थी घनघोर पानी बरस रहा था , दूर -दूर तक जल ही जल नजर आता था l ऊपर उड़ती दो बतखों की द्रष्टि एक कछुए पर पड़ी , जो एक पेड़ की टहनी मुंह से पकड़े स्वयं को बचाने में लगा था l बतखों को कछुए पर दया आ गई और उसके पास जा कर बोलीं --- " आओ कछुए भाई , तुम टहनी पकड़े रहो और हम तुम्हे उड़ाकर सूखी जमीन तक पहुंचा देते हैं l बस , किसी भी स्थिति में अपना मुंह न खोलना l " कछुए ने बिना सीख को समझे हाँ कर दी l अब कछुआ टहनी को मुंह से पकड़े हुए था और दोनों बतखों ने उसे दोनों सिरे से पकड़ रखा था और आसमान में उड़ते हुए जा रहे थे l नीचे जमीन पर खड़े कुछ बच्चों ने यह अचरज भरा द्रश्य देखा और कछुए की ओर इशारा कर के हँसने लगे l बच्चों को अपनी पर हँसते देख कछुआ क्रोध से भर उठा और पलटकर चिल्लाने लगा l मुंह खोलते ही टहनी पर उसकी पकड़ ढीली हो गई और कछुआ जमीन पर आ गिरा l इस कथा से यही शिक्षा मिलती है कि अविवेक के कारण व्यक्ति असमय मुँह खोलता है जिसका परिणाम विनाशकारी होता है l कभी मौन रहकर भी समस्या का निराकरण संभव है l
22 November 2022
WISDOM -----
हम अपने कष्टों के लिए हमेशा दूसरों को दोष देते हैं लेकिन सच ये है कि व्यक्ति की अपनी ही कमजोरियां हैं जिनकी वजह से वह कष्ट भोगता है l ' मोह ' के कारण कैसे व्यक्ति बंधनों में बंध जाता है , इसे समझाने के लिए आचार्य जी ने एक कथा कही है --- ' वैसे तो भँवरे को सभी फूलों से प्यार होता है , पराग रस के लोभ में हर बाग़ में प्रत्येक फूल पर मंडराता घूमता है l यह भंवरा सबसे अधिक कमल के फूल को प्यार करता है और अपने इस अतिमोह में कभी -कभी वह अपने प्राण ही गँवा देता है l सुबह से साँझ तक कमल के सौन्दर्य और स्वाद में खोया हुआ भँवरा साँझ होने पर भी उसके मोह से नहीं निकल पाता l साँझ होने पर सूर्य अस्त की वेला में कमल की पंखुडियां बंद होने लगती हैं , पर कमल के मोह में बंधा भंवरा वही जस -का -तस बैठा रहता है और कमल के पूरी तरह बंद होने पर वह भ्रमर उसी में कैद कैद हो जाता है l जो भ्रमर अपने पराक्रम से कठोर कष्ट को भी काटकर चूर -चूर कर देता है , वही मोह विवश होने पर कोमल पंखुड़ियों को नहीं काट पाता l उन्ही के बीच सिकुड़ा बैठा रहता है l उसे प्रतीक्षा रहती है सुबह होने की , परन्तु वह सुबह उसके जीवन में कभी नहीं आती l कमल के अन्दर प्राणवायु के अभाव में उसके प्राण निकल जाते हैं अथवा सरोवर में स्नान करने आए हाथी उस समूची कमलनाल को ही उखाड़ कर खा जाते हैं l उस भ्रमर के भाग्य में मृत्यु के अलावा और कुछ नहीं होता l इसी तरह मनुष्य मोहजाल में फंसकर अपने अस्तित्व को भुला बैठता है l