स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने मनुष्य सेवा के रूप परमात्मा की सेवा स्वीकार की , इससे उन्होंने अपने में स्थाई सुख - शान्ति तथा संतोष का अनुभव किया | रोगियों की सेवा , अपंगों की सेवा और निर्धनों की सहायता करना उनका विशेष कार्यक्रम बन गया | जहाँ भी वे किसी रोगी को कराहते हुए देखते अपने हाथों से उसकी परिचर्या करते । अपंगों और विकलांगों के पास जाकर उनकी सहायता करते । साधारण रोगियों से लेकर क्षय एवं कुष्ठरोगियों तक की सेवा करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था । दीन - दुःखियों को ह्रदय से लगाने में उन्हें एक स्वर्गीय सुख , शान्ति का अनुभव होता था |
14 January 2016
12 January 2016
महान आत्मा ------- स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ था । मैट्रिक पास कर उन्होंने जिस समय कॉलेज में प्रवेश लिया उस समय उनके ह्रदय ने पुलकित होकर कहा ---- " यदि मैं अपने परिश्रम के बल पर ईश्वरीय कृपा से ज्ञान की प्राप्ति कर सका तो संसार का अंधकार दूर करने में जीवन का एक - एक क्षण लगा दूंगा । " इस शिव संकल्प की अनुभूति ने नरेन्द्रनाथ के ह्रदय में एक ऐसे उत्तरदायित्व का जागरण कर दिया जिससे उनका मानसिक स्तर सामान्य से उठकर असामान्य स्थिति की ओर बढ़ गया |
उन्होंने मन ही मन परमात्मा को धन्यवाद दिया और स्वयं से कहा --- नरेंद्र ! लोकसेवा की मंगल कामना में इतना सुख है तब न जाने उसका प्रतिपादन करने में कितना सुख और संतोष होगा । कर्तव्य ध्वनित हो चुका है उसका पालन करना और मानव जीवन की धन्यता प्राप्त करना अब तेरे हाथ में है ।
उनकी आत्मा लोक - कल्याण की भावना से तड़प उठी और भविष्य उनको स्वामी विवेकानन्द के रूप में पूजने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
लोककल्याण के लिए नरेन्द्रनाथ ने जिस ज्ञान की आवश्यकता समझी उसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने पाश्चात्य दर्शन के साथ भारतीय दर्शन का अध्ययन किया फिर उन्होंने यह जान लिया कि भारतीय तत्वज्ञान संसार में शाश्वत और श्रेष्ठ है । और तब उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि संसार को भारतीय तत्वज्ञान से अवगत कराएँगे ।
स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें यह सिखाता है कि----- विश्व कल्याण के शिव संकल्प के साथ जीवन में जाग उठने वालों को ऐसे कौन से श्रेय हैं जो पूर्ण रूप से न मिल जाते हों ।
स्वामी विवेकानंद ने स्थानीय पूजा की मोहमयी मान्यता को ठोकर मारकर लोककल्याण का , परमार्थ का मार्ग चुना । उन्होंने दीन - दुःखियों , अनाथों तथा विधवाओं की सेवा करने के लिए अनेक मठ स्थापित किये , जिनमे वे आश्रयहीनो को आश्रय और शिष्यों को लोकसेवा का शिक्षण व प्रशिक्षण करते थे ।
उन्होंने मन ही मन परमात्मा को धन्यवाद दिया और स्वयं से कहा --- नरेंद्र ! लोकसेवा की मंगल कामना में इतना सुख है तब न जाने उसका प्रतिपादन करने में कितना सुख और संतोष होगा । कर्तव्य ध्वनित हो चुका है उसका पालन करना और मानव जीवन की धन्यता प्राप्त करना अब तेरे हाथ में है ।
उनकी आत्मा लोक - कल्याण की भावना से तड़प उठी और भविष्य उनको स्वामी विवेकानन्द के रूप में पूजने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
लोककल्याण के लिए नरेन्द्रनाथ ने जिस ज्ञान की आवश्यकता समझी उसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने पाश्चात्य दर्शन के साथ भारतीय दर्शन का अध्ययन किया फिर उन्होंने यह जान लिया कि भारतीय तत्वज्ञान संसार में शाश्वत और श्रेष्ठ है । और तब उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि संसार को भारतीय तत्वज्ञान से अवगत कराएँगे ।
स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें यह सिखाता है कि----- विश्व कल्याण के शिव संकल्प के साथ जीवन में जाग उठने वालों को ऐसे कौन से श्रेय हैं जो पूर्ण रूप से न मिल जाते हों ।
स्वामी विवेकानंद ने स्थानीय पूजा की मोहमयी मान्यता को ठोकर मारकर लोककल्याण का , परमार्थ का मार्ग चुना । उन्होंने दीन - दुःखियों , अनाथों तथा विधवाओं की सेवा करने के लिए अनेक मठ स्थापित किये , जिनमे वे आश्रयहीनो को आश्रय और शिष्यों को लोकसेवा का शिक्षण व प्रशिक्षण करते थे ।
11 January 2016
अपने आप आगे बढ़ो , और बढ़े बनो -------- लाल बहादुर शास्त्री
शास्त्री जी का कहना था --- " जो स्वावलंबन और आत्मविश्वास के साथ बढ़ता है , उसकी योग्यता , द्रढ़ता , कर्मठता , साहस और कर्तव्य भावना अदम्य होती है । "
उन्होंने कहा --- " फूल कहीं भी हो वह खिलेगा ही । बगीचे में हो , जंगल में हो या कमरे में , बिना खिले उसे मुक्ति नहीं । बगीचे का फूल पालतू फूल है , उसकी चिंता उसे स्वयं नहीं रहती |
जंगल का फूल इतना चिंतामुक्त नहीं है , उसे अपना पोषण आप जुटाना पड़ता है , अपना निखार आप करना पड़ता है । कहते हैं कि इसीलिए खिलता भी वह मन्दगति से है । सौरभ भी धीरे - धीरे बिखेरता है । किन्तु उसकी सुगंध बड़ी तीखी होती है , काफी दूर तक वह अपनी मंजिल तय करती है । जंगल का फूल यद्दपि अपने आकार में छोटा होता है और कई बार पूरा खिल भी नहीं पाता है तो भी अपनी सुगंध में वह दूसरे फूलों से हल्का नहीं पड़ता बजनी ही होता है । "
यह सिद्धांत मनुष्यों के विकास में भी लागू होता है । दूसरों का सहारा लेकर बहुत ऊँचे पहुँचे हुए लोगों में वह साहस व द्रढ़ता नहीं होती । सफलता की मंजिल भले ही देर से मिले , पर अपने पैरों की गई विकास यात्रा अधिक विश्बस्त होती है ।
संसार में कार्य करने के लिए स्वयं का विश्वास पात्र बनना आवश्यक है ।
उन्होंने कहा --- " फूल कहीं भी हो वह खिलेगा ही । बगीचे में हो , जंगल में हो या कमरे में , बिना खिले उसे मुक्ति नहीं । बगीचे का फूल पालतू फूल है , उसकी चिंता उसे स्वयं नहीं रहती |
जंगल का फूल इतना चिंतामुक्त नहीं है , उसे अपना पोषण आप जुटाना पड़ता है , अपना निखार आप करना पड़ता है । कहते हैं कि इसीलिए खिलता भी वह मन्दगति से है । सौरभ भी धीरे - धीरे बिखेरता है । किन्तु उसकी सुगंध बड़ी तीखी होती है , काफी दूर तक वह अपनी मंजिल तय करती है । जंगल का फूल यद्दपि अपने आकार में छोटा होता है और कई बार पूरा खिल भी नहीं पाता है तो भी अपनी सुगंध में वह दूसरे फूलों से हल्का नहीं पड़ता बजनी ही होता है । "
यह सिद्धांत मनुष्यों के विकास में भी लागू होता है । दूसरों का सहारा लेकर बहुत ऊँचे पहुँचे हुए लोगों में वह साहस व द्रढ़ता नहीं होती । सफलता की मंजिल भले ही देर से मिले , पर अपने पैरों की गई विकास यात्रा अधिक विश्बस्त होती है ।
संसार में कार्य करने के लिए स्वयं का विश्वास पात्र बनना आवश्यक है ।
10 January 2016
लौह लेखनी के धनी ------- श्री सखारामजी देऊसकर
' सम्पूर्ण देश की प्रांतीय भावना को एक राष्ट्र - भाव में बदल देने की विधि कोई जानना चाहे तो वह सखाराम देऊसकर के जीवन से सीखे । ' श्री देऊसकर जी जन्म से महाराष्ट्रीय थे किन्तु कर्म से बंगाली थे । वे जहाँ महाराष्ट्र के पुत्ररत्न थे , वहां बंगाल के पुरुष - रत्न थे |
इनका जन्म 17 दिसंबर 1869 को महाराष्ट्र प्रान्त के रत्नागिरी में हुआ था । एक प्रान्त के नायकों तथा महापुरुषों का परिचय दुसरे प्रान्त से हो तथा देश के विशेष व्यक्तित्व सार्वदेशिक स्तर पर सम्मानित तथा प्रेरक हों ---- इस विशाल भावना के अधीन श्री सखाराम ने बंगला भाषा में जो प्रणयन किया है वह अपना एक विशेष महत्व रखता है ।
श्री सखाराम ने बंगला में महादेव गोविन्द रानाडे का एक सुन्दर जीवन चरित्र लिखकर बंगाल को महाराष्ट्र की प्रतिभा से परिचय किया । साथ ही अपने लेखों तथा भाषणों द्वारा समय - समय पर गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक के नाम तथा उनके महान कार्य बंगवासियों के ह्रदय में स्थापित कर दिए । लाल , बाल, पाल का नय विधान बंगाल के घर - घर में गूंजने लगा |
श्री सखाराम ने बंगला में छत्रपति शिवाजी का जीवन - चरित्र लिखा जो ' शिवाजी - दीक्षा ' के नाम से प्रकाशित हुआ । उन्होंने बंगालियों के बीच शिवाजी जन्मोत्सव मनाने की प्रथा का प्रचलन किया । इस प्रकार बंगाल तथा महाराष्ट्र को एक सूत्र में गूँथ देने शुभ श्रेय श्री सखाराम जी को जाता है ।
इनका जन्म 17 दिसंबर 1869 को महाराष्ट्र प्रान्त के रत्नागिरी में हुआ था । एक प्रान्त के नायकों तथा महापुरुषों का परिचय दुसरे प्रान्त से हो तथा देश के विशेष व्यक्तित्व सार्वदेशिक स्तर पर सम्मानित तथा प्रेरक हों ---- इस विशाल भावना के अधीन श्री सखाराम ने बंगला भाषा में जो प्रणयन किया है वह अपना एक विशेष महत्व रखता है ।
श्री सखाराम ने बंगला में महादेव गोविन्द रानाडे का एक सुन्दर जीवन चरित्र लिखकर बंगाल को महाराष्ट्र की प्रतिभा से परिचय किया । साथ ही अपने लेखों तथा भाषणों द्वारा समय - समय पर गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक के नाम तथा उनके महान कार्य बंगवासियों के ह्रदय में स्थापित कर दिए । लाल , बाल, पाल का नय विधान बंगाल के घर - घर में गूंजने लगा |
श्री सखाराम ने बंगला में छत्रपति शिवाजी का जीवन - चरित्र लिखा जो ' शिवाजी - दीक्षा ' के नाम से प्रकाशित हुआ । उन्होंने बंगालियों के बीच शिवाजी जन्मोत्सव मनाने की प्रथा का प्रचलन किया । इस प्रकार बंगाल तथा महाराष्ट्र को एक सूत्र में गूँथ देने शुभ श्रेय श्री सखाराम जी को जाता है ।
9 January 2016
संत ज्ञानेश्वर
' प्रवचन और उपदेशों द्वारा ही नहीं , लेखनी और क्रियाओं द्वारा भी उन्होंने मानव मूल्यों के प्रतिपादक धर्म का प्रचार किया । ' उनकी मान्यता थी कि पूजा पाठ तब तक अधूरा ही है , जब तक ह्रदय में सेवा और सदभावनाएँ नहीं जागें । उन्होंने गिरे हुए को ऊँचा उठाया और दीन- दुःखियों के प्रति सेवा - सहयोग करने के लिए लोगों को प्रेरित किया । कई संपन्न व्यक्ति उन्हें जो धन - सम्पदा अर्पित कर देते थे उन्हें वे दीन - दुःखियों की सेवा में लगाने के लिए वापस कर देते थे । उनकी रचित ' ज्ञानेश्वरी गीता ' आध्यात्मिक साहित्य की अमूल्य सम्पदा मानी जाती है ।
8 January 2016
महान साहित्यकार ---- मेक्सिम गोर्की --- कूड़े के ढेर से जन्मा एक महामानव
गोर्की ( जन्म 1858 ) के बचपन का नाम था अलेक्सी । ' कोकेशस ' नामक पात्र में जब उनकी पहली कहानी ' माकार- चंद्रा ' प्रकाशित हुई तो उसने लेखक के रूप में अपना नाम दिया ---- ' गोर्की ' | जिसका अर्थ होता है --- ' तेज ' । उन्होंने अपने मित्र से कहा --- " मैं तेजी से समाज की विवशताओं के बन्धन काटना चाहता हूँ , इसलिए गोर्की बना । एक साहित्यकार के रूप में आज मेरा जन्म हुआ है और जन्मदाता है कूड़े का ढेर । "
अलेक्सी का बचपन बहुत गरीबी व दुःख में बीता । आठ वर्ष की उम्र में वह परिवार का कर्ता बन गया । वह मिल जाती तो मजदूरी करता नहीं तो कूड़े - कचरे के ढेर में से कोई काम की चीज खोजकर उसकी मरम्मत कर बाजार में बेच आता और जो कुछ पैसे मिलते उससे अपना व नानी का पेट भरता । स्कूल में पढ़ना नहीं हो सका । कूड़े का ढेर उसका बहुत दिनों का साथी था ।
यहीं से फटे कागजों को उठाकर तुड़े - मुड़े , सड़े - गले अक्षरों को जोड़कर उसने पढ़ना सीखा । यही उसकी पाठशाला थी । पढ़ने का शौक इतना था कि जब कभी किसी के पास अच्छी पुस्तक का पता चलता तो उसके घर पहुँच जाता , उसकी मजदूरी करता , बदले में एक - आध दिन के लिए किताब मांग कर पढ़ लेता । युवा होने पर रेल्वे स्टेशन पर चौकीदारी करता और दिन भर बदबू और सीलन भरी कोठरी में पढ़ता - लिखता रहता | सर्दी के लिए उनके पास पहनने - ओढ़ने के लिए कपड़े भी नहीं थे । गोर्की ने आभाव सहे पर पढ़ना - लिखना नहीं छोड़ा ।
भूखे - नंगे निराश्रित अलेक्सी ने परिस्थितियों से जो लड़ाई लड़ी , साथ ही विकृतियों से जो संघर्ष किया यह तथ्य उन्हें मेक्सिम गोर्की बनाने में सहायक रहा ।
साहित्य - जगत में आने पर पहले कई वर्षों तक गोर्की को कड़ा संघर्ष करना पड़ा । प्रारंभिक संघर्ष के बाद सफलता गोर्की के चरण चूमने लगी । गोर्की ने एक सफल लेखक और साहित्यकार के रूप में पीड़ित मानवता की सेवा की थी । उनकी रचनाओं में गिरे हुए को ऊँचा उठाने की प्रेरणाएं भरी होती थीं । वे कहते थे मेरी एक ही साध है कि मैं मानव का दर्द साहित्य के माध्यम से मानव को समझा सकूँ । गोर्की ने कीचड़ में रहते हुए भी अपने को कमल की तरह विकसित करके यह प्रमाणित कर दिया कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में क्यों न रहे , यदि उसमे आगे बढ़ने की भावना - शक्ति और कर्मणा शक्ति है तो वह प्रगति कर सकता है ।
अलेक्सी का बचपन बहुत गरीबी व दुःख में बीता । आठ वर्ष की उम्र में वह परिवार का कर्ता बन गया । वह मिल जाती तो मजदूरी करता नहीं तो कूड़े - कचरे के ढेर में से कोई काम की चीज खोजकर उसकी मरम्मत कर बाजार में बेच आता और जो कुछ पैसे मिलते उससे अपना व नानी का पेट भरता । स्कूल में पढ़ना नहीं हो सका । कूड़े का ढेर उसका बहुत दिनों का साथी था ।
यहीं से फटे कागजों को उठाकर तुड़े - मुड़े , सड़े - गले अक्षरों को जोड़कर उसने पढ़ना सीखा । यही उसकी पाठशाला थी । पढ़ने का शौक इतना था कि जब कभी किसी के पास अच्छी पुस्तक का पता चलता तो उसके घर पहुँच जाता , उसकी मजदूरी करता , बदले में एक - आध दिन के लिए किताब मांग कर पढ़ लेता । युवा होने पर रेल्वे स्टेशन पर चौकीदारी करता और दिन भर बदबू और सीलन भरी कोठरी में पढ़ता - लिखता रहता | सर्दी के लिए उनके पास पहनने - ओढ़ने के लिए कपड़े भी नहीं थे । गोर्की ने आभाव सहे पर पढ़ना - लिखना नहीं छोड़ा ।
भूखे - नंगे निराश्रित अलेक्सी ने परिस्थितियों से जो लड़ाई लड़ी , साथ ही विकृतियों से जो संघर्ष किया यह तथ्य उन्हें मेक्सिम गोर्की बनाने में सहायक रहा ।
साहित्य - जगत में आने पर पहले कई वर्षों तक गोर्की को कड़ा संघर्ष करना पड़ा । प्रारंभिक संघर्ष के बाद सफलता गोर्की के चरण चूमने लगी । गोर्की ने एक सफल लेखक और साहित्यकार के रूप में पीड़ित मानवता की सेवा की थी । उनकी रचनाओं में गिरे हुए को ऊँचा उठाने की प्रेरणाएं भरी होती थीं । वे कहते थे मेरी एक ही साध है कि मैं मानव का दर्द साहित्य के माध्यम से मानव को समझा सकूँ । गोर्की ने कीचड़ में रहते हुए भी अपने को कमल की तरह विकसित करके यह प्रमाणित कर दिया कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में क्यों न रहे , यदि उसमे आगे बढ़ने की भावना - शक्ति और कर्मणा शक्ति है तो वह प्रगति कर सकता है ।
7 January 2016
पिता की सीख से संकल्प किया
लियोनार्दो दा विची जब दो वर्ष के थे तब उनकी माता ने उनके पिता से तलाक लेकर दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया | जब किसी बालक को उसकी माता द्वारा दुलार पाते देखते तो वह उदास हो जाते । एक दिन उन्होंने पिता से पूछ ही लिया ---- " पिताजी आप नई माँ क्यों नहीं ले आते ? " पिता ने कहा ---- " जब तुम्हे जन्म देने वाली माँ ही प्रेम न दे सकी तो यह आवश्यक नहीं कि नयी माँ तुम्हे प्यार दे , वह तुम्हारी उपेक्षा भी तो कर सकती है । "
पिता ने कहा ----- " प्यार पाने का रास्ता किसी से प्यार की भीख मांगना नहीं है वरन उसे जीतना है । तुम चाहो तो अपने जीवन में एक व्यक्ति का ही नहीं हजारों व्यक्तियों का प्यार पा सकते
हो । " बालक ने कहा ---- 'सो कैसे पिताजी ? '
पिता ने कहा ---- " अपनी प्रतिभा को विकसित करके । किसी के स्नेह , श्रद्धा को पाने का एक ही मार्ग है और वह यह है कि अपने को उतना अच्छा , योग्य और प्रतिभाओं का आगार बनाओ कि हर कोई तुम्हारे प्रखर व्यक्तित्व के आगे अभिभूत हो उठे , तुम्हे प्यार करने लगे । "
अपने अनुभवी पिता की बात बालक लियोनार्दो ने गाँठ बाँध ली और संकल्प कर लिया कि वह प्यार के लिए किसी के आगे रोयेगा , गिडगिडायेगा नहीं वरन वह अपने को ऐसा बनाएगा कि हर कोई उसे चाहने लगे ।
बचपन में माता के स्नेह से वंचित यही बालक अपने जीवन में हजारों का ह्रदय जीतने में सफल हुआ । साथ ही ' लियोनार्दो दा विची ' सर्व विद्दा विशारद , इतिहास का आश्चर्य भी बन गया l
पिता ने कहा ----- " प्यार पाने का रास्ता किसी से प्यार की भीख मांगना नहीं है वरन उसे जीतना है । तुम चाहो तो अपने जीवन में एक व्यक्ति का ही नहीं हजारों व्यक्तियों का प्यार पा सकते
हो । " बालक ने कहा ---- 'सो कैसे पिताजी ? '
पिता ने कहा ---- " अपनी प्रतिभा को विकसित करके । किसी के स्नेह , श्रद्धा को पाने का एक ही मार्ग है और वह यह है कि अपने को उतना अच्छा , योग्य और प्रतिभाओं का आगार बनाओ कि हर कोई तुम्हारे प्रखर व्यक्तित्व के आगे अभिभूत हो उठे , तुम्हे प्यार करने लगे । "
अपने अनुभवी पिता की बात बालक लियोनार्दो ने गाँठ बाँध ली और संकल्प कर लिया कि वह प्यार के लिए किसी के आगे रोयेगा , गिडगिडायेगा नहीं वरन वह अपने को ऐसा बनाएगा कि हर कोई उसे चाहने लगे ।
बचपन में माता के स्नेह से वंचित यही बालक अपने जीवन में हजारों का ह्रदय जीतने में सफल हुआ । साथ ही ' लियोनार्दो दा विची ' सर्व विद्दा विशारद , इतिहास का आश्चर्य भी बन गया l
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