ईरान के दार्शनिक शेख सादी से किसी जिज्ञासु ने पूछा ,"पहलवान बड़े होते हैं या धनी या परोपकारी ?"शेख सादी ने उत्तर देने से पहले प्रश्नकर्ता से एक प्रश्न पूछा -"बताओ ,हातिम के ज़माने में सबसे बड़ा पहलवान या सबसे बड़ा धनी कौन था ?"जिज्ञासु ने याद करने का बहुत प्रयत्न किया पर उसे किसी का नाम याद नहीं आया | इस पर शेख सादी ने कहा ,"देखो हातिम के परोपकार बहुत विख्यात हैं और उसकी उदारता सभी को याद है | उस समय भी पहलवान और धनवान अनेकों हुए होंगे पर किसी के काम न आने के कारण उनका नाम किसी को याद नहीं है | जिज्ञासु का समाधान हो गया | उसने समझ लिया कि बलवान ,धनवान नहीं परोपकारी बड़े होते हैं |
19 February 2013
दूरदर्शिता वट वृक्ष की तरह है जो समयानुसार फल देता है एक राज्य का नियम था कि राजा पांच वर्ष के लिए नियुक्त होता था | इसके बाद उसे ऐसे निर्जन वन में छोड़ दिया जाता था जहां साधनों के अभाव में भूखा -प्यासा मर जाता था | बहुत से राजा इसी प्रकार मर चुके थे | एक चतुर एक बार राजगद्दी पर बैठा | उसने पता लगा लिया कि पांच वर्ष बाद उसे किस निर्जन क्षेत्र में भेजा जायेगा | उसने तुरंत यह व्यवस्था की कि उस वीरान में जलाशय बनवाये ,पेड़ -पौधे लगवाये ,प्रजा बसाई ,यातायात के साधन जुटाये | पांच वर्ष में वह निर्जन क्षेत्र इतना हरा -भरा हो गया कि वहां अनेक उद्द्योग -व्यवसाय शुरु हो गये | जब पांच वर्ष पूरे हो गये तब राजा वहां चला गया और पहले से अधिक सुख सुविधा से रहने लगा | यही है दूरदर्शिता | यदि हम वर्तमान को सत्कर्मों से सुखी बनाकर पुण्य -परमार्थ की सम्पदा जमा कर लें तो भविष्य में भी सुखी व संपन्न जीवन व्यतीत कर सकते हैं |
18 February 2013
- जीवन एक संग्राम है जिसमे सुख और दुःख समान रुप से आते हैं ।दुःख के बाद ही सुख की अनुभूति सुखद लगती है ।दुःख के बीच ही सुख है ।शहद मधुमक्खियों के छते से निकलता है ।उन मधुमक्खियों के जहरीले डंक होते हैं ।उनके बटोरे हुए मधु को वही मनुष्य प्राप्त कर सकता है जो उनके डंकों से नहीं घबराता ।गुलाब के पौधों में खुशबूदार फूलों के साथ कांटे भी लगे रहते हैं ।उन पुष्पों के सौरभ का आनंद वही मनुष्य लेता है ,जिसे काँटों की पीड़ा सहन करने का साहस हो ।सुंदर व्याघ्र चर्म पाने की इच्छा रखने वाले को व्याघ्र से युद्ध करना पड़ता है ,मोती ढूंढने वाले को समुद्र की तली तक दौड़ लगानी पड़ती है ।वास्तव में महानता दुर्गम संकटों का आवाहन करती है और उनका निराकरण करके ही अपने अस्तित्व को सार्थक सिद्ध करती है ।
17 February 2013
एक व्यक्ति बड़ा परेशान था ।उसे बीस लाख का घाटा हुआ तो दिल धड़कने लगा हार्ट अटैक की आशंका सताने लगी।पत्नी एक साधु के पास ले गई ।उसने साधु से कहा -"महाराज इन्हें दस लाख का फायदा हुआ है और ये व्यर्थ में परेशान हो रहे हैं \साधु बोले ,"समझ में नहीं आता कि लाभ हुआ है या नुकसान ,ये परेशान क्यों हैं ?"पत्नी बोली -"महाराज !वास्तव में इन्हें तीस लाख का लाभ इस सौदे में होना था ,पर मिले मात्र दस लाख ।बीस लाख जो नहीं मिले ,उसी पर दुखी होकर ऐसी स्थिति में आ गए हैं \साधु ने उसे समझाते हुए कहा ,"जो कुछ भी तेरे पास है ,उसके लिए तू खुश होना सीख ,प्रसन्न होने की कला जीवन में उतार ।ज्ञान चक्षुओं के अभाव में हम परमात्मा की अपार देन को देख और समझ नहीं पाते ,सदा यही कहते रहते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं है ।जो हमें मिला है उसका मूल्य समझे तो मालुम होगा कि वह अदभुत है \
16 February 2013
इमर्सन -"आओ हम चुप रहें ,ताकि फरिश्तों के वार्तालाप सुन सकें ।"सुप्रसिद्ध मनीषी रहती ऐडवर्ड इवरेट हेल अपनी रचना में एक छोटी बालिका के संबंध में लिखते हैं कि वह पक्षियों और वन्य जीवों के साथ खेला करती थी और बीच -बीच में पास में बने मंदिर में प्रार्थना करने के लिए जाया करती थी ।प्रार्थना करने के बाद कुछ देर बिलकुल शान्त होकर रहती वहीँ बैठी रहती ।पूछने पर कारण बताते हुए कहती कि मैं देर तक चुपचाप इसलिए बैठी रहती हूँ ताकि यह सुन सकूँ कि ईश्वर मुझसे कुछ कहना तो नहीं चाहता ।'शान्त और एकाग्र मन से ही उनसे वार्तालाप संभव है ।मौन रहकर ही अपने अन्तराल में उतरने वाले ईश्वर के दिव्य संदेशों ,को सुना समझा जा सकता है ।
जो पवित्र नहीं उदार नहीं ,उनका जप -तप निरर्थक है ।मात्र कर्मकांडों के सहारे कोई पुण्य लोक तक नहीं पहुंचता ।एक बार पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा -"भगवन !लोग इतना कर्मकांड करते हैं फिर भी उन्हें आस्था का लाभ क्यों नहीं मिलता ?"शिवजी बोले -"धार्मिक कर्मकांड होने पर भी मनुष्य जीवन में जो आडम्बर छाया हुआ है ,यही अनास्था है ।लोग धार्मिकता का दिखावा करते हैं ,उनके मन वैसे नहीं हैं ।"परीक्षा लेने दोनों धरती पर आये ।माँ पार्वती ने सुंदर साध्वी पत्नी का और शिवजी ने कोढ़ी का रुप धारण किया ।मंदिर की सीढ़ियों के समीप वे पति को लेकर बैठ गईं ।लोग दर्शन के लिए आते रहे ,कुछ पल पार्वतीजी को देखकर आगे बढ़ जाते ।शिवजी को गिने -चुने कुछ ही सिक्के मिले ।कुछ दानदाताओं ने तो संकेत भी किया कि कहां इस कोढ़ी पति के साथ बैठी हो ,इन्हें छोड़ दो ।पार्वतीजी सहन नहीं कर पाईं ।बोलीं-"प्रभु !लौट चलिए कैलाश पर ,अब इन पाखंडियों का यह कुत्सित रुप सहन नहीं होता ।"इतने में ही एक दीन -हीन भक्त आया ,पार्वतीजी के चरण छुए और बोला -"माँ आप धन्य हैं पति परायण हैं ।मैं इनके घावों को धो दूं ,आप दोनों यह सत्तू खा लें ।भक्त ने उनके घावों पर पट्टी बांधी और सत्तू थमाकर आगे बढ़ा ।तभी शिवजी ने कहा -"यही है एकमात्र भक्त जिसने निष्कपट भाव से सेवा धर्म को प्रधानता दी ।ऐसे लोग गिने -चुने हैं शेष तो धार्मिकता का दिखावा करते हैं ।शिव -पार्वती ने उस भक्त को दर्शन दिए ,वरदान दिया और कैलाश लौट गए ।
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