पंडित शास्त्री की गणना काशी के महान विद्वानों में होती है | एक दिन उनके एक शिष्य ने उनसे इस सफलता का रहस्य पूछा ,शास्त्रीजी ने शिष्य को एक ताला -चाबी पकड़ाते हुए कहा -"मैंने जीवन में जो भी अर्जित किया ,इससे प्रेरणा पाकर ही किया | शिष्य की उत्सुकता को भाँपते हुए वे बोले -"ये ताला सफलता का प्रतीक है और चाबी पात्रता की | मेरे जीवन भर के अनुभवों का सार यह है कि सफलता का ताला पात्रता की चाबी से खुलता है | | यश प्रतिष्ठा के पीछे भागने के बजाय यदि मनुष्य अपना समय पात्रता विकसित करने में लगाए तो उसका व्यक्तित्व सफलता को उसके जीवन में आने केलिए विवश कर देता है |
19 March 2013
इतिहास साक्षी है कि सफलता उन्ही को मिलती है जिन्होंने निजी जीवन में कठोरता अपनायी ,स्वयं पर कड़ा अंकुश लगाकर आत्मानुशासन का अभ्यास किया एवं अपनी बची हुई ऊर्जा को सुनियोजित किया | यदि अनुकरणीय और प्रखर प्रतिभा का धनी बनना है तो एक ही राजमार्ग है -तपश्चर्या से स्वयं को अनुशासित करना ,व्यवहार में सज्जनता शालीनता ,श्रमशीलता ,मितव्ययता ,स्वच्छता ,उदारता आदि श्रेष्ठ गुणों को अपनाते हुए जीनियस बनना ,व्यक्तित्व को बहुआयामी बनाना | चीनी यात्री हुवेन्सांग ने भारत के आरण्यक ,आश्रम और मठों में प्रतिभाओं को गढ़ने के लिये अपनायी जाने वाली कठिन तपश्चर्या प्रणाली की बहुत प्रशंसा की है | मिस्र निवासी सेंट एंथनी ने जिन्हें 'डेज़र्ट फादर 'कहा जाता है ,उन्होंने तीसरी शताब्दी के आरंभिक दिनों में लाल समुद्र के पास प्रतिभाएं निखारने के लिये एक कठोर तपश्चर्यारत जीवन को आधार बनाया | मठ में निवास करने वालों के लिये इटली के संत 'बेनिडिक्ट ऑफ नरसिया 'ने सादगी ,ब्रह्मचर्य और कठोर अनुशासन का विधान किया था |
प्राचीन काल से ही भारतीय ऋषि -मनीषियों का यह निष्कर्ष था कि प्रतिभा -प्रखरता के लिये कठोर तपस्वी जैसा जीवन आवश्यक है अन्यथा तृष्णा और वासना की लिप्सा इतनी सघनता के साथ छायी रहेगी कि अपनी सामर्थ्य की तुलना में औसत पुरुषार्थ भी करते न बन सकेगा |
प्राचीन काल से ही भारतीय ऋषि -मनीषियों का यह निष्कर्ष था कि प्रतिभा -प्रखरता के लिये कठोर तपस्वी जैसा जीवन आवश्यक है अन्यथा तृष्णा और वासना की लिप्सा इतनी सघनता के साथ छायी रहेगी कि अपनी सामर्थ्य की तुलना में औसत पुरुषार्थ भी करते न बन सकेगा |
18 March 2013
MORALITY
'नैतिकता सर्वमान्य योग्यता '
वाराणसी नरेश ब्रह्मदत्त की अपने राजपुरोहित देवमित्र पर अटूट श्रद्धा थी | उनके व्यक्तित्व में प्रतिभा योग्यता ज्ञान के साथ शील ,सदाचार और नैतिकता की सुगंध भी व्याप्त थी | अन्य राज्यों की जनता में उनके प्रति अपार भक्ति भाव था | राजपुरोहित के मन में एक दिन यह प्रश्न उठा कि उनके प्रति राजा और प्रजा के ह्रदय में जो श्रद्धा व सम्मान है उसका कारण क्या है ?उनका शास्त्र ज्ञान और प्रतिभा अथवा उनका शील और सदाचार ?इस प्रश्न के उत्तर के लिये उन्होंने दूसरा आचरण किया _एक दिन राजसभा केसमाप्त होने के बाद घर लौटते समय उन्होंने राजकोष से एक सिक्का उठा लिया | कोषाध्यक्ष ने यह सोचकर कि विशेष कार्य से सिक्का लिया होगा ,कुछ नहीं कहा | दूसरे दिन राजपुरोहित ने फिर सिक्का उठा लिया ,कोषाध्यक्ष ने फिर अनदेखा कर दिया | लेकिन तीसरे दिन राजपुरोहित ने जैसे ही सिक्के उठाये कोषाध्यक्ष ने उनका हाथ पकड़ लिया और सैनिकों से कहा यह धूर्त है ,चोरी करता है इसे न्याय पीठ में उपस्थित करो | पतित आचरण के कारण राजपुरोहित को हाथ बांधकर नंगे पैर ,पैदल न्यायलय में राजा के सामने लाया गया | राजा ने प्रश्न पूछे और आश्वस्त होकर निर्णय दिया कि इसने तीन बार राजकोष से धन चुराया है इसलिये इसके दाहिने हाथ की एक अंगुली काट ली जाये जिससे आगे वह ऐसे कुकर्म से दूर रहे | राजा के इस निर्णय से राजपुरोहित को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया | उन्होंने राजा से कहा -"मैं चोर नहीं हूं ,मैं यह जानना चाहता था कि आप मुझे जो श्रद्धा व सम्मान देते हैं उसकी सच्ची अधिकारिणी मेरी योग्यता ,ज्ञान और प्रतिभा है या मेरा शील और सदाचार है | आज यह स्पष्ट हो गया कि योग्यता ज्ञान का अपना महत्व तो है लेकिन यदि वह शील ,सदाचरण से च्युत हो जाये तो ये क्षमताएं उसकी रक्षा नहीं कर सकतीं | शील सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थीं ,उनसे च्युत होते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया | "
वाराणसी नरेश ब्रह्मदत्त की अपने राजपुरोहित देवमित्र पर अटूट श्रद्धा थी | उनके व्यक्तित्व में प्रतिभा योग्यता ज्ञान के साथ शील ,सदाचार और नैतिकता की सुगंध भी व्याप्त थी | अन्य राज्यों की जनता में उनके प्रति अपार भक्ति भाव था | राजपुरोहित के मन में एक दिन यह प्रश्न उठा कि उनके प्रति राजा और प्रजा के ह्रदय में जो श्रद्धा व सम्मान है उसका कारण क्या है ?उनका शास्त्र ज्ञान और प्रतिभा अथवा उनका शील और सदाचार ?इस प्रश्न के उत्तर के लिये उन्होंने दूसरा आचरण किया _एक दिन राजसभा केसमाप्त होने के बाद घर लौटते समय उन्होंने राजकोष से एक सिक्का उठा लिया | कोषाध्यक्ष ने यह सोचकर कि विशेष कार्य से सिक्का लिया होगा ,कुछ नहीं कहा | दूसरे दिन राजपुरोहित ने फिर सिक्का उठा लिया ,कोषाध्यक्ष ने फिर अनदेखा कर दिया | लेकिन तीसरे दिन राजपुरोहित ने जैसे ही सिक्के उठाये कोषाध्यक्ष ने उनका हाथ पकड़ लिया और सैनिकों से कहा यह धूर्त है ,चोरी करता है इसे न्याय पीठ में उपस्थित करो | पतित आचरण के कारण राजपुरोहित को हाथ बांधकर नंगे पैर ,पैदल न्यायलय में राजा के सामने लाया गया | राजा ने प्रश्न पूछे और आश्वस्त होकर निर्णय दिया कि इसने तीन बार राजकोष से धन चुराया है इसलिये इसके दाहिने हाथ की एक अंगुली काट ली जाये जिससे आगे वह ऐसे कुकर्म से दूर रहे | राजा के इस निर्णय से राजपुरोहित को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया | उन्होंने राजा से कहा -"मैं चोर नहीं हूं ,मैं यह जानना चाहता था कि आप मुझे जो श्रद्धा व सम्मान देते हैं उसकी सच्ची अधिकारिणी मेरी योग्यता ,ज्ञान और प्रतिभा है या मेरा शील और सदाचार है | आज यह स्पष्ट हो गया कि योग्यता ज्ञान का अपना महत्व तो है लेकिन यदि वह शील ,सदाचरण से च्युत हो जाये तो ये क्षमताएं उसकी रक्षा नहीं कर सकतीं | शील सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थीं ,उनसे च्युत होते ही मैं दंड का अधिकारी बन गया | "
MORAL EDUCATION
'शालीनता बिना मोल मिलती है ,परन्तु उससे सब कुछ ख़रीदा जा सकता है | '
व्यक्ति के जीवन में जितना महत्व शिक्षा का है ,उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान नैतिकता का है | नैतिक गुणों के बिना मनुष्य का सर्वांगीण विकास संभव नहीं ,इसके अभाव में कोई भी शिक्षा श्रेष्ठ भावना और उत्कृष्ट चिंतन का व्यक्ति बनाने में सदा असफल रहेगी | कोई भी व्यक्ति एक अच्छा समाजनिष्ठ नागरिक तभी बन सकेगा जब उसे आरम्भ से ही नैतिक तत्वों ,शाश्वत मूल्यों की जानकारी होगी | ऐसा शिक्षण ही विद्दार्थी को स्वावलंबी ,सहिष्णु सदाचारी ,संयमी ,कर्तव्यपरायण ,प्रमाणिक तथा परोपकारी बना सकता है | ऐसे व्यक्ति स्वयं ऊँचे उठते हैं ,आगे बढ़ते हैं तथा अपनी विशिष्टता के सहारे इस विश्व उद्दान को सुरभित समुन्नत रख सकते हैं |
नैतिकता अपने में तीन तत्वों का समावेश करती है -कर्तव्यपरायण ,विवेक द्रष्टि और ऊँचा उठने की अभीप्सा | नैतिक व्यक्ति के पास नैतिक बल होता है जो उसकी अपार उर्जा का भंडार होता है ,यह नैतिक बल मन में इतना आत्मविश्वास पैदा कर देता है कि इनसान असंभव को संभव कर दिखाने में सफल हो जाता है | नैतिक व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होता है ,उसके पास विवेक द्रष्टि होती है जिसके आधार पर वह यह निर्णय करने में सक्षम होता है कि कौनसा कार्य करने योग्य है ,किस काम को पहले और कितने समय में करना है | विवेक द्रष्टि हो तो व्यक्ति शुभ अवसर को पहचान लेता है और उसके लिये श्रद्धा पूर्वक अपने ह्रदय का दरवाजा खोल देता है |
व्यक्ति के जीवन में जितना महत्व शिक्षा का है ,उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान नैतिकता का है | नैतिक गुणों के बिना मनुष्य का सर्वांगीण विकास संभव नहीं ,इसके अभाव में कोई भी शिक्षा श्रेष्ठ भावना और उत्कृष्ट चिंतन का व्यक्ति बनाने में सदा असफल रहेगी | कोई भी व्यक्ति एक अच्छा समाजनिष्ठ नागरिक तभी बन सकेगा जब उसे आरम्भ से ही नैतिक तत्वों ,शाश्वत मूल्यों की जानकारी होगी | ऐसा शिक्षण ही विद्दार्थी को स्वावलंबी ,सहिष्णु सदाचारी ,संयमी ,कर्तव्यपरायण ,प्रमाणिक तथा परोपकारी बना सकता है | ऐसे व्यक्ति स्वयं ऊँचे उठते हैं ,आगे बढ़ते हैं तथा अपनी विशिष्टता के सहारे इस विश्व उद्दान को सुरभित समुन्नत रख सकते हैं |
नैतिकता अपने में तीन तत्वों का समावेश करती है -कर्तव्यपरायण ,विवेक द्रष्टि और ऊँचा उठने की अभीप्सा | नैतिक व्यक्ति के पास नैतिक बल होता है जो उसकी अपार उर्जा का भंडार होता है ,यह नैतिक बल मन में इतना आत्मविश्वास पैदा कर देता है कि इनसान असंभव को संभव कर दिखाने में सफल हो जाता है | नैतिक व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होता है ,उसके पास विवेक द्रष्टि होती है जिसके आधार पर वह यह निर्णय करने में सक्षम होता है कि कौनसा कार्य करने योग्य है ,किस काम को पहले और कितने समय में करना है | विवेक द्रष्टि हो तो व्यक्ति शुभ अवसर को पहचान लेता है और उसके लिये श्रद्धा पूर्वक अपने ह्रदय का दरवाजा खोल देता है |
17 March 2013
ALTRUISM
जो परमार्थ में लीन हैं ,तन मन और धन से परोपकार एवं परहित में निरत हैं ,वही सज्जन हैं ,सत्पुरुष हैं और वही धनवान हैं |
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के शिष्य 120 वर्ष जीवित रहे | एक बार वे प्रवास पर थे | उस क्षेत्र में लगातार 4 वर्ष पानी नहीं गिरा था ,कुएँ -तालाब का पानी सूख गया था | सभी आए ,कहा महाराज !उपाय बताएं | वे बोले -"पुण्य होंगे तो प्रसन्न होगा भगवान | "लोगों ने पूछा ,'क्या पुण्य करें ?'तो वे बोले "सामने तालाब है ,उसमे थोड़ा ही पानी है ,इसमें मछलियां मर रहीं हैं ,पानी डालो | "लोग बोले -"हमारे लिये ही पानी नहीं है ,मछलियों को पानी कहां से दें ?"उन्होंने कहा -"कहीं से भी लाओ ,तालाब में डालो | "सभी ने पानी तालाब में डालना शुरू किया | तीसरे दिन बादल आए ,घटाएँ भरकर महीने भर बरसीं | सारा दुर्भिक्ष -पानी का अभाव दूर हो गया | 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई | '
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के शिष्य 120 वर्ष जीवित रहे | एक बार वे प्रवास पर थे | उस क्षेत्र में लगातार 4 वर्ष पानी नहीं गिरा था ,कुएँ -तालाब का पानी सूख गया था | सभी आए ,कहा महाराज !उपाय बताएं | वे बोले -"पुण्य होंगे तो प्रसन्न होगा भगवान | "लोगों ने पूछा ,'क्या पुण्य करें ?'तो वे बोले "सामने तालाब है ,उसमे थोड़ा ही पानी है ,इसमें मछलियां मर रहीं हैं ,पानी डालो | "लोग बोले -"हमारे लिये ही पानी नहीं है ,मछलियों को पानी कहां से दें ?"उन्होंने कहा -"कहीं से भी लाओ ,तालाब में डालो | "सभी ने पानी तालाब में डालना शुरू किया | तीसरे दिन बादल आए ,घटाएँ भरकर महीने भर बरसीं | सारा दुर्भिक्ष -पानी का अभाव दूर हो गया | 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई | '
उस धन से क्या लाभ ,जो याचक को नहीं दिया जाता ,उस बल से क्या ,जो शत्रु को रोक न सके ,उस ज्ञान से क्या ,जो आचरण में न आ सके और उस आत्मा (व्यक्ति )से क्या जो जितेंद्रिय न बन सके |
कारूँ को अल्लाह ने बहुत बढ़ा खजाना दिया | कहा -इस दौलत को नेकी में खर्च कर | 'कारूँ दौलत पाकर फूला न समाया | उसने दौलत को बेहिसाब उड़ाना आरम्भ किया ,राग -रंग ,ऐशो -आराम में नष्ट करने लगा | खजाना खर्च होने लगा | एक दिन जमीन हिली और कारूँ का महल मय दौलत के उसमे फंस गया | बची दौलत का थोड़ा सा ही हिस्सा मिल जाये ,यह सोच कर उसने आवाज लगाई | कोई भी नहीं आया | खुदा के कहर से उसे निजात नहीं मिली | कारूँ की तरह रातों -रात अमीर बनने वालों ने इससे एक सीख ली और सोचा कि अल्लाह की मरजी पर अपनी मरजी नहीं रखनी चाहिये | परमात्मा की विभूतियाँ सद उद्देश्य के लिये हैं ,उनका दुरूपयोग विनाशकारी ही होता है |
कारूँ को अल्लाह ने बहुत बढ़ा खजाना दिया | कहा -इस दौलत को नेकी में खर्च कर | 'कारूँ दौलत पाकर फूला न समाया | उसने दौलत को बेहिसाब उड़ाना आरम्भ किया ,राग -रंग ,ऐशो -आराम में नष्ट करने लगा | खजाना खर्च होने लगा | एक दिन जमीन हिली और कारूँ का महल मय दौलत के उसमे फंस गया | बची दौलत का थोड़ा सा ही हिस्सा मिल जाये ,यह सोच कर उसने आवाज लगाई | कोई भी नहीं आया | खुदा के कहर से उसे निजात नहीं मिली | कारूँ की तरह रातों -रात अमीर बनने वालों ने इससे एक सीख ली और सोचा कि अल्लाह की मरजी पर अपनी मरजी नहीं रखनी चाहिये | परमात्मा की विभूतियाँ सद उद्देश्य के लिये हैं ,उनका दुरूपयोग विनाशकारी ही होता है |
16 March 2013
'संसार में वैभव रखना ,धनवान होना कोई बुरी बात नहीं ,बुराई तो धन के अभिमान में है | वही
व्यक्ति को गिराता है | 'साधन -संपति ,वैभव बढ़ जाने से जीवन में खुशहाली बढ़नी चाहिये ,लेकिन खुशहाली नहीं बढ़ी ,मन की शांति ख़त्म हो गई है | धन -दौलत के साथ यदि द्रष्टिकोण परिष्कृत हो जाता ,ह्रदय विशाल हो जाता ,सह्रदयता बढ़ती तो स्वयं के साथ समाज का भी कल्याण होता |
'वैभव असीम मात्रा में कमाया तो जा सकता है ,पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता | '
धन -संपति ,शिक्षा और ज्ञान में वृद्धि के साथ यदि मनुष्य का चिंतन परिष्कृत हो उसमे ईमानदारी उदारता ,सेवा आदि सद्गुण हों तभी वह धन और ज्ञान सार्थक है ,अन्यथा 'पैनी अक्ल 'और अमीरी विनाश के साधन होंगे | आध्यात्मिक मनोविज्ञानी कार्ल जुंग की यह द्रढ़ मान्यता थी कि मनुष्य की धर्म ,न्याय ,नीति में अभिरुचि होनी चाहिये ,उसके लिये वह सहज स्वभाव है | यदि इस दिशा में प्रगति न हो पाई तो अंतत:मनुष्य टूट जाता है और उसका जीवन निस्सार हो जाता है | 'ब्रिटिशसंसद में वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर दार्शनिकों की राय जानने के लिये कुछ विशेषज्ञों को बुलाया गया उसमे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री -जॉन स्टुअर्ट मिल भी थे | उन्होंने तुरंत कहा -"मजदूरों का वेतन न बढ़ाया जाये | वेतन बढ़ाने के मैं सख्त खिलाफ हूं | उन्होंने अपनी गवाही में कहा जो वेतन बढ़ाया जा रहा है ,उसकी तुलना में उनके लिये स्कूलों का ,उनके पढ़ने -लिखने का प्रबंध किया जाये ,उनकी चिकित्सा -दवा का प्रबंध किया जाये और जब वे सभ्य एवं सुसंस्कृत होने लगें तब उनके वेतन में वृद्धि की जाये ,अन्यथा वेतन की वृद्धि करने से मुसीबत आ जायेगी ,ये मजदूर तबाह हो जायेंगे | "बात ख़त्म हो गई | सभी ने एक मत से मजदूरों का वेतन डेढ़ गुना बढ़ा दिया | तीन वर्ष बाद जब जानकारी ली गई कि डेढ़ गुना वेतन जो बढ़ाया गया ,उसका क्या फायदा हुआ ?तब ज्ञात हुआ कि मजदूरों की बस्तियों में जो शिकायतें पहले थीं ,वे पहले से दोगुनी हो गईं ,शराबखाने पहले से दोगुने हो गये गुप्तरोग पहले जितने मजदूरों को होते थे ,उससे दूने -चौगुने हो गये | यह देखकर लोगों ने कहा कि जॉन स्टुअर्ट मिल की गवाही सही थी कि वेतन नहीं बढ़ना चाहिये | अनुभवी गुरुजनों का मत है कि वेतन जरुर बढ़ना चाहिये लेकिन पैसा बढ़ने के साथ -साथ लोगों का ईमान ,लोगों का द्रष्टिकोण ,लोगों का चिंतन भी बढ़ना चाहिये |
व्यक्ति को गिराता है | 'साधन -संपति ,वैभव बढ़ जाने से जीवन में खुशहाली बढ़नी चाहिये ,लेकिन खुशहाली नहीं बढ़ी ,मन की शांति ख़त्म हो गई है | धन -दौलत के साथ यदि द्रष्टिकोण परिष्कृत हो जाता ,ह्रदय विशाल हो जाता ,सह्रदयता बढ़ती तो स्वयं के साथ समाज का भी कल्याण होता |
'वैभव असीम मात्रा में कमाया तो जा सकता है ,पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता | '
धन -संपति ,शिक्षा और ज्ञान में वृद्धि के साथ यदि मनुष्य का चिंतन परिष्कृत हो उसमे ईमानदारी उदारता ,सेवा आदि सद्गुण हों तभी वह धन और ज्ञान सार्थक है ,अन्यथा 'पैनी अक्ल 'और अमीरी विनाश के साधन होंगे | आध्यात्मिक मनोविज्ञानी कार्ल जुंग की यह द्रढ़ मान्यता थी कि मनुष्य की धर्म ,न्याय ,नीति में अभिरुचि होनी चाहिये ,उसके लिये वह सहज स्वभाव है | यदि इस दिशा में प्रगति न हो पाई तो अंतत:मनुष्य टूट जाता है और उसका जीवन निस्सार हो जाता है | 'ब्रिटिशसंसद में वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर दार्शनिकों की राय जानने के लिये कुछ विशेषज्ञों को बुलाया गया उसमे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री -जॉन स्टुअर्ट मिल भी थे | उन्होंने तुरंत कहा -"मजदूरों का वेतन न बढ़ाया जाये | वेतन बढ़ाने के मैं सख्त खिलाफ हूं | उन्होंने अपनी गवाही में कहा जो वेतन बढ़ाया जा रहा है ,उसकी तुलना में उनके लिये स्कूलों का ,उनके पढ़ने -लिखने का प्रबंध किया जाये ,उनकी चिकित्सा -दवा का प्रबंध किया जाये और जब वे सभ्य एवं सुसंस्कृत होने लगें तब उनके वेतन में वृद्धि की जाये ,अन्यथा वेतन की वृद्धि करने से मुसीबत आ जायेगी ,ये मजदूर तबाह हो जायेंगे | "बात ख़त्म हो गई | सभी ने एक मत से मजदूरों का वेतन डेढ़ गुना बढ़ा दिया | तीन वर्ष बाद जब जानकारी ली गई कि डेढ़ गुना वेतन जो बढ़ाया गया ,उसका क्या फायदा हुआ ?तब ज्ञात हुआ कि मजदूरों की बस्तियों में जो शिकायतें पहले थीं ,वे पहले से दोगुनी हो गईं ,शराबखाने पहले से दोगुने हो गये गुप्तरोग पहले जितने मजदूरों को होते थे ,उससे दूने -चौगुने हो गये | यह देखकर लोगों ने कहा कि जॉन स्टुअर्ट मिल की गवाही सही थी कि वेतन नहीं बढ़ना चाहिये | अनुभवी गुरुजनों का मत है कि वेतन जरुर बढ़ना चाहिये लेकिन पैसा बढ़ने के साथ -साथ लोगों का ईमान ,लोगों का द्रष्टिकोण ,लोगों का चिंतन भी बढ़ना चाहिये |
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