2 December 2022

WISDOM ----

   एक  चोर  संत  नानक  के  पास   पहुंचा   और  अपनी  चोरी  की  बुरी  आदत  से  छुटकारा  पाने  का  उपाय  पूछा  l  नानक  ने  जोई  उपाय  बताये  वे  उससे  निभते  न  थे  l  एक  के  बाद  एक   उपाय  बदलते -बदलते  जब  बहुत  दिन  बीत  गए   और  किसी   से  भी  वह  आदत  न  छूटी   तब  उन्होंने  चोर  से  कहा  कि  तुम  अपने  पाप  सबके  सामने  प्रकट  करने  लगो  l  चोर  का  बार -बार  आना  और  पूछना  समाप्त  हो  गया  l  पाप  प्रकट  करने  से  उसे  लज्जा  आती  थी  ,  सो  उसने  चोरी  करना  ही  बंद  कर  दिया  l  

1 December 2022

WISDOM -----

  ऋषियों  का  वचन  है ---- ' उदय  होता  सूर्य  भी  रक्त  होता  है  और  अस्त  होते  समय  भी  रक्त  रहता  है  l  उसी  तरह  बुद्धिमान  सज्जनों  का  रूप  भी  विपत्ति   में  और  संपत्ति  में  एक  जैसा  रहता  है  l  '    संसार  में  जो  व्यक्ति  सुख -दुःख  के  चक्र  को  नहीं  समझते  वे  सुख  आने  पर  अहंकारी  हो  जाते  हैं   और  दुःख  आने  पर  हताश -निराश  हो  जाते  हैं ,  उनका  आत्मविश्वास  ही  समाप्त  हो  जाता  है  , आत्महत्या   कर  लेते  हैं  l  लेकिन  जो  इस  सत्य  को  जानते  हैं  कि  गहरी  रात  के  बाद  सुबह  अवश्य  होगी  , उसे  कोई  रोक  नहीं  सकता , वे  अपने  आत्मविश्वास  पर  दृढ  रहते  हैं , उन्हें  ईश्वरीय  सत्ता  पर  विश्वास  होता  है   और  दुःख  के  कठिन  समय  में  आने  वाले  सुनहरे  पल  की  तैयारी  करते  हैं   l  महाभारत  का   प्रसंग  है ---- जब  पांडवों  को  जुए  में  हारने  के  बाद  बारह  वर्ष  का  वनवास  और  एक  वर्ष  का   अज्ञातवास  मिला   तब  अर्जुन  ने  दिव्यास्त्र  प्राप्त  करने  के  लिए  कठोर  तपस्या  की , शिवजी  से  'पाशुपत अस्त्र  ' प्राप्त  किया   तब  देवराज  इंद्र   जो  अर्जुन  के  पिता  थे  अपने  साथ  कुछ  समय  के  लिए  स्वर्गलोक  ले  गए  , वहां  उनका  मन  बहलाने  के  लिए  अप्सराओं  के  नृत्य  का  आयोजन  किया  l  स्वर्ग  की  सबसे  सुन्दर  अप्सरा  उर्वशी  उन  पर  आसक्त  हो  गई   और  उसने  अर्जुन  से  प्रेम -याचना  की  लेकिन  अर्जुन  ने  उर्वशी   की  याचना  को  अस्वीकार  कर  दिया  और  कहा  कि   आपके  सौन्दर्य  में  मैंने  अपनी  माँ  के  दर्शन  किए  l  उर्वशी  को  यह  अपना  अपमान  लगा  और  उसने  क्रोधित  होकर  अर्जुन  को  नपुंसक  होने  का  श्राप  दे  दिया  l  तब  देवराज  इंद्र  ने  उनकी  तपस्या  और  श्रेष्ठ  चरित्र   के  आधार  पर  कहा  कि  यह  श्राप  केवल  एक  वर्ष  के  लिए  जब  वह  चाहेंगे  तब  लागू  होगा  l  यह  शाप  अज्ञातवस्  की  अवधि  में  पांडवों  के  लिए  वरदान  बन  गया  , अर्जुन  ने  ब्रह्न्न्ला  बनकर  राजा   विराट   की  पुत्री   उत्तरा  और    उसकी  सहेलियों  को  नाच , गाना -बजाना  सिखाया l  कहाँ  अर्जुन  जिसके  गांडीव  की   टंकार    से  धरती  हिल  जाती  थी  , विपदा  के  समय  ऐसा  रूप  धरना  पड़ा  l  महारानी  द्रोपदी   ने   ऐसे  कठिन  समय  में  राजा    विराट   के  रनिवास  में  नौकरानी  बन   कर   सैरंध्री   नाम  रखकर   सबकी    सेवा  की  l    वहां  का  सेनापति  कीचक  जो  रानी  का  भाई  था  , रनिवास  में  आता -जाता  था  , उसकी   कुद्रष्टि  द्रोपदी  पर  थी   l  एक  दिन  जब  उससे  जान  बचाकर  द्रोपदी  राजसभा  की  ओर भागी   तब  कीचक  भी  उनके  पीछे  भागा  और  भरी  सभा  में  उसने  द्रोपदी  को  ठोकर  मारी , अपशब्द  कहे  l  महारानी  होकर  कितना  अपमान  !  समय  विपरीत  था   इसलिए  सहना  पड़ा  l   धीरे -धीरे  कष्ट  के  दिन  बीत  गए  l  कष्ट  , मान -अपमान  हम  सबके  जीवन  में  आता  रहता  है   इसलिए  हमें  अपने  सारे  रिश्तों  के  साथ  एक  रिश्ता  भगवान  से  भी  रखना  चाहिए   , इससे  हमें  शक्ति  और  सद्बुद्धि  मिलती  है  l    

30 November 2022

WISDOM -----

 ऋषियों  का  वचन  है --- ' मनुष्य  पाप  कर  के  यह  सोचता  है  कि   उसका  पाप  कोई  नहीं  जानता  , पर  उसके  पाप  को  न  केवल  देवता  जानते  हैं  , बल्कि  सबके  ह्रदय  में  स्थित  परम पिता  भी  जानते  हैं  l  '     जब   संसार  में  कायरता  बढ़  जाती  है   तब  व्यक्ति  छल , कपट , षड्यंत्र  का  सहारा  लेता  है  l  प्रत्यक्ष  में  प्रेम  और  अपनत्व  दिखाकर  पीठ  में  छुरा  भोंकने  का  कार्य  करता  है  l  ऐसा  कर  के  वह  अपने  को  बहुत  चतुर , चालाक  समझता  है  l  अनेकों  लोग  जो  कुछ  ज्यादा  ही  बुद्धिमान  होते  हैं  वे  पुलिस  और  कानून  की  नजरों  से  बच  भी  जाते  हैं   लेकिन  ईश्वर  से  , प्रकृति  से  कुछ  छुपा  हुआ  नहीं  है  l  सत्य  एक  दिन  सामने  आ  ही  जाता  है  l  ऐसे  कायरतापूर्ण  कार्य  हर  युग  में  हुए  हैं   लेकिन  यदि  व्यक्ति  सत्य  की  राह  पर  है   तो  दैवी  शक्तियां  उसकी  रक्षा  करती  हैं  और  पापियों  का  हर  प्रयास  असफल  हो  जाता  है   l  महाभारत  का  प्रसंग  है ---- दुर्योधन , शकुनि  ने  कुचक्र  रचकर  पांचों   पांडवों  और  माता  कुंती  को   वारणावत  भेजा  l   प्रत्यक्ष  में  यह  कहा  गया  कि  वे  वहां  सैर  करने  , वहां  के  मेले  आदि  का  आनंद  लेने  जा  रहे  हैं   लेकिन  पांडवों  को  समूल  नष्ट  करने  के  लिए  उसने  पुरोचन  के  भेजकर  उनके  लिए  लाख  का  महल  बनवा  दिया  l  यह  कार्य   पांडवों  की  पीठ  में  छुरा  भोंकना  था  l  लाख  के  महल  में  सभी  चीजें  ऐसी  रखी  गईं  थीं  जो  शीघ्र  आग  पकड़ती  हैं  l   निश्चित  दिन  पांडवों  को  महल  सहित  जला  देने  की  योजना  थी  l   यह  कार्य  बहुत  गुप्त  रूप  से  किया  गया  लेकिन  महात्मा  विदुर  को  इसकी  जानकारी  थी  l  हस्तिनापुर  से  चलते  समय   उन्होंने  युधिष्ठिर  को  गूढ़  भाषा  में   समझाया  और  कहा --- जो  आग  जंगल  का  नाश  करती  है  , वह  बिल  में  रहने  वाले  चूहे  को  नहीं  छू  सकती  l  सेही --जैसे  जानवर   सुरंग  खोदकर  जंगली  आग  से  अपना  बचाव  कर  लेते  हैं  l  युधिष्ठिर  सब  कुछ  समझ  गए  l  वहां  पहुंचकर  सुरंग  तैयार  कर  ली  l  निश्चित  दिन   युधिष्ठिर  ने  बहुत  बड़े  भोज  का  आयोजन  किया  , सभी  कर्मचारी  खा -पी कर  गहरी   नींद    सो  गए  , तब  भीम  ने  उस  लाख  के  महल  को  आग  लगा  दी   और  माता  कुंती  समेत     बाहर  निकल  आए  l  जिनकी  रक्षा  करने  वाले  स्वयं  भगवान  हों  उनका  कोई  कुछ  नहीं  बिगाड़  सकता  l  क्रिया  की  प्रतिक्रिया  अवश्य  होती  है  ,  कर्म फल  अवश्य  मिलता  है  l दुर्योधन  आदि    पांडवों  को  उनकी  माता  सहित  नष्ट  करना  चाहते  थे   , वे  तो  बच  गए  लेकिन  महाभारत  के  युद्ध  में  पूरे  कौरव  वंश  का  अंत  हो  गया  l  जानबूझकर , सोच -समझ कर   और  योजना  बनाकर   जो  अपराध  किए  जाते  हैं  , प्रकृति  से  उनको  दंड  अवश्य  मिलता  है  l  

29 November 2022

WISDOM ----

   लघु कथा ---- सुबह -सुबह  एक  लोहार  घर  से  बाहर  निकला  l  रास्ते  में  उसे  लोहे  के  दो  टुकड़े  मिल  गए  , उसने    उन्हें   उठा  लिया  और  घर  लौटने  पर   लोहार  ने  एक  टुकड़े  से  तलवार  बनाई  और  दूसरे  को  ढाल  बना  दिया  l  कुछ  दिनों  बाद  एक  योद्धा  आकर  तलवार  और  ढाल  खरीदकर  ले  गया  l  उस  योद्धा  ने  कई  युद्धों  में   उनका  उपयोग  किया  l  एक  युद्ध  में  तलवार  टूट  गई  लेकिन  ढाल  ज्यों की त्यों  सलामत  रही  l  टूटी   तलवार   को  योद्धा  घर  ले  आया   और  तलवार  व  ढाल  दोनों  को  पास -पास  रख  दिया  l  रात  में  जब  सब  सो  गए  , तब  तलवार  कराहती  हुई  ढाल  से  बोली  --- बहिन  , देखो  मेरी  कैसी  दुर्दशा  हो  गई   और  एक  तू  है  जो  ज्यों -की -त्यों  सुरक्षित  है  l  ढाल  ने  कहा ---हम  दोनों  में  एक  फर्क  जो  है  l  वह  क्या  ?  तलवार  पूछ  बैठी  l    ढाल  ने  कहा --- तू  सदैव  किसी  को  मारने -काटने  का  काम  करती   रही  है   और  मैं  बचाने  का  l  यह  ख्याल  रखो  कि  मारने  वाले  से  बचाने  वाले  की  आयु  ज्यादा  है  l 

28 November 2022

WISDOM ---

   श्रीमद् भगवद्गीता   में  भगवान  कहते  हैं --- मेरे  भक्त  का  कभी  नाश  नहीं  होता  l किसी  भी  स्थिति  में  उसका  कोई  अहित  नहीं  होता  l  मैं  सदा  उसके  साथ  रहता  हूँ  l  जो  सच्चे  ईश्वर  भक्त  हैं  उनके  मन  में  सतत  विश्वास  रहता  है   कि  जब  प्रभु  साथ  हैं  तो  कुछ  भी  अन्यथा  नहीं  होगा  l  एक  कथा  है ---- एक  सेठ जी  थे  , ईश्वर विश्वासी  थे  l  ईमानदारी  से   व्यापार    करते  और   और  काम  करने  के  साथ  मन  में  निरंतर  भगवान  का  नाम स्मरण  करते  l  उनके  रुई  के  कई  गोदाम  थे  l  एक  दिन  उनका  मुनीम   अचानक  दौड़ता  हुआ  उनके  कक्ष  में  पहुंचा   और  बोला --- " सेठ जी  ! बड़ी  बुरी  खबर  है  l  तार  आया  है  कि  हमारे  गोदामों  में  आग  लग  गई  , संभवतः  लाखों  का  नुकसान   हो  गया  हो  l "  यह  सुनकर  सेठ जी  जरा  भी  विचलित  नहीं  हुए    और  बोले --- " जैसी  प्रभु  की  इच्छा  , वैसा  ही  होगा  l "  मुनीम  को  ऐसा  देखकर  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  l  l  एक  घंटे  बाद  मुनीम   फिर  से  सेठजी  के  कमरे  में  दौड़ा  आया   और  बोला --- " सेठ जी  !  अभी -अभी  खुशखबरी  आई  है  l  हमारे  सारे  गोदाम  सुरक्षित  हैं  l  पहला  वाला  तार  हमें  गलती  से  मिल  गया  था  l  सेठजी  ने  फिर  वही  शांत  भाव  से  उत्तर  दिया --- " जैसी  प्रभु  की  इच्छा  होती  है  , वैसा  ही  होता  है  l " मुनीम  को  समझ  में  आ  गया   जो  सब  कुछ  ईश्वर  की  इच्छा  मानकर  उन  पर  छोड़  देते  हैं वे   मन:स्थिति  में  शांत  रहते  हैं   l  

27 November 2022

WISDOM ----

  वस्तुओं  के  प्रति  आकर्षण  का , अतृप्त  इच्छाओं  का  नाम  तृष्णा  है  l  तृष्णा  प्राय:  अपनी  स्थिति  से  अधिक  ऊँची  सामर्थ्य  वाली   वस्तुओं  के  लिए  हुआ  करती  है  l  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " वासना  और  तृष्णा  की  खाई  इतनी  चौड़ी  और  गहरी  है  कि  उसे  पाटने  में   कुबेर  की  सम्पदा  और  इंद्र  की  सामर्थ्य  भी   कम  पड़ती  है  l   तृष्णा  कभी  तृप्त  नहीं  होतीं  l  उन्हें  व्रत , संकल्प  और  प्रतिरोध  की  छड़ी  से  ही  काबू  में  लाया  जा  सकता  है  l "  एक  कथा  है ------  एक  राजा  ने  एक  बकरी  पाली   और  प्रजाजनों  की  परीक्षा  लेने  का   निर्णय  किया  l  यह  घोषणा  की  गई  कि  जो  इस  बकरी  को  तृप्त  कर  देगा   उसे  सहस्त्र  स्वर्ण  मुद्राएँ  उपहार  में  मिलेंगी  l   परीक्षा  की  अवधि  पंद्रह  दिन  रखी  गई  और  बकरी  घर  ले  जाने  की  छूट  दे  दी  l   जो  ले  जाते  वे  पंद्रह  दिन  तक  उसका  पेट  भली  प्रकार  भर  देते  l  इतने  पर  भी  जब  वह  दरबार  में  पहुँचती  तो   अपनी  आदत  के  अनुरूप  वहां  रखे  हुए  हरे  चारे   में   मुंह  मारती  l  प्रयत्न  असफल  चला  जाता  l  इस  प्रकार  कितनों  ने  ही  प्रयत्न  किया  ,  पर  वे  सभी  निराश  होकर  लौट  गए  l   एक  बुद्धिमान  उस  बकरी  को  ले  गया   , वह  पीछे  छुपकर  बकरी  को  चारा  डाल  देता  , उसका  पेट  भर  देता  लेकिन  जब  वह  सामने  से   आता  , उसके  हाथ  में  चारा  होता  तब  वह  बकरी  की  छड़ी  से  अच्छी  खबर  लेता  l  उसे  देखते  ही  बकरी  खाना  भूल  जाती   और   मुंह   फेर  लेती  l  यह  नया  अभ्यास  जब  पक्का  हो  गया  तो  वह  बकरी  को  लेकर   दरबार  में  पहुंचा  l  छड़ी  हाथ  में  थी  l  उसके  सामने  हरा  चारा  रखा  गया   तो  छड़ी   को  ऊँची  उठाते  ही   बकरी  ने  मुंह  फेर  लिया  ,  राजा  समझ  गया  कि  वह  पूर्ण  तृप्त  हो  गई   और  उस  बुद्धिमान  को  इनाम  मिल  गया  l  इस  रहस्य  का  उद्घाटन   करते  हुए   राजपुरोहित  ने  बताया  कि  तृष्णायें   बकरी  के  सद्रश  हैं  l  वे  कभी  तृप्त  नहीं  होतीं  l  उन्हें  व्रत , संकल्प  और  प्रतिरोध  की   छड़ी  से  ही  काबू  में  लाया  जा  सकता  है   l  

25 November 2022

WISDOM -----

     पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " दूसरों  का  सहारा  लेकर  बहुत  ऊँचे  पहुंचे  हुए  लोगों  में   वो  साहस  और  द्रढ़ता  नहीं  होती   जो  अपने  आप  विकसित  हुए   व्यक्ति  में  स्थायी  रूप  से  होती  है  l  सफलता  की  मंजिल  भले  ही  देर  से  मिले   पर  अपने  पैरों  की  गई  यात्रा  -विकास यात्रा  अधिक  विश्वस्त  होती  है  l  संसार  में  कार्य  करने  के  लिए  स्वयं  का   विश्वासपात्र  बनना  आवश्यक  है  l  आत्म शक्तियों  पर  जो   जितना  अधिक  विश्वास  करता  है  ,  वह  उतना  ही  सफल  और  बड़ा  आदमी  बनता  है  l  "   एक  कथा  है ---- किसी  चिड़िया  ने  चोंच  में  दबाकर   पीपल  का  एक  बीज   नीम  के खोखले  तने  में  डाल  दिया  l  वहां  थोड़ी  मिटटी  , थोड़ी  नमी  थी  l  बीज  उग  आया   और  धीरे -धीरे  उस  वृक्ष  से  ही  आश्रय  लेकर  बढ़ने  लगा  l   सीमित    साधनों  में  वह   पीपल  का  पौधा   थोड़ा   ही  बढ़कर  रह  गया  l   एक  दिन  उसने  बड़े  वृक्ष  को   डांटते  हुए  कहा ---- " दुष्ट  !  तू   स्वयं  तो  आकाश  छूने  जा  रहा  है   और  मुझे  थोड़ा  भी  बढ़ने  नहीं  देता  l  अब  तूने  शीघ्र  ही  मुझे   विकास  के  और  साधन  न  दिए   तो  तेरा  सत्यानाश  कर  दूंगा  l  "  नीम  के  वृक्ष  ने  समझाया  ----" मित्र  !  औरों  की  दया  पर  पलने  वाले   इतना  ही  विकास  कर  सकते  हैं   जितना  तुमने  किया  है  l  इससे  अधिक  करना  हो  तो   नीचे  उतरो   और  अपनी  नींव  आप  बनाओ  ,  अपने  पैरों  पर  खड़े  हो  l  "  पौधे  से  वह  तो  नहीं  बना  ,  हाँ , वह   उसे  कोसने  अवश्य  लगा   लेकिन  नीम  के  वृक्ष  को  इतनी  फुरसत  कहाँ  थी  कि   वह  पीपल  के  पौधे  की  गाली -गलौज  सुनता   l  एक  दिन  हलकी  सी   आंधी  आई  l  नीम  का  वृक्ष  थोड़ा  ही  हिला  था  ,  पीपल  के  पौधे  की  नींव  कमजोर  थी   अत"  वह  धराशायी  होकर  मिटटी  चाटने  लगा  l  उधर  से  एक  राहगीर  निकला   l  उसने   नीम  के  वृक्ष  की  ओर  देखा  और  उसके   खोखले  तने  से  गिरे  हुए    पीपल  के  पौधे  को  देखा   और  धीरे से  कहा --- "  जो  परावलंबी  हैं  ,  औरों  के  आश्रय  में  बढ़ने  की  आशा  करते  हैं  ,  उनकी  अंत  में  यही  गति  होती  है  l "    आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- "जो  दूसरों  के  सहारे   उठते  हैं  उन्हें   बात -बात  पर  गिर  जाने  का   भय  बना  रहता  है  l  अपने  आप  बढ़ने  में  सच्चाई  और  ईमानदारी   रहती  है  ,  वह  घबराता  नहीं  , परेशान  भी  नहीं  होता   l