जो व्यक्ति कभी रुष्ट होता है और कभी प्रसन्न हो जाता है , इस प्रकार में क्षण - क्षण में रुष्ट और प्रसन्न होता रहता है ऐसे चंचल चित वाले पुरुष की प्रसन्नता भी भयंकर होती है |
18 May 2016
17 May 2016
WISDOM
इस संसार में सज्जन को सज्जन तथा दुष्ट को दुष्ट सलाहकार मिल जाते हैं | यदि हमारा विवेक जाग्रत नहीं है तो दूसरों की सलाह हमें भटका सकती है |
16 May 2016
परिस्थिति से परिवर्तन
जीवन के उत्थान और पतन का केन्द्र मन है । यह मन जिधर चलता है जिधर इच्छा और आकांक्षा करता है उधर ही उसकी अपनी एक दुनिया बनकर खड़ी हो जाती है । मन को कल्पवृक्ष की उपमा दी गई है , उसमे ईश्वर ने यह शक्ति विशाल परिणाम में भर दी है जैसा मनोरथ करें वैसे ही साधन जुट जायें और उसी पथ पर प्रगति होने लगे ।
बंगाल के संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जगदीशचन्द्र बोस इस बात पर विश्वास करते थे कि बुरे से बुरे व्यक्ति को सद्व्यवहार द्वारा सुधारा जा सकता है । उनके पिता डिप्टी कलक्टर थे , चोर डाकुओं को पकड़वाने का कार्य भी उन्हें करना पड़ता था । एक बार एक खतरनाक डाकू को उन्होंने पकड़वाया , अदालत ने उसे जेलखाने की कड़ी सजा दी ।
जब यह डाकू जेल से छूटकर आया तो सर बोस के पास गया और कहने लगा --- " सुविधापूर्वक खर्च न चलने के कारण मुझे अपराध करने पड़ते हैं । यदि आप मेरा कोई काम लगवा दें तो मैं उत्तम जीवन व्यतीत कर सकूँगा । "
जगदीशचन्द्र बोस अपनी दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे । उन्होंने उस डाकू को बिना अधिक पूछताछ किये अपने पास एक अच्छी नौकरी पर रख लिया । उस दिन से उस डाकू ने कोई अपराध नहीं किया और मालिक के कुटुम्ब पर आई हुई आपत्तियों के समय उसने अपने प्राणों को खतरे में डालकर भी उनकी रक्षा की ।
स्वभावत: कोई व्यक्ति बुरा नहीं है । बुरी परिस्थितियां मनुष्य को बुरा बनाती हैं , यदि उसकी परिस्थितियां बदल दी जाएँ तो बुरे से बुरे व्यक्ति को भी अच्छे मार्ग पर चलने वाला बनाया जा सकता है ।
बंगाल के संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जगदीशचन्द्र बोस इस बात पर विश्वास करते थे कि बुरे से बुरे व्यक्ति को सद्व्यवहार द्वारा सुधारा जा सकता है । उनके पिता डिप्टी कलक्टर थे , चोर डाकुओं को पकड़वाने का कार्य भी उन्हें करना पड़ता था । एक बार एक खतरनाक डाकू को उन्होंने पकड़वाया , अदालत ने उसे जेलखाने की कड़ी सजा दी ।
जब यह डाकू जेल से छूटकर आया तो सर बोस के पास गया और कहने लगा --- " सुविधापूर्वक खर्च न चलने के कारण मुझे अपराध करने पड़ते हैं । यदि आप मेरा कोई काम लगवा दें तो मैं उत्तम जीवन व्यतीत कर सकूँगा । "
जगदीशचन्द्र बोस अपनी दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे । उन्होंने उस डाकू को बिना अधिक पूछताछ किये अपने पास एक अच्छी नौकरी पर रख लिया । उस दिन से उस डाकू ने कोई अपराध नहीं किया और मालिक के कुटुम्ब पर आई हुई आपत्तियों के समय उसने अपने प्राणों को खतरे में डालकर भी उनकी रक्षा की ।
स्वभावत: कोई व्यक्ति बुरा नहीं है । बुरी परिस्थितियां मनुष्य को बुरा बनाती हैं , यदि उसकी परिस्थितियां बदल दी जाएँ तो बुरे से बुरे व्यक्ति को भी अच्छे मार्ग पर चलने वाला बनाया जा सकता है ।
15 May 2016
द्रष्टिकोण का परिवर्तन
' मन को संतुलित करने के लिए किया हुआ प्रयत्न जीवन के सारे स्वरुप को ही बदल देता है । नरक को स्वर्ग में परिवर्तित करने की कुन्जी मनुष्य के हाथ में है । सोचने का तरीका यदि बदल डाले , बुराई में से भलाई और निराशा में से आशा की किरणे ढूंढने का अभ्यास करे तो रोता हुआ मनुष्य हँसते - हँसाते अपनी सभी समस्याओं को हल कर सकता है । '
भगवान बुद्ध वन को पार करते जा रहे थे , उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हुई । अंगुलिमाल ने बुद्ध से कहा ---- " आज आप ही मेरे शिकार होंगे । "
तथागत मुस्कराए , उन्होंने कहा --- ' दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो । 'डाकू ठिठक गया उसने कहा ----- ' कहिये , क्या कहना है । '
तथागत ने कहा ----- " सामने वाले पेड़ से तोड़कर एक पत्ता जमीन पर रख दो । "
डाकू ने वैसा ही किया । तथागत ने कहा ---- " अब इसे पुन: पेड़ में जोड़ दो । "
डाकू ने कहा ---- " यह कैसे संभव है । तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता । "
बुद्ध ने गम्भीर मुद्रा में कहा ---- " वत्स ! इस संसार में मार - काट , तोड़ - फोड़ , उपद्रव और विनाश यह सभी सरल है । इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है । फिर तुम इसमें अपनी क्या महानता सोचते हो , किस बात का अभिमान करते हो ? बड़प्पन की बात निर्माण है विनाश नहीं । तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते ? "
अंगुलिमाल के अंत:करण में शब्द तीर की तरह घुसते गये । कातर होकर उसने तथागत से पूछा ---- " इतने समय तक पापकर्म करने पर भी क्या मैं पुन: धर्मात्मा हो सकता हूँ ? "
तथागत बोले ---- " वत्स ! मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भो पापों से पुण्य को ओर मुड़ सकता है l धर्म का मार्ग किसी के लिए भी अवरुद्ध नहीं है l तुम अपना द्रष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायेगा l विचार बदले तो मनुष्य बदला l अंगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रजा ले ली और वह बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ l
भगवान बुद्ध वन को पार करते जा रहे थे , उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हुई । अंगुलिमाल ने बुद्ध से कहा ---- " आज आप ही मेरे शिकार होंगे । "
तथागत मुस्कराए , उन्होंने कहा --- ' दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो । 'डाकू ठिठक गया उसने कहा ----- ' कहिये , क्या कहना है । '
तथागत ने कहा ----- " सामने वाले पेड़ से तोड़कर एक पत्ता जमीन पर रख दो । "
डाकू ने वैसा ही किया । तथागत ने कहा ---- " अब इसे पुन: पेड़ में जोड़ दो । "
डाकू ने कहा ---- " यह कैसे संभव है । तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता । "
बुद्ध ने गम्भीर मुद्रा में कहा ---- " वत्स ! इस संसार में मार - काट , तोड़ - फोड़ , उपद्रव और विनाश यह सभी सरल है । इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है । फिर तुम इसमें अपनी क्या महानता सोचते हो , किस बात का अभिमान करते हो ? बड़प्पन की बात निर्माण है विनाश नहीं । तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते ? "
अंगुलिमाल के अंत:करण में शब्द तीर की तरह घुसते गये । कातर होकर उसने तथागत से पूछा ---- " इतने समय तक पापकर्म करने पर भी क्या मैं पुन: धर्मात्मा हो सकता हूँ ? "
तथागत बोले ---- " वत्स ! मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भो पापों से पुण्य को ओर मुड़ सकता है l धर्म का मार्ग किसी के लिए भी अवरुद्ध नहीं है l तुम अपना द्रष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायेगा l विचार बदले तो मनुष्य बदला l अंगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रजा ले ली और वह बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ l
13 May 2016
आस्तिकता का परिष्कार अपेक्षित है ------ वास्तविक भक्त
भगवान के दर्शन की , उनकी प्राप्ति की आकांक्षा सभी को रहती है । गीता में भगवान ने कहा है --- ईश्वर को चमड़े की आँखों से नहीं विवेक की दिव्य द्रष्टि से देखा जा सकता है ।
आस्तिकता की परम्पराओं को मानव जाति अतीत काल से अपनाये हुए है । अब उसके परिष्कार की आवश्यकता है । यह परिष्कार समस्त जड़ - चेतन में भगवान को देखना , प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी में प्रभु की ज्योति के दर्शन करने के रूप में ही हो सकता है ।
यदि ईश्वर भक्ति का यह स्वरुप अपना लिया जाये तो संसार की सभी समस्याओं का मंगलमय हल निकल सकता है ।
एक बार पार्वतीजी ने शंकर भगवान से पूछा ----- गंगा स्नान करने वाले प्राणी समस्त पापों से छूट जाते हैं ?
शंकरजी बोले --- जो भावना पूर्वक स्नान करता है , उसी को सद्गति मिलती है ।
पार्वतीजी ने गंगा स्नान का बड़ा महत्त्व सुना था , इसलिए उन्हें संतोष नहीं हुआ । शंकरजी ने कहा --- अच्छा चलो तुम्हे प्रत्यक्ष दिखाते हैं -- । कोढ़ी का रूप बनाकर वे रास्ते में बैठ गये , साथ में पार्वतीजी सुन्दर स्त्री के रूप में उनके साथ हो गईं । गंगा स्नान का पर्व था , अनेकों लोगों ने कोढ़ी के साथ सुन्दर स्त्री को देखा तो किसी ने कोढ़ी को गाली दी , किसी ने उस स्त्री से कहा कि तुम हमारे साथ चलो । जो भी देखता वह उस स्त्री की ओर आकर्षित होता ।
अंत में एक ऐसा व्यक्ति भी मिला जिसने उस स्त्री के पतिव्रत धर्म की सराहना की और कोढ़ी को गंगा स्नान कराने में मदद की ।
शंकरजी प्रकट हुए और बोले --- प्रिये ! यही श्रद्धालु सद्गति के सच्चे अधिकारी हैं ।
आस्तिकता की परम्पराओं को मानव जाति अतीत काल से अपनाये हुए है । अब उसके परिष्कार की आवश्यकता है । यह परिष्कार समस्त जड़ - चेतन में भगवान को देखना , प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी में प्रभु की ज्योति के दर्शन करने के रूप में ही हो सकता है ।
यदि ईश्वर भक्ति का यह स्वरुप अपना लिया जाये तो संसार की सभी समस्याओं का मंगलमय हल निकल सकता है ।
एक बार पार्वतीजी ने शंकर भगवान से पूछा ----- गंगा स्नान करने वाले प्राणी समस्त पापों से छूट जाते हैं ?
शंकरजी बोले --- जो भावना पूर्वक स्नान करता है , उसी को सद्गति मिलती है ।
पार्वतीजी ने गंगा स्नान का बड़ा महत्त्व सुना था , इसलिए उन्हें संतोष नहीं हुआ । शंकरजी ने कहा --- अच्छा चलो तुम्हे प्रत्यक्ष दिखाते हैं -- । कोढ़ी का रूप बनाकर वे रास्ते में बैठ गये , साथ में पार्वतीजी सुन्दर स्त्री के रूप में उनके साथ हो गईं । गंगा स्नान का पर्व था , अनेकों लोगों ने कोढ़ी के साथ सुन्दर स्त्री को देखा तो किसी ने कोढ़ी को गाली दी , किसी ने उस स्त्री से कहा कि तुम हमारे साथ चलो । जो भी देखता वह उस स्त्री की ओर आकर्षित होता ।
अंत में एक ऐसा व्यक्ति भी मिला जिसने उस स्त्री के पतिव्रत धर्म की सराहना की और कोढ़ी को गंगा स्नान कराने में मदद की ।
शंकरजी प्रकट हुए और बोले --- प्रिये ! यही श्रद्धालु सद्गति के सच्चे अधिकारी हैं ।
12 May 2016
ईश्वर के प्रति समर्पण -------- श्रीमद्भगवद्गीता का प्रेरक आदर्श
' आत्मिक शुद्धि , आत्मिक शान्ति तथा लोकहित के लिए अपने आपको ईश्वर को समर्पित करना भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता रही है । '
जब मनुष्य सब ओर से सहायता की आशा त्याग कर एकमात्र ईश्वर को ही आत्मसमर्पण कर देता है तब वह मन में अनोखी शान्ति का अनुभव करता है और गुप्त दैवी शक्ति प्राप्त करता है ।
' जो संसार के अन्य आश्रयों को छोड़कर नित्य निरंतर निष्काम भाव से भगवान को सब कुछ सौंप देता है , भगवान उसकी रक्षा ही नहीं करते , वरन उसका लौकिक एवं पारलौकिक भर भी सम्हालते हैं । ' शर्त यही है कि यह आत्म समर्पण विशुद्ध प्रेम भाव से होना चाहिए ।
संसार में बड़े - बड़े महात्मा , विद्वान और विचारक हुए हैं । जिन लेखकों ने केवल यश लिप्सा और विद्वता के दंभ की पूर्ति के लिए साहित्य साधना की थी , वे अंधकार में क्षण भर के लिए प्रकाश करने वाली चिनगारी की तरह चमक कर बुझ गये ।
किन्तु जिन विद्वानों ने अपने को भगवान को समर्पित कर , ईश्वरीय सत्ता से गुप्त दैवी बल ग्रहण कर साहित्य निर्माण किया , उनमे गुप्त रूप से ऐसी महान शक्ति का आविर्भाव हुआ कि वह ग्रन्थ युग - युग होने पर आज भी सर्वत्र प्रेरक और पूजनीय है ।
महाकवि मिल्टन ने अपनी तमाम काव्य शक्तियों को ईश्वर को अर्पित कर दिया , इससे उनकी कविता में वह दैवी शक्ति एवं बल आया कि वह शाश्वत भावना स्पष्ट कर सकी और बड़ी लोकप्रिय हुईं । इसी प्रकार अपने अंतिम दिनों में महाकवि वर्ड्सवर्थ भी अध्यात्म में डूब गये और उनकी कविता उच्चतम आत्मज्ञान की परिचायिका बनी ।
भारत में गोस्वामी तुलसीदास , सूरदास , मीराबाई , कबीर , गुरु नानक आदि अनेक संत महाकवियों ने अपनी शक्तियों को ईश्वर के अर्पण कर दिया । इस आत्मसमर्पण से उनकी स्वार्थ भावना , यश लिप्सा और अहं भाव दूर हो गये । इस ईश्वरीय स्पर्श से वे भक्ति , प्रेम , विनय सेवा , करुणा आदि के ऐसे ह्रदय स्पर्शी भजन , दोहे , गीत लिख सके , जो युग - युग बीत जाने पर आज भी हमें नए उत्साह , प्रेम और प्रेरणा से भर देते हैं ।
जब मनुष्य सब ओर से सहायता की आशा त्याग कर एकमात्र ईश्वर को ही आत्मसमर्पण कर देता है तब वह मन में अनोखी शान्ति का अनुभव करता है और गुप्त दैवी शक्ति प्राप्त करता है ।
' जो संसार के अन्य आश्रयों को छोड़कर नित्य निरंतर निष्काम भाव से भगवान को सब कुछ सौंप देता है , भगवान उसकी रक्षा ही नहीं करते , वरन उसका लौकिक एवं पारलौकिक भर भी सम्हालते हैं । ' शर्त यही है कि यह आत्म समर्पण विशुद्ध प्रेम भाव से होना चाहिए ।
संसार में बड़े - बड़े महात्मा , विद्वान और विचारक हुए हैं । जिन लेखकों ने केवल यश लिप्सा और विद्वता के दंभ की पूर्ति के लिए साहित्य साधना की थी , वे अंधकार में क्षण भर के लिए प्रकाश करने वाली चिनगारी की तरह चमक कर बुझ गये ।
किन्तु जिन विद्वानों ने अपने को भगवान को समर्पित कर , ईश्वरीय सत्ता से गुप्त दैवी बल ग्रहण कर साहित्य निर्माण किया , उनमे गुप्त रूप से ऐसी महान शक्ति का आविर्भाव हुआ कि वह ग्रन्थ युग - युग होने पर आज भी सर्वत्र प्रेरक और पूजनीय है ।
महाकवि मिल्टन ने अपनी तमाम काव्य शक्तियों को ईश्वर को अर्पित कर दिया , इससे उनकी कविता में वह दैवी शक्ति एवं बल आया कि वह शाश्वत भावना स्पष्ट कर सकी और बड़ी लोकप्रिय हुईं । इसी प्रकार अपने अंतिम दिनों में महाकवि वर्ड्सवर्थ भी अध्यात्म में डूब गये और उनकी कविता उच्चतम आत्मज्ञान की परिचायिका बनी ।
भारत में गोस्वामी तुलसीदास , सूरदास , मीराबाई , कबीर , गुरु नानक आदि अनेक संत महाकवियों ने अपनी शक्तियों को ईश्वर के अर्पण कर दिया । इस आत्मसमर्पण से उनकी स्वार्थ भावना , यश लिप्सा और अहं भाव दूर हो गये । इस ईश्वरीय स्पर्श से वे भक्ति , प्रेम , विनय सेवा , करुणा आदि के ऐसे ह्रदय स्पर्शी भजन , दोहे , गीत लिख सके , जो युग - युग बीत जाने पर आज भी हमें नए उत्साह , प्रेम और प्रेरणा से भर देते हैं ।
10 May 2016
दुष्ट व्यक्ति अपने ही दुष्कर्मों द्वारा मारा जाता है
स्वार्थ के वशीभूत मनुष्य इतना लालची हो जाता है कि उसे घ्रणित दुष्कर्म करने पर भी लज्जा नहीं आती । तृष्णा के वशीभूत होकर लोग अनीति का आचरण करते हैं और वह अनीति ही अंततः उनके पतन एवं सर्वनाश का कारण बनती है ।
' कोई कितना ही शक्तिशाली , बलवान क्यों न हो , स्वार्थपरता एवं दुष्टता का जीवन बिताने पर उसे नष्ट होना ही पड़ता है । '
रावण के बराबर महापंडित , वेद और शास्त्र का ज्ञाता , वैज्ञानिक , कुशल प्रशासक , कूटनीतिज्ञ कोई भी नहीं था , लेकिन पर - स्त्री का अपहरण , राक्षसी आचार - विचार एवं दुष्टता के कारण कुल सहित नष्ट हो गया ।
कंस ने अपने राज्य में अत्याचार किये , अपनी बहन और बहनोई को जेल में बंद कर दिया , उसके नवजात शिशुओं को शिला पर पटक - पटक कर मार डाला । अपने राज्य में छोटे - छोटे बालकों को कत्ल करा दिया, , लोगों में भय और आतंक का वातावरण पैदा किया । वही कंस भगवान कृष्ण द्वारा बड़ी दुर्गति से मार दिया गया ।
दुर्योधन ने पांडवों का राज - पाट छीनकर उन्हें बहुत दुःख दिये, अंत में वह महाभारत के युद्ध में अपने शक्तिशाली भाइयों के साथ पांडवों द्वारा मारा गया ।
' दुष्टता , असुरता कितनी ही शक्तिसंपन्न हो , उसे अपने ही दुर्गुणों के कारण निर्बल होकर मरना पड़ता है । '
' कोई कितना ही शक्तिशाली , बलवान क्यों न हो , स्वार्थपरता एवं दुष्टता का जीवन बिताने पर उसे नष्ट होना ही पड़ता है । '
रावण के बराबर महापंडित , वेद और शास्त्र का ज्ञाता , वैज्ञानिक , कुशल प्रशासक , कूटनीतिज्ञ कोई भी नहीं था , लेकिन पर - स्त्री का अपहरण , राक्षसी आचार - विचार एवं दुष्टता के कारण कुल सहित नष्ट हो गया ।
कंस ने अपने राज्य में अत्याचार किये , अपनी बहन और बहनोई को जेल में बंद कर दिया , उसके नवजात शिशुओं को शिला पर पटक - पटक कर मार डाला । अपने राज्य में छोटे - छोटे बालकों को कत्ल करा दिया, , लोगों में भय और आतंक का वातावरण पैदा किया । वही कंस भगवान कृष्ण द्वारा बड़ी दुर्गति से मार दिया गया ।
दुर्योधन ने पांडवों का राज - पाट छीनकर उन्हें बहुत दुःख दिये, अंत में वह महाभारत के युद्ध में अपने शक्तिशाली भाइयों के साथ पांडवों द्वारा मारा गया ।
' दुष्टता , असुरता कितनी ही शक्तिसंपन्न हो , उसे अपने ही दुर्गुणों के कारण निर्बल होकर मरना पड़ता है । '
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