प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l जैसे कर्म किए हैं वैसा ही फल अवश्य मिलेगा लेकिन यह कब और किस रूप में मिलेगा , इसे काल निश्चित करता है l अब वर्तमान समय में लालच , स्वार्थ , अहंकार , महत्वाकांक्षा ----- आदि बुराइयाँ इतनी बढ़ गईं हैं कि किसी को अपराधी घोषित करने और दंड देने से पहले अपना स्वार्थ आड़े आ जाता है l सामान्य जन भी अपने स्वार्थ और डर की वजह से भी अपने परिवार और समाज के अपराधियों को सहर्ष स्वीकार करते है l यह सब कुछ नया नहीं है , महाभारत में भी धृतराष्ट्र पुत्र मोह में अंधे थे l दुर्योधन बाल्यकाल से ही पांडवों के विरुद्ध षडयंत्र करता रहा लेकिन धृतराष्ट्र ने , भीष्म पितामह ने उस पर कोई नियंत्रण नहीं रखा l उसे उसकी गलतियों की कभी कोई सजा नहीं दी , उसकी उद्दंडता बढ़ती ही गई l लेकिन ईश्वरीय विधान ऐसा नहीं है l ईश्वर को संसार के प्रत्येक व्यक्ति के हर पल की , उसकी उठती -गिरती सांसों की जानकारी है l सबका लेखा -जोखा ईश्वर के पास है l संसार के नियम -कानून अपराधी को दंड दें या न दें , ईश्वर की लाठी से कोई बच नहीं सकता l पुण्य किए हैं तो उनका फल सुख -वैभव के रूप में अवश्य मिलता है l जिस स्तर का पाप व्यक्ति करता है , वैसा ही दंड उसे मिलता है l छल , कपट षड्यंत्र , धोखा , लोगों को योजना बनाकर शारीरिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित करना --ऐसे अपराध हैं जिनकी क्षमा नहीं होती , ईश्वरीय दंड इतना कठोर होता है कि देखने वालों की रूह काँप जाए l ईश्वरीय विधान में एक विशेष बात यह है कि हमारे लिए हमारा यह एक जन्म है लेकिन ईश्वरीय विधान में यह मनुष्य की एक यात्रा है , यात्रा के किस पड़ाव पर पाप और पुण्य के फल मिलेंगे , यह मालूम करना मनुष्य के वश में नहीं है l ऋषि कहते हैं --होश में रह कर जीवन जिओ , किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं , किसी का बुरा मत करो l और इस सत्य को स्वीकार करो कि जब हम किसी का बुरा नहीं कर रहे तो हमारा भी बुरा नहीं होगा l
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