17 June 2020

WISDOM -------

  आइन्स्टीन   से  किसी  ने  पूछा   कि   संसार  में  इतना  दुःख  और  कलह  क्यों  है  , जबकि  विज्ञानं  ने  एक  से   बढ़कर  एक    सुख - साधन  दिए  हैं   l   उत्तर  देते  हुए  उन्होंने  कहा  --- कमी  बस  एक  ही  रह  गई   कि   अच्छे  इनसान   बनाने  की   कोई  योजना  नहीं  बनी  l   देश  संप्रदाय  के  पक्षधर  सभी  दीखते  हैं  ,  पर  ऐसे  लोग  नहीं  दीख  पड़ते    जो  अच्छे  इनसान   बनाने  की   योजनाएं  बनायें   l '

WISDOM -----

  '  पाप  एवं   दुष्कर्म   ही  एकमात्र  दुःख  का  कारण  नहीं  होते  ,   अयोग्यता , मूर्खता ,  निर्बलता ,  निराशा , फूट ,  निष्ठुरता ,  आलस्य   भी  ऐसे  दोष  हैं  जिनका  परिणाम   पाप  के   समान   और  कई  बार  उससे  भी  अधिक  दुःखदायी   होता  है  l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  ने  लिखा  है ---- ' आप  कठिनाइयों  से  बचना  या  छुटकारा  पाना  चाहते  हैं   तो  अपने  भीतरी  दोषों  को  ढूंढ़   निकालिए   और  उन्हें  निकाल  बाहर  करने  में   जुट  जाइये  l   दुर्गुणों  को  हटाकर   उनके  स्थान  पर  आप   सद्गुणों  को   अपने  अंदर  जितना  स्थान  देते  जायेंगे  ,  उसी  अनुपात  के  अनुसार  आपका  जीवन   विपत्ति  से  छूटता   जायेगा   l 

16 June 2020

WISDOM ------

    हिंसा   और    अत्याचार  को  रोकने  के  लिए  निष्क्रिय  विरोध , उपेक्षा  व  उदासीनता  से  काम  नहीं   चलता  l   उसे  रोकने  के  लिए  अदम्य  साहस   और  कठोर  संघर्ष  की  आवश्यकता  है   तभी   उसमें    सफल  हुआ  जा  सकता  है   l   यदि  संगठित  रूप  से   अत्याचार - अन्याय  का  प्रतिरोध  किया  जाये   तो  शक्तिशाली  बर्बरता  को  भी  परास्त  किया  जा  सकता  है  l 

जीवन उसका है , जो कठिनाइयों के मस्तक पर अपने मजबूत पाँव जमाकर खड़ा हो सकता है l

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   लिखते  हैं --- ' संकटों  से  डर   कर  जीवन  से  भागना   भीरुता  है   और    इस  संसार  में  समस्त  दण्ड   विधान  भीरु  और  कायर   व्यक्ति  के  लिए  बनाये  जाते  हैं  l '
आचार्य श्री  लिखते  हैं  ---- ' मरकर  परिस्थितियों  को  बदला  नहीं  जा  सकता  l   कर्मों  का  नाश  नहीं  होता  l  अगला  जीवन  वहीँ  से  शुरू  होगा ,  जहाँ  से  तुमने  इसे  छोड़ा  था l  आत्महत्या  पाप  है  --- इसका  दोहरा  दंड  है  --- एक  -आत्महत्या  का  दंड  और  दूसरा   अपने  कर्मक्षेत्र  से  भागने  का  दंड  l '  ऋषि  का  कहना  है -- प्रारब्ध  प्राप्त  भोगों  को  शांति  और  धैर्य  के  साथ  भोग  लेने  में   ही  भलाई  है  ,  उनसे  भागना  नहीं  चाहिए  क्योंकि  प्रारब्ध  कभी  पीछा  नहीं  छोड़ता  ,  भोगना  ही  पड़ता  है  l
  पेशवाओं  के  पथ - प्रदर्शक  -- ब्रह्मेन्द्र  स्वामी ,  इनका  जन्म  का  नाम  विष्णुपंत  था  ,    जब  दस  वर्ष  के  थे  ,  तब  उनके   माता - पिता  की  मृत्यु  हो  गई  l   सारी   सम्पति  सगे - संबंधियों   ने  हड़प  ली   और  उन्हें  रूखी  रोटी  भी  नहीं  देते  थे  ,  ऐसा  व्यवहार  करते  थे  जैसे  वे  कोई  छूत   के  रोगी  हों  l   जीवन  से  निराश  होकर   बीस  वर्ष  की  आयु  में  वे  आत्महत्या  करने  पहाड़  की  चोटी   पर  पहुँच  गए   l   कूदने  ही  वाले  थे  कि    महायोगी  ज्ञानेंद्र  सरस्वती  ने  उन्हें  आवाज  देकर  रोक  दिया   और  उन्हें  समझाया  कि  --- मानव  जीवन   दुबारा    नहीं  मिलता ,  यह  बहुमूल्य  है  l   अपरिमित  शक्तियों  का  स्रोत  है  l   दूसरों  की  पीड़ा  को  भी  समझो   l   औरों  को  ऊँचा  उठाने  में  लगी  दुर्बल  भुजाएं  भी  थोड़े  समय  में  लौह - दंड    बन  जाएँगी  l  मानव  जीवन  की  गरिमा  को  पहचानों  l --- इस  तरह  उन्होंने  युवक  विष्णुपंत  को   जीवन  जीना  सिखाया   और  कहा   कि   निराशा  में  डूबे   हुए  व्यक्तियों  में  जीवन  चेतना  का  प्रसार  करो  l 
 जीवन  के  इस  महामंत्र  से  यही  युवक  ब्रह्मेन्द्र  स्वामी  में  बदल  गया   और  17  वीं   सदी  में   महाराष्ट्र  के  इतिहास  को  एक  नया  मोड़  दिया  l   साधारण  से  क्लर्क   बालाजी  विश्वनाथ  को  गढ़कर  पेशवा  बनाया  l  

15 June 2020

WISDOM -----

   प्रकृति    की  मर्यादाओं ---- नियत  नियमों  की  अनुकूल  दिशा  में  चलकर  ही   सुखी  और  शांत  रहा  जा  सकता  है  ---- पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  l
 ग्रह - उपग्रह ,  नक्षत्र , तारे   एक  नियम  मर्यादा  के  अनुसार  चलते  हैं  l   वे  अपने  निश्चित  विधान  का  कभी  उल्लंघन  नहीं  करते  l   कीड़े - मकोड़े  और  पक्षियों  में  यह  विशेषता  पाई  जाती  है   कि   वे  अपने  भीतर  की   किसी  अज्ञात  घड़ी   के  मार्गदर्शन  से   अपनी  गतिविधियाँ   व्यवस्थित  रखते  हैं  l   केवल  मनुष्य  ही  ऐसा  है   जो  बार - बार   प्रकृति  के  नियमों  के  विरुद्ध  जाने  की  धृष्टता  करता  है  l
        आज  संसार  में  जो  समस्या  है  वह  मनुष्य  की  धृष्टता  का  ही  परिणाम  है  l   यदि  हम  जागरूक  नहीं  हैं  और  हमने   विज्ञान   की  आधुनिक  तकनीकों  और   आविष्कारों   से  प्राप्त  सुख - सुविधाओं  को  स्वीकार  कर  लिया  है    तो  हमें  उसके  विनाशकारी  परिणाम  भी  स्वीकार  करने  पड़ेंगे   l   जैसे  फ्रिज , टीवी ,   ए.सी. ,  मोबाइल , रासायनिक  खाद , बीज , कीटनाशक  आदि  का  हम  उपयोग  करते  हैं  l   इनके  दुष्प्रभावों  को  विशेषज्ञ  अनेकों  बार  बता  चुके  हैं   लेकिन  हम   जागरूक  नहीं  हैं  ,  इन  सुविधाओं  की  हमें  आदत  हो  गई  है   तो  इनके  दुष्परिणाम  भी  हमें  भुगतने  पड़ते  हैं  l   विज्ञान   इसके  बहुत  आगे  बढ़  गया  है  l   हजारों  की  संख्या  में  कृत्रिम  उपग्रह  हैं ,   संचार  के  साधनों  में  नित्य   नई   तकनीक  आ  रही  है  l   जब  ए.सी.  और  मोबाइल  से  निकलने  वाली  तरंगे  हमारे  शरीर  को  नुकसान  पहुंचाती   हैं   तो    इनसे  और  अधिक  विकसित  तकनीक   से  निकलने  वाली  तरंगे   क्या  हमें  जीवित  रहने  देंगी  ?   इस   आधुनिकता  के  बीच     मनुष्य    का  दम   घुटने  लगेगा  l   जब  पक्षियों  की , पेड़ - पौधों  , वनस्पतियों   की  प्रजाति  लुप्त  हो  रही  है  तो  अब  मनुष्य  के  अस्तित्व  पर  भी  खतरा  है  l
  विज्ञान  बुरा  नहीं  है  ,  लेकिन  जिनके  पास  असीम  धन - सम्पदा  है   और  कभी  न  मिटने  वाली  तृष्णा  है   वे  इन  तकनीकों  का  उपयोग   अपने  स्वार्थ  के  लिए  ,  दुनिया  पर  राज  करने  के  लिए  करते  हैं  l   कुछ  लोगों  की  इस  लोभ - लालसा  का  दुष्परिणाम  सारा  संसार  भुगतता  है   और  इसलिए  भुगतता  है  क्योंकि  जागरूक  नहीं  हैं  l  हम  अपने  स्वाभिमान  को  जगाएं ,  इससे  हम  निर्भय  होंगे  l    निर्भय  और  आत्मविश्वासी    व्यक्ति  से  बीमारी ,  भूत - प्रेत  सब  डर  कर  भागते  हैं   l

WISDOM ------

 जिस  प्रकार   सूखे  बांस  आपस  की  रगड़  से  ही  जलकर  भस्म  हो  जाते  हैं  ,  उसी  प्रकार  अहंकारी  व्यक्ति  आपस  में  टकराते  हैं  और  कलह  की  अग्नि  में  जल  मरते  हैं  l ---- पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य 
      अहंकार  ज्ञान  के  सारे  द्वार  बंद  कर  देता  है   l   अहंकार  यदि  धन  का  हो   तो  व्यक्ति  धन  के  माध्यम  से  सब  कुछ  हथियाना  चाहता  है  l   जिनके  पास  असीम  धन - सम्पदा  है  ,  वे  उस  धन  के  बल  पर  संसार  पर  शासन  करना  चाहते  हैं  l    समय  के  साथ  शासन  का  तरीका  भी  बदल  जाता   है  ,  अब  वे  लोगों  के  मन  में  भय  पैदा  कर  के  ,  उन्हें  मानसिक  रूप  से  कमजोर  बना  कर ,  उनके  दैनिक  जीवन  पर  भी   नियंत्रण  करना  चाहते  हैं  l   महत्वाकांक्षा  यहीं  नहीं  रूकती  l     वे  धन  के  बल  पर  प्रकृति  को  जीतना  चाहते  हैं  l   इसी  महत्वाकांक्षा  के  कारण   अनेक  सभ्यताएँ    धूल  में  मिल  गईं  l  लेकिन  अहंकार  के  कारण  व्यक्ति  इनसे  सबक  नहीं   सीखता  l 
  विज्ञान   की  आधुनिक  तकनीकों , आविष्कारों   से   ही  आज   नियम - संयम  से  रहने  वाला  व्यक्ति  भी  स्वस्थ  नहीं  है  l     अधिक    धन  कमाने   का  लालच   संसार  को  नई - नई  बीमारियाँ   देता  है ,  फिर  उनके  इलाज  देता  है  ,  फिर  नई  बीमारी  !  यह  चक्र  कभी  ख़त्म  नहीं  होता  l
  यह  चक्र  तभी  रुकेगा  जब  व्यक्ति  जागरूक  होगा ,   आधुनिक  सुविधाओं  को  छोड़कर  एक  सरल  जीवन  जियेगा ,   प्रकृति  के  साथ  तालमेल  रखेगा  ,  संवेदनशील  बनेगा  l
 अभी  लोग  क्रूरता  और  छल - छद्म     के  आधार  पर  संसार  को   अपने  ढंग  से  चलाना   चाहते  हैं  ,  लेकिन  यदि  वे  संवेदनशील  बन  जाएँ , '  जियो   और  जीने  दो '  के  सिद्धांत  पर  चलें  ,  अपना  स्वार्थ  छोड़  दें   तो  बिना  किसी  प्रयास  के  संसार  उनके  क़दमों  में   झुकेगा   l 

13 June 2020

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   एक  साधु   वर्तमान  शासन  तंत्र  की  आलोचना   कर  रहा  था  ,  तब  एक   तार्किक  ने  उनसे  पूछा  --- "  कल  तो  आप  संगठन  शक्ति  की  महत्ता  बता  रहे  थे  l   आज  शासन  की  बुराई  !  शासन  भी  तो  एक  संगठन  ही  है  l  "  इस  पर  महात्मा  ने  एक  कहानी  सुनाई -----
 "  एक  वृक्ष  पर  एक  उल्लू  बैठा  हुआ  था  ,  उसी  पर  आकर  एक  हंस  भी  बैठ  गया   और  स्वाभाविक  रूप  में  बोला ---- "  आज  सूर्य  प्रचंड  रूप  में  चमक  रहे  हैं ,  इसलिए  गर्मी  तीव्र  हो  गई  है  l  "
  उल्लू  ने  कहा ---- "  सूर्य  कहाँ  है  ?  गर्मी  तो  अंधकार  बढ़ने  से   होती  है  ,  जो  इस  समय  भी  हो  रही  है   l  "  उल्लू  की   आवाज   सुनकर   एक  बड़े  वट वृक्ष  पर  बैठे  हुए   अनेक  उल्लू  वहां  आकर  हंस  को   मूर्ख   बनाने  लगे   और  सूर्य  के  अस्तित्व  को  स्वीकार  न  कर   हंस  पर  झपटे  l   हंस  यह  कहता  हुआ  उड़  गया   क़ि  --- " यहाँ  तुम्हारा  बहुमत  है  , बहुमत  में  समझदार  को   सत्य  के  प्रतिपादन  मे   सफलता  मिलना    दुष्कर  ही  है   l "    बहुमत  के   महत्व  को    समझते  हुए   हंस  चुप  हो  गया  l