पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने एक प्रसंग में वाङ्मय में लिखा है ----- ' अपनी हीन तथा निम्न वृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए लोग प्राय: अहंकार का पालन किया करते हैं l वे मद में इतने मत्त हो जाते हैं कि इस बात का विचार ही नहीं करते कि उनके अहंकार के नीचे दबकर कितने निरपराध तथा असहाय लोगों का बलिदान हो रहा है ? किसी का भी त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं जाता l कम समझ लोग चाहे उसके प्रभाव को अनुभव न कर सकें और अदूरदर्शी भी तुरंत उसका कोई परिणाम न देखकर उसे व्यर्थ बताने लगें l पर तत्ववेत्ता इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि इस जगत में छोटे से छोटे काम की भी प्रतिक्रिया अवश्य होती है l
23 January 2020
22 January 2020
अपने बौद्धिक होने का अहंकार और बढ़ती निष्ठुरता के कारण मनुष्य ऐसा कुछ कर रहा है जिसे देखकर प्राचीनकाल के दैत्यों के दिल दहल जाएँ --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
आचार्य श्री लिखते हैं --- बौद्धिकता के बल पर अनेकों तरह की खोजबीन करने वाला मानव कितना ही अभिमान क्यों न करे पर संवेदनाओं के क्षेत्र में वह पाषाण युगीन मनुष्य से भी कोसों पीछे है l जान रसेल ने लिखा है --- "प्रत्येक व्यवहार विज्ञानी ईसा , फ्रांसिस , संत पाल , गाँधी और बुद्ध के व्यवहार को ललचाई नज़रों से देखता है l लेकिन हिटलर , मुसोलिनी को व्यवहार के कलंक के रूप में देखता है l "
आचार्य श्री लिखते हैं --- ' निस्संदेह व्यवहार सम्बन्धी दोषों , दुर्बलताओं और कमियों का एकमात्र कारण निष्ठुरता है l कितने ही शासन बदले , सत्ताएं बदली लेकिन क्या इस उलट - फेर में मनुष्य सुखी हो सका ? ' नहीं ' l क्योंकि उसने निष्ठुरता के स्थान पर अन्त: संवेदना की स्थापना नहीं की l यदि मनुष्य के हृदय में संवेदना जाग जाये तो उसके व्यवहार में स्थायी सुधार संभव है l
अन्त : संवेदना का जागरण इस कदर बेचैनी उत्पन्न करता है और व्यवहार को बदलने के लिए बाध्य करता है l
एक ऐतिहासिक घटना है ----- विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय ने अपने गुरु संत कनकदास से पूछा --- महाराज ! भगवान गज को बचाने स्वयं क्यों दौड़े ? दौड़े भी थे तो सवारी क्यों नहीं ली ?'
संत दूसरे दिन समझाने का वादा कर के चले गए l दूसरे दिन उन्होंने नवजात राजकुमार की ठीक वैसी ही प्रतिमा बनवाई , बिलकुल स्वाभाविक थी , और उसे गोद में खिलाते हुए राजमहल के तालाब के पास आये l राजा भी पास ही थे l उस कृत्रिम प्रतिमा को उन्होंने धीरे से तालाब में डाल दिया l प्रतिमा बहुत स्वाभाविक थी , नकली राजकुमार के गिरते ही राजा कूद पड़ा और बहुत देर बाद जब वह निकला तो राजकुमार की प्रतिमा उसके हाथ में थी l अपनी बेवकूफी पर खिन्न भी था l संत ने कहा --- उत्तर मिला सम्राट l अन्त: संवेदना का जागरण ऐसी ही बेचैनी उत्पन्न करता है l फिर भगवान तो संवेदनाओं के घनीभूत रूप हैं , गज की पुकार पर , द्रोपदी की पुकार पर दौड़े चले आये l
आचार्य श्री लिखते हैं --- ' निस्संदेह व्यवहार सम्बन्धी दोषों , दुर्बलताओं और कमियों का एकमात्र कारण निष्ठुरता है l कितने ही शासन बदले , सत्ताएं बदली लेकिन क्या इस उलट - फेर में मनुष्य सुखी हो सका ? ' नहीं ' l क्योंकि उसने निष्ठुरता के स्थान पर अन्त: संवेदना की स्थापना नहीं की l यदि मनुष्य के हृदय में संवेदना जाग जाये तो उसके व्यवहार में स्थायी सुधार संभव है l
अन्त : संवेदना का जागरण इस कदर बेचैनी उत्पन्न करता है और व्यवहार को बदलने के लिए बाध्य करता है l
एक ऐतिहासिक घटना है ----- विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय ने अपने गुरु संत कनकदास से पूछा --- महाराज ! भगवान गज को बचाने स्वयं क्यों दौड़े ? दौड़े भी थे तो सवारी क्यों नहीं ली ?'
संत दूसरे दिन समझाने का वादा कर के चले गए l दूसरे दिन उन्होंने नवजात राजकुमार की ठीक वैसी ही प्रतिमा बनवाई , बिलकुल स्वाभाविक थी , और उसे गोद में खिलाते हुए राजमहल के तालाब के पास आये l राजा भी पास ही थे l उस कृत्रिम प्रतिमा को उन्होंने धीरे से तालाब में डाल दिया l प्रतिमा बहुत स्वाभाविक थी , नकली राजकुमार के गिरते ही राजा कूद पड़ा और बहुत देर बाद जब वह निकला तो राजकुमार की प्रतिमा उसके हाथ में थी l अपनी बेवकूफी पर खिन्न भी था l संत ने कहा --- उत्तर मिला सम्राट l अन्त: संवेदना का जागरण ऐसी ही बेचैनी उत्पन्न करता है l फिर भगवान तो संवेदनाओं के घनीभूत रूप हैं , गज की पुकार पर , द्रोपदी की पुकार पर दौड़े चले आये l
WISDOM --- महानता बड़प्पन प्रदर्शन में नहीं , अपितु अपनी तुलना में अनेकों का अनेक गुना हित - साधन में है --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
कीट्स ने अपनी कविता ' महिमा से महानता की ओर ' में ठीक ही कहा है ---- ' जब मनुष्य अपनी ही महिमा का गुणानुवाद अपने मुख से करने लगे , तो समझना चाहिए कि वह उस महानता से दूर हटता जा रहा है , जो उसे सहज में उपलब्ध हो सकती थी l क्षुद्र स्तर के लोग ऐसी ही चर्चा में संलग्न रहते हैं और अपना एवं दूसरों का समय बरबाद करते हैं l महानता यत्र - तत्र उल्लेख कर लेने भर से व्यक्तित्व में नहीं आ जाती , न ही यह विज्ञापन का विषय है l यह एक ऐसी विभूति है , जो बिना कहे हुए भी सामने वाले को बहुत कुछ कहती बताती रहती है l फूलों को अपनी सुगंध की चर्चा करने की कहाँ आवश्यकता पड़ती है l वह काम तो उनकी अद्भुत सुवास ही अनायास करती रहती है और अनेकानेक भौरों को मदमस्त करती हुई खींच बुलाती है l जिस दिन हिमालय अपने गुणों का बखान करने लगे , उसी दिन उसकी आध्यात्मिकता की दिव्यता समाप्त हो जाएगी और लोग उसका सान्निध्य लाभ लेने से कतराएंगे l
एक अन्य विद्वान् ने लिखा है --- महानता बताने की वस्तु नहीं है , वरन करने योग्य कार्य है l वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति दिन - रात चीखता रहे कि वह महान है , लोगों को उसका सम्मान करना चाहिए , तो उलटे वह अपमान और उपहास का पात्र साबित होगा l इसके विपरीत यदि लोगों की भलाई के लिए छोटा सा भी कार्य कर दे तो जान - श्रद्धा उसके प्रति सहज ही उमड़ पड़ेगी l
श्रद्धा से सम्मान और सम्मान से महान बनने की ओर उसका मार्ग प्रशस्त हो जायेगा l
एक अन्य विद्वान् ने लिखा है --- महानता बताने की वस्तु नहीं है , वरन करने योग्य कार्य है l वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति दिन - रात चीखता रहे कि वह महान है , लोगों को उसका सम्मान करना चाहिए , तो उलटे वह अपमान और उपहास का पात्र साबित होगा l इसके विपरीत यदि लोगों की भलाई के लिए छोटा सा भी कार्य कर दे तो जान - श्रद्धा उसके प्रति सहज ही उमड़ पड़ेगी l
श्रद्धा से सम्मान और सम्मान से महान बनने की ओर उसका मार्ग प्रशस्त हो जायेगा l
21 January 2020
WISDOM ------ प्रकृति किसी के भी अहंकार को बर्दाश्त नहीं करती
' पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है --- बुरे दिनों की चपेट में आने से पहले आदमी अहंकारी हो चुका होता है l उद्धत मनुष्यों की दुर्मति ही उनकी दुर्गति कराती है l मनीषियों का कहना है कि अहंकार मनुष्यों को गिराता है l उसे उद्दंड और परपीड़क बनाता है l अपने साथियों को पीछे धकेलने , किसी के अनुग्रह की चर्चा न करने , दूसरे के प्रयासों को हड़प जाने के लिए अहंकार ही प्रेरित करता है ताकि जिस श्रेय की स्वयं कीमत नहीं चुकाई गई उसका भी लाभ उठा लिया जाये l
अहंकारी लोग आमतौर से कृतध्न होते हैं और अपनी विशेषताओं और सफलताओं का का उल्लेख बढ़ - चढ़ कर करते हैं l इनमे नम्रता , विनयशीलता का अभाव होता है और अन्यों को छोटा दिखाने, पिछड़ों का तिरस्कार - उपहास करने की प्रवृति बढ़ती जाती है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'जब अहंकार बढ़ने लगता है तो व्यक्ति की संवेदनशीलता , सरलता , सरसता जैसे सद्गुणों का ह्रास होने लगता है l इस कारण ऐसा व्यक्ति दूसरों की नज़रों में निरंतर गिरता जाता है , घृणास्पद बनता है , शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और अन्तत: घाटे में रहता है l आत्मसम्मान की रक्षा करनी हो तो अहंकार से बचना ही चाहिए l
अहंकारी लोग आमतौर से कृतध्न होते हैं और अपनी विशेषताओं और सफलताओं का का उल्लेख बढ़ - चढ़ कर करते हैं l इनमे नम्रता , विनयशीलता का अभाव होता है और अन्यों को छोटा दिखाने, पिछड़ों का तिरस्कार - उपहास करने की प्रवृति बढ़ती जाती है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'जब अहंकार बढ़ने लगता है तो व्यक्ति की संवेदनशीलता , सरलता , सरसता जैसे सद्गुणों का ह्रास होने लगता है l इस कारण ऐसा व्यक्ति दूसरों की नज़रों में निरंतर गिरता जाता है , घृणास्पद बनता है , शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और अन्तत: घाटे में रहता है l आत्मसम्मान की रक्षा करनी हो तो अहंकार से बचना ही चाहिए l
20 January 2020
WISDOM ----
बहुत वर्ष पहले एक मूर्तिकार मूर्तियां बनाता और उन्हें बेचकर गुजारा करता l उसकी मूर्ति प्राय: एक रूपये में बिकती l लड़का बड़ा हुआ तो मूर्तिकार ने उसी धंधे में उसे लगाया l लड़का कुशाग्र बुद्धि था , जल्दी ही अच्छी मूर्तियां बनाने लगा और वे बाप की अपेक्षा दूने दाम में यानि दो रूपये में बिकने लगीं l इतने पर भी बाप ने अपना नित्य कर्म जारी रखा l वह लड़के की मूर्तियों को बड़ी बारीकी से देखता और उनमे जो नुक्स होता उसे सुधारने की सलाह देता l लड़के के अहंकार को चोट लगी , उसकी मूर्तियां दूने दाम में बिकने लगीं थीं l तब भी प्रशंसा मिलने के स्थान पर उसके कार्य में पिता द्वारा मीन मेख ही निकाली जाती थी l अपने को दुःख लगने की बात उसने अपने पिता पर प्रकट की और कहा मेरी मूर्तियां इतनी सुन्दर हैं , आपकी मूर्तियों से ज्यादा दाम में बिकती हैं , फिर भी आप कमी निकालते हैं , मुझे बहुत दुःख होता है l
यह सुनकर पिता को बहुत दुःख हुआ ,बोला --- ' बेटे ! तेरी प्रगति अब रुक गई l दो रूपये से अधिक मूल्य की मूर्ति अब न बना सकेगा l यह भूल मुझसे बचपन में हुई थी और एक रूपये की मूर्ति बनाने के बाद और अधिक प्रगति न कर सका l वही भूल अब तुम कर रहे हो l लड़के ने अपनी भूल समझी l पिता की सीख मानकर वह पहले से अच्छी मूर्तियां बनाने लगा l गलतियों को स्वीकार करना और उन्हें सुधारना , यही अनवरत प्रगति का राह मार्ग है
यह सुनकर पिता को बहुत दुःख हुआ ,बोला --- ' बेटे ! तेरी प्रगति अब रुक गई l दो रूपये से अधिक मूल्य की मूर्ति अब न बना सकेगा l यह भूल मुझसे बचपन में हुई थी और एक रूपये की मूर्ति बनाने के बाद और अधिक प्रगति न कर सका l वही भूल अब तुम कर रहे हो l लड़के ने अपनी भूल समझी l पिता की सीख मानकर वह पहले से अच्छी मूर्तियां बनाने लगा l गलतियों को स्वीकार करना और उन्हें सुधारना , यही अनवरत प्रगति का राह मार्ग है
18 January 2020
WISDOM -----
एक कसाई की गाय वध शाला से छूटकर भाग गई l कसाई पकड़ने के लिए पीछे - पीछे दौड़ा l गाय एक संत के आश्रम में घुस गई और आश्रम के पीछे घनी झाड़ियों में घास चरने लगी l घनी झाड़ियों की वजह से वह कसाई की आँखों से ओझल थी l कसाई ने संत से पूछा --- " इधर से गाय निकली है क्या ? आपने उसे देखा है क्या ? "
संत सोचने लगे सच बोलने से गाय का प्राण जायेगा और गौ - हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं l इसलिए परिणाम को देखते - समझते हुए शब्द - छल करने में कोई हर्ज नहीं l कसाई के बार - बार पूछने पर संत ने कहा ---- " जिसने देखा वह बोलता नहीं और जो बोलता है उसने देखा नहीं l ' कसाई इस ब्रह्म ज्ञान की भाषा का अर्थ नहीं समझ सका और आगे चला गया l ऋषि की पत्नी ने
इस रहस्य वचन का कारण पूछा तो उनने कहा --- ' गाय के प्राण बचाने के लिए शब्द - छल किया l नेत्रों ने गाय देखी पर वे बोलते नहीं l जीभ बोलती है पर देखती नहीं l इस प्रकार सत्य वचन भी हो गया और गाय की रक्षा भी हो गई l ' संत ने कहा --- ' हमें कभी अप्रिय सच नहीं बोलना चाहिए अर्थात ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जिससे किसी का अहित हो l '
संत सोचने लगे सच बोलने से गाय का प्राण जायेगा और गौ - हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं l इसलिए परिणाम को देखते - समझते हुए शब्द - छल करने में कोई हर्ज नहीं l कसाई के बार - बार पूछने पर संत ने कहा ---- " जिसने देखा वह बोलता नहीं और जो बोलता है उसने देखा नहीं l ' कसाई इस ब्रह्म ज्ञान की भाषा का अर्थ नहीं समझ सका और आगे चला गया l ऋषि की पत्नी ने
इस रहस्य वचन का कारण पूछा तो उनने कहा --- ' गाय के प्राण बचाने के लिए शब्द - छल किया l नेत्रों ने गाय देखी पर वे बोलते नहीं l जीभ बोलती है पर देखती नहीं l इस प्रकार सत्य वचन भी हो गया और गाय की रक्षा भी हो गई l ' संत ने कहा --- ' हमें कभी अप्रिय सच नहीं बोलना चाहिए अर्थात ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जिससे किसी का अहित हो l '
16 January 2020
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है --- ' ख़ुशी दृष्टिकोण है , विचारणा की शक्ति है जो हमें प्रसन्नता देती है l हमारी नाभि में खुशी रूपी कस्तूरी छिपी पड़ी है l ढूंढते हम चारों ओर हैं l हर दिशा से वह आती लगती है पर होती अंदर है l '
आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है , वह ख़ुशी ढूंढने के लिए सिनेमा , क्लब , रेस्टॉरेन्ट , कैबरे डांस सब जगह जाता है पर ख़ुशी उसे कहीं नहीं मिलती l वही व्यक्ति ज्ञानवान होता है जिसे ख़ुशी तलाशना और बांटना आता है l जीवन का आनंद सदैव भीतर से आता है l यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रियाकलाप चल रहे हों , उन सभी में हमको ख़ुशी ही खुशी बिखरी हुई दिखाई पड़ेगी l '
दृष्टिकोण विकसित होते ही ऐसा आनंद आता है कि जिसको शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता l --- दाराशिकोह मस्ती में डूबते जा रहे थे l जेबुन्निसा ने पूछा --- ' अब्बाजान ! आपको क्या हुआ है आज ? आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे l फिर यह मस्ती कैसी ? '
दाराशिकोह बोले ---- " बेटी ! आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद पढ़ कर आया हूँ l जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं l जीवन का असली आनंद उनमे भरा पड़ा है l बस , यह मस्ती उसी की है l "
आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है , वह ख़ुशी ढूंढने के लिए सिनेमा , क्लब , रेस्टॉरेन्ट , कैबरे डांस सब जगह जाता है पर ख़ुशी उसे कहीं नहीं मिलती l वही व्यक्ति ज्ञानवान होता है जिसे ख़ुशी तलाशना और बांटना आता है l जीवन का आनंद सदैव भीतर से आता है l यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रियाकलाप चल रहे हों , उन सभी में हमको ख़ुशी ही खुशी बिखरी हुई दिखाई पड़ेगी l '
दृष्टिकोण विकसित होते ही ऐसा आनंद आता है कि जिसको शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता l --- दाराशिकोह मस्ती में डूबते जा रहे थे l जेबुन्निसा ने पूछा --- ' अब्बाजान ! आपको क्या हुआ है आज ? आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे l फिर यह मस्ती कैसी ? '
दाराशिकोह बोले ---- " बेटी ! आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद पढ़ कर आया हूँ l जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं l जीवन का असली आनंद उनमे भरा पड़ा है l बस , यह मस्ती उसी की है l "
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