इस संसार में अच्छाई - बुराई , अंधकार और प्रकाश का अस्तित्व है l इस अस्तित्व का व्यवहारिक रूप हमें संसार में मनुष्यों की आदतें , उनके कार्य करने के तरीके , उनके गुण -अवगुण आदि के द्वारा समझ में आता है l यह संसार एक रंगमंच है और व्यक्ति को इस नाटक में कौन सा पार्ट अदा करना है यह उसके पूर्व में किए गए कर्म और उस दिशा में आगे बढ़ने की संभावनाओं पर निर्भर करता है l महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ता है , सन्मार्ग पर चलकर , सत्कर्म कर के अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए प्रत्यनशील है तो उसके मार्ग में अनेक बाधाएं आएँगी l वास्तव में ये बाधाएं नहीं हैं , ये ईश्वर द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएं हैं l इन परीक्षाओं में मुख्यतः चार पेपर ही होते हैं ---- काम , क्रोध , लोभ और मोह l ये पेपर पहले से ही लीक होते हैं l यदि मनुष्य अपने भीतर की कमियों को जानता है तो वह आसानी से समझ सकता है कि कौन सा पेपर सबसे कठिन होगा जैसे कोई व्यक्ति मंत्र जप , नाम स्मरण , नेक कर्म आदि विभिन्न सात्विक तरीकों से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ रहा है लेकिन उसमें काम वासना बहुत है , धन का लालच बहुत है तो उसके मन को लुभाने के अनेक प्रस्ताव उसके सामने आएंगे ताकि उनकी टांग खींचकर नीचे धकेला जा सके l अब ईश्वर स्वयं तो परीक्षा लेने आते नहीं हैं , इन परीक्षाओं का कंट्रोल रूम बुरे लोगों के पास होता है जिनके पास लोगों को सताने के अनेक तरीके होते हैं , साम , दाम , दंड , भेद , छल , कपट , षड्यंत्र , तंत्र , मंत्र , ब्लैक मैजिक आदि अनेक तरीकों से वे जी -तोड़ कोशिश करते हैं कि व्यक्ति आगे न बढ़ पाए , नीचे गिरकर उनकी आसुरी प्रवृत्ति में सहयोगी हो जाए l यही परीक्षा है l कर्मों की गति को यदि हम समझें तो यहाँ ' एक पंथ , दो काज ' हैं l बुरे लोगों के माध्यम से अध्यात्म पथ के पथिक की परीक्षाएं भी हो जाती हैं , और अनेक बुरे कर्म करते -करते उनका पाप का घड़ा भी भरता जाता है l जो सन्मार्ग पर हैं वे पुण्य कर्म कर के अपना पुण्य का घड़ा भरते जाते हैं , अध्यात्म -पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं l यदि कोई भूल हो गई , नीचे लुढ़क गए तो ईश्वर उन्हें पुन: आगे बढ़ने का - ऊपर उठने का मौका अवश्य देते हैं l अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का मौका तो भगवान सभी को देते हैं लेकिन जिनकी बुद्धि पापकर्म में लिप्त है वे उसे समझ नहीं पाते , वे स्वयं को ही भगवान समझते हैं l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- सत्कर्म करो , सन्मार्ग पर चलो , गायत्री मंत्र का जप करो ताकि हमारे प्रारब्ध के जो भी बुरे कर्म हैं , वे कट जाएँ , समाप्त हो जाएँ और युग - परिवर्तन जैसे श्रेष्ठ कार्यों के लिए , ईश्वरीय योजना में सहयोग देने के लिए हमारा चयन हो सके l