23 July 2013

SOLUTION

ईसप  की लोककथाएँ-नीतिकथाएँ  सर्व  प्रचलित  हैं  , एक  गुलाम  कहे  जाने  वाले  व्यक्ति  ईसप  के  जीवन  में  महत्वपूर्ण  मोड़  एक  घटनाक्रम  से  आया ।  ईसप  जिस  जमींदार  का  गुलाम  था  वह  किसी  दूसरे  जमींदार  से  शर्त  हार  गया  ।  शर्त  के  अनुसार  - समुद्र  का  पूरा  पानी  पीने  की  सजा  हारने  वाले  जमींदार  को  मिली  ।  आदमी  के  लिये  भला  यह  कैसे  संभव  है  ?  अत:  वह  जमींदार  बहुत  परेशान  था          ईसप  ने  अपने  मालिक  को  परेशान  देखकर  कहा -यदि  आज्ञा  दें  तो  मैं  मुक्ति  का  उपाय  बतलाता  हूँ  । जमींदार  ने  कहा  कि  यदि  इस  समस्या  से  पीछा  छुड़ा  दे  तो  ईसप  को  वह  मुक्त  कर  देगा  । सभा  आयोजित  की  गई , सभी  समुद्र  तट  पर  पहुंचे  । शर्त  के  अनुसार  ईसप  के  मालिक  को  समुद्र  का  पूरा  पानी  पीने  को  कहा  गया  । तभी  ईसप  बोल  उठा - यदि  आप लोग  पहले  समुद्र  में  निरंतर  गिर  रहीं  नदियों  को  थोड़े  समय  के  लिये  रोक  दें  तो  हमारे  मालिक  निश्चित  ही  समुद्र  का  पानी  पी  जायेंगे  । ईसप  की  चतुराई  भरी  बात  सुनकर  सभी  ताकते  रह  गये  ।
       ईसप  ने  अपनी  बात  को  नीतियुक्त  बताते  हुए  समझाया --
   ' मानव  जीवन  भी  इसी  प्रकार  है  । जब  तक  मन  की  इच्छाओं  की  पूर्ति  होती  रहती  है , तब  तक  वह  आपाधापी  में  लगा  रहता  है  । मन  रूपी  समुद्र  में  यदि  वासनाओं  की  नदियों  को  न  बहने  दिया  जाये  तो  वासनाएँ  स्वत:  ही  तिरोहित  हो  जायेंगी  । '
    ईसप  न  केवल  मुक्त  हो  गए , वहीँ  से  उनके  अंदर  के  नीति  कथाकार  का  उदय  हुआ  । आज  विश्व  भर  में  कथा  साहित्य  में  उनका  महत्वपूर्ण  स्थान  है ।

22 July 2013

DHYAN

अपने  व्यक्तित्व  को  श्रेष्ठ  विचारों  का  स्नान  करा  देना  ही  ध्यान  कहलाता  है  -हमारी  समस्त  समस्याओं  का  मूल  कारण  व्यक्तित्व  के  गठन  में  संव्याप्त  कमियों  में  छिपा  हुआ  है
व्यक्तित्व  को  सही  ढंग  से  निखार  लेना, उसका  सुनियोजन  करना  जिस  दिन  मनुष्य  को  आ  जाता  है, उसकी  सारी  समस्याओं  कष्टों  ,परेशानियों  का  अंत  हो  जाता  है
ध्यान  मात्र  एकाग्रता  नहीं  है  , जब  व्यक्ति  का  व्यक्तित्व  व्यवस्थित  ही  नहीं, पूर्णत:प्रकाशित  भी  होने  लगता  है  , तब  ध्यान  संपन्न  हुआ  माना  जाता  है
          जीवन  जीने  की  कला  के  नाम  से  जिस  विधा  को  पुकारा  जाता  है,  वह  यही  अध्यात्म  साधना  है,  जिसकी  ध्यान  एक  क्रिया  है

MESSAGE

'सच्चे  गुरु  के  लिये  सैंकड़ों  जन्म  समर्पित  किये  जा  सकते  हैं  ,सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है  जहां  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से  कभी  नहीं  पहुंच  सकता  है  '
           आंतरिक  चेतना  के  परिमार्जन  एवं  उसके  विकास  के  लिये  जिस  दवा  की  आवश्यकता  होती  है, वह  अत्यंत  दुर्लभ  एवं  विरल  होती  है , सामर्थ्यवान  गुरु  ही  ऐसी  दवा  देने  की  क्षमता  रखता  है

              "तुम्हारे  लक्ष्य  के  पास  पहुंचने  तक  बीच-बीच  में  असंख्य  बाधाएं  पैदा  होंगी, पर  न  तुम  घबराना  और  न  ही  हिम्मत  हारकर  कभी  अपने  प्रयत्न  छोड़ना ,परिस्थितियों  के  उतार-चढ़ाव  को  तुम  एक  निरीक्षक  की  द्रष्टि  से  देखोगे  तो  तुम्हारी  बुद्धि  यह  निर्णय  देती  रहेगी  कि  अब  तुम्हे  क्या  करना  चाहिये ?  घटनाओं  से  प्रभावित  हो  जाओगे  तो  तुम्हारी  संग्राम  की  शक्ति  कमजोर  हो  सकती  है  और  तुम्हारा  आत्मबल  गिर  सकता  है  , इसलिये  असफलताओं  और  अप्रिय  घटनाओं  को  एक  कर्मयोगी  की  द्रष्टि  से  देखना  चाहिये , मुझे  विश्वास  है  कि  तब  विजय  भी  तुम्ही  को  मिलेगी  , समय  चाहे  कितना  भी  भयंकर  क्यों  न  हो "

21 July 2013

PEARL

'हम वह प्रकाश -स्तम्भ बनेगें जो विकराल लहरों से भरे समुद्र में भटकते जहाजों को मार्ग दिखाते हैं | '
  विचार -क्रान्ति के अग्रदूत कुमारजीव का जन्म चौथी शताब्दी में कश्मीर के कूची इलाके में हुआ | पिता की मृत्यु के बाद माँ ने मेहनत -मजदूरी करके उनका पालन -पोषण किया |
उनकी शिक्षा के लिये वे उन्हें लेकर मीलों की कष्ट साध्य यात्रा करते आचार्य बंधुदत्त के आश्रम में जा पहुंची | वितस्ता नदी के किनारे बना यह आश्रम समूचे भारत में अपनी गुणवता की धाक जमाये था | आचार्य इसे
'मानव जीवन की प्रयोगशाला' कहते थे |
  जीवन विद्दा के इस आचार्य ने बालक की अनूठी प्रतिभा को पहचाना और गढ़ने में जुट गये | परिणामस्वरूप कुमारजीव आचार्य की अनोखी कलाकृति के रूप में सामने आया | अध्ययन समाप्ति के बाद जब आश्रम से विदा का समय आया तो गुरुदेव ने कहा --"इन दिनों व्यक्ति और समाज अनेक कठिनाइयों और चिन्ताओं से ग्रस्त हैं ,इसका कारण है -बुद्धि विभ्रम अथवा आस्था संकट | इस समस्या का एक ही समाधान है --सद्विचार ,अपने विवेक और कौशल से सद्ज्ञान का प्रसार कर लोकमानस को परिष्कृत करना | "
आचार्य ने कहा -अपने को किसी क्षेत्र विशेष में मत बांधना ,समूचा विश्व तुम्हारा घर है ,विचार -क्रान्ति के अग्रदूत बनो ,यदि मानव जाति को आस्था संकट से छुड़ाने में जुट सके तो समझना दक्षिणा दे दी | "
                  आचार्य के चरणों में प्रणाम कर कुमारजीव कर्म क्षेत्र की ओर बढ़ चले ---
    सद्ज्ञान के प्रसार के दौरान उनकी मित्रता काशगर राज्य के विद्वान् बुद्धियश से हुई | बुद्धियश ने कुमारजीव को काशगर में रुक जाने को कहा और कहा -"तुम्हारा विवाह सुंदर कन्या से करा देंगे ,यहां का राजा विद्वानों का बड़ा आदर करता है ,तुम्हे धन ,यश व सुख सब एक साथ मिलेगा | "
            कुमारजीव ने कहा -"मेरे लिये विद्दा का अर्थ है -इनसान की जिंदगी इनसान के लिये है ,इस बात का शिक्षण ,जीवन जीने की कला का बोध कराने की जिम्मेदारी गुरुदेव ने मेरे कन्धों पर डाली है इससे मैं रंच मात्र नहीं हट सकता | "
कुमारजीव का उत्तर सुन बुद्धियश उनकी महानता के आगे नतमस्तक हो गया ,उसने भी उन्हें सहयोग देने का वचन दिया |
अपने विद्दा विस्तार के क्रम में कुमारजीव चीन गये ,चीनी भाषा सीखी ,भारत के विचारपूर्ण साहित्य का चीनी भाषा में अनुवाद किया | लगभग सौ ग्रंथों के अनुवाद के साथ भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार हेतु मौलिक ग्रंथ रचे इसी बीच बुद्धियश भी अपने मित्र के पास आ पहुंचे ,दोनों मित्रों ने मिलकर अनेकोँ सहयोगी तैयार किये ,अनेक बुझे हुए दीपों को जलाया | भगवान तथागत के आदर्शों के अनुरूप सादा जीवन जीते हुए जीवन के अंतिम क्षण तक क्रियाशील रहे | उनका एक ही संदेश था --जीवन विद्दा में निष्णात ही विद्दा प्रसार कर सकते हैं | उनके इस संदेश को सुन अनेकोँ सचल प्रकाश दीप बने | 

WISDOM

'सुख के स्थायित्व के लिये यह कहा जा सकता है कि उसे धर्म से उत्पन्न और धर्माभिरक्षित होना चाहिये | '
        अधर्म से प्राप्त सुख ,  अन्याय या अत्याचार का सुख
      चोरी या कमजोरी से पाये हुए धन का सुख ,
     अपने से निर्बलों ,असहायों को सताकर प्राप्त किया गया सुख ,
      न्याय विरुद्ध अधिकार का सुख
       धर्म और नीति के विरुद्ध विषय -भोग का सुख -कभी स्थायी नहीं होता |
ऐसा सुख परिणाम में विष से भी अधिक घातक होता है | 

20 July 2013

AWAKENING

'मनुष्य भटका हुआ देवता है ',यह सत्य है पर सत्य यह भी है कि जब वह अंतस की चिनगारी जाग जाती है तो व्यक्ति का गंतव्य पुन:देवत्व की उपलब्धि व पूर्णता की प्राप्ति बन जाता है |
            सूर ,तुलसी ,आम्रपाली ,अंगुलिमाल अजामिल ,विल्वमंगल ,अशोक आदि आरम्भ से वैसे न थे ,जैसे कि विवेक का उदय होने के बाद हो गये | नये सिरे से अपनायी गई श्रेष्ठता इतनी समर्थ होती है कि उसके दबाव से पिछले दिनों बरती गई अवांछनीयता को दबाया जा सके |
       दिव्य जीवन जीने के लिये संकल्प उभारनेऔर साहस करने के लिये समर्पित लोगों में से किसी को भी मझधार में डूबना नहीं पड़ा |
        आचार्य इन्द्रदत्त के स्नातकों में कपिल गौर वर्ण ,उन्नत ललाट ,अति सुंदर थे | एक दिन जब नगर सेठ प्रसेनजित के द्वार पर कपिल ने गुहार लगाई -"भिक्षां देहि "-तब नगर सेठ की अति सुंदर परिचारिका मधूलिका भिक्षा लेकर आई ,यह उन दोनों के जीवन का बहुत ही मार्मिक क्षण था | भिक्षा झोली में पड़ी रही ,कितने क्षण बीत गये कुछ पता ही न चला |
    इसके बाद कपिल को जब भी समय मिलता वही द्वार --और तब प्रारंभ हुई पतन की करुण कथा |
      वसंत पर्व समीप था ,मधूलिका ने भिक्षु कपिल से सौ स्वर्ण मुद्राओं की याचना की और युक्ति भी बताई -"आप श्रावस्ती नरेश के पास चलें जायें ,वे अप्रतिम दानी हैं ,सौ स्वर्ण मुद्राएँ उनके लिये बड़ी बात नहीं है |
             कामांध कपिल अपना विवेक खो चुके थे रात्रि में ही राजप्रसाद में प्रवेश करना चाहा | प्रहरी ने प्रताड़ित किया और दस्यु की आशंका से रात भर बंदी गृह में रखा | दूसरे दिन वे बंदी के वेश में राजा के सम्मुख प्रस्तुत हुए |
       कपिल ने अपना आत्म-सम्मान ,शील खोया ,परन्तु उन्हें उबारने वाला 'सत्य 'अभी उनके पास था | उन्होंने महाराज को सारी गाथा स्पष्ट बता दी | सम्राट कपिल की निश्छलता पर प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा -"युवक !अब तुम क्या चाहते हो ,जो मांगोगे मिलेगा | "कपिल ने सोचा सौ क्यों ,हजार ,नहीं एक लाख ,क्यों न ऐसा कुछ मांगा जाये जिससे मधूलिका के साथ आजीवन सुख से रहा जाये | कपिल ने कहा -"आपका सम्पूर्ण राज्य चाहिये | "समस्त सभासद स्तब्ध रह गये ,किन्तु श्रावस्ती नरेश विचलित नहीं हुए | वे बोले -"तथास्तु !कपिल!मैं निस्संतान हूँ ,राज्य भोग ने मेरी आत्मिक शक्तियों को जर्जर कर दिया था ,मैं चाहता ही था कि कोई सुयोग्य पात्र मिल जाये तो मैं इस जंजाल से मुक्त होकर आत्म कल्याण का मार्ग खोजूँ -तुमने आज मेरा भार उतार दिया ,आज से श्रावस्ती तुम्हारी हुई | "
राजा की उदारता से स्तब्ध कपिल की अन्तर चेतना जाग्रत हुई -क्या आत्म शांति ,आत्म कल्याण इतना महान है जिस पर राज्य न्योछावर किया जा सके | कपिल संभले और बोले -"नहीं !नहीं !क्षमा करें राजन !मैं अपने उसी श्रेय पथ की ओर प्रस्थान करूंगा जिसका निर्देश मेरे गुरुदेव ने दिया था | "क्षण भर में लोगों ने देखा वे राजमहल से दूर -बहुत दूर -अति दूर जा रहें हैं ,पतन से उत्थान की ओर ,श्रेय पथ पर जा रहें हैं
        

19 July 2013

Labour judiciously and continuously applied becomes genius .

'जीवन की सार्थकता कर्तव्य कर्म का सही ढंग से निर्वाह करने में है | जो कर्तव्य हमें मिला है ,जिसे हमें करने को दिया गया है ,उसे सही एवं श्रेष्ठ रूप में कर लेने में ही बुद्धिमता है |
          धनवन्तरि भिषगाचार्य के अंतिम वर्ष में शोध कर रहे थे | औषधि शास्त्र का उन्होंने ऐसा अध्ययन किया था कि स्वयं कुलाधिपति भी कई बार उनसे आवश्यक जानकारियां उपलब्ध किया करते थे | आयुर्वेद का ऐसा गहन अध्ययन इतिहास में शायद ही कोई और कर सका हो | एक -एक ऋचा पर उन्होंने कितना श्रम किया ,यह तो वह स्वयं ही जानते थे |
      पर आयुर्वेद का निष्णात धनवन्तरि कई दिन से गुरुकुल की सीमा से हिमालय तक भ्रमण कर रहें हैं ,एक -एक जड़ी एक -एक बूटी का प्रयोग कर डाला उन्होंने | पर एक भी तो ऐसी पत्ती नहीं निकली जो उनकी पीठ पर हो गये फोड़े के घाव को ठीक कर देती |
    रात -दिन की लगातार खोज के उपरान्त भी सफलता नहीं मिली अत:पराजित सैनिक की भांति हारे -थके धनवन्तरि गुरुकुल की ओर लौट चले | वहां तक पहुँचते -पहुँचते भी हजारों बूटियों का प्रयोग करके देख लिया किंतु उन्हें न तो कोई जड़ी -बूटी मिली और न ही फोड़ा ठीक हुआ
   सूखा मुख ,रूखे मुरझाये बाल -शिष्य की ऐसी विपन्न  मुद्रा देख गुरु की आंखे छलछला आईं | उन्होंने कहा -"तात !बड़ा कष्ट पाया तुमने | "आचार्य प्रवर ने बड़ी करुणा -बड़े ममत्व के साथ उनका वस्त्र हटा कर देखा ,पीठ का घाव अभी घटा नहीं था ,कुछ बढ़ ही गया था | आचार्य ने कहा -"वत्स !आओ मेरे साथ चलो | तुम्हारा उपचार तो मेरे पास है | "
आश्रम से थोड़ी ही दूर पर एक औषधि का पौधा लगा था ,गुरु ने उसे तोड़ा और पीसकर उसका लेप उनकी पीठ पर लगाते हुए कहा -"वत्स !अब तुम्हारा घाव दो दिन में अच्छा हो जायेगा | "
   निराश और दुखी धनवन्तरि ने कहा -"गुरुदेव !बूटी विद्दालय के इतने समीप ही थी ,आप उसे जानते भी थे | फिर व्यर्थ ही मुझे इतना क्यों दौड़ाया ?इतना कष्ट देकर आपने क्या पाया ?"
मौन हो ऋषि ने करुण नेत्रों से उनकी ओर देखा ,वह तो उनका अंत:करण था जिसने आप ही उत्तर दे दिया ---
    "धनवन्तरि !इतनी कठिन साधना नहीं करते तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ ,वह कहां से मिल पाता ?"