14 July 2013

PEARL

'श्रम और पसीने से उपार्जित जीविका से जो आत्म गौरव जुड़ा है ,उसका आनंद षटरस व्यंजनों से भी अधिक है"
       हँसमुख स्वभाव ,छह फीट का हट्टा -कट्टा गोरा शरीर ,श्रम के प्रकाश से प्रदीप्त आँखे ,विश्वविद्दालय के वाद -विवाद दल के शीर्षस्थ वक्ता ,वकील तथा फुटबॉल टीम के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी -अनेकों विभूतियों का स्वामी होने के साथ श्रम देवता के एकनिष्ठ आराधक जो अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक होकर भी कोलम्बिया की फैक्ट्री में मजदूरी करते रहे ,वे थे --डेविड मोर्स |
उनने कहा था -"आप सब विश्वास मानिये शीघ्र ही मानव के भविष्य में ऐसा समय आयेगा ,जब जीवन के मन्दिर में अनिवार्य प्रतिष्ठा योग्य एक ही देवता होगा ,वह है --श्रम देवता | "

Nothing is impossible to the man who can will and then do .

'कर्मवीर उदास नहीं देखे जाते | खीजते वे रहते हैं ,जो आलस में समय गंवाते हैं और जिम्मेदारियों से जी चुराते हैं | हो सकता है परिश्रमी को कठिनाइयां झेलनी पड़ें ,पर चैन तो निठल्लेपन में भी नहीं मिलता  | '
       स्पेन के नाविक कोलम्बस ने दुस्साहसी नौकायन करके अमेरिकी महाद्वीप को खोज निकाला | उसकी कीर्ति सब ओर फैली | लौटने पर सम्मान सूचक अनेक समारोह हुए |
   ऐसे ही एक प्रीति भोज में उनके किसी विद्वेषी ने कहा -"यह कौन सी बड़ी बात है | अटलांटिक पार किया कि अमेरिका आ गया | इतने सरल काम के लिये इतने सम्मान की क्या जरुरत है | "
    भोज समाप्त होने पर कोलम्बस ने एक उबला अंडा मेज पर रखा और कहा -"आप में से कोई सज्जन इसे सीधा खड़ा कर देने की कृपा करें | "
सभी ने बहुत अकल दौड़ाई ,कोशिश की पर वैसा न हो सका ,जैसा कि करने के लिये कहा गया था |
  कोलम्बस ने अंडे का एक सिरा उँगली के सहारे पिचकाकर समतल किया और मेज पर खड़ा कर दिखाया |
 उसने कहा -"देखा आप लोगों ने ,अंडा सीधा खड़ा कर देना कितना सरल है | पर सूझ -बूझ के अभाव में आप में से कोई इसे कर नहीं सका | "

  "महत्व श्रम का ही नहीं ,सूझ -बूझ का भी होता है | "

13 July 2013

JEALOUSY - The jealous man poisons his own banquet , and then eats it .

'ईर्ष्या दूसरे के संबंध में सोचती और पड़ौसी के चूल्हे से आग ला कर अपना छप्पर जलाती है |
   दो बुढियां पड़ोस में रहती थीं | एक थी उदार और दूसरी ईर्ष्यालु | दोनों ने लंबे समय तक तप किया ,देवता प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा --
उदार बुढ़िया ने मांगा -"मुझे जो कुछ भी आप दें ,उससे दोगुना पड़ोसियों को अवश्य दें | "उसके सभी पड़ोसी संपन्न हो गये ,उसका अहसान मानते और सम्मान देते रहे |
ईर्ष्यालु बुढ़िया ने मांगा-" मेरे शरीर के जो दो अंग हैं ,उनमे से एक -एक नष्ट हो जाये साथ ही पड़ोसियों के दोनों नष्ट हो जायें | -"
ईर्ष्यालु ने अपना एक हाथ ,एक पैर ,एक कान ,एक आँख नष्ट करा दी ,परिणाम स्वरुप पड़ोसियों के दोनों हाथ ,दोनों पैर ,दोनों कान ,दोनों आँखे नष्ट हो गईं | वह स्वयं तो दुखी रही ,साथ ही पड़ोसियों को भारी विपति में फँसा दिया |
उदारता और ईर्ष्या के ऐसे ही परिणाम होते हैं | 

SELF EXAMINATION

दूसरों में जो बुराइयां हमें दीखा करती हैं ,वे प्राय:हमारे ही ह्रदय के बुरे -भले भावों का प्रतिबिम्ब मात्र होती हैं | यदि हमारे अंदर बुरे तत्व अधिक हैं तो हमें सामने वाले की बुराइयां पहले और अधिक दिखाई देंगी | यदि हम में अच्छे तत्व अधिक हैं तो अच्छाईयां ही दिखाई देंगी |
      औरों की बुराइयां देखने के लिये ललचाने वाले बहुत हैं परंतु अपनी ओर देखने का अभ्यास बहुत कम लोगों को होता है | बहुत कम लोग मौत के पहले अपने आपको पहचान पाते हैं | महापुरुषों का जीवन निहारें तो पायेंगे कि वे हमेशा आत्म निरीक्षण करते रहे ,उनकी हर भूल उन्हें कुछ नया सुधार करने की सीख देती रही |
      यदि आप में भी महान बनने की चाहत उठे तो दूसरों को तुच्छ समझने की ,उनमे बुराइयां ढूंढने की नजर का परित्याग कर दीजिये | दूसरों को तुच्छ समझने वाला मनुष्यत्व खो देता है | औरों की गलतियां  खोजने की अपेक्षा अपनी कमियां ढूंढे और उन्हें दूर करने के लिये प्राण -पण से जुट जायें |

 अपनी शक्तियों को पहचानने और उनका सदुपयोग करने में ही मनुष्य जीवन की शान है | '

वर्तमान यदि कठिनाइयों से घिरा हुआ भी है तो ये विपतियाँ हमारे लिये वरदान हैं | मानव व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही है ,जब तक विपतियों का आक्रमण न हो ,इसकी विभूतियों की चमक तीव्र नहीं हो पाती | चंदन की और अधिक घिसाई का अर्थ है --सुगंध का प्रति पल नया विस्तार |
अत:आत्म निरीक्षण के द्वारा अपने आप की गरिमा को पहचानिये ,कौन जाने कल के उज्जवल भविष्य में आप संसार के महान कलाकार बन जायें ,भावी समाज आपको महान विभूति के रूप में पा कर कृतकार्य हो |  

12 July 2013

MIRROR

चित्रकार ने बड़ी मेहनत से भूखे गरीब आदमी का चित्र बनाया | चित्र ऐसा प्राकृतिक लगता कि आदमी की पीड़ा उभरकर कैनवस पर रख दी हो | दर्द से कराहता ,झुरियां पड़ी हुई ,कपड़े चिथड़े तार -तार दर्शाये गये थे | चित्र को देखकर लोगों के मन में दुःख के भाव उभरते | लोग अपनी- अपनी मनोवृति के अनुसार अटकलें लगाते |
             चित्रकार के एक डॉक्टर मित्र ने चित्र को देखा और बड़ी देर तक देखता रहा | अंत में उसकी प्रशंसा करते हुए बोला --"लगता है इस आदमी के पेट में तकलीफ है | वही चित्र में आपने बताई है |
   दुनिया अपने स्वभाव चिंतन के अनुरूप ही दिखाई देती है | 

SEVA - SADHNA

'दुखी को सुखी और सुखी को सुसंस्कृत बनाना ,आदर्शवादिता का अभिवर्धन ही सेवा साधना है | '
      दुःख ,कष्टों का तत्काल संकट निवारण करने के लिये कुछ साधनों की ,सहायता की आवश्यकता पड़ती है ,पर किसी का स्थाई दुःख मिटाना हो तो उसे अपने पैरों पर खड़ा कर स्वावलंबी बनाना होगा |
    दूसरों को ऊँचा उठाने ,आगे बढ़ाने के लिये जो साहस प्रखर होता है -इस परमार्थ परायणता को ही सेवा साधना कहते हैं |
                    मनुष्य जन्म की शुरुआत सेवा से होती है और अंत भी उसी में | जीवन का आदि और अंत -यह दो ऐसी अवस्थाएं हैं ,जब मनुष्य सर्वथा अशक्त ,असमर्थ होता है | इन दोनों का मध्यवर्ती अन्तराल ही ऐसा है ,जिसमे व्यक्ति सबसे सशक्त ,समर्थ और योग्य होता है | यही वह काल होता है ,जब उसे स्वयं पर किये गये उपकारों के बदले समाज को उपकृत करके ऋण चुकाना पड़ता है |
     यदि मनुष्य ऐसा न करे और जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत सेवा -ही -सेवा लेता रहे ,तो उसकी वह कृतध्नता मरणोतर जीवन में ऐसा वज्राघात बनकर बरसती है ,जिसके लिये उसके पास सिर्फ पछतावा ही शेष रहता है |

          सेवा एक साधना है जो इसे भली प्रकार संपन्न कर लेता है ,समझना चाहिये उसने सब कुछ पा लिया | सेवा को सर्वोपरि ईश्वर उपासना कहा गया है |

     
     
                   

 

       नेपल्स नगर के बड़े गिरजे का पादरी था -वोरले | चर्च की आय अच्छी थी पर वहां पूजा -पाठ के अतिरिक्त और कोई काम न होता था | वोरले ने नगर में घूमकर वहां की समस्याओं को समझने का प्रयत्न किया | वहां आवारा लड़कों की संख्या  तेजी से बढ़ती जा रही थी ,उनके द्वारा अन्याय भी बहुत होते थे |
  वोरले ने विचार किया कि इन लड़कों को सुधारने का स्वावलंबी बनाने का काम किया जाना चाहिये | उसने योजना की समग्र रूपरेखा बनाकर उसे लागू करने का दृढ निश्चय किया |


 उसका सुधार कार्य तेजी से बढ़ा ,हर वर्ष लगभग पांच हजार लड़के भरती होते रहे | इसका परिणाम यह हुआ कि नेपल्स नगर अपने समय में सुधरे हुए शहरों में अग्रणी हो गया |

11 July 2013

PEARL

'जो महत्वाकांक्षी हैं ,जिनमे कुछ करने की लगन है ,उन्हें साधारण परिस्थितियां तो क्या पहाड़ भी नहीं रोक सकते | अपने ध्येय का पक्का पहाड़ को चीरता और समुद्र को तैरता हुआ आगे बढ़ता जाता है | परिवार की समस्या ,धन का अभाव ,लोगों का विरोध ,समय एवं स्वास्थ्य की शिकायत प्रगति प्रिय कर्मवीरों को नहीं रोक सकती |
      ब्रीयवे  नाम के एक अमेरिकन युवक को दूसरा विश्व युद्ध के समाप्त होने पर जर्मनी भेजा गया | यह युवा सैनिक कृषि -विशेषज्ञ भी था | वह यह भी जानता था कि जर्मनी एक विश्व स्तर की शक्ति था ,पर अब हिटलर के उन्माद के कारण ध्वस्त हो ,वह निराशा के क्षणों से गुजर रहा था | खाने के लिये पर्याप्त अन्न भी नहीं था ,वहां के लोग पूरी तरह से अमेरिकी ,अंग्रेज और फ्रेंच सेना की दया के मोहताज थे |
       ब्रीयवे अपने साथ कुछ फलों व अन्न के बीज ,जो जर्मनी की भूमि में पैदा हो सकें ले गया | सीमा पर रोककर उसकी जांच -पड़ताल की गई ,पर किसी तरह ब्रीयवे बच गये |
           फ्रैंकफर्ट से लगभग 35 किलोमीटर   दूरएक ग्रामीण क्षेत्र ,उसकी  ड्यूटी लगी | वही हुआ ,जैसा वह चाहता था | बुरी तरह से निराश जर्म न नागरिकों कीउसने  क्लास ली एवं कृषि विज्ञान की जानकारी दी ,गांव से के बाहर पांच एकड़ के टुकड़े पर उसने अपने साथ लाये बीज बो दिये ,शाक वाटिका लग गई ,गांव वाले उसे परिश्रम सींचते थे ,इसका ध्यान रखा गया कि प्रत्येक परिवार को एक क्यारी मिल जाये |
 ब्रीयवे का उद्देश्य था -पोषण के साथ ,स्वावलंबन ,सहकारिता औरसृजन की वृति का शिक्षण | इस कृषि आंदोलनने   पश्चिमी जर्मनी के बढे क्षेत्र में फैलकर ब्रीयवे का स्वपन सार्थक कर दिया ,इससे जर्मन लोगों का आत्म विश्वास बढ़ा और छोटा सा प्रयोग राष्ट्र व्यापी बन गया |
जब उसने जर्मनी से विदा ली तो पूरे जर्मनी ने उसे अनेक पुरस्कारों ,उपहारों के साथ धन्यवाद देकर विदा किया | ब्रीयवे हर युवा के लिये एक आदर्श है कि कोई चाहे तो कुछ असंभव भी करके दिखा सकता है |