20 April 2020

WISDOM ------- सत्य की विजय निश्चित है

   कहते  हैं  ' ईश्वर   के घर  देर  है  , अंधेर  नहीं  l '--- इस  सम्बन्ध  में  एक  रोचक  कथा  है  -----  एक  5 - 6   वर्ष  का  बालक  था ,  उसे  समुद्र   में  सैर   करने की  बहुत  इच्छा  थी   l  माता - पिता  के  पास  इतना  पैसा  नहीं  था  कि   वे  उसके  इस  शौक  को  पूरा  कर  सकें  l  फिर  कहीं  से  पता  चला  कि    कोई  व्यवसायी  अपनी  नई  मोटर बोट    की  खुशी   में  बहुत  कम   किराये  में  लोगों  को  सैर  कराएगा  l   इस  परिवार  ने  भी  इस  अवसर  का  लाभ  लिया   और  सैर  को  चले  l  बहुत  बड़ी  बोट    थी  ,  और  बहुत  लोग  थे  उसमे  l  यह  माँ  अपने  बालक  में  अच्छे  संस्कार  डालने  और  जीवन  जीना  सिखाने  के  लिए  रामायण  और  महाभारत  की  कहानियां  सुनाया  करती  थी  l
  यह  क्रम  इस   बोट   में  सैर  के  वक्त  भी  चल  रहा  था --- माँ  समझा  रही  थी  कि   देखो   रावण  ने  वेश  बदल  कर  सीता  का  अपहरण  किया  ,  इसलिए  हमें    कोई  व्यक्ति  हो  या  वस्तु   उसकी  बाहरी  चमक  या  बाहरी  शालीनता  देखकर  विश्वास  नहीं  करना  चाहिए  l  रावण  बाहरी  रूप  में  साधु  बनकर  आया ,  लेकिन  उसके  भीतर  आसुरी  प्रवृति  थी   और  ऐसी  आसुरी  प्रवृति  के  लोगों  को  जब  कोई  पहचान  लेता  है   तो   वे  उसे  अपने  रास्ते   से  हटा  देते  हैं  जैसे  रावण  ने  जटायु  का  वध  कर  दिया  l  इसलिए   विकट   परिस्थितियों   में      धैर्य  और  विवेक  से  काम  लो ,  सत्य  की  जीत  होती  है    और  जिसके  मन  में  लोक कल्याण  की  भावना  होती  है  दैवी  शक्तियां  उसकी  मदद  करती  हैं   l    उसी  समय   विस्फोट  हुआ  और  वह   मोटर बोट  टूटकर  बिखर  गई  और  वह  बालक  भी  अपनी  माँ  की   गोद    से  छिटककर   समुद्र  में  गिरा  l   उस  बालक  को  किसी  मछुआरे  ने  बचाया  ,  उस  बालक  के  कपड़े   में  बोट   का  टुकड़ा  फंसा  था  ,  जिसे  कुछ  सोचकर  वह  वृद्ध  मछुआरा  अपने  साथ  ले  आया   l
बालक  को  होश  आने  पर   , स्वस्थ  होने  पर  मछुआरे  ने  उससे  पूछा --- तुम  सब  इतनी  पुरानी   बोट   में  सैर  को  क्यों  निकले   ? '    बालक  ने  कहा --- वह  बोट   बिलकुल  नई  थी  l  नई   बोट   में  सब  लोग  बहुत  खुश  थे  l '  मछुआरे  ने  कहा --- बेटा  ! यह  हाथ  बहुत  अनुभवी  हैं  ,  इस  टुकड़े को  छूते   ही  समझ  गए  कि   यह  बहुत  पुरानी   बोट   का  टुकड़ा  है ,  इसे  तो  टूटना  ही  था  l  खैर  ! तुम  इसे  अपने  पास  रखो   और  ज्ञान  हासिल  करो   जिससे  सत्य  को  जान  सको  l  अभी  तो  केवल  बोट   में  बैठे  लोग  ही  डूबे   हैं   यदि  ये  अपराध  विस्तृत  क्षेत्र  में  फ़ैल  गया   तो  अनर्थ  हो  जायेगा   l '
अब  उस  बालक  के  जीवन  का  एक  ही  लक्ष्य  था  ---सत्य  को  जानना  l  उसे  माँ  के  अंतिम  शब्द  याद  थे  --रावण  का  बाहरी  रूप ---- सत्य की  जीत   और  लोक कल्याण  की  भावना  हो  तो  दैवी  शक्तियां  मदद
 करती  हैं   l   मोटर बोट   का  वह  टुकड़ा   उसकी  अमूल्य  निधि  था  l    दिन - रात  अध्ययन  कर  के   वह  इस  बात  की  तह  में  पहुँच  गया  कि  मछुआरे  ने  सत्य  कहा  था  , वह  बोट    बहुत  पुरानी   थी  ,  धन  की  लालसा  ने  इतने  लोगों  की  जान  ले  ली  l   वह  बालक  जो  अब  युवा  हो  गया  था  ,  उसने   सबूत   सहित 
राजा  के  सामने  अपनी  बात   रखी  l   उस  समय  तक  वह  बोट   का  मालिक  बहुत  संपन्न  व्  शक्तिशाली  हो  गया  था  l   राजा  न्यायप्रिय  था   ,  उसने  कहा  -- अपनी  तृष्णा  के  लिए  लोगों  का  जीवन  छीनने  की  अनुमति  किसी  को  नहीं  है  l   सत्यमेव  जयते  l 

19 April 2020

WISDOM ----- अनीति ही हिंसा है

  ऋषि  का  कहना  है ----  अनीति  का  प्रतिकार  करने  के  लिए   जब  अहिंसा   समर्थ  न  हो   तो  हिंसा  भी   अपनाई  जा  सकती  है   l  अन्याय  के  विरुद्ध  क्रुद्ध  होना  मानवता  का  चिन्ह  है  l  यदि  अन्याय  को  सहन  करते    रहा  जायेगा    तो  इससे  अनीति  बढ़ेगी   और  इस  सुन्दर  संसार  में   अशान्ति   उत्पन्न  होगी   l   स्वार्थ  और  अन्याय  के  लिए  आक्रमण  वर्जित  है   लेकिन  आत्मरक्षा  और  अनाचार  की  रोकथाम  के  लिए   हिंसा  अपनानी  पड़े  तो  उसे  अनुचित  नहीं  माना  जा  सकता   l   आवश्यकता  पड़ने  पर  कांटे  से  काँटा  निकालना ,  विष  से  विष  मारने  की  नीति  उचित  कही  जाती  है  l
  सज्जनता  और  दुष्टता  की  अति  कहीं  भी  नहीं  होनी  चाहिए   l 

WISDOM -----

   इस  संसार  में  शुरू  से  ही   अंधकार  और  प्रकाश  में  संघर्ष  रहा  है    और  जब  भी  अंधकार  या  दुष्प्रवृतियों  की  अधिकता  रही  है   तब  संसार  में  अत्याचार , अन्याय  और  भीषण  नर - संहार  के  दृश्य  दिखाई  दिए  हैं  l   आदिकाल  से  देखें   तो  रावण  इतना  विद्वान्  था ,  उसकी  सोने  की  लंका  थी   लेकिन  राक्षसी  प्रवृति  की  वजह  से   वह   राक्षसों  को   विभिन्न  क्षेत्रों  में  भेजता  था  ,  जहाँ  वे  उत्पात  मचाते  थे  ,  निर्दोष  लोगों  का  वध  करते   और  ऋषियों  के  यज्ञ , हवन   आदि  को  अपवित्र  करते  थे  l   इस  कारण  सारे  धार्मिक  कृत्य  बंद  हो  गए  थे  l   राक्षसों  के  अत्याचार  इतने  बढ़  गए  थे  कि   सामान्य जन   का  जीना  मुश्किल  हो  गया  था  l
  वर्तमान  स्थिति  कुछ  इसी  तरह  है  ,  सभी  धार्मिक  स्थल  बंद  हो  गए  ,  लोग  भयभीत  हैं  ,  घरों  में  बंद  हैं  l    तब  भी  राक्षस  मायावी  थे  ,  अदृश्य  होकर   सबको  सताते  थे   और  अब  भी  अदृश्य  हैं  l    उस  समय   यह  स्पष्ट  अवश्य  था  कि   वे  राक्षस  रावण  के  भेजे  हुए  थे   लेकिन   अब  विज्ञान   ने   उसे  भी  अदृश्य  कर  दिया  l
अत्याचार  और  अन्याय  के  कारण  ही  संसार  के  विभिन्न  देशों  में  क्रान्ति   हुई ,  दो  विश्व युद्ध  हुए  l  ऐसा  लगता  है    कि    लोगों  को  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  करना  ,  उन्हें  बेमौत  मारना   राक्षसी  प्रवृति  के  लोगों  का  मनोरंजन  का  साधन  है    क्योंकि  ये  उत्पात  कभी  खत्म   नहीं  हुए   समय - समय  पर  विभिन्न  रूपों  में   वे  अपनी  शक्ति  का   प्रद्रशन  कर  देते  हैं  l
यह  सिलसिला  तभी  थमेगा  जब  लोगों  की  चेतना  जाग्रत  होगी ,  लोग  जागरूक  होंगे  l   आज  के  समय  में   बुद्धि  और  विवेक  से  ही  दुश्मन  को  पराजित  किया  जा  सकता  है  l 

WISDOM ---- अति सर्वत्र वर्जयेत

  हमारे  आचार्य , ऋषियों  आदि  का  कहना  है   कि   किसी  भी  स्थिति  में  अति  नहीं  होनी  चाहिए  l   महात्मा  बुद्ध  ने  कहा  भी  है --- वीणा  के  तार  को  इतना  मत  कसो  कि   वह  टूट  जाए ,  और  इतना  ढीला  भी  मत  छोड़ो   कि   वह  बजना  ही  छोड़  दे   l
  अति  जहाँ  भी  है ,  वह   मनुष्य  के  लिए  मुसीबत  उत्पन्न  करती  है   l   यदि  लालच , तृष्णा   , अहंकार  अति  का  है  तो  ये  दुर्गुण   उस  व्यक्ति  के  हृदय  की  संवेदना  को  सोख  लेते  हैं   , फिर  उसके  अमानुषिक  व्यवहार  से  सारा  समाज  त्रस्त   होने  लगता  है  l
  पूंजीवादी  व्यवस्था  में  अति उत्पादन  की  समस्या  है  l   अनेक  कारण  हैं  जिनकी  वजह  से  अति  उत्पादन  हो  जाता  है  ,  इससे  एक  नई   समस्या   उत्पन्न  होती  है  कि   इसे  खपाएं  कहा  ?    उपभोग  सामग्री  का  अतिउत्पादन  हो  तो  उसे  तो   कहीं  भी  खपाया  जा  सकता  है    लेकिन  यदि    नशीले  मादक  पदार्थ ,   कीटनाशक ,  अस्त्र - शस्त्र ,  हथियार ,  विभिन्न  तरह  की  दवाएं ,  इनके  उपकरण  आदि  का  अतिउत्पादन  हो  तो  उसे    किसी  बाजार  में  खपाना , बेचना  एक  कठिन  समस्या  होती  है  l   यदि  पूंजीपति  में   मानवीयता  नहीं  है  तो  वह  साम , दाम , दंड , भेद  किसी  भी  नीति   से  अपने  माल  को  बेचकर  लाभ  कमा  लेगा  ,  उसे  केवल  अपने  लाभ  की  चिंता  है  ,  लोगों  के  हित    की  परवाह  नहीं  है   l
     इसलिए  ऋषियों  ने  मध्यम   मार्ग  पर  बल  दिया  है  l   अपना  भी  हित   हो  जाये   और  संसार  का  अहित  न  हो  l  ' अति  का  अंत  होता  है  l   इसलिए ' जियो  और  जीने  दो ' l
  व्यवस्था  चाहे  जो  हो --- पूंजीवाद , समाजवाद ,  प्रजातंत्र ,  राजतन्त्र --- यदि   इनमे  मानवता ,  संवेदना ,  करुणा , भाईचारे ,  परहित  आदि  सद्गुणों  का  समावेश  होगा   तभी  इस  धरती  पर  लोग  सुख - शांति  से  जीवन  जी  सकेंगे  l  

18 April 2020

WISDOM ---- जीवन में धन जरुरी है लेकिन धन का अहंकार अनर्थ उत्पन्न करता है

  धन  जीवन  में  जरुरी  है  ,  लेकिन  लोभ  की  कोई  सीमा  नहीं   है   l   कोई  व्यक्ति  पचास  व्यक्तियों  से  अधिक  धनी   है  तो  भी  उसके  मन  में  कसक  होगी  कि   दूसरे  पचास  व्यक्ति  उससे  कहीं  अधिक  संपन्न  हैं  l   उसे  सबसे  आगे  निकल  जाने  की  आकुलता  होती  है  ,  इसलिए  हर  उचित , अनुचित  और  अनैतिक  तरीके  से  वह  धन  - सम्पदा  एकत्र  कर  लेता  है  l
   धन - संपन्न  व्यक्ति  होने  का  अहंकार   ,  उसके  मानवीय  गुणों  को  कम  कर  देता  है   l   क्योंकि  अहंकार  सभी  जगह  पर  अपना  आधिपत्य  स्थापित  करना  चाहता  है  l
  कहते  हैं  सद्गुणों  में  विशेष  आकर्षण  होता  है  इसलिए  बुरे  से  बुरा  व्यक्ति  भी  समाज  में  स्वयं  को  बहुत  शालीन ,  समाज सेवी , परोपकारी   सिद्ध  करना  चाहता  है  l   इसलिए  ऐसे  लोगों  का  दोहरा  व्यक्तित्व  होता  है  -- एक  समाज  के  सामने  बहुत  दानी , परोपकारी ,  आदर्श  व्यक्तित्व  और  दूसरी  परदे  के  पीछे   जहाँ  अति  धन  कमाने  की  लालसा  उसे  नैतिक  और  मानवीय  मूल्यों  से  गिरा  देती  है  l   संसार  की  अधिकांश  समस्याएं  ऐसे  ही  लोगों  की  अधिकता  से  उत्पन्न  होती  हैं  l
 संपन्नता   जिस  गति  से  बढ़ती  है  ,  फिर  व्यक्ति  हो  या  संस्था   उसका  अहंकार  भी  उतना  ही  बढ़ता  जाता  है  l   धन  की  ताकत  बहुत  होती  है ,  उसके  बल  पर  वे  किसी  भी  देश  की  व्यवस्था  को  अपने  अनुरूप   नीति     बनाने  पर विवश  कर  देते  हैं  l   यही  वजह  है  आज  संसार  में  शोषण  व  अन्याय  में  वृद्धि  हुई  है   l 

WISDOM ----- मनुष्य चैन से जीना चाहता है

  मनुष्य  जीवन  अनेक   समस्याओं  से  घिरा  हुआ  है  ,  बीमारी  है ,  दुःख  है   और  सबसे  बड़ा  दुःख  है --- मृत्यु  l   शेष  सारे  दुःख  तो  उसकी  छाया    में  हैं    l    मनुष्य  अपने  मिटने  के  डर   से  भयभीत  है   l   इसलिए   प्रत्येक  सांसारिक  प्राणी   मृत्यु  को   भुलाकर   अपनी  जिंदगी  अपने  हिसाब  से  चैन  से  जीना  चाहता  है   l   मनुष्य ,   ईश्वर  की  भी  उनके  सौम्य  रूप  में ,  सुन्दर  छवि  की  उपासना   करता  है  l
        गीता  में  भगवान   ने  अर्जुन  को  अपने  विराट  रूप  के  दर्शन  दिए  --' सब  जन्म    मुझ    से  पाते  हैं   ,  फिर  लौट  मुझ    में   ही   आते  है  l '   लेकिन  परमात्मा  के  विकराल  रूप  का  कोई  ध्यान  नहीं  करना  चाहता  l
  जीवन  जीने  की  स्वतंत्रता  बहुत  बड़ी  स्वतंत्रता  है  ,  मनुष्य  हर  पल  मृत्यु  को  अपने  आसपास  देखना  नहीं  चाहता  l   इसलिए  कोई  यह  कह  कर  कि  हम  तुम्हे  मृत्यु  से  बचाएंगे ,  व्यक्ति  पर  अपना  नियंत्रण  रखना  चाहे  ,  तो     ऐसी  स्थिति  में  लोग  मानसिक  व्याधियों  से  घिरने  लगते  हैं  , आक्रामक  हो  जाते  हैं  l 

17 April 2020

WISDOM ------- भय का भूत --- भयग्रस्त व्यक्ति एक संकट से अनेक संकट स्वत: पैदा कर लेते हैं

 नीति   कहती  है --- भय   आधी  मृत्यु  है  ,  इसलिए  किसी  को  अकारण   भय    नहीं  करना  चाहिए  ,  जो  अवश्यम्भावी   उसके  लिए   तो  भय  करना  और  भी  मूर्खता  है  l   उस  परिस्थिति  के  लिए  तो  शूरवीरों  की  तरह  तैयार  रहना  चाहिए    l    इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है  -------     एक  बार  संसार  की  बिगड़ती  हुई  स्थिति  को  सुधारने  पर  विचार - विमर्श  के  लिए  विष्णु जी   को    शिवजी   ने    बुलाया  और  यमराज  को  भी  बुलाया   l    विष्णु जी  के  वाहन  गरुड़  बाहर  ही  रुके  ,  मीटिंग  देर  तक  चलती  इसलिए  वे  समय  बिताने  के  लिए    वहां  दाना  चुग  रहे  कबूतर  से  बात  करने  लगे  l
  निमंत्रण  मिलते  ही  उसी  समय  वहां  यमराज  आ  धमके  ,   कबूतर  को  वहां  देख   उन्हें  हंसी  आ  गई  और  अर्थपूर्ण  ढंग  से  मुस्कराते  हुए  वे  अंदर  चले  गए  l
 यमराज  को  देख  कबूतर  के  तो  प्राण   सूख   गए  l   उसने  गरुड़  से  कहा --- अवश्य  ही  मेरी  मृत्यु  आ  गई   है ,  इसलिए  यमराज  मुझे  देखकर   हँसे  l   तू  मुझे  किसी  सुरक्षित  स्थान  पर  पहुंचा  दो  l
  गरुड़  ने  उसे  बहुत  समझाया  ,  पर  भयभीत  कबूतर   ने  कुछ  न  सुनी   और  कहा --- ' आप  मुझे  विंध्याचल  की  नीलाद्रि  गुफा   तक  पहुंचा  दो ,  मैं  वहां  छुप  जाऊँगा  , सुरक्षित  रहूँगा  l '
गरुड़  तो  बहुत    तीव्र  गति  से  उड़ते  हैं  ,  कबूतर  को  अपनी  पीठ  पर   बैठाकर  विंध्याचल  की  नीलाद्रि  गुफा  में  छोड़  आये  l
उसी  समय  मीटिंग  खत्म   हो  गई  और  यमराज  बाहर  निकले  l   वहां  कबूतर  को  न  देखकर  उन्होंने   गरुड़  से  पूछा  कि --- तुम्हारे  साथ  जो  कबूतर  था  वह  कहाँ  गया  ?   गरुड़  ने  हंसकर  कहा --- महाराज  !  आपकी  विकराल  दाढ़ , लम्बी  मूंछ  और  भयंकर  आकृति   को  देख  वह  भयभीत  हो  गया  l   मैंने  बहुत  समझाया ,  वह  माना  नहीं  l   इसलिए  मैं  अभी - अभी  उसे  विंध्याचल  में  एक  सुरक्षित  स्थान  पर  छोड़कर  आया  हूँ  l  '  यमराज  ने  पूछा  --- वहां  आपने  किसी  और  को  तो  नहीं  देखा l
गरुड़  ने  कहा --- जिस  गुफा  में  मैं  उसे  छोड़कर  आया ,  वहां  एक  बिल्ली  के  पंजे  के  निशान  देखे  l   कोई  बात  है  क्या  l   यमराज  ने  कहा  ---- ' जब  मैं  यहाँ  से  निकला  तो  मैंने  कबूतर  के  मस्तक  पर   एक  लेख  पढ़ा ,-- लिखा  था  -- एक  घड़ी   बाद  उसे  विंध्याचल  की  बिल्ली  खा  जाएगी  l   मैंने  उसे  शिवलोक  में  देखकर   विचार  किया  कि   ब्रह्मा जी  भी  कभी - कभी  कितनी  भूल  करते  हैं   l   कहाँ  शिवलोक  और  कहा  विंध्याचल   ,  पर  अब  स्पष्ट  हो  गया  ,  वैसे  चाहे  कबूतर  बच  जाता  ,  पर  उसके   भय   ने   ब्रह्मा जी  के  लेख  को  सत्य  कर  दिया  l   कबूतर  उस  गुफा  में  भी  न  बच  सका ,  यथासमय  पर  उसे  बिल्ली  ने  खा  लिया  l
  इस  कथा  से  यही  शिक्षा  मिलती  है    कि   विपरीत  परिस्थितियों  में  हम  धैर्य  से  काम  लें  l   भयग्रस्त  न  हों  l   धैर्य , विवेक  और   आत्मविश्वास  से   समस्याओं  पर  विजय  पाई  जा  सकती  है  l