29 July 2026

WISDOM -----

   कहते  हैं  जो  भी  महाभारत  में  है  , वही  इस धरती  पर  है  l   सब  कुछ  वैसा  ही  है  ,  यह  हमारा  विवेक  है  कि  हम  क्या  सीखते  हैं  l  कौरवों  के  कुलगुरु  थे  --- कृपाचार्य  l  दुर्योधन  ने  जीवन  भर  जितने  षडयंत्र  किए  , छल -कपट  किया  ,  कुलगुरु  होने  के  नाते  वे  दुर्योधन  को  ऐसा  करने  से  रोक  सकते  थे  ,  धृतराष्ट्र  को  भी  समझा  सकते  थे  कि  ऐसा  अन्याय  न  करें  , इसका  परिणाम  अच्छा  नहीं  होगा    लेकिन  उन्होंने  ऐसा  नहीं  किया   क्योंकि  उन्हें  राजसी  सुख  भोग  की  आदत  हो  गई  थी    और  दुर्योधन  के  विरोध  का  मतलब  था   उन  राजसी  सुखों  से  वंचित  हो  जाना  l  ऐसे  ही  संत  -महात्मा  आज  के  समय  में  भी  हैं  ,  उन्हें  अपनी  दुकान  की  चिंता  है  ,  वे  सब  शक्ति   और  धन -वैभव  संपन्न  लोगों  को  खुश  करने  में  लगे  रहते  हैं  l  इस  युग  में   जिनके  पास  पद -प्रतिष्ठा  है  , धन  संपन्न  हैं   वे  भी  सोचते  हैं  की  जितनी  चाहे  मनमानी   कर    लो  , पापकर्म  कर  लो   फिर  बड़े -बड़े  संत -साधकों  से  पूजा  - पाठ  करा  लेंगे  जिससे  सारे  पाप  धुल  जाएंगे  l  मन्त्र  की  और  विधि -विधान  से  पूजा -पाठ  की  ऐसी  शक्ति  भी  है   कि  ऐसा  होता  भी  है   और  ऐसे  लोगों  के  सुख - वैभव  में  कहीं  कोई  कमी  नहीं  आती  l  लेकिन  जो  साधक - संत  उनके  लिए  इतनी  तपस्या  करते  हैं  , इसके  लिए  उन्हें  पर्याप्त  धन -राशि , मान -सम्मान  तो  मिल  जाता  है  लेकिन  कहते  हैं  इसमें  उनके  पुण्यों  का  एक  बड़ा  हिस्सा  भी  चला  जाता  है  l  अब  वे  विभिन्न  नेक  कर्मों  से  इसकी  क्षतिपूर्ति  कर  लें  तो  ठीक  है  अन्यथा  उन  संत -साधकों  का  पतन   शुरू  हो  जाता  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- अत्याचारी , अन्यायी   और  मर्यादाहीन  आचरण  करने  वालों  का  कभी  भी  साथ  न  दें  ,  ऐसे  लोग  स्वयं  तो  डूबेंगे   और  जो  भी  उनके  साथ  है  , उन  सब  को  ले  डूबेंगे  l  महात्मा  विदुर  ने  दुर्योधन   के  गलत  कार्यों  का  कभी  समर्थन  नहीं  किया   राजमहल  के  सुख  छोड़कर   बहुत  साधारण  जीवन  जिया   l  विदुर  जी  की    सत्य -निष्ठा  और  सादगी  की  ऐसी  ताकत  थी   कि  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  दुर्योधन  के   स्वादिष्ट  पकवान  त्याग  दिए  और     विदुर  जी   के   घर  जाकर   साग -रोटी    खा  कर  ही  तृप्त  हो  गए   l  

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