3 March 2019

WISDOM ---- भाव - श्रद्धा ही उपासना को सार्थक बनती है , कर्मकांड नहीं

महाप्रभु  चैतन्य  के  जीवन काल  की  घटना   है  ---- वे  जगन्नाथपुरी  क्षेत्र  में  प्रचार   यात्रा   पर  निकले  थे  l मंडली  में  कई  विद्वान्  भी  थे  l  वटवृक्ष  के  नीचे  एक  किसान  को   उन्होंने  तन्मयता पूर्वक  गीता  पाठ  करते  हुए  देखा   l  उसकी  आँखों  से  आंसू  टपक  रहे  थे   l  मंडली  रूककर  पाठ  सुनने  लगी  l  नितांत  अशुद्ध  उच्चारण    था  l  अल्प   शिक्षित     था,  संस्कृत  नहीं  जनता  था   l  विद्वानों  ने  उसे  टोका  तो  वह  बोला ---  " मेरे  लिए  इतना  ही  बहुत  है  की  भगवन  जो  कह  रहे  हैं  , उसे  मेरी  आत्मा  अमृत  की  तरह  पी  रही  है  l  "   उस भक्त  को  नमन  करते  हुए  चैतन्य  महाप्रभु  ने कहा --- " भक्तों  !  इस  अशिक्षित  की  भावना  सराहनीय  है   l  यही  है  वह  तत्व  जो   भक्त  की  उपासना  को  सार्थक  बनता  है  l  समर्पण  का  भाव  नियोजित  किये  बिना  सारे  पूजा  उपचार  के  क्रम  खोखले  हैं   l  "

2 March 2019

WISDOM --- मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता सामूहिक जीवन के लिए सदा घातक रही है

  तक्षशिला  के  राजा   आम्भीक  के  निमंत्रण  प र   सिकंदर  ने  भारत  पर  आक्रमण  किया  l  जहाँ  आम्भीक  जैसे  देशद्रोही  थे  वहां  अनेक  देशभक्त  राजा  भी  थे  l  इन  राजाओं  में  देश भक्ति की  भावनाएं  तो  थीं  किन्तु   एकता  की  बुद्धि  का  सर्वथा  अभाव  था   l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने अपने  वाड्मय  ' महापुरुषों  के  अविस्मरणीय  जीवन  प्रसंग ' में  पृष्ठ  1. 35  पर  लिखा  है  ----- " सिकंदर  के  विरोधी  होने  पर  भी  वे  आपसी  विरोध  को  भुला  न  सके  l  किसी  एक  राष्ट्र  के  कर्णधारों  में   परस्पर  प्रेम  रहने  से  ही  कल्याण  की  संभावनाएं  सुरक्षित  रहा  करती  हैं  ,  फिर  भी  यदि  उनमे  किसी कारण  से  मनोमालिन्य   रहेगा   ,  तब  भी   किसी  संक्रामक  समय  में  उन्हें  आपसी  भेदभाव   मिटाकर  एक  संगठित   शक्ति  से  ही   संकट  का  सामना  करना  श्रेयस्कर  होता  है   अन्यथा  आया  हुआ  संकट    अलग - अलग  सबको  नष्ट  कर  देता  है l "
       देशद्रोही    आम्भीक  को  देखकर  अन्य  राजा  भी  देशद्रोही     बनते  जा  रहे  थे   l   जब  कोई  पापी   किसी   मर्यादा   की  रेखा  उल्लंघन  कर  उदाहरण  बन  जाता  है  ,  तब  अनेकों  को  उसका  उल्लंघन  करने  में   अधिक  संकोच  नहीं  रहता   l  
  भारत  के  प्रवेश  द्वार  पर  ,  एकमात्र  प्रहरी  के  रूप  में  महाराज  पुरु  रह  गए  थे   l  अनेक  अभागे  राजा   सिकंदर  की  सहायता  करते  हुए   उसकी  विजयों  में  अपने  लाभ  का  भाग  देखने  लगे  थे  l  
  जब  तक  पुरु  जैसे  वीर   भारत- भूमि  पर पैदा  होते  रहेंगे  ,  इसकी  गौरव  पताका  युग - युग  तक  आकाश  में  फहराती  रहेगी   l  

1 March 2019

WISDOM --- त्याग और बलिदान की सामर्थ्य

  बात    उन  दिनों  की  है  जब  वैशाली  महानगरी  में  राज्य - महोत्सव   के  कारण  उल्लास  का  वातावरण  था   l  राजा - प्रजा   सभी  विभिन्न  रंगों  में  डूबे  थे  l अचानक  महल  में   लगे  विशाल  घंटे  की   आवाज  ने  सबका  ध्यान   तोड़ा   l  राज परम्परा  के  अनुसार  घंटे  का  निरंतर  बजना  संकट  का  परिचायक  था  ,  जिसका  अर्थ   होता  था   कि  शत्रु  ने  आक्रमण  कर  दिया  l   राग - रंग  थम  गया  और  युद्ध  की  रणभेरी   गूंजने   लगी  l   शत्रु  की  विशाल  सेना  और  पूर्व   तैयारी    न  होने  से  वैशाली  के  सैनिकों  के  पैर  उखड़ने  लगे  l  वैशाली  नगर   शत्रु  सेना  के  कहर  से  चीत्कार  कर  उठा  l 
  नगर नायक  महायायन  कभी  अपनी  शूरवीरता  के  लिए  विख्यात  था  किन्तु  वृद्धावस्था  के  कारण  उसका  अपना  शरीर  भी  साथ  नहीं  दे  रहा  था  l  वह  परेशान  था  कि  क्या   हमारी  आँखों  के  सामने  ही  यह  अत्याचार  होता  रहेगा  ?   यह  सोचकर  वृद्ध  नायक  चल   पड़ा  शत्रु  सेनाध्यक्ष  से  मिलने  l  शत्रु  को  सामने  देखते  ही  वह  बोल  पड़ा  कि  -- '  इन  मासूमों  पर  अत्याचार  बंद  करो  l " 
 शत्रु  सेना नायक  ने  महायायन  के  सामने  एक  विचित्र  शर्त  रखी   कि   तुम  सामने बह  रही   नदी  में  जितनी  देर  डूबे  रहोगे  ,  हमारी  सेना  लूट- पाट  एवं  हत्या  बंद  रखेगी   l   शर्त  स्वीकार  कर  वृद्ध महायायन   तुरंत  नदी  में  कूद  पड़ा   l  वचन बद्ध  शत्रु  सेनानायक  ने   सेना  को  तब  तक  लूटमार  और  संहार  बंद   रखने   को  कहा  जब  तक  वृद्ध  का  सर  पानी  के  बाहर   न  दिखाई  न  पड़े  l
  शत्रु  सेनाध्यक्ष  और  उसकी  विशाल  सेना     प्रात:  से  शाम  तक  महायायन   के  बाहर  निकलने  की  प्रतीक्षा  करती  रही  ,  लेकिन  महायायन  पानी  में  डूबा  ही  रहा  l    आखिर  गोताखोरों  को   वृद्ध  का  पता  लगाने  को  कहा  l  लम्बी  खोजबीन  के  बाद  महायायन  का  मृत  शरीर  चट्टान  से  लिपटा  पाया  गया  l  उसने  दोनों  हाथों  से  चट्टान  को  मजबूती  से  पकड़े  ही  दम  तोड़  दिया  था  l  इस अनुपम  त्याग  और  बलिदान  को  देखकर  शत्रु  सेनानायक  का  ह्रदय  भी  द्रवित  हो  उठा  l 
  मानवता  के  इस  वृद्ध  पुजारी  के  समक्ष  अपनी  हार  स्वीकारते  हुए  उसने  सैनिकों  को  लूट  की  वस्तुएं  वापस  देने    तथा  अपने  राज्य   की  ओर  वापस  लौटने   का  आदेश  दिया   l  

28 February 2019

WISDOM ----- काल सर्वोपरि है ---

  भगवान  श्रीकृष्ण   ने  कुरुक्षेत्र  में   अपने   विराट  और   विश्वरूप  को  दिखलाते  हुए    स्वयं  को  संहारकारी  काल  के  रूप  में  घोषित  किया  है   l  काल  का  प्रवाह  प्रचंड  होता  है   l  इस  संसार  में  हर  व्यक्ति  की  अपनी  भूमिका  होती  है   l  बुद्धिमत्ता  तो  यही  है  काम  पूरा  होते  ही  उससे  विदा  ले  लेनी  चाहिए   l  काम  के  बाद  एक  पल  भी  ठहरना  अच्छा  नहीं  है   l  विवेकानंद  कहते  थे  --- " माँ  का  काम  करने  के  बाद  मैं  यहाँ  एक  क्षण  भी  ठहरना  नहीं  चाहता  l  "  उनका  काम  पूरा  होते  ही  वे  इस धरती  से  विदा  हो  गए  l 
         फ्रांस  की  राज्य  क्रांति  में   नेपोलियन   सहित    चार  प्रमुख  व्यक्तियों  का  योगदान  था   l  नेपोलियन  के  आलावा   अन्य   तीनो  जनसामान्य  के  रूप  में  प्रकट  हुए   और  अपना काम  करके  विदा  हो  गए  l    इतिहास  के  अनुसार  नेपोलियन  ने  अनेक  महान  कार्य  किए    लेकिन   वह   अहंकारी  था   l  इस अहंकार  के  कारण  महान  कार्य  करने  वाले  भी   एक  दिन  नष्ट  हो  जाते  हैं   l   फ्रान्स  की  राज्य  क्रांति काल की अभिव्यक्ति  थी   l    जो  लोग    स्वयं  को  भगवान  का  यंत्र  मानकर  कार्य  करते  हैं  ,  अपनी  सफलता  का  सारा   श्रेय    भगवान  को  देते  हैं  ,  समाज  में  उन्ही  की  प्रतिष्ठा  होती  है   l  लेकिन  जो  अहंकारी  हैं  , स्वयं  पर  गर्व  करते  हैं   कि  महान  घटनाओं  के  जन्मदाता  वही  हैं  ,  वे  बड़ी  भ्रान्ति  में  रहते  हैं   l  अहंकार  के  कारण  वे  काल  की  गहरी  खाई  में  जा  गिरते  हैं   l    नेपोलियन    के  कार्य  इतिहास प्रसिद्ध  हैं  किन्तु  उसका  अवसान  अत्यंत  दर्दनाक   हुआ   l   

WISDOM ----- जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है , उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता l

   आज  मनुष्य  खुशियों  कीं   तलाश  में  सारी  उम्र    बाहर  भटकता  रहता  है  लेकिन  उसे  कहीं  शांति  नहीं  मिलती l  खुशियों  का  यह  खजाना ,  मन  की  शांति  उसके  अन्तस्  में  ही  है  l  बस  !  उसे  पाने  के  लिए   सदाचार , सत्कर्म  और  सकारात्मक  सोच  की जरुरत  है   l  
  एक  कथा  है  ----  एक  भिखारी  था  ,  वह  जिन्दगी  भर  एक  ही  जगह  बैठकर  भीख  मांगता  रहा   l  उसकी  इच्छा थी  कि  वह  भी  धनवान  बने  ,  इसलिए  वह   दिन  में  ही  नहीं  ,  रात में  भी  भीख  माँगा  करता  था  l  जो  कुछ उसे  भीख  में  मिलता  उसे खरच करने  के  बजाय  जोड़ता  ही  रहता   l  अपनी   ख्वाहिश   को  पूरा  करने  के  लिए  उसने   दिन - रात  भरपूर कोशिश  की  ,  लेकिन  वह  कभी  भी  धनवान  न  हो  सका  l  वह  भिखारी  की  तरह  जिया  और  भिखारी  की  तरह  मरा  l 
 जब  वह  मरा  तो  कफन  के  लायक  भी    पूरे   पैसे  उसके  पास  नहीं  थे   l  आसपास  ले  लोगों  ने  उसका   झोंपड़ा  तोड़  दिया  ,  फिर  सबने  मिलकर  वहां  की  जमीन  साफ  की  l  सफाई  करने  वाले   इन  सभी  को   तब  भारी  आश्चर्य  हुआ  ,  जब  उन्हें  उस  जगह  पर   बड़ा  भारी  खजाना  गड़ा  हुआ  मिला  l  यह  ठीक  वही  जगह  थी  ,  जिस  जगह  पर  बैठकर    वह  भिखारी   जिन्दगी  भर  भीख  माँगा  करता  था  l  जहाँ  पर  वह  बैठता  था  ,  उसके  ठीक  नीचे  यह   भारी   खजाना  गड़ा  हुआ  था  l 
  आज  मनुष्य  की  हालत  कुछ  ऐसी  ही  है  l  वह  बाहरी  चीजों  में  ही  खुशियों  को  तलाशता  रहता  है ,  किन्तु  पाता  कुछ  भी  नहीं  है   l  

26 February 2019

WISDOM ----- यदि संगठित रूप से अत्याचार - अनाचार का प्रतिरोध किया जाये तो शक्तिशाली बर्बरता को भी परास्त किया जा सकता है

 गढ़ मंडला  की  रानी  दुर्गावती  ने   अकबर  जैसे  शक्तिशाली  सम्राट  को  भी  दो  बार  पराजित  कर  के  पीछे खदेड़  दिया    l  क्षत्रियों  ने  युद्धों  में  जैसी  वीरता  दिखाई , उसकी  प्रशंसा  इतिहास  के  पन्ने - पन्ने  में  लिखी  हुई  मिलती  है  ,  पर  साथ  ही  अवसर  के  अनुकूल  कार्यप्रणाली  न  अपनाकर  ,  और  केवल  परम्पराओं  के  पीछे  ही  लगे  रहकर   उन्होंने  जो  बहुत  बड़ी  भूल  की  उसकी  अबुद्धिमत्ता  की  आलोचना  भी  अनेक  विद्वानों  ने  की  है  ----- पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने   वाड्मय ' मरकर  भी  जो  अमर  हो  गए '  में   पृष्ठ   1.7  पर  लिखा  है -----  दो  आक्रमणों  में  रानी  दुर्गावती  ने  शत्रु  को  अच्छी  तरह  हरा  दिया  ,  पर  न  मालूम  किस  कारण  उसकी  सेना  ने  शत्रु  की   भागती  हुई  सेना  का  पीछा  नहीं  किया    ?
   शत्रु    को   आधा  कुचल  कर  छोड़  देने  से   वह  प्राय:  प्रतिशोध  की  ताक  में  रहता  है   और  फिर  से  तैयार  होकर  आक्रमण  कर  सकता  है   l  गढ़ मंडला  के  सेनाध्यक्षों   से  यही  भूल  हुई    जिसके  फलस्वरूप   मुगल  सेना  एक  के  बाद  एक  तीन  आक्रमण  कर  सकी   और  अंत  में  सुयोग  मिल  जाने  से   उसने  सफलता  प्राप्त  कर  ली   l  "  
उन्होंने  आगे  लिखा  है  '  महाराज  पृथ्वीराज  ने  प्रथम  बार  के  आक्रमण  में    मुहम्मद  गौरी  को  हराकर  पकड़  लिया  था    लेकिन  बाद  में  कुछ  लोगों  की  चिकनी - चुपड़ी  बातों  में  आकर   मुहम्मद  गौरी  के  क्षमा  प्रार्थना  करने  पर  उसे  छोड़  दिया  l  परिणाम  यह  हुआ  कि   उसने  फिर  अधिक  तैयारी  के   साथ  आक्रमण  किया  और  विजय  मिलने  पर  पृथ्वीराज  को  मरवा   ही   डाला  l  '
  हमारे  नीतिकारों  ने  भी  यही  कहा  है  --- दुष्ट  शत्रु  पर  दया  दिखाना   अपना  और  दूसरों  का  अहित  करना  है  l   आजकल  के  व्यवहार शास्त्र  का  स्पष्ट  नियम  नही  कि    दूसरों  को  सताने  वाले   दुष्टजन  पर  दया  करना  ,  सज्जनों  को  दंड  देने  के  समान  है   क्योंकि  दुष्ट  तो  अपनी  स्वभावगत   क्रूरता   और  नीचता   को  छोड़  नहीं  सकता    l  जब  तक  उसमे  शक्ति  रहेगी  ,  वह  निर्दोष  व्यक्तियों  को  सब  तरह  से  दुःख  और  कष्ट  ही   देगा   l   
बर्नार्ड शा  ने  भी  एक  लेख  में  लिखा  है --- स्वभाव  से  ही  दुष्ट  और  आततायी  व्यक्तियों   को  समाज  में  रहने  का   अधिकार  नहीं  है  l  उनका  अंत  उसी  प्रकार  कर  देना  चाहिए  जिस  प्रकार  हम  सर्प  और  भेड़िया  आदि  अकारण  आक्रमणकारी    और  घात  में  लगे  रहने  वाले  जीवों  का  कर  देते  हैं   l   

25 February 2019

WISDOM ----- समस्याओं का कारण ----- मानवी दुर्बुद्धि

 बुद्धि  तो  सहज  रूप में  सभी  को  प्राप्त  होती  है -- किसी  को  कम ,  किसी  को  ज्यादा   l   लेकिन  बुद्धि    यदि  भ्रष्ट  होकर  कुमार्गगामी  बन  जाये    तो  वह  व्यक्ति  का  स्वयं  का  तो  पतन  करती  ही  है  ,  उसके  क्रिया - कलाप   समाज  को  भी  क्षति  पहुंचाते  हैं   l  जिस  प्रकार    द्रष्टि   दोष  होने  के  कारण  मात्र  नजदीक  की वस्तुएं  ही  दीख  पड़ती  हैं    और    दूर  रखी  हुई  वस्तुओं  को    पहचानना  कठिन  होता  है   उसी  प्रकार  दुर्बुद्धिग्रस्त  व्यक्ति  तात्कालिक  लाभ   को  ही  सब  कुछ  समझता   है  ,   किस  कृत्य  का  भविष्य   में   क्या  परिणाम  होगा  , इसका  अनुमान  नहीं  लगा  पाता  l  तात्कालिक लाभ कमाने  की    अविवेकपूर्ण   कामना  की वजह  से  ही  समाज  में     भ्रष्टाचार ,  अनाचार , अत्याचार  , अन्याय , शोषण  बढ़ा  है  l