19 March 2025

WISDOM ------

  आतंकवाद  एक  दूषित  मानसिकता  है  l  आतंकवादी  केवल  वे  नहीं  हैं  जो  दूसरे  देशों  से  आकर  मासूम , निर्दोष  और  निरीह  लोगों  को  मारकर  अपनी  कायरता  का  प्रमाण  देते  हैं  l  आतंकवादी  एक  राक्षस  के  समान  होते  हैं  , इनके  ह्रदय  में  संवेदना  नहीं  होती  l  इनका  दिल  पत्थर  की  तरह  होता  है   जिसमें  क्रूरता  होती  है  l  ये  निर्दयी  और  क्रूर  होते  हैं  मानवता  इनमें  नहीं  होती  l  ऐसे  दुर्गुणों  से  युक्त  व्यक्ति  परिवार , समाज  राष्ट्र  और  संसार   में  हैं   जो   अक्सर  मुखौटा  लगाकर  , कभी  प्रत्यक्ष  रूप  से  , कभी  तंत्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से   और  कभी  षड्यंत्र  रचकर , धोखा  देकर  अपनी  निर्दयता  और  क्रूरता  का  परिचय  देते  हैं  l  ऐसे  आतंकवादियों  से  स्वयं  की  सुरक्षा  बड़ा  कठिन  है  l  कहीं  तो  जन्म  से  ही  आतंकी  बनने  की  ट्रेंनिंग  दी  जाती  है  लेकिन  अनेक  ऐसे  उदाहरण  हैं  जहाँ  व्यक्ति  के  पूर्व  जन्मों  के  संस्कार  के  जाग्रत  हो  जाने  के  कारण  उसमें  निर्दयता  , क्रूरता , अहंकार  जैसे  दुर्गुण  आ  जाते  हैं   और  इन्हीं  के  पोषण  के  लिए   वो  जघन्य  कार्य  करता  है  l  त्रेतायुग  और  द्वापरयुग  में  जब  पाप  का  प्रतिशत  इतना  अधिक  नहीं  था   तब  अत्याचार , अन्याय  अधिकांशत:  प्रत्यक्ष  था  लेकिन  कलियुग  में  कायरता  बढ़  जाने  के  कारण   पीठ  में  छुरा  भौंकने  के  उदाहरण  बहुत  अधिक  हैं  l   आतंकवादी  मानसिकता  का   महाभारत  का  प्रसंग  है -----  गुरु  द्रोणाचार्य  का  पुत्र  अश्वत्थामा  बहुत  वीर  था  l  उसे  भी  शस्त्र -शास्त्र  का  अच्छा  ज्ञान  था   लेकिन  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई  ,  उसने  शिविर  में  रात्रि  में  प्रवेश  कर    सोए  हुए  द्रोपदी  के  पांच  पुत्रों  को  मार  डाला  l  इससे  भी  उसको  शांति  न  मिली   तो  अपने  ब्रह्मास्त्र   का  प्रयोग   अभिमन्यु  की  पत्नी   उत्तरा  के  गर्भस्थ  पुत्र  को  मारने  के  लिए  किया  l  इस  अमानवीय  कृत्य  से  सभी  चीत्कार  उठे  l  द्रोपदी  ने  भीम  से  कहा  कि  तुम्हारा  इतना  बल  किस  काम  का  ,  जो  निर्दयी  अश्वत्थामा  को   दण्डित  न  कर  सके  l  जब  भीम  अश्वत्थामा  के  पास  जाने  लगे  तो  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  भीम  को  रोका  और  कहा  कि  इस  समय  अश्वत्थामा   राक्षस  बन  चुका  है  ,  अपनी  सभी  मर्यादा  और  नीतियों  को  भूलकर  दानव  बन  गया  है  l  उसकी  मन:स्थिति  में  दया  नहीं , क्रूरता  है  , वह  भीम  को  भी  मार  सकता  है  l   ---यही  मानसिकता  आतंकवादियों  की  होती  है  l  निर्दयता , क्रूरता , चालाकी  जैसे  दुर्गुणों  से  युक्त  व्यक्ति  अब  समाज  में  ही  घुल-मिलकर  रहते  हैं  l  इनका  सच  तो  वही  समझ  पाता  है  जिसका  उनसे  पाला  पड़ता  है  l  

14 March 2025

WISDOM ------

 जीवन  में  आने  वाली  कठिनाइयों  को  चुनौती  मानकर  सकारात्मक  तरीके  से   उनका  मुकाबला  किया  जाए  तो  जीवन  में  सफलता  अवश्य  मिलती  है  l  हमारे  महाकाव्य  हमें  इस  बात  की  शिक्षा  देते  हैं  कि   अंधकार  कितना  ही  घना  क्यों  न  हो  ,  सूर्योदय  अवश्य  होता  है  l  इसी  विश्वास  को  अपने  ह्रदय  में   रखकर  निरंतर  अपने  व्यक्तित्व  को  परिष्कृत  करने  का  प्रयत्न  किया  जाए  तो  सफलता  अवश्य  मिलती  है  l  महाभारत  में  पांडवों की  माता  कुंती  का  चरित्र  अनूठा  है  l   उनकी  महानता  की  कहीं  कोई  तुलना  नहीं  है  l  धृतराष्ट्र  के  भाई   पांडु   से  उनका  विवाह  हुआ  था  l  महाराज   पांडु  को  शिकार  का  शौक  था   ,  एक  दिन   उन्होंने  जंगल  में   अपने  तीर  से  हिरन  को  मारा  ,  वह   एक  ऋषि  थे  जो  हिरन  के  वेश  में   थे  और   उस  समय  अपनी  पत्नी  के  साथ  थे   l  मरते  हुए  ऋषि  ने  पांडु  को  श्राप  दिया  कि  ----अपनी  पत्नी  के  साथ  जब  तुम  इसी  तरह  प्रेम  में  होगे  तो  तुम्हारी  मृत्यु  हो  जाएगी  l  '  इस श्राप  के  कारण  महाराज  पांडु  अपनी  दोनों  पत्नियों  कुंती  और  माद्री  के  साथ   ब्रह्मचारी   का  जीवन  व्यतीत  करने  लगे  l  महारानी  कुंती  ने  अपने  जीवन  में  सादगी  को  अपना  लिया  ,   उन्होंने  अपना  व्यवहार  संतुलित  रखा  ताकि  महाराज  के  जीवन  पर  कोई  आंच  न  आए  l  होनी  को  कौन  टाल  सकता  है  l  एक  दिन  जब  वह  अपनी  दूसरी  पत्नी  माद्री  के  साथ  एकांत  के  पल  में  थे  तब  ऋषि  के  श्राप  का  असर  हुआ  और  उनकी  तत्काल  मृत्यु  हो  गई  l  माद्री  ने  स्वयं  को  उनकी  मृत्यु  का  कारण  मानकर  उसी  समय  अपने  प्राण  त्याग  दिए  l  युवावस्था  में  ही  पति  की  मृत्यु  हो  जाने  से   पांचों  पुत्रों  के  पालन -पोषण  की  जिम्मेदारी  कुंती  पर  आ  गई  l    पिता  का  साया  सिर  पर  से   हटते  ही  दुर्योधन  आदि  कौरवों  के  अत्याचार  और  षड्यंत्र  शुरू  हो  गए  l  कुंती  ने  कभी  हिम्मत  नहीं  हारी  ,  अनेक  कष्टों  को  सहते  हुए  उन्होंने  अपने  बच्चों  की  सही  परवरिश  की  l  यह  कुंती  का  ही  त्याग  और  बलिदान  था  जिसने  पांचों  पांडवों  को  शस्त्र  और  शास्त्र  में  निपुण , धर्म  , सत्य  और  नीति  की  राह  पर  चलने  वाला  बना  दिया  l  दूसरी  ओर  धृतराष्ट्र  की  पत्नी  पतिव्रता  थीं  ,  लेकिन  उन्होंने  अपनी  आँख  पर  पट्टी  बाँध  ली   ताकि  अपने  पति  की  तरह  वे  भी  दुनिया  को  न  देख  सकें  l   इसका    परिणाम  यह  हुआ  कि  वे  अपने  बच्चों  की  गतिविधियों  पर  भी  नजर  नहीं  रख  सकीं  और  सब  साधन  होते  हुए  भी   उनके  जीवन  को  सही  दिशा  न  दे  सकीं  परिणाम स्वरुप  कौरव  अधर्म  और  अन्याय  की  राह  पर  चलने  लगे   और  कौरव  वंश  का  सर्वनाश  हुआ  l  

13 March 2025

WISDOM ------

  नकारात्मक  सोच  वाला  व्यक्ति  न  केवल  स्वयं  परेशान  रहता  है  बल्कि  अपने  आसपास  के  लोगों  को  भी  वैसी  ही  नकारात्मक  सोच  का  बना  देता है  l   ऐसे  व्यक्ति  कभी  भी  किसी  भी  कार्य  में  अच्छाई  को  नहीं  देखते  ,  वे  हमेशा  उसमें  से  बुराई  को  ढूंढ  निकालते  हैं  l  इसका  परिणाम  यह  होता  है  कि  वे  स्वयं  उन  बुराइयों  से , नकारात्मकता  से  घिरे रहते  हैं  l  इसका  परिणाम  कभी  भी  शुभ  नहीं  होता  l  ------ महाभारत  का  प्रसंग  है   कि  भीष्म  पितामह  ने  गांधार  नरेश  से  बात  कर  के  उनकी  पुत्री  गांधारी  का  विवाह  धृतराष्ट्र  से   संपन्न  कराया  l  भीष्म  पितामह  कोई  प्रस्ताव  प्रस्तुत  करें  तो  उसे  कोई  अस्वीकार  करने  का  साहस  नहीं  कर  सकता  l  गांधारी  के  भाई  शकुनि  ने  जब  देखा  कि  उसकी  बहन  का  विवाह  एक  अंधे  व्यक्ति  के  साथ  हुआ  है   , भीष्म  पितामह  के  सामने  उनके  पिता  गांधार  नरेश  कुछ  बोल  न  सके   तो  शकुनि   को  बहुत  क्रोध  आया   और  उसके  मन  में  बदले  की  भावना  जाग्रत  हो  गई  कि  वह  किसी  न  किसी  तरह  इसका  बदला  अवश्य  लेगा  l  यहाँ  शकुनि  को  सोच  नकारात्मक  थी  , उसने  यह  नहीं  देखा  कि  उसकी  बहन  एक  विशाल  साम्राज्य  की  कुलवधु  ,  सबके  सम्मान  की  अधिकारिणी  बन  गई   l  एक  ऐसा  साम्राज्य  जिसके  संरक्षक  गंगापुत्र  भीष्म  थे  , एक  से  बढ़कर  एक  शक्तिशाली  राजा -महाराजा  उनके  आगे  सिर  झुकाते  थे  , शस्त्र - शास्त्र  के  ज्ञाता  द्रोणाचार्य  उसमें  आश्रय  पाते  थे  l  विशाल  , एकछत्र  साम्राज्य  का  वैभव  गांधारी  के  चरणों  में  था  l  संसार  का  सब  सुख  और  सम्मान  उसे  मिला  l  यह  सब   अच्छाई ,  सकारात्मकता   शकुनि  को  दिखाई  नहीं  थी  l  उसे  तो  केवल  यही  दिखाई  दे  रहा  था  कि  धृतराष्ट्र  अंधे  हैं  l  उसने  अपना  बदला  लेने  के  लिए  ,  भीष्म  पितामह  द्वारा  संरक्षित  साम्राज्य  की  शांति  भंग  करने  के  लिए  दुर्योधन  को  अपना  हथियार  बनाया  l  वह  निरंतर  दुर्योधन  के  मन  में  पांडवों  के  प्रति  द्वेष  की  भावना  भरता  रहता ,  दुर्योधन  की  मदद  से  अपनी  कुत्सित  चालों  को  अंजाम  देता  l  हस्तिनापुर  का  साम्राज्य  कौरव- पांडवों   के  आपसी  बैर  का    षड्यंत्रों  का  केंद्र  बन  गया  l  इसका  परिणाम  हुआ  --महाभारत  का  महायुद्ध  l  जिस  बहन  के  अंधे  पति  को  देखकर  उसे  दुःख  हुआ , बदले  की  भावना  जाग्रत  हुई ,  उसी  बहन  के  सौ  पुत्र  इस युद्ध  में   मृत्यु  को  प्राप्त  हुए  l  बहन  के  प्रति  ऐसा  कैसा  प्रेम  !  उसे  ऐसा  दुःख  दे  दिया  जिसकी  भरपाई  कभी  नहीं  हो  सकती  ,  पूरा  कौरव  वंश  नष्ट  हो  गया  l   यदि  शकुनि  अपना  गांधार  देश  छोड़कर   अपनी  बहन  के  साथ  हस्तिनापुर  में  नहीं  रहता   तो  इतना  अनर्थ  न  होता  l  यह  प्रसंग  हमें  यही  शिक्षा  देता  है  कि  मनुष्य   का   अपने  जीवन  में  विभिन्न  मानसिकता  के  लोगों  से  सामना  होता  है , व्यवहार  होता  है  l  किसी  की  कोई  बात  बुरी  लगती  है  तो  बदला  लेने  का  सकारात्मक  तरीका  अपनाओ  ,  स्वयं  को  उससे  श्रेष्ठ  साबित  करो  , अपने  व्यक्तित्व  को  ऊँचा  उठाओ  ,  प्रतिपक्षी  स्वयं  ही  हार  जायेगा  l  

11 March 2025

WISDOM ---

   एक  गुरु  के  दो  शिष्य  थे  l  दोनों  किसान  थे  l  भगवान का  भजन  भी  दोनों  करते  थे  l  किन्तु  एक  बड़ा  सुखी  था  ,  दूसरा  बड़ा  दुःखी  था  l  गुरु  की  मृत्यु  पहले  हुई  ,  उनके  बाद  दोनों  शिष्यों  की  भी  मृत्यु  हो  गई  l  संयोग  से  स्वर्गलोक  में  भी  तीनों  एक  ही  स्थान  पर   आ  मिले  l  पर  यहाँ  भी  स्थिति  पहले  जैसी  थी  l  जो  पृथ्वी  पर  सुखी  था  , वह  यहाँ  भी  प्रसन्नता  का  अनुभव  कर  रहा  था   और  जो  पृथ्वी  पर  अशांत  रहता  था  ,  वह  यहाँ  भी  अशांत  दिखाई  दिया  l   दुःखी  शिष्य  ने  गुरुदेव  से  पूछा  --- "  भगवन  !  लोग  कहते  हैं   कि  ईश्वर भक्ति  से   स्वर्ग  में  सुख  मिलता  है  ,  पर  हम  तो  यहाँ  भी  दुःखी  के  दुःखी   रहे  l "  गुरु  ने  गंभीर  होकर  उत्तर  दिया  ---- " वत्स  !  भक्ति  से  स्वर्ग  तो  मिल  सकता  है  ,  पर  सुख  और  दुःख  मन  की  देन  है  l  मन  शुद्ध  है   तो  नरक  में  भी  सुख  है   और  मन  शुद्ध  नहीं  है   तो  स्वर्ग  में  भी  कोई  सुख  नहीं  है  l 

10 March 2025

WISDOM ------

 इस  संसार  में  मनुष्य  कर्म  करने  के  लिए  स्वतंत्र  है  ,  ईश्वर  इसमें  हस्तक्षेप  नहीं  करते  l  व्यक्ति  अच्छा  या  बुरा  जो  भी  कर्म  करता  है  , उसके  अनुरूप  ही  उसका  फल  उसे  मिलता  है  l  ईश्वर  स्वयं  इस  कर्मफल  से  नहीं  बचे  हैं  l  जब  महाभारत  के  महायुद्ध  में  सात  महारथियों  ने  मिलकर  अभिमन्यु  को  मारा  था  , तब  अभिमन्यु  की  माँ  सुभद्रा  जो  श्रीकृष्ण  की  सगी  बहन  थीं  ,  उन्होंने  श्रीकृष्ण  से  कहा  --- तुम्हे  तो  लोग  भगवान  कहते  हैं  ,  तुम  मेरे  ही  पुत्र , अपने  भानजे  अभिमन्यु  की  रक्षा  न  कर  सके  ! "  तब  श्रीकृष्ण  ने  कहा --- 'यह  संसार  कर्मफल  के  आधीन  है  l  हमारा  वर्तमान  जीवन  कई  जन्मों  की  यात्रा  है  l  मनुष्य  जो  भी  कर्म  करता  है  उसका  फल  उसे  कब  , कैसे  और  किस जन्म  में  किस  प्रकार  मिलेगा   , यह  काल  निश्चित  करेगा  l  त्रेतायुग  में  मैंने  बाली  को  छुपकर  मारा  था  ,  वह  बाण  मेरे  लिए   भी  रखा  है  l  '   जब  भगवान  श्रीकृष्ण  पेड़  के  नीचे  विश्राम  कर  रहे  थे  तब  व्याध  का  बाण  लगने  से  उनकी  मृत्यु  हुई  l  कभी  -कभी  ऐसा  भी  होता  है  कि  वर्तमान  जन्म  में  हम  जो  कर्म  करते  हैं  , उनका  फल  भी  इसी  जन्म  में  मिल  जाता  है  l  किसी  की  मदद  करने  से  पहले  भगवान  भी  देखते  हैं  कि  उसके  खाते  में  ऐसा  कोई  पुण्य  है  भी  या  नहीं  , तभी   प्रार्थना  सुनते  हैं  l   जब  दु:शासन  द्रोपदी  का  चीरहरण  करने  को  तैयार  था   और  द्रोपदी  'हे !कृष्ण  !  कहकर  भगवान  को  पुकार  रही  थी   तब  भगवान  ने  अपने  अनुचरों  से  कहा  --- द्रोपदी  हमें  पुकार  रही  है ,  देखो  उसके  खाते  में  ऐसा  कोई  पुण्य  है  कि  उसकी  मदद  की  जाए  ?  अनुचरों  ने  सब  बहीखाते  देखे  और  कहा  --- हां  भगवान  !  जब  आपने  शिशुपाल  को  सुदर्शन  चक्र  से  मारा  था  , तब  आपकी  अंगुली  थोड़ी  सी  कट  गई  थी  , उसमें  खून  बहने  लगा  था  l  तब  आपकी  महारानियाँ  देखती  रहीं  , उन्हें  समझ  नहीं  आया  की  क्या  करें  ?  तब  द्रोपदी  ने  अपनी  कीमती   साड़ी  फाड़कर  आपकी  अंगुली  में  बाँधी  थी  l  यह  सुनते  ही  भगवान  ने  वस्त्रवातर  धारण  कर  लिया  l  दु:शासन  का  दस  हजार  हाथियों  का  बल  हार  गया  ,  सारी सभा  साड़ियों  के  ढेर  से  भर  गई  ,  द्रोपदी  का  बाल  बांका  भी  नहीं  हुआ  ,  ईश्वर  ने  उसकी  लाज  रखी  l  l    इसी  तरह  पाप  कर्मों  का  फल  भी   कभी  इसी  जन्म  में  मिल  सकता  है  ,कभी  किसी  दूसरे  जन्म  में  l  कर्म  की  गति  बड़ी  न्यारी  है  ,   सामान्य   व्यक्ति  की  समझ  से  परे  है  l  इसलिए  कहते  हैं  सत्कर्मों  की  पूंजी  जोड़ते  रहो  l  कौनसा  पुण्य   हमें  कब  किसी  मुसीबत  से  बचा  ले  ,  ईश्वर  की  कृपा  मिल  जाए  l  

9 March 2025

WISDOM ------

महाभारत  के  विभिन्न  प्रसंग  हमें,  जीवन  जीने  की  कला  सिखाते  हैं  ---- ऋषि  कहते  हैं  यदि  मनुष्य  में  विवेक  और  वैराग्य  हो  तो  वह  अनेक  समस्याओं  से  मुसीबतों  से  बचकर  सुरक्षित  बाहर  निकल सकता  है  l  युधिष्ठिर  धर्मराज  थे  ,  उनके  भीतर  विवेक  था  , क्या  सही  है  और  क्या  गलत  है  ,  इसे  वह  अच्छी  तरह  जानते  थे   l   वे  जानते  थे  कि  जुआ  खेलना   उचित  नहीं  है  l  जुआ  खेलने  के  दुष्परिणाम  वे  अच्छी  तरह  जानते  थे  लेकिन  फिर  भी  जब  दुर्योधन  ने  उन्हें  जुआ  खेलने  को  आमंत्रित  किया  ,  तब  उन्होंने  इस  आमंत्रण  को  सहज  स्वीकार  कर  लिया  l  हारे  हुए  जुआरी   के  पीछे  ऐसा  दुर्भाग्य  पड़  जाता  है  कि  पांचों  पांडवों  को  द्रोपदी  सहित   चौदह  वर्ष  वनवास  भोगना  पड़ा  , राजा  विराट  के  यहाँ  वेश  बदलकर  नौकर  की  तरह  रहना  पड़ा  l   इसी  तरह  यदि  हमारे  मन  में  वैराग्य  का  भाव  नहीं  है   अर्थात  हम  किसी  के  भी  लालच  में  आ  जाते  हैं   तो  उसका  दुष्परिणाम  भी  भोगना  पड़ता  है  l  जैसे  कर्ण   को  सूतपुत्र  होने  के  कारण  अपमानित  और  उपेक्षित  होना  पड़ता  था  l  उसकी  वीरता  को  भी  उचित  सम्मान  नहीं  मिला  l  दुर्योधन  कूटनीतिज्ञ  था  l  वह  समझ  गया  था  कि  कर्ण  जैसा  वीर  उसके  पक्ष  में  होगा  तो  उसके  आगे  की  राह  आसान  हो  जाएगी  l    उसने  कर्ण  को  अंगदेश  का  राजा  बनाने  का    और  यथोचित  सम्मान  दिए  जाने  का  लालच  दिया  l  कर्ण  जानता  था  कि  दुर्योधन  अत्याचारी  , अन्यायी  है  लेकिन  फिर  भी  उसने  उस  प्रस्ताव  को  स्वीकार  कर लिया  l  कहते  हैं  यदि  कर्ण  दुर्योधन  के  साथ  न  होता  तो  शायद  दुर्योधन  महाभारत  के  महायुद्ध  को  करने  की  हिम्मत  नहीं  जुटा  पाता  l  कर्ण  ने  विवेक  और  वैराग्य  से  काम  नहीं  लिया  l  अत्याचारी  का  साथ  देने  का  जो  परिणाम  होता  है  वही उसका  हुआ  l  

7 March 2025

WISDOM -----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' ज्ञान -चक्षुओं  के  अभाव  में   हम  परमात्मा  के  अपार  दान  को  देख  और  समझ  नहीं  पाते  और  सदा  यही  कहते  रहते  हैं  कि  हमारे  पास  कुछ  नहीं  है  ,  हमें  कुछ  नहीं  मिला  l  लेकिन  यदि  हमें  जो  नहीं  मिला  उसकी  शिकायत  करना  छोड़कर  ,  जो  मिला  है  उसकी  महत्ता  को  समझें  तो  मालूम  होगा  कि   जो  कुछ  मिला  है  ,  वह  कम  नहीं  , अद्भुत  है  l   जो   परमात्मा    अनेक  सुख  देता  है  ,  यदि  वह  थोड़े  से  दुःख  देता  है  ,  तो  उन्हें  भी  प्रसन्नता पूर्वक  सहन  करना  चाहिए   l  "  -------- हकीम  लुकमान  जब  एक  अमीर  आदमी  के  दास  थे  l  वह  अमीर  कभी -कभी  ईश्वर  को  भला  बुरा  कह  देता  था  , लेकिन  वह  लुकमान  की  कर्तव्य परायणता  के  लिए  उनसे  स्नेह  करता  था  l  लुकमान  बहुत  नेक  , आज्ञाकारी  थे  l  एक  दिन  अमीर   ने  ककड़ी  खानी  चाही  , लेकिन  जैसे  ही  उसे   मुख  से  लगाईं  , वह  उन्हें कड़वी  लगी  l  उन्होंने  उसे  तुरंत  लुकमान  को  दे  दी   और  कहा  ---- 'ले , तू  इसे  खा  ले  l  हकीम  लुकमान  ने  ककड़ी   ले  ली  और  बिना  कुछ  कहे  उसे  चुपचाप  खा  लिया  , जैसे  वह   कोई  मीठी  ककड़ी  हो  l  l  अमीर  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ   , उसने  लुकमान  से  पूछा  ---- "  लुकमान , तुमने  इतनी  कड़वी  ककड़ी  किस  तरह  खा  ली  ? "  लुकमान  ने  कहा --- "  स्वामी  आ!  आप  मुझे  प्रतिदिन  स्वादिष्ट  भोजन  देते  हो  ,  एक  दिन  कड़वा  दिया  तो  क्या  उसे  फेंक  दूँ   या  उसके  लिए  आपको  दोष  दूँ  l  अपने  प्यारे  लोगों  की   चार  मिठास  में   एक  कड़वाहट  भी  हो  ,  तो  क्या  उसके  लिए  उसे  दोषी  ठहराना  चाहिए  l  "  अमीर  समझ  गया  कि   परमात्मा  ने  हमें  अनेक  सुख  दिए  हैं   l  यदि  कोई  दुःख  जीवन  में  आया  भी  है  तो  उसके  लिए  परमात्मा  को  भला -बुरा  नहीं  कहना  चाहिए  l