एक तारा आसमान से धरती पर आ गिरा l धरती ने पूछा --- " क्यों बंधु ! तुमने इतनी लंबी यात्रा कर के यहाँ आने की तकलीफ क्यों की ? " तारा बोला --- " बहन पृथ्वी ! जब मैं दूर से तुम्हे देखता था तो तुम चमचमाती नजर आती थीं और मैं बस यही सोचता रहता था कि कैसे तुमसे मिल पाऊं l " पृथ्वी चकित हुई और बोली ---- " आश्चर्य है , दूर से तो तुम भी मुझे झिलमिलाते दिखाई पड़ते थे , पर न अब एक बड़ी चट्टान से ज्यादा कुछ नहीं दीखते हो l " तारा बोला ---- "बहन ! अब एक बात समझ में आई l दूर से हमें हर वस्तु लुभावनी लगती है , पर जैसे ही हम उसे प्राप्त कर लेते हैं , वो अपना सौन्दर्य खो बैठती है l सच्ची सुन्दरता तो हमारी सोच और समझ के अन्दर है l " बात पृथ्वी को भी समझ में आ गई l अब दोनों एक दूसरे की सचाई जानते हैं , पर न एक दूसरे की चमक से ईर्ष्या करते हैं और न अपनी स्थिति पर दुःख प्रकट करते हैं l
16 January 2023
15 January 2023
WISDOM ----
लघु कथा ---1 . ' निर्भयता के साथ एकजुटता की आवश्यकता होती है l '----- एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने गया l उसने देखा कि दलदल में एक खरगोश का बच्चा फंस गया है l लकड़हारे ने उस असहाय खरगोश को दलदल से निकाला और अपने घर ले आया l यह खरगोश बहुत दुबला -पतला था l उस लकड़हारे के घर पहले से ही कई खरगोश थे l उन्होंने उस नए खरगोश से पूछा ---' जंगल में तो सब सुख -साधन थे , फिर तुम इतने पतले -दुबले क्यों हो ? " उस खरगोश ने कहा ---- " जंगल में सिंह आदि शक्तिशाली जानवरों का बहुत भय था l सब सुख -साधनों के बावजूद इस भय ने मुझे पनपने ही नहीं दिया l " एक खरगोश ने पूछा --- " यदि तुम सिंह का मुकाबला करते तो क्या जीत जाते ? ' यह नया खरगोश बहुत समझदार था , बोला --- " अकेला व्यक्ति कितना भी वीर हो सदैव विजयी नहीं हो सकता l यदि हम सब संगठित होते और एकजुटता के साथ चतुराई से काम लेते तो संभवतया जीत भी जाते l "
2 . महाभारत समाप्त हुआ l पुत्र वियोग से दुखी धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर को बुलाया , उनसे पूछा ---- " विदुर जी ! हमारे पक्ष में एक -एक योद्धा इतना सक्षम था कि उसने सेनापति बनने पर अपने पराक्रम से पांडवों के छक्के छुड़ा दिए l यह जीवन -मरण का युद्ध है , यह सब जानते थे , तो सेनापति बनने पर ही अपना पराक्रम दिखाने की जगह कर्तव्य बुद्धि से एक साथ पराक्रम दिखाते , तो क्या युद्ध जीत न जाते l " विदुर जी ने कहा --- " राजन ! आप ठीक सोचते हैं , परन्तु अकेले अधिक यश बटोरने की लिप्सा तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की अहंता ने कर्तव्य को सोचने और निभाने का अवसर ही नहीं दिया l यदि कर्तव्य ही सोचा होता , तो वे अपने भाइयों को उनका हक देकर युद्ध को टाल भी सकते थे l अत: हे राजन ! आप कौरवों की हार उनकी मृत्यु का दुःख न करें l "
14 January 2023
WISDOM -----
जीवन -प्रसंग ---- राजा शर्याति अपने परिवार समेत वन विहार को निकले l एक सुरम्य सरोवर के निकट पड़ाव डाला गया l बच्चे इधर -उधर खेल -कूद करते घूमने लगे l मिटटी के ढेर के नीचे से दो तेजस्वी मणियाँ जैसी चमकती दिखीं तो राजकुमारी सुकन्या को कुतूहल हुआ l उसने लकड़ी के सहारे उन मणियों को निकालने का प्रयास किया किन्तु उन चमकीली वस्तुओं को कुरेदने पर उनसे रक्त की धारा बह निकली l सुकन्या को दुःख भी हुआ और आश्चर्य भी l वह घटना का कारण जानने के लिए पिता के पास पहुंची l राजा शर्याति ने सुना तो वे स्तब्ध रह गए l उन्हें ज्ञात था कि समीप के एक टीले के नीचे च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे हैं l राजा को लगा कि हो -न -हो , पुत्री से उन्ही की आँखें फूट गईं हैं l वे सपरिवार घटना स्थल पर पहुंचे तो देखा कि वहां च्यवन ऋषि नेत्रहीन होकर कराह रहे हैं l राजा को महसूस हुआ कि उनकी पुत्री से अनजाने में पाप हो गया , उन्होंने इसके लिए ऋषि से क्षमा मांगी l ऐसे में राजकुमारी सुकन्या ने अभूतपूर्व साहस दिखाया l वह बोली --- " पिताजी ! पाप का प्रायश्चित कर्ता को स्वयं ही करना चाहिए l मैं आजीवन नेत्रहीन ऋषि च्यवन की पत्नी बनकर उनकी सेवा करुँगी l यही मेरे कर्मों का प्रायश्चित होगा l " आत्म त्याग का इतना बड़ा साहस रखने वाली आत्मा महान होगी , ऐसा विचार कर अनेक देवता उसे प्रणाम करने पहुंचे l l विवाह की परंपरा पूर्ण की गई l सुकन्या अंधे और वृद्ध पति को देवता मानकर प्रसन्न मन से धैर्य पूर्वक उनकी सेवा करने लगी l देवता उसकी साधना से प्रभावित हुए और अश्विनीकुमारों ने च्यवन ऋषि की वृद्धता और अन्धता को दूर कर दिया l उन्ही के नाम पर च्यवनप्राश प्रसिद्द है l सुकन्या का जीवन सार्थक हो गया l
13 January 2023
WISDOM ----
महाभारत की कथा हमें यह सिखाती है कि -- अहंकारी व्यक्ति का कभी कोई अहसान न ले , उससे कभी कोई मदद न ले l वो अहसान जता -जताकर आपका जीना दूभर कर देगा l भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य आदि दुर्योधन के साथ रहकर राजमहल की सब सुख -सुविधाओं का उपभोग करते थे , दुर्योधन समय -समय पर अपना अहसान जताता भी था l इस कारण उन्होंने दुर्योधन की हर गलत नीति का मौन रहकर समर्थन किया l दुर्योधन ने कर्ण को अपना मित्र बनाकर उस पर अहसान किया और कर्ण ने अपनी जान देकर उस मित्रता का मोल चुकाया l केवल महात्मा विदुर में ऐसा स्वाभिमान था कि उन्होंने महल के सुखों को त्याग दिया और वहां से कुछ दूरी पर अपनी कुटिया बनाकर चाहे गरीबी में ही रहे लेकिन स्वाभिमान से रहे , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उस कुटिया में उनका आतिथ्य स्वीकार किया l --------- एक बार विदुर जी ने धृतराष्ट्र को समझाने का प्रयास किया कि पुत्र मोह में पड़कर विवेकहीन मत बनो , अनीति मत अपनाओ l दुर्योधन को पता लगा कि चाचा विदुर पिताजी को उसके विरुद्ध सलाह दे रहे हैं l उसने उन्हें दरबार में बुलाया और अपमानित किया , कहा --- " तुम दासी पुत्र हो l मेरा ही अन्न खाकर मेरी ही निंदा करते हो l " विदुर जी जरा भी विचलित नहीं हुए और बोले --- " बेटा ! मैं क्या हूँ , यह तुमसे अधिक अच्छी तरह समझता हूँ l वन के शाक -पात मैं बारह वर्षों से खा रहा हूँ , तुम्हारा अन्न नहीं खा रहा l तुम्हारे पिताजी अर्थात मेरे बड़े भाई ने ही मुझे बुलाकर मेरी मेरी सलाह मांगी तो मुझे जो उचोत लगा , अपने अनुभव के आधार पर सलाह दी l तुम्हे नहीं रुचता तो अपने पिता से कहो कि मुझे परामर्श के लिए न बुलाया करें l " इस अपमान पर विदुर जी न उत्तेजित हुए , न विचलित l उनकी सहन शक्ति , संतुलन क्षमता अद्भुत थी l वे नीतिज्ञ थे l
WISDOM ----
लघु कथा ---- ' लालच का फल ' --- एक बार अंधड़ आया उसके कारण विशाल वृक्ष गिरा l पेड़ के नीचे एक ऊँट बैठा था , उसकी कमर टूट गई और टहनियों पर लगे घोंसलों में पक्षी और अंडे -बच्चे गिर गए l ढेरों मांस वहां बिखरा पड़ा था l उस समय एक भूखा सियार उधर से निकला और अनायास ही इतना भोजन पाकर बहुत प्रसन्न हुआ l सोचने लगा कि महीनों तक पेट भरने का साधन हो गया l निश्चिन्त होकर उसने नजर दौड़ाई तो नदी तट पर एक बड़ा सा मेढ़क दीखा l सियार ने सोचा कि पहले इसे लपक लिया जाए , नहीं तो ये डुबकी लगाकर भाग खड़ा होगा और हाथ से निकल जायेगा l सियार ने मेढ़क पर झपट्टा मारा l मेढ़क नदी में खिसक गया l सियार भी इस चिकनी मिटटी में फिसलता चला गया और गहरे पानी में समा गया l जितना भोजन उसके सामने था उसमे संतोष कर लेता तो यह नौबत न आती l ' लालच बुरी बला है l '
12 January 2023
WISDOM -----
1. एक भक्त भगवान की प्रतिमा के आगे बैठा कुछ याचना करता था l याचना करते -करते बहुत समय बीत गया , पर उसकी कामना पूर्ण नहीं हुई l किसी अविश्वासी ने हँसते हुए भक्त से कहा --- " भला कहीं पत्थरों की मूर्तियाँ भी किसी को कुछ दिया करती हैं ? " भक्त ने कहा --- " सो तो ठीक है , पर मैंने सोचा - मनोरथ के पूर्ण न होने पर जो निराशा होती है , उससे चित्त खिन्न न हो , उसके लिए इस प्रकार का अभ्यास किया जाए तो हानि ही क्या है ? "
2 . पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' भक्ति का अर्थ है --- भावनाओं की पराकाष्ठा और परमात्मा एवं उसके असंख्य रूपों के प्रति प्रेम l यदि पीड़ित को देख अंतर में करुणा जाग उठे , भूखे को देख अपना भोजन उसे देने की चाह मन में आए और भूले -बिसरों को देख उन्हें सन्मार्ग पर ले चलने की इच्छा हो , तो ऐसे ह्रदय में भक्ति का संगीत बजते देर नहीं लगती l सच्चे भक्त की पहचान भगवान के चित्र के आगे ढोल -मँजीरा बजाने से नहीं , बल्कि गए -गुजरों और दीन -दुखियों को उसी परमसत्ता का अंश मानकर , उनकी सेवा करने से होती है l "
WISDOM-----
जीवन -प्रसंग ---- एक धनी व्यक्ति सुकरात से मिलने पहुंचा l वहां उनसे बातें करते -करते वह अपनी तारीफों के पुल बाँधने लगा l जब उसकी डींगें बहुत बढ़ गईं तो सुकरात ने पृथ्वी का एक नक्शा मंगवाया और उससे पूछा --- मित्र ! ये बताओ कि इस नक्शे में तुम्हारा घर कहाँ है ? घर तो उस नक्शे में उसे कहाँ मिलता , पर बहुत प्रयत्न करने पर चने के दाने के बराबर उसका देश उसे उस नक्शे में दिखाई पड़ा l सुकरात वह दिखाते हुए उससे बोले ---- " मित्र ! परमात्मा ने अनंत विस्तार के ब्रह्माण्ड की रचना की है l उस ब्रह्माण्ड में अनेक ग्रह हैं और उन्ही में से एक गृह पृथ्वी है l इस पृथ्वी पर भी अनेक देश हैं और उनमें से एक देश तुम्हारा भी है l तुम्हारे देश में भी अनेक राज्य हैं और उन राज्यों में अनेक नगर हैं , उनमें से एक नगर तुम्हारा भी है l तुम्हारे नगर में भी अनेक धनपति होंगे और उनमें से एक तुम हो l जब परमात्मा के इतने बड़े साम्राज्य में मनुष्य का स्थान इतना छोटा सा है तो उसके लिए इतना व्यर्थ अहंकार करने से क्या लाभ ! " थोड़ा रूककर सुकरात बोले ---- " सांसारिक उपलब्धियों पर गर्व करने से बेहतर है कि तुम उस सौभाग्य को विकसित करने का प्रयत्न करो , जिससे तुम्हारा जीवन सार्थक बन सके l "