प्लेटो अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति से बहुत दुखी व असंतुष्ट थे | जब किसी ने उनके दुःख और असंतोष का कारण पूछा तो उन्होंने कहा -- " महात्मा सुकरात जैसे महान संत और विचारक की हत्या करने वाले समाज में रहना , उसी शासन-सत्ता की अधीनता स्वीकार करते हुए जीना क्या कम दु:खद है ? " प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा --" क्या इसका कोई समाधान नहीं है ? " तब उन्होंने उत्तर दिया --" समाधान तो है , लेकिन इसके लिये धार्मिक रीतियों , मान्यताओं एवं रिवाजों को वैज्ञानिक विवेक से परखना होगा | एक ऐसी विचार-प्रणाली का , एक ऐसे दर्शन का प्रवर्तन करना होगा , जिसमे धर्म एवं विज्ञान , दोनों का समन्वय हो | जब किसी युग में ऐसा होगा , तब कभी किसी सुकरात को विषपान न करना पड़ेगा | "
4 November 2013
कर्मयोग
मिथिलानगरी के महानंद का जीवन कठोर तप में बीता | उन्होंने कई सिद्धियाँ अर्जित कर ली | असाधारण क्षमताओं के धनी मुनि महानंद की ख्याति चंद्रमा के प्रकाश की तरह फैलने लगी | अगणित व्यक्ति उनके आश्रम में पहुँचते और उन्हें उनकी सिद्धियों का लाभ भी मिलता , वे आश्रम की सम्रद्धि में वृद्धि भी करते लेकिन मुनि महानंद की अंदर की शांति विलुप्त हो गई | तृष्णा में उलझे मुनि अंदर से परेशान , दुखी रहने लगे | एक रात इसी दुःख में वे अकेले जंगल होते हुए नदी किनारे एक गाँव में पहुंचे | वहां उन्हें किसी के कराहने का स्वर सुनाई दिया | एक व्यक्ति बीमार था | कोई उसकी देख-रेख करने वाला नहीं था | उन्होंने उसकी रात भर सेवा की | कपड़े
बदले , जब पीड़ा से मुक्त होने पर उसे नींद आ गई , तब वे आश्रम लौट आये उस दिन न वे संध्या कर पाए , न प्राणायाम , न ही जप-तप | लेकिन उन्हें अंत:करण में अभूतपूर्व शांति अनुभव हो रही थी | आज उन्होंने सेवा को , कर्मयोग की साधना को सच्ची सिद्धिदात्री आराधना के रूप में जाना |
मनुष्य को अपनी बुद्धि की शक्ति का उपयोग आजीविका के साथ-साथ सेवा के लिये , परोपकार के लिये करना चाहिये | इस नियम का पालन सारी दुनिया करने लगे तो सहज ही सब लोग बराबर हो जाएँ , कोई भूखा न रहे और जगत बहुत से पापों से बच जाये | इस नियम का पालन करने वाले पर इसका चमत्कारी असर होता है , क्योंकि उसे परम शांति मिलती है , उसकी सेवाशक्ति बढ़ती है और उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है |
3 November 2013
DEEPAVALI
प्रकाश और संतुलन का प्रेरणा पर्व है -दीपावली |
दीपावली लक्ष्मी का पर्व माना गया है | लक्ष्मी से तात्पर्य है - अर्थ-धन | लक्ष्मी जीवन-साधना का , विकास की ओर बढ़ने का सहारा है | हम लक्ष्मी को माँ समझकर उसे अपने जीवन को विकसित , सामर्थ्यवान बनाने के लिये उपयोग करें , न कि भोग-विलास तथा ऐशोआराम के लिये |
आवश्यकतानुसार खर्च करना , उपयोगी कार्यों में लगाना , नीति , श्रम और न्याय से धनोपार्जन करना , बजट बनाकर उसकी क्षमता के अनुसार खर्च करना , आर्थिक क्षेत्र में संतुलन तथा व्यवस्था कायम रखना - यह सब दीपावली पर्व का संदेश है |
यदि हमारे जीवन का प्रत्येक कोना भावना और साधना की परम ज्योति से ज्योतित हो और हमारा प्रत्येक आचरण कर्म और आदर्श से मंडित हो तो हमारा जीवन न केवल प्रकाश से पूर्ण होगा , बल्कि हम लक्ष्मी की वैभव- विभूति , उसकी श्रीसंपदा से भी लाभान्वित होगें |
इस पावन-वेला में दीपों की पंक्तियां कुछ इस तरह जगमगाएं कि विश्व में सद्बुद्धि का उजाला बढ़े | सद्बुद्धि का यह उजाला ही सम्रद्धि को सुरक्षित और विकसित करने का आधार है |
सद्ज्ञान और सद्बुद्धि के साथ सम्रद्धि का समन्वय ही इस पर्व की प्रेरणा है | हमारे जीवन में यह चरितार्थ हो , तभी दीपावली मनाने की सार्थकता है |
लक्ष्मी कमल पर आसीन है | कमल विवेक का प्रतीक है | पंक से उत्पन्न होकर भी पंक रहित , स्वच्छ , पावन , सुगंधित | संपति तभी वरेण्य है , जब वह पवित्रता पर आधारित हो |
दीपावली लक्ष्मी का पर्व माना गया है | लक्ष्मी से तात्पर्य है - अर्थ-धन | लक्ष्मी जीवन-साधना का , विकास की ओर बढ़ने का सहारा है | हम लक्ष्मी को माँ समझकर उसे अपने जीवन को विकसित , सामर्थ्यवान बनाने के लिये उपयोग करें , न कि भोग-विलास तथा ऐशोआराम के लिये |
आवश्यकतानुसार खर्च करना , उपयोगी कार्यों में लगाना , नीति , श्रम और न्याय से धनोपार्जन करना , बजट बनाकर उसकी क्षमता के अनुसार खर्च करना , आर्थिक क्षेत्र में संतुलन तथा व्यवस्था कायम रखना - यह सब दीपावली पर्व का संदेश है |
यदि हमारे जीवन का प्रत्येक कोना भावना और साधना की परम ज्योति से ज्योतित हो और हमारा प्रत्येक आचरण कर्म और आदर्श से मंडित हो तो हमारा जीवन न केवल प्रकाश से पूर्ण होगा , बल्कि हम लक्ष्मी की वैभव- विभूति , उसकी श्रीसंपदा से भी लाभान्वित होगें |
इस पावन-वेला में दीपों की पंक्तियां कुछ इस तरह जगमगाएं कि विश्व में सद्बुद्धि का उजाला बढ़े | सद्बुद्धि का यह उजाला ही सम्रद्धि को सुरक्षित और विकसित करने का आधार है |
सद्ज्ञान और सद्बुद्धि के साथ सम्रद्धि का समन्वय ही इस पर्व की प्रेरणा है | हमारे जीवन में यह चरितार्थ हो , तभी दीपावली मनाने की सार्थकता है |
लक्ष्मी कमल पर आसीन है | कमल विवेक का प्रतीक है | पंक से उत्पन्न होकर भी पंक रहित , स्वच्छ , पावन , सुगंधित | संपति तभी वरेण्य है , जब वह पवित्रता पर आधारित हो |
1 November 2013
WISDOM
बगदाद के संत जुन्नैद अपने एक शिष्य को औरों से अधिक प्यार करते थे | शिष्यों ने शिकायत की कि एक के साथ पक्षपात क्यों ? " संत चुप हो गये | कुछ दिन बाद उनने सभी शिष्यों को बुलाया और एक कीड़ा हाथ में थमाते हुए कहा -- " किसी ऐसे स्थान पर इसे मार देना जहाँ कोई न देखता हो | " पांच शिष्य तो ये काम कर आये , पर वह प्रिय शिष्य उस जीव को ज्यों का त्यों वापस ले आया और बोला -- " ऐसी कोई जगह नहीं , जहाँ अल्लाह न देखता हो | "
जुन्नैद ने कहा -- " तुम सभी में एक यही है , जो ईमान और अल्लाह को पहचानता है | ऐसे ही मेरे शिष्यों पर खुदा की रहमत बरसती है | "
ईश्वर विश्वासी से कभी पापकर्म हो ही नहीं सकता |
जुन्नैद ने कहा -- " तुम सभी में एक यही है , जो ईमान और अल्लाह को पहचानता है | ऐसे ही मेरे शिष्यों पर खुदा की रहमत बरसती है | "
ईश्वर विश्वासी से कभी पापकर्म हो ही नहीं सकता |
समर्पण
महाकाश्यप भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे | वह जब पहली बार भगवान बुद्ध से मिलने पहुँचे तो भगवान के उनके मस्तक पर हाथ रख देने से ही उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हो गई | यह देखकर आनंद को बड़ा आश्चर्य हुआ | उन्होंने बुद्ध से प्रश्न किया -- " भगवन ! यह व्यक्ति आज आया और आपके क्षणिक स्पर्श से मुक्त हो गया और मैं सदा आपके साथ रहता हूँ तब भी उस अवस्था को प्राप्त न कर सका , ऐसा क्यों ? "
बुद्ध ने उत्तर दिया -- " आनंद ! तुम जब मुझसे पहली बार मिले तो तुमने तीन शर्तें रखीं कि हमेशा साथ रहोगे , सदा मेरे निकट सोओगे और जिसको भी मुझसे मिलाना चाहोगे , उससे मुझे मिलना पड़ेगा | तुम्हारा समर्पण सशर्त समर्पण था और महाकाश्यप का समर्पण बिना किन्ही अपेक्षाओं के था | समर्पण शर्तों के आधार पर नहीं होता | जिस दिन तुम्हारी अपेक्षाएं छूट जायेंगी , उस दिन तुम भी उसी शून्यता को उपलब्ध हो जाओगे | " आनंद को प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था |
बुद्ध ने उत्तर दिया -- " आनंद ! तुम जब मुझसे पहली बार मिले तो तुमने तीन शर्तें रखीं कि हमेशा साथ रहोगे , सदा मेरे निकट सोओगे और जिसको भी मुझसे मिलाना चाहोगे , उससे मुझे मिलना पड़ेगा | तुम्हारा समर्पण सशर्त समर्पण था और महाकाश्यप का समर्पण बिना किन्ही अपेक्षाओं के था | समर्पण शर्तों के आधार पर नहीं होता | जिस दिन तुम्हारी अपेक्षाएं छूट जायेंगी , उस दिन तुम भी उसी शून्यता को उपलब्ध हो जाओगे | " आनंद को प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था |
30 October 2013
GREATNESS
' जो स्वयं के तत्व को जान लेता है , परम तत्व को जानना उसी से संभव है | ऐसे महान व्यक्तित्व ईश्वर के सृजन संदेश को प्रसारित करने के लिये ईश दूत की भूमिका निभाते हैं | '
बुद्ध को आत्म-बोध हुआ | कठोर तप के बाद प्राप्त इस उपलब्धि से वे निर्वाण मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे | पर उनका लक्ष्य था -- अनाचार- कुरीति से भरे समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जन - मानस का परिष्कार | आत्मबोधजन्य ईश्वरीय संदेश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन - जन तक पहुँचकर विचार - क्रांति कर सकने में सफल हुए |
प्रव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती है | भिक्षुकगण सतत चलते रहते थे व बुद्ध के साथ संघं , धर्मं शरणम् गच्छामि का नारा लगाते , भारतवर्ष ही नहीं , सारे विश्व में उनका संदेश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके |
सिद्धार्थ के अंदर विश्वकल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया |
बुद्ध को आत्म-बोध हुआ | कठोर तप के बाद प्राप्त इस उपलब्धि से वे निर्वाण मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे | पर उनका लक्ष्य था -- अनाचार- कुरीति से भरे समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जन - मानस का परिष्कार | आत्मबोधजन्य ईश्वरीय संदेश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन - जन तक पहुँचकर विचार - क्रांति कर सकने में सफल हुए |
प्रव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती है | भिक्षुकगण सतत चलते रहते थे व बुद्ध के साथ संघं , धर्मं शरणम् गच्छामि का नारा लगाते , भारतवर्ष ही नहीं , सारे विश्व में उनका संदेश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके |
सिद्धार्थ के अंदर विश्वकल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया |
29 October 2013
WISDOM
'मानव जीवन एक बहुमूल्य निधि है |यह सौभाग्य हमें इसलिए मिला है की हम दुनिया के सौन्दर्य का रसास्वादन करते हुए इस तरह जियें जिसमे पुष्प जैसी मृदुलता , चन्दन जैसी सुगंध और दीपक जैसी रोशनी भरी पड़ी हो | '
जीवन कला जिसे आती है , वह कलाकार अपने पास के स्वल्प साधनों से ही महान अभिव्यंजना प्रस्तुत करते हैं |
स्वामी विवेकानंद प्रतिकूलताओं से घिरे थे | साधनसम्पन्नता में जन्मे नरेंद्र के घर कई घटनाएँ घटीं जो किसी का भी मानसिक संतुलन गड़बड़ा सकती थीं , पर उस स्थिति में भी वे न
रामकृष्ण को भूले , न वैराग्य को , न ठाकुर की कही एक-एक बात को |
एक सुंदर सी राजकुमारी विद्दार्थी दिनों में उनके साथ पढ़ती थी | वह युवा नरेंद्र व उनकी विद्वता पर आसक्त थी | उसने जब कष्टों के विषय में सुना तो प्रस्ताव भेजा - " हमसे शादी कर लो , राज्य का उत्तराधिकार आपको ही मिलेगा | आप बैरिस्टर बन जायेंगे | " विवेकानंद ने जो जवाब लिखा , वह हर युवा के लिये जानने योग्य है -- " मैं हाड़-मांस के भोगों के लिये नहीं आया | यह मेरी प्रकृति नहीं है | मैं अपनी आत्मा व सत्य के साथ कभी समझौता नहीं कर सकता ( With truth no compromise ) " विवेकानंद संन्यस्त हुए | फिर राष्ट्र की परिव्रज्या कर अमेरिका चले गये |
आध्यात्मिकता के मार्ग पर बाधाएं आती हैं , पर उनसे परेशान न होकर चलते चले जाना ही
महानता है |
जीवन कला जिसे आती है , वह कलाकार अपने पास के स्वल्प साधनों से ही महान अभिव्यंजना प्रस्तुत करते हैं |
स्वामी विवेकानंद प्रतिकूलताओं से घिरे थे | साधनसम्पन्नता में जन्मे नरेंद्र के घर कई घटनाएँ घटीं जो किसी का भी मानसिक संतुलन गड़बड़ा सकती थीं , पर उस स्थिति में भी वे न
रामकृष्ण को भूले , न वैराग्य को , न ठाकुर की कही एक-एक बात को |
एक सुंदर सी राजकुमारी विद्दार्थी दिनों में उनके साथ पढ़ती थी | वह युवा नरेंद्र व उनकी विद्वता पर आसक्त थी | उसने जब कष्टों के विषय में सुना तो प्रस्ताव भेजा - " हमसे शादी कर लो , राज्य का उत्तराधिकार आपको ही मिलेगा | आप बैरिस्टर बन जायेंगे | " विवेकानंद ने जो जवाब लिखा , वह हर युवा के लिये जानने योग्य है -- " मैं हाड़-मांस के भोगों के लिये नहीं आया | यह मेरी प्रकृति नहीं है | मैं अपनी आत्मा व सत्य के साथ कभी समझौता नहीं कर सकता ( With truth no compromise ) " विवेकानंद संन्यस्त हुए | फिर राष्ट्र की परिव्रज्या कर अमेरिका चले गये |
आध्यात्मिकता के मार्ग पर बाधाएं आती हैं , पर उनसे परेशान न होकर चलते चले जाना ही
महानता है |
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