' मंदिर को समुन्नत और स्वावलंबी संस्था का सफल रूप प्रदान कर स्वामी सोमदत्त गिरि ने यह सिद्ध कर दिया कि साधुओं को यदि सामाजिक जीवन में अपनी प्रतिष्ठा और उत्तरदायित्व के पालन की योग्यता बनाये रखनी है तो उन्हें स्वावलंबी, कर्मठ और परिश्रमी होना चाहिए | जो औरों को मार्ग दिखाता है, औरों का कल्याण करता है उसे भगवान का भक्त होने के साथ कर्मयोगी भी होना चाहिये । ' सोमदत्त गिरि के गुरु जिस शिव मंदिर में पूजा करते थे, उस मंदिर व उनकी आजीविका के लिए गांव वालों ने थोड़ी जमीन दे दी थी , वे अपने भोजन व आजीविका के लिए किसी पर निर्भर रहना नहीं चाहते थे। उन्होंने दिन में 8 घंटे लगातार काम करके उस जमीन को साफ किया, सूखी लकड़ी बेचकर गाय खरीदी, दूध से अपने भोजन का काम चलाते । उन्होंने मेहनत करके भूमि को कृषि -योग्य बना लिया । भूमि पर तरह -तरह की सब्जियां उगाईं , उन्हें बेचकर बुवाई के समय मैक्सिकन गेहूं का बीज लाकर बोया , उत्तम खाद और समय पर पानी से बहुत अच्छी फसल तैयर हुई । वे शाम के समय कीर्तन -भजन करते और दिन मे धूनी -कमण्डल के स्थान पर खुरपी -फावड़ा लेकर परिश्रम कर एक आदर्श प्रस्तुत किया ।
20 April 2015
18 April 2015
धर्म पर आस्था रख्ने वाले, दया न छोड़ने वाले----- महात्मा रिचे
नावेल्ड ( अलवानिया ) का एक छोटा सा गांव है, वहां के मिशन स्कूल में एक छोटा बालक न्यूनरिचे भर्ती हुआ । एक दिन धर्म -शिक्षा के घंटे में पादरी प्रभु यीशु की सहृदयता और शिक्षा की विवेचना कर रहे थे । वे बता रहे थे ---- " यीशु ने दया और करुणा की सरिता बहाई और अपने अनुयायियों को हर प्राणी के साथ दया का सहृदय व्यवहार करने का उपदेश दिया । सच्चे ईसाई को ऐसा ही दयावान होना चाहिए । वह कई दिन तक लगातार यह सोचता रहा ----- क्या हम सच्चे ईसाई नही हैं ?
बालक ने कई दिन तक अपने घर में मांस के लिए छोटे जानवरों और पक्षियों का वध होते देखा था , इन तड़पते हुए प्राणियों को देखकर बालक घर के बाहर चला गया और सुबक -सुबक कर घण्टों रोता रहा । अपनी वेदना उसने दूसरे दिन शिक्षक पादरी के सामने रखी --- और पूछा , क्या मांस के लिए पशु -पक्षियों की हत्या करना ईसाई धर्म के और प्रभु यीशु की शिक्षाओं के अनुरूप है ?
पादरी स्वयं मांस खाते थे , वहां घर -घर में मांस खाया जाता था इसलिए वे कुछ ना कह सके ।
बालक रिचे ने निश्चय किया कि वह सच्चा ईसाई बनेगा , उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया । उनसे प्रेरित होकर उनकी माँ व दोनों बहनो ने भी मांस खाना छोड़ दिया | धीरे -धीरे यह विचार जड़ ज़माने लगा कि जो दयालु होगा वह मांसाहार कैसे कर सकेगा ?
रिचे बड़े होकर पादरी बने , उन्होंने घर -घर घूमकर सच्ची धार्मिकता का प्रचार किया , ' दयालु धर्म प्रेमियों की संस्था ' नामक संग़ठन ने जो लोक शिक्षण किया , उससे प्रभावित होकर लाखों व्यक्तियों ने मांसाहार छोड़ा और धार्मिकता अपनाई ।
बालक ने कई दिन तक अपने घर में मांस के लिए छोटे जानवरों और पक्षियों का वध होते देखा था , इन तड़पते हुए प्राणियों को देखकर बालक घर के बाहर चला गया और सुबक -सुबक कर घण्टों रोता रहा । अपनी वेदना उसने दूसरे दिन शिक्षक पादरी के सामने रखी --- और पूछा , क्या मांस के लिए पशु -पक्षियों की हत्या करना ईसाई धर्म के और प्रभु यीशु की शिक्षाओं के अनुरूप है ?
पादरी स्वयं मांस खाते थे , वहां घर -घर में मांस खाया जाता था इसलिए वे कुछ ना कह सके ।
बालक रिचे ने निश्चय किया कि वह सच्चा ईसाई बनेगा , उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया । उनसे प्रेरित होकर उनकी माँ व दोनों बहनो ने भी मांस खाना छोड़ दिया | धीरे -धीरे यह विचार जड़ ज़माने लगा कि जो दयालु होगा वह मांसाहार कैसे कर सकेगा ?
रिचे बड़े होकर पादरी बने , उन्होंने घर -घर घूमकर सच्ची धार्मिकता का प्रचार किया , ' दयालु धर्म प्रेमियों की संस्था ' नामक संग़ठन ने जो लोक शिक्षण किया , उससे प्रभावित होकर लाखों व्यक्तियों ने मांसाहार छोड़ा और धार्मिकता अपनाई ।
ईसा के सच्चे शिष्य और सच्चे पुजारी------- वेरियर एल्विन
किसी और देश का विलायती साहब एकदम ग्रामीण--- आदिवासियों जैसा जीवन बिता सकेगा, ऐसी कल्पना करना कठिन है परन्तु एल्विन ने यह सब कर दिखाया और सिद्ध कर दिया कि जिनके मन में सेवा की लगन है वे हर वातावरण में साँस ले सकते हैं । किसी भी प्रकार के जीवन में अपने आपको एक रस कर सकते हैं ।
एल्विन इंग्लैंड के रहने वाले थे और ' क्रिस्त सेवा संघ '---- नामक संस्था के अंतर्गत ईसा की पवित्र शिक्षाओं के प्रसार हेतु भारत आये थे । यहां आकर उन्होंने आदिवासियों की सेवा का मार्ग अपनाया । एल्विन को इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा श्री जमनालाल बजाज ने दी थी , उन्होंने महात्मा गांधी से भी आशीर्वाद लिया और अमरकंटक से दस मील दूर करंजिया में अपने साथियों के साथ मिलकर एक ' गोंड - सेवा मंडल ' की स्थापना की । वहां उन्होंने आदिवासियों में शिक्षा प्रचार के लिए स्कूल खोला , एक अस्पताल भी खोला जिससे वे आदिवासियों के स्नेह पात्र बन गये ।
करंजिया में एल्विन पूरे आदिवासी बनकर रहे --- आदिवासियों की तरह पोशाक , उन्ही की तरह नंगे पैर , वहीँ के अन्दाज में बात करने का प्रयास । एक गोंड कन्या ' लीला ' को उनने अपना जीवन साथी चुना । आदिवासियों की सेवा के साथ-साथ एल्विन एक साहित्यकार के रूप में सामने आये | उन्होंने कुल 26 किताबें लिखीं और एक-एक किताब पर वर्षों मेहनत की । आदिवासियों के रहन-सहन, विश्वास, परंपराओं और कार्यशैलियों की जितनी जानकारी उनकी पुस्तकों से मिल सकती है, अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। चार वर्ष करंजिया में रहने के बाद एल्विन पारमगढ़ आये, वहां भी स्कूल व अस्पताल खोला । इसके बाद वे बापू के पास साबरमती आश्रम आ गये । जब बम्बई में गांधीजी की गिरफ्तारी हुई तो एल्विन ही आश्रम की सारी व्यवस्था सम्हाल ली
बाद में व फिर से करंजिया आए और केवल गोंडो की ही नहीं, बेंगा, मुरिया नागा आदि की भी सेवा करते रहे ।
एल्विन इंग्लैंड के रहने वाले थे और ' क्रिस्त सेवा संघ '---- नामक संस्था के अंतर्गत ईसा की पवित्र शिक्षाओं के प्रसार हेतु भारत आये थे । यहां आकर उन्होंने आदिवासियों की सेवा का मार्ग अपनाया । एल्विन को इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा श्री जमनालाल बजाज ने दी थी , उन्होंने महात्मा गांधी से भी आशीर्वाद लिया और अमरकंटक से दस मील दूर करंजिया में अपने साथियों के साथ मिलकर एक ' गोंड - सेवा मंडल ' की स्थापना की । वहां उन्होंने आदिवासियों में शिक्षा प्रचार के लिए स्कूल खोला , एक अस्पताल भी खोला जिससे वे आदिवासियों के स्नेह पात्र बन गये ।
करंजिया में एल्विन पूरे आदिवासी बनकर रहे --- आदिवासियों की तरह पोशाक , उन्ही की तरह नंगे पैर , वहीँ के अन्दाज में बात करने का प्रयास । एक गोंड कन्या ' लीला ' को उनने अपना जीवन साथी चुना । आदिवासियों की सेवा के साथ-साथ एल्विन एक साहित्यकार के रूप में सामने आये | उन्होंने कुल 26 किताबें लिखीं और एक-एक किताब पर वर्षों मेहनत की । आदिवासियों के रहन-सहन, विश्वास, परंपराओं और कार्यशैलियों की जितनी जानकारी उनकी पुस्तकों से मिल सकती है, अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। चार वर्ष करंजिया में रहने के बाद एल्विन पारमगढ़ आये, वहां भी स्कूल व अस्पताल खोला । इसके बाद वे बापू के पास साबरमती आश्रम आ गये । जब बम्बई में गांधीजी की गिरफ्तारी हुई तो एल्विन ही आश्रम की सारी व्यवस्था सम्हाल ली
बाद में व फिर से करंजिया आए और केवल गोंडो की ही नहीं, बेंगा, मुरिया नागा आदि की भी सेवा करते रहे ।
16 April 2015
ज्ञान और कर्म के प्रतीक------ स्वामी मुक्तानन्द जी
महाराष्ट्र में ठाना जिले में गणेशपुरी नामक ग्राम में कुटिया बनाकर रहने वाले स्वामी मुक्तानन्द महाराज ज्ञान एवं विद्वता के साथ लोक-सेवा की कर्मठ भावना से ओत-प्रोत थे | स्वामीजी ने अपनी कुटिया के आस-पास की बंजर भूमि स्वयं अपने हाथों से खोदकर उसमे खाद आदि डालकर इतनी उपजाऊ बना ली थी कि आस-पास के गांव वाले प्रतिदिन उसे देखने आया करते थे ।
मुख से प्रभु का अखण्ड नाम स्मरण करते हुए वे पेड़-पौधों को खाद-पानी दिया करते थे मानो ज्ञान-भक्ति और कर्म की त्रिवेणी संगम में ही वे स्नान कर रहे हों । बिलकुल बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर उसे एक आदर्श बाग बनाना उनकी ईश्वर भक्ति का सशक्त प्रतीक है ।
कुटिया के चारों ओर लगभग एक एकड़ जमीन में उन्होंने पपीते, केले, नीबू, अमरुद आदि फल और विभिन्न साग-सब्जी की इतनी सुंदर बगिया बनाई थी कि देखने वाले स्वामीजी की परिश्रमशीलता कि तारीफ करते नहीं थकते | स्वामी मुक्तानन्द जी अपनी आध्यात्मिक साधना में संलग्न रहते हुए भी कृषि कार्य में नियमित रूप से प्रतिदिन चार घंटे श्रमदान करते थे । उनके बाग में चार किलों के पपीते, तीन फुट लम्बी लौकी और एक फुट के केले देखकर लाग आश्चर्यचकित रह जाते ।
वे कहते थे---- " जप-तप की अपेक्षा अन्न और फलों का उत्पादन करना आज परमेश्वर की महान सेवा भक्ति है । जितना आनन्द मुझे जप-और ध्यान में आता है उससे अधिक आनंद मुझे मिट्टी गोड़ने, पौधे लगाने और उन्हें खाद-पानी देने में आता है । "
मुख से प्रभु का अखण्ड नाम स्मरण करते हुए वे पेड़-पौधों को खाद-पानी दिया करते थे मानो ज्ञान-भक्ति और कर्म की त्रिवेणी संगम में ही वे स्नान कर रहे हों । बिलकुल बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर उसे एक आदर्श बाग बनाना उनकी ईश्वर भक्ति का सशक्त प्रतीक है ।
कुटिया के चारों ओर लगभग एक एकड़ जमीन में उन्होंने पपीते, केले, नीबू, अमरुद आदि फल और विभिन्न साग-सब्जी की इतनी सुंदर बगिया बनाई थी कि देखने वाले स्वामीजी की परिश्रमशीलता कि तारीफ करते नहीं थकते | स्वामी मुक्तानन्द जी अपनी आध्यात्मिक साधना में संलग्न रहते हुए भी कृषि कार्य में नियमित रूप से प्रतिदिन चार घंटे श्रमदान करते थे । उनके बाग में चार किलों के पपीते, तीन फुट लम्बी लौकी और एक फुट के केले देखकर लाग आश्चर्यचकित रह जाते ।
वे कहते थे---- " जप-तप की अपेक्षा अन्न और फलों का उत्पादन करना आज परमेश्वर की महान सेवा भक्ति है । जितना आनन्द मुझे जप-और ध्यान में आता है उससे अधिक आनंद मुझे मिट्टी गोड़ने, पौधे लगाने और उन्हें खाद-पानी देने में आता है । "
15 April 2015
सत्य के लिए लड़ने वाले---- वाल्टेयर
84 वर्ष की आयु में जब वाल्टेयर की मृत्यु हुई तो उनका अंतिम संस्कार कराने के लिए पेरिस का कोई भी पादरी तैयार नहीं था क्योंकि वाल्टेयर ने अपनी लेखनी से हमेशा धर्मान्ध पुरोहितों, शोषण, अत्याचार और धार्मिक लूट पर जमकर प्रहार किया था इसलिए उनके शव को नगर से बाहर एक छोटे से गाँव में दफना दिया ।
वाल्टेयर ने अपने जीवन में लगभग 100 महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे, उन सभी मे उन्होंने धर्म के वास्तविक रूप का प्रतिपादन किया । उनकी लेखनी ने न केवल धार्मिक वरन राजनैतिक और आर्थिक क्रांति के लिए भूमि तैयार की जिसके फलस्वरूप निहित स्वार्थों का आसन ही डगमगा गया और फ्रांस ही नहीं सारे य़ूरोप की जनता में स्वतंत्र विचारों की महत्वपूर्ण शक्ति का उदय हुआ । उनके द्वारा छेड़ी गई विचार क्रान्ति के कारण ही उन्हें फ़्रांस की राज्य क्रांति का प्रमुख आधार स्तम्भ व महामानव माना जाता है ।
वे एक अथक सैनिक थे जो अनवरत रूप से बुराइयों से लड़ते रहे | वे मानव मन को अंधविश्वासों और कुसंस्कारों से विरत करना चाहते थे | वाल्टेयर बहत परिश्रमी थे , उन्होंने अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ जाने नहीं दिया ।
वे कहते थे कुछ काम न करना मृतक के समान है । वाल्टेयर को सर्वाधिक ख्याति उनके द्वारा लिखे नाटकों से मिली । उन्होंने तत्कालीन राज्य व्यवस्था को लेकर एक व्यंग्य प्रधान नाटक लिखा , यह नाटक जब अभिमंचित हुआ तो राज्य व्यवस्था की कई दूषित परम्पराओं का पर्दाफाश हुआ । उनकी पुस्तकें आज़ भी फ्रेंच साहित्य का गौरव समझी जाती हैं ।
फ़्रांस के सम्राट लुई चौदहवें की म्रत्यु हुई उस समय वाल्तेयर केवल 2 1 वर्ष के थे लेकिन वैचारिक दृष्टि से वे प्रौढ़ थे । लुई के मरने पर बहुत खर्च किया गया जिससे राजकोष में बहुत कमी आई , उनके उत्तराधिकारी ने इस कमी को पूरा करने के लिए घुड़साल के आधे घोड़े बेच दिए तो इस कृत्य पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा---- ' यदि राजा घुड़साल के उन घोड़ों को न बेचकर उन गधों को विदा कर देता जो राजसभा में भरें हुए हैँ तो अच्छा रहता । उस स मय फ़्रांस के शासन तंत्र पर चापलूसों का आधिपत्य था जो काम कुछ नहीं करते थे ओर वेतन के रुप में मोटी रकम वसूल करते थे ।
जब उनकी म्रत्यु हो गईं तब लोगों ने उनके महत्व को स्वीकार किया , फ़्रांस की राज्य क्रांति के बाद वाल्टेयर की मरी मिट्टी को 1 3 वर्ष बाद कब्र से निकाला गया और एक विराट जुलूस के रूप में राजसी सम्मान के साथ नगर मे घुमाया गया , उनकी शवयात्रा में 6 लाख नर -नारी सम्मिलित थे , अर्थी पर मोटे अक्षरों में लिखा था ----" वह वाल्टेयर जिसने हमारे मन को बड़ा बल व साहस प्रदान किया , जिसने हमें स्वाधीनता संग्राम के लिये उकसाया । "
वाल्टेयर ने अपने जीवन में लगभग 100 महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे, उन सभी मे उन्होंने धर्म के वास्तविक रूप का प्रतिपादन किया । उनकी लेखनी ने न केवल धार्मिक वरन राजनैतिक और आर्थिक क्रांति के लिए भूमि तैयार की जिसके फलस्वरूप निहित स्वार्थों का आसन ही डगमगा गया और फ्रांस ही नहीं सारे य़ूरोप की जनता में स्वतंत्र विचारों की महत्वपूर्ण शक्ति का उदय हुआ । उनके द्वारा छेड़ी गई विचार क्रान्ति के कारण ही उन्हें फ़्रांस की राज्य क्रांति का प्रमुख आधार स्तम्भ व महामानव माना जाता है ।
वे एक अथक सैनिक थे जो अनवरत रूप से बुराइयों से लड़ते रहे | वे मानव मन को अंधविश्वासों और कुसंस्कारों से विरत करना चाहते थे | वाल्टेयर बहत परिश्रमी थे , उन्होंने अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ जाने नहीं दिया ।
वे कहते थे कुछ काम न करना मृतक के समान है । वाल्टेयर को सर्वाधिक ख्याति उनके द्वारा लिखे नाटकों से मिली । उन्होंने तत्कालीन राज्य व्यवस्था को लेकर एक व्यंग्य प्रधान नाटक लिखा , यह नाटक जब अभिमंचित हुआ तो राज्य व्यवस्था की कई दूषित परम्पराओं का पर्दाफाश हुआ । उनकी पुस्तकें आज़ भी फ्रेंच साहित्य का गौरव समझी जाती हैं ।
फ़्रांस के सम्राट लुई चौदहवें की म्रत्यु हुई उस समय वाल्तेयर केवल 2 1 वर्ष के थे लेकिन वैचारिक दृष्टि से वे प्रौढ़ थे । लुई के मरने पर बहुत खर्च किया गया जिससे राजकोष में बहुत कमी आई , उनके उत्तराधिकारी ने इस कमी को पूरा करने के लिए घुड़साल के आधे घोड़े बेच दिए तो इस कृत्य पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा---- ' यदि राजा घुड़साल के उन घोड़ों को न बेचकर उन गधों को विदा कर देता जो राजसभा में भरें हुए हैँ तो अच्छा रहता । उस स मय फ़्रांस के शासन तंत्र पर चापलूसों का आधिपत्य था जो काम कुछ नहीं करते थे ओर वेतन के रुप में मोटी रकम वसूल करते थे ।
जब उनकी म्रत्यु हो गईं तब लोगों ने उनके महत्व को स्वीकार किया , फ़्रांस की राज्य क्रांति के बाद वाल्टेयर की मरी मिट्टी को 1 3 वर्ष बाद कब्र से निकाला गया और एक विराट जुलूस के रूप में राजसी सम्मान के साथ नगर मे घुमाया गया , उनकी शवयात्रा में 6 लाख नर -नारी सम्मिलित थे , अर्थी पर मोटे अक्षरों में लिखा था ----" वह वाल्टेयर जिसने हमारे मन को बड़ा बल व साहस प्रदान किया , जिसने हमें स्वाधीनता संग्राम के लिये उकसाया । "
13 April 2015
विश्वशान्ति और मानवता के पुजारी-------- रोमांरोलां
1914 में जब पहला विश्व युद्ध छिड़ा तो युद्ध की लपटें धरती से उठकर लोगों के दिमाग में भी धधकने लगीं उस समय रोमांरोलां लोगों को युद्ध के दुष्परिणाम समझाने में और शांति व प्रेम का वातावरण बनाने में लगे हुए थे | जब उन्होंने अपने प्रयासों का बुद्धिजीवियों पर परिणाम होते नहीं देखा तो अकेले ही शांति प्रयासों में जुट गये और जेनेवा जाकर उन्होंने ' इन्टरनेशनल रेडक्रास ' को अपनी सेवाएं अर्पित कर दीं और यूरोप का यह महान कलाकार , मनीषी रेडक्रास के दफ्तर में और क्षेत्र में काम करने लगा ।
रोमांरोलां की रूचि बचपन से संगीत में थी । युवावस्था तक पहुँचते -पहुँचते वे संगीत कला में इतने निष्णात हो गये कि उनकी ख्याति यूरोप भर में फैल गई । फिर उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया और टॉलस्टाय को अपना साहित्यिक गुरु माना और एक लम्बा पत्र लिखा कि आप मुझे आशीर्वाद दें । टॉलस्टाय ने इस पत्र के उत्तर में लिखा --- " प्यारे भाई ! तुम्हारा पहला पत्र मिला । इससे मेरी आत्मा बहुत ही अभिभूत हो उठी है । आँखों में आँसू भर गये पढ़ते -पढ़ते । तुम भावनाओं की माध्यम से लोगों में मानवीय आदर्शों के प्रति निष्ठा का जागरण करो । इससे प्रभु के उपवन की सुंदर सेवा होगी ।
रोमांरोलां बहुत दुर्बल काठी के और दमे के रोगी थे पर उन्होंने समस्त प्रतिकूलताओं से तालमेल बिठाते हुए अपने अंदर की रचनात्मकता विकसित की , उन्होंने पूर्व तथा पश्चिम के दर्शन और साहित्य के समन्वय का प्रयास किया । उन्होंने महात्मा गांधी , स्वामी विवेकानन्द सभी की जीवनियाँ लिखकर पूर्व को पश्चिम में पहुँचाया । उनके उदार विचार और तथ्यपूर्ण प्रतिपादनों का है परिणाम था कि स्टालिन जैसे उग्र और नास्तिकतावादी राजनेता और महात्मा गांधी जैसे अहिंसावादी संत -- दोनों ही उनसे प्रभावित रहे रहे । रोमांरोलां के प्रयास और उनका दर्शन सम्पूर्ण मानव सभ्यता को एकता के सूत्र में आबद्ध करने के लिए ही गतिशील रहा ।
रोमांरोलां की रूचि बचपन से संगीत में थी । युवावस्था तक पहुँचते -पहुँचते वे संगीत कला में इतने निष्णात हो गये कि उनकी ख्याति यूरोप भर में फैल गई । फिर उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया और टॉलस्टाय को अपना साहित्यिक गुरु माना और एक लम्बा पत्र लिखा कि आप मुझे आशीर्वाद दें । टॉलस्टाय ने इस पत्र के उत्तर में लिखा --- " प्यारे भाई ! तुम्हारा पहला पत्र मिला । इससे मेरी आत्मा बहुत ही अभिभूत हो उठी है । आँखों में आँसू भर गये पढ़ते -पढ़ते । तुम भावनाओं की माध्यम से लोगों में मानवीय आदर्शों के प्रति निष्ठा का जागरण करो । इससे प्रभु के उपवन की सुंदर सेवा होगी ।
रोमांरोलां बहुत दुर्बल काठी के और दमे के रोगी थे पर उन्होंने समस्त प्रतिकूलताओं से तालमेल बिठाते हुए अपने अंदर की रचनात्मकता विकसित की , उन्होंने पूर्व तथा पश्चिम के दर्शन और साहित्य के समन्वय का प्रयास किया । उन्होंने महात्मा गांधी , स्वामी विवेकानन्द सभी की जीवनियाँ लिखकर पूर्व को पश्चिम में पहुँचाया । उनके उदार विचार और तथ्यपूर्ण प्रतिपादनों का है परिणाम था कि स्टालिन जैसे उग्र और नास्तिकतावादी राजनेता और महात्मा गांधी जैसे अहिंसावादी संत -- दोनों ही उनसे प्रभावित रहे रहे । रोमांरोलां के प्रयास और उनका दर्शन सम्पूर्ण मानव सभ्यता को एकता के सूत्र में आबद्ध करने के लिए ही गतिशील रहा ।
12 April 2015
राष्ट्र भाषा के अमर शिल्पी------- आचार्य महावीर प्रसाद द्धिवेदी
श्री महावीर प्रसाद द्धिवेदी देश के उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने जीवन भर व्यक्तिगत सुख सुविधाओं की उपेक्षा कर मातृभाषा हिन्दी की सेवा की ।
युवावस्था के प्रारंभिक दिनों में इन्होने एक सस्ता साहित्य लिखा जिसे जन समुदाय ने पसंद किया , बिक्री भी खूब हुई , पर्याप्त धन भी मिला । मित्र मंडली ने बहुत आग्रह किया तो दो पाण्डुलिपियां और लिख लीं । घर की सफाई-सुव्यवस्था में उनकी पत्नी ने ये पाण्डुलिपियां देखी तो अपने पति की करतूत पर तिलमिला गईं । उन्होंने पति को फटकार लगाई -----
" जनमानस में कुत्सित -भावों को पनपाने में जो सस्ती लोकप्रियता और धन मिलता है उस पर धिक्कार है । ऐसे साहित्यकार से तो गँवार होना अच्छा । भगवान ने अकल दी है , कलम में ताकत दी है तो सामाजिक समस्याओं के निदान क्यों नहीं सुझाते ? जनरुचि को परिमार्जित कर आदर्शों की ओर मोड़ने के लिए क्यों नहीं लिखते ? "
पत्नी की फटकार से पति का सोया विवेक जाग पड़ा । जाग्रत विवेक ने साहित्यकार को दिशा -बोध दिया । वह दायित्व को पहचान जुट पड़ा लोक मानस का परिष्कार करने के लिए , साहित्यकार के दायित्व और गरिमा को पहचानने वाले मनीषी थे ---- पं. महावीर प्रसाद द्धिवेदी वे कहा करते थे --- साहित्यकार को समाज सेवी होना आवश्यक है । तभी वह समाज में जाग्रति पैदा करने वाला साहित्य दे सकता हैं । स्वयं उन्होंने ऐसा किया भी । उन्होंने अपने जीवन का बहुत समय किसानो की सेवा में बिताया और अंत तक इसे निभाते रहे । श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ने उनके बारे में लिखा है कि द्धिवेदी जी किसानो के पास जाते , उनकी समस्याएं सुनते और निवारण के प्रयास करते । एक बार किसी किसान का लड़का जंगली खाद्दान की रोटी खा रहा था और आगे चले तो देखा एक किसान बीमार पड़ा है । बस , तुरंत घर लौटे और एक के लिए सब्जी व दूसरे के लिए दवा लेकर हाजिर हो गए । बनारसीदास जी की पूछने पर उन्होंने कहा --- ' सेवा और साहित्य रचना एक सिक्के के दो पहलू हैं । इससे एक लाभ और मिलता है कि विभिन्न अंचलों में रहने वाले जन -समुदाय की मानसिक -संरचना के बारे में गंभीर और बारीक़ जानकारियां मिलती हैं । इसी आधार पर प्रभावी ढंग से शैली का परिवर्तन , गठन और सुधार किया जा सकता है । साहित्य -सृजन और समाज निर्माण दोनों एक हैं । ' द्धिवेदी जी ने स्वयं को ईश्वर की एक शक्ति के रूप में समझा और सेवा व सृजन को एक किया । गणेश शंकर विद्दार्थी , मैथलीशरण गुप्त जैसे अनेक व्यक्तियों को सामान्य से उठाकर मूर्धन्य बनाया । एक समूचा युग ही द्धिवेदी युग के रूप में सँवारा ।
युवावस्था के प्रारंभिक दिनों में इन्होने एक सस्ता साहित्य लिखा जिसे जन समुदाय ने पसंद किया , बिक्री भी खूब हुई , पर्याप्त धन भी मिला । मित्र मंडली ने बहुत आग्रह किया तो दो पाण्डुलिपियां और लिख लीं । घर की सफाई-सुव्यवस्था में उनकी पत्नी ने ये पाण्डुलिपियां देखी तो अपने पति की करतूत पर तिलमिला गईं । उन्होंने पति को फटकार लगाई -----
" जनमानस में कुत्सित -भावों को पनपाने में जो सस्ती लोकप्रियता और धन मिलता है उस पर धिक्कार है । ऐसे साहित्यकार से तो गँवार होना अच्छा । भगवान ने अकल दी है , कलम में ताकत दी है तो सामाजिक समस्याओं के निदान क्यों नहीं सुझाते ? जनरुचि को परिमार्जित कर आदर्शों की ओर मोड़ने के लिए क्यों नहीं लिखते ? "
पत्नी की फटकार से पति का सोया विवेक जाग पड़ा । जाग्रत विवेक ने साहित्यकार को दिशा -बोध दिया । वह दायित्व को पहचान जुट पड़ा लोक मानस का परिष्कार करने के लिए , साहित्यकार के दायित्व और गरिमा को पहचानने वाले मनीषी थे ---- पं. महावीर प्रसाद द्धिवेदी वे कहा करते थे --- साहित्यकार को समाज सेवी होना आवश्यक है । तभी वह समाज में जाग्रति पैदा करने वाला साहित्य दे सकता हैं । स्वयं उन्होंने ऐसा किया भी । उन्होंने अपने जीवन का बहुत समय किसानो की सेवा में बिताया और अंत तक इसे निभाते रहे । श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ने उनके बारे में लिखा है कि द्धिवेदी जी किसानो के पास जाते , उनकी समस्याएं सुनते और निवारण के प्रयास करते । एक बार किसी किसान का लड़का जंगली खाद्दान की रोटी खा रहा था और आगे चले तो देखा एक किसान बीमार पड़ा है । बस , तुरंत घर लौटे और एक के लिए सब्जी व दूसरे के लिए दवा लेकर हाजिर हो गए । बनारसीदास जी की पूछने पर उन्होंने कहा --- ' सेवा और साहित्य रचना एक सिक्के के दो पहलू हैं । इससे एक लाभ और मिलता है कि विभिन्न अंचलों में रहने वाले जन -समुदाय की मानसिक -संरचना के बारे में गंभीर और बारीक़ जानकारियां मिलती हैं । इसी आधार पर प्रभावी ढंग से शैली का परिवर्तन , गठन और सुधार किया जा सकता है । साहित्य -सृजन और समाज निर्माण दोनों एक हैं । ' द्धिवेदी जी ने स्वयं को ईश्वर की एक शक्ति के रूप में समझा और सेवा व सृजन को एक किया । गणेश शंकर विद्दार्थी , मैथलीशरण गुप्त जैसे अनेक व्यक्तियों को सामान्य से उठाकर मूर्धन्य बनाया । एक समूचा युग ही द्धिवेदी युग के रूप में सँवारा ।
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