' अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं l वे समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस दोहरी नीति को समझ नहीं सकता l वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं l अपने को इस प्रकार बुद्धिमान समझना बहुत बड़ी मूर्खता है l वास्तविकता छिपी नहीं रह सकती l इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है l सामने से अच्छा व्यवहार करना और पीठ में खंजर भोंकना , ये सोच समझ कर किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते l महाभारत में ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ दुर्योधन ने अपने ही भाइयों पांडवों के विरुद्ध अनेक षड्यंत्र रचे , लाक्षाग्रह में भेजकर तो वे पांडवों के जलकर मर जाने की ख़ुशी मन -ही-मन मना रहे थे l लेकिन ऐसी कुटिल नीति का अंत अच्छा नहीं होता l अपने भीतर की असुरता को मनुष्य संसार से चाहे कितना भी छुपा ले , लेकिन ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है l उनसे कुछ नहीं छुपा , कर्म का फल अवश्य मिलता है l
18 September 2024
15 September 2024
WISDOM ------
अनंत ब्रह्माण्ड पर आधिपत्य जमाने की मनुष्य की व्यर्थ चेष्टा पर उसे चेताते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार बट्रेंड रसेल ने लिखा है ----- " अच्छा होता कि हम अपनी धरती ही सुधारते और बेचारे चंद्रमा को उसके भाग्य पर छोड़ देते l अभी तक हमारी मूर्खताएं धरती तक ही सीमित रही हैं l उन्हें ब्रह्माण्डव्यापी बनाने में मुझे कोई ऐसी बात प्रतीत नहीं होती , जिस पर विजय उत्सव मनाया जाए l चंद्रमा पर मनुष्य पहुँच गया तो क्या ? यदि हम धरती को ही सुखी नहीं बना पाए तो यह प्रगति बेमानी है l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " प्रगति के नाम पर विकृति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाए चल रहे इनसान के लिए बट्रेंड रसेल की यह पंक्तियाँ आज बहुत सार्थक प्रतीत होती हैं l विज्ञानं ने हमारे जीवन को सुख -सुविधा और विलासिता की चीजों से भर दिया है l भौतिक प्रगति तो हुई है लेकिन हम आंतरिक रूप से कंगाल हो चुके हैं l मनुष्य भावनाओं और संवेदनाओं से रहित एक रासायनिक यंत्र बन गया है l l विज्ञान का प्रभाव क्षेत्र कितना ही व्यापक और उपलब्धियां कितनी ही चमत्कारी क्यों न हों , इसके अलावा भी जीवन में भावनात्मक संतुष्टि , मानवीय संवेदना जरुरी है , जिसके अभाव में जिंदगी पंगु हो जाएगी l " विज्ञान की उपलब्धियों के संबंध में बंट्रेंड रसेल का कथन है ----- " हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच हैं , जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता l मानव जाति अब तक जीवित रह सकी तो अपने अज्ञान और अक्षमता के कारण ही , परन्तु यदि ज्ञान व क्षमता मूढ़ता के साथ युक्त हो जाएँ तो उसके बचे रहने कोई संभावना नहीं है l अत: विज्ञानं के साथ विवेक एवं औचित्य पूर्ण क्रियाकुशालता की भी आवश्यकता है l "
13 September 2024
WISDOM -----
11 September 2024
WISDOM -----
संसार में आज इतना पाप , अनर्थ , अनीति , अत्याचार बढ़ रहा है , इसका मुख्य कारण यही है कि मनुष्यों ने कर्म फल और पुनर्जन्म पर विश्वास करना छोड़ दिया है l विद्वानों के इस सन्देश को कि ' वर्तमान में जिओ ' लोगों ने गलत ढंग से ले लिया l अब लोग इस तरह सोचने लग गए हैं कि नैतिक - अनैतिक , सही -गलत किसी भी तरीके से जितना सुख , ऐशो -आराम भोग लो , चाहे जितना छल -कपट , षड्यंत्र कर लोगों को उत्पीड़ित कर लो , अगला जन्म किसने देखा ? जो होगा सो देखा जायेगा l ---इस तरह की सोच होने के करण ही समाज में पाप अपराध बढ़ रहे हैं l थोड़ी सी भी शक्ति आ जाए तो व्यक्ति अपने को सर्वसमर्थ , भगवान समझने लगता है , उसे लगता है कि वही सबका भाग्य -विधाता है l कर्मफल विधान को समझाने वाले अनेक प्रसंग , कथाएं हैं लेकिन अपने ही मानसिक विकारों में फँसा हुआ व्यक्ति समझता नहीं है l -------- आचार्य महीधर अपने शिष्यों के साथ तीर्थयात्रा पर थे l रात्रि में जंगल में रुक गए l रात्रि में ही उन्हें समीप के अंधे कुएं से करुण क्रंदन सुनाई पड़ा l वे वहां पहुंचे तो देखा पांच व्यक्ति औधेमुँह पड़े बिलख रहे हैं l आचार्य ने उनसे पूछा --- 'आप कौन हैं , इस कुएं में क्यों गिरे हैं ? ' उनमें से एक ने कहा --- " हम पांच प्रेत हैं , कर्मफल भोग रहे हैं l ' आचार्य ने उनसे उनकी ऐसी दुर्गति का कारण पूछा , तब उनमें से एक ने कहा ---- " वह पूर्वजन्म में ब्राह्मण था l दक्षिणा बटोर कर विलासिता में खर्च करता था l उपासना कभी नहीं की l " दूसरे ने कहा ---- " वह क्षत्रिय था , पर दुःखियों को पीड़ा देता , मांस - नशा , आदि विभिन्न कुकृत्य में निरत रहा l " तीसरा बोला --- " मैं वैश्य था l हमेशा अपने ही लाभ की सोचता , बिक्री में हेराफेरी करता , कभी दान नहीं किया l " चौथे ने कहा --- " मैं शूद्र था , अहंकारी , आलसी , दुर्व्यसनी l कभी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया l " पांचवां प्रेत किसी को अपना मुँह नहीं दिखाता था , निरंतर रोता जा रहा था l बहुत पूछने पर वह बोला --- " मैं पूर्वजन्म में साहित्यकार था , पर अपनी कलम से मैंने अश्लीलता और फूहड़पन फ़ैलाने वाला साहित्य लिखा l मैंने वासना भड़काई और सारे समाज को भ्रष्ट किया l इसलिए मुझे ब्रह्म राक्षस बनकर इस स्थिति में भटकना पड़ रहा है l " उन पाँचों प्रेतों ने आचार्य से प्रार्थना की कि वे समाज में उनकी ( प्रेतों ) की दुर्गति का कारण सभी को बता दें , ताकि वे लोग ऐसी भूल न करें l
10 September 2024
WISDOM -----
इंद्र का वैभव नष्ट हो रहा था l वे बड़े चिंतित हुए और राजर्षि प्रह्लाद के पास जाकर उसका कारण पूछा l प्रह्लाद ने बताया --- राजन तुमने अहिल्या जैसी सती -साध्वी का शील नष्ट किया है l जब तक उसका प्रायश्चित कर पुन: शील संग्रह नहीं करोगे , अपने वैभव को भी बचा नहीं सकोगे l लोभी इंद्र ने अपने को प्रह्लाद का अतिथि बताकर , उन्ही का शील मांग लिया l प्रह्लाद ने अपना शील उन्हें दान कर दिया l ऐसा करते ही उनके शरीर से तीन ज्योति पुरुष निकले और बोले --- हम सत्य , धर्म और वैभव हैं , जहाँ चरित्र ( शील ) नहीं रहता , वहां हम भी नहीं रहते l प्रह्लाद ने कहा --- मैंने इंद्र को नेक सलाह देकर सत्य का तथा अतिथि को याचित वास्तु दान कर धर्म का ही पालन किया है l अत: आपका जाना उचित नहीं है l फिर मैंने शील दान ही तो किया है l जिस जीवन देवता की आराधना से मैंने शील अर्जित किया था , उसे मैं पुन: संग्रह कर लूँगा l प्रह्लाद की यह बात सुनकर जाते हुए सत्य , धर्म और वैभव के चरण रुक गए और प्रह्लाद को अपने खोये हुए चारों देव वापस मिल गए l महामानव हर स्थिति में इस बहुमूल्य जीवन संपदा को नष्ट नहीं करते इस कारण उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में दैवी अनुदान भी मिलते हैं l
8 September 2024
WISDOM -----
अरब देश में एक प्रसिद्ध सुल्तान रहा करते थे l वे बड़े न्याय प्रिय एवं प्रजावत्सल थे l एक बार सुल्तान जंगल की सैर को निकले l उन्हें शिकार अत्यंत प्रिय था l एक बार संध्या के समय वे सूर्यास्त का द्रश्य देख रहे थे , तभी उन्हें लगा कि टीले पर कोई जानवर बैठा है तो उन्होंने तुरंत निशाना साध कर उस पर तीर छोड़ा l तीर लगते ही एक जोर की चीख सुनाई पड़ी l चीख सुनकर सुल्तान काँप उठे क्योंकि यह एक मनुष्य की चीख थी l उन्होंने पास जाकर देखा कि एक बालक तीर से घायल होकर पीड़ा से छटपटा रहा था l कुछ ही समय में उसका मजदूर पिता भी वहां आ गया l अपने पुत्र की यह हालत देखकर , वह बहुत बेहाल हो गया l सुल्तान ने बालक का शीघ्र उपचार कराया और उसके बाद दो थाल बालक के पिता के लिए मंगवाए l एक में अशर्फियाँ और दूसरे में तलवार रखी थी l सुल्तान मजदूर से बोले ---- " मैंने जानवर समझ कर तीर छोड़ा था , परन्तु गलती से तुम्हारे पुत्र को लगा l किन्तु तब भी तीर चलाने के कारण दोष तो मेरा ही है l तुम चाहो तो अशर्फियाँ लेकर इस भूल को माफ़ कर दो अन्यथा यदि मुझे माफ़ी का हक़दार न पाओ तो मेरा सिर तलवार से कलम कर दो l " सुल्तान की न्यायप्रियता देखकर मजदूर दांग रह गया l उसने कहा ---- " हुजुर ! मुझे दोनों में से कुछ नहीं चाहिए l केवल आप यह भूल दोबारा न करें l आप निरीह प्राणियों का वध करना छोड़ दें l " बादशाह ने उस दिन के बाद से शिकार करना छोड़ दिया l