2 February 2013

नशा ,नाश की जड़ है ।पिता ने बहुत समझाया -"बेटा !शराब मनुष्य को बरबाद कर देती है "।पर बेटे ने एक न सुनी ,वह नियमित रूप से शराब पीता रहा ।एक दिन उसने अपने मित्र के साथ खूब शराब पी ।उसकी सारी विचार शक्ति नष्ट हो गई ।उसने मित्र से पूछा -क्यों जी !मेरी मृत्यु के बाद क्या होगा ?"होगा यह कि तुम्हारा शरीर कब्र में डाल दिया जायेगा "-साथी ने उत्तर दिया ।लड़का बोला -"अजी यह तो मुझे भी पता है ,तुम उसके बाद की बात बताओ "।मित्र ने कहा -फिर क्या होगा ,तुम्हे मिट्टी से ढक कर कब्र बना दी जाएगी ।"लड़का ठठाकर हँसा और कहने लगा -मूर्ख !इतना तो मुझे भी पता है ,तू यह बता उसके बाद क्या होगा ?मित्र ने हँसकर कहा -"बरसात होगी और पड़ोसी तुम्हें खूब रौंदेगा ।"लड़का चिल्लाया -"अच्छा तो पड़ोसी की यह हिम्मत !और लाठी लेकर दौड़ा ।पकड़ते -पकड़ते उसने पड़ोसी का सिर सीरा बना दिया ।वह तो पुलिस आ गई ,नहीं तो मारकर ही छोड़ता ।पुलिस उसे पकड़ कर ले गई और हवालात में बंद कर दिया ।सुबह उसने पिताजी को संदेश भेजा -"पिताजी !अब मैं समझ गया ,नशा सचमुच मनुष्य से वह सब करा सकता है ,जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।"

31 January 2013

जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता है ।संकीर्ण स्वार्थ ,वासना और अहं से युक्त अनैतिक जीवन भय का प्रमुख कारण है ।भय का सबसे घ्रणित पहलू अपने स्वार्थ के लिए ,दूसरों पर छाये रहने की भावना से अधीनस्थ लोगों का शोषण करना है ।वैराग्यशतक में भय की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है -भोग में रोग का भय ,धन में चोरी होने का भय ,सत्ता में शत्रुओं का भय ,सौंदर्य में बुढ़ापे का भय ,शरीर में मृत्यु का भय ।इस तरह संसार में सब कुछ भय से युक्त है ।त्याग का मार्ग ही निर्भयता की अवस्था की ओर ले जाता है ।

30 January 2013

SILENCE

जब महाभारत का अन्तिम श्लोक गणेशजी के सुपाठ्य अक्षरों में अंकित हो चुका तब महर्षि वेदव्यास ने गणेशजी से कहा -"आपका मौन विस्मयकारी है ।इस सुदीर्घ काल में मैंने तो पंद्रह बीस लाख शब्द बोल डाले ,परन्तु आपके मुख से मैंने एक भी शब्द नहीं सुना ।इस पर गणेशजी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा -"किसी दीपक में अधिक तेल होता है ,किसी में कम ,परन्तु तेल का अक्षय भंडार किसी किसी दीपक में नहीं होता ।उसी प्रकार सबकी प्राणशक्ति सीमित है ,असीम किसी की नहीं ।इस प्राणशक्ति का पूर्णतम लाभ वही पा सकता है जो संयम से उसका उपयोग करता है ।संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम का प्रथम सोपान है -वाक्-संयम ।वाणी का संयम न रखने से प्राणशक्ति सूख जाती है इसलिए मैं मौन का उपासक हूँ ।

29 January 2013

मनुष्य का अच्छा स्वभाव ही उसका सौन्दर्य है ।वह कुरूपता की कमी पूरी कर सकता है ,किन्तु बुरे स्वभाव के रहते देवताओं जैसे सौन्दर्य का भी कोई मूल्य नहीं ।लुकमान से किसी ने प्रश्न किया कि आपने इतनी शिष्टता कहाँ से सीखी ?लुकमान ने उत्तर दिया -"भाई ,मैंने शिष्ट व्यवहार अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही सीखा है ।लुकमान का उत्तर सुनकर लोग अचरज में पड़ गये ।लुकमान ने स्पष्ट करते हुए कहा कि अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही मैंने जाना कि अशिष्ट व्यवहार क्या है ।मैंने पहले उनकी बुराइयों को देखा ।फिर देखा कि कहीं वे बुराइयां मुझ में तो नहीं हैं ।इस तरह के आत्म निरीक्षण से मैं बुराइयों से दूर होता गया और आत्म सुधार के फलस्वरूप लोग मुझे लुकमान से हजरत लुकमान कहने लगे ।

28 January 2013

हवा जोर से चलने लगी ।धरती की धूल उड़ -उड़कर आसमान पर छा गई ।धरती से उठकर आकाश पर पहुँच जाने पर धूल को बड़ा गर्व हो गया ।वह सहसा कह उठी -"आज मेरे समान कोई भी ऊँचा नहीं ।जल ,थल ,नभ के साथ दसों दिशाओं में मैं ही व्याप्त हूँ ।बादल ने धूल की बात सुनी ।धूल की भूल पर ,उसके गर्व पर अट्टाहास किया और अपनी जलधाराएँ खोल दीं ।देखते -ही -देखते आसमान से उतरकर धूल धरती पर जल के साथ दिखाई देने लगी ।दिशाएँ साफ हो गईं ,कहीं भी धूल का नामो -निशान तक नहीं रहा ।जल के साथ बहती हुई धूल से धरती ने पूछा -"रेणुके !तुमने अपने उत्थान -पतन से क्या सीखा ?"धूल ने कहा -"माता धरती !मैंने सीखा कि उन्नति पाकर किसी को गर्व नहीं करना चाहिए ।गर्व करने वाले मनुष्य का पतन अवश्य होता है ।

27 January 2013

जिंदगी की सार्थकता को यदि खोजना है तो वह दूसरों की भलाई करने में है ।जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं ,वे निजी जीवन में उदार बन कर जीते हैं ।दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा प्रकृति हर पल देती है ।झरना निरंतर दूसरों के लिए बहता है ।बादल बरस कर अपना कोष नहीं चुका देते ।वे बार -बार खाली होते हैं ,फिर भर जाते हैं ।नदियाँ उदारता पूर्वक समुद्र को देती हैं व समुद्र भाप बना कर उन्हें बादलों को लौटा देता है ,इस विश्वास के साथ कि यह प्रवाह चलता रहेगा ।वृक्ष प्रसन्नता पूर्वक देते हैं व सोचते हैं कि वे ठूंठ बन कर नहीं रहेंगे ।नियति का चक्र उन्हें सतत हरा -भरा बनाये रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा ।हवा की झोली में सौरभ भरने वाले खिलते पुष्पों तथा दूध के बदले कोई प्रतिदान न मांगने वाली गायों से हम शिक्षण लें एवं उदारता को जीवित रख हँसते -हँसते जीवन जियें ।एक राजा वेश बदल कर नगर में यह जानने के लिए अक्सर निकलता था कि उसकी प्रजा सुखी है या नहीं ।एक दिन उसने देखा कि एक बहुत ही बूढ़ा आदमी एक बाग के किनारे काजू का पेड़ लगा रहा है ।राजा ने उस बूढ़े आदमी से पूछा -"बाबा !यह पेड़ तुम किसके लिए लगा रहे हो ?जब इसमें फल लगेंगे ,तब तुम इसे देखने के लिए नहीं रहोगे ।तुम्हारे जीवन के थोड़े ही दिन शेष रह गए हैं ,फिर इसे लगाने से तुम्हे क्या फायदा ?इस पर वृद्ध हँसा और सहज स्वर में उसने उत्तर दिया -"फलों के पेड़ इसलिए नहीं लगाए जाते कि हम लगाते ही उनके फल खायेंगे ।पेड़ को लगाता कोई और है ,फल कोई और खाता है ।यह दुनिया की बहुत पुरानी रीति है ।

26 January 2013

एक आदमी ऐसे गाँव में पहुँच गया ,जहां सब अंधे रहते थे ।उनका परस्पर व्यवहार कहीं भी आँख वालों से अलग नहीं था ।सुनना ,पदचाप से जान लेना ,सूंघना आदि सभी क्षमताएँ विकसित थीं ।उसे वहां एक लड़की मिली ।बड़ी सुंदर व शिष्ट थी ।उसे उस लड़की से प्रेम हो गया ।वह अंधी थी ।उस लड़की ने बुजुर्गों से उससे शादी की बात की ,पर साथ में यह भी कहा कि उसके साथ एक कमी है कि उसे दिखाई देता है ।हम लोगों की तरह नहीं है ।सभी अंधे बुजुर्ग बोले -"यह बड़ी भयावह बीमारी है ।सारी तकलीफें इसी से पैदा होती हैं ।हम उसका इलाज कर देंगे ,फिर तुम्हारी शादी कर देंगे ।वे उसके पीछे पड़ गए ।वह भागा ।अंधों का चक्रव्यूह इतना प्रबल था कि जाल में फँस गया ।लड़की कहती रही कि हम तुमसे प्रेम करते हैं ,मत भागो ,पर वह किसी तरह बच कर निकल भागा ।अंधों के गाँव में देखना भी बीमारी है ,आज के संसार की स्थिति भी ऐसी ही है ।विवेकवान होना ,किसी का भला करना औरों के लिए एक बीमारी बन गई है ।