30 September 2017

WISDOM

  आपत्तियों  का  कारन  है  ---- अधर्म  --- जब  मनुष्य  के  मन  में  सद्वृत्तियाँ  रहती  हैं  ,  तो  उनकी  सुगंध  से  दिव्यलोक  भरा - पूरा  रहता  है   और  जैसे  यज्ञ  की  सुगंध  से   अच्छी  वर्षा ,  अच्छा  अन्न  उत्पादन  होता  है  ,  वैसे  ही  जनता  की  सदभावनाओं   के  फलस्वरूप   ईश्वरीय   कृपा   की,  सुख - शांति    की    वर्षा  होती  है     l  यदि  लोगों  के  ह्रदय  छल कपट ,  द्वेष ,  छल  आदि   दुर्भावों  से    भरे   रहें  ,  तो  उनसे  अद्रश्य  लोक   एक  प्रकार  से   आध्यात्मिक    दुर्गन्ध  से    भर  जाते  हैं   l  जैसे   वायु  के  दूषित ,   दुर्गंधित   होने  से  हैजा  आदि  बीमारियाँ   फैलती  हैं   ,  वैसे  ही   पाप वृत्तियों  के  कारण  सूक्ष्म  लोकों  का  वातावरण    गन्दा  हो  जाने  से      युद्ध , महामारी  ,  दरिद्रता ,   अर्थ संकट ,  दैवी  प्रकोप  आदि    उपद्रवों  का   आविर्भाव     होता  है   l  

29 September 2017

शिक्षा - संत --------- स्वामी केशवानंद

   राजस्थान  प्रान्त  के  सीकर  जिले   के  मगलूणा  गाँव  में  एक  साधारण   किसान  परिवार  में  केशवानंद  का  जन्म  हुआ  ,  उनके  बचपन  का  नाम  ' वीरमा '  था  l  अपने  बचपन  और  किशोरावस्था  में  उन्होंने  गाँव  के  जीवन  का  दरद   और  बदहाली  देखी  l  उस  समय  गाँव  के  लोग   जागीरदारों - सामंतों ,  राजाओं - नवाबों  और  विदेशी  शासकों  की  तिहरी  गुलामी  में  जकड़े  थे  l  वीरमा   की    किशोरावस्था  राजस्थान  के  रेतीले  टीलों  के  बीच  लगभग  नंगे बदन  सरदी - गरमी  सब  कुछ  सहते  हुए  बीती  l   ऐसे  में  माता - पिता  भी  चल  बसे   l   तब  उन्हें   आर्य  अनाथालय  में  सहारा  मिला   l   पढने  की  लगन  में  उन्होंने  साधुवेश  धारण  किया  l    पंजाब  के  गुरु  कुशलदास   और  अवधूत  हीरानंद  के  संपर्क  में  आकर  ' केशवानंद '  बन  गए   l     फिर  तो  भारत  भर  के  तीर्थ  स्थानों , मंदिरों , मठों , शहर , गाँव , शिक्षण - संस्थानों ---- में  घूम - घूम  कर  दुनिया  की  पुस्तकें  पढ़  डालीं   l
     गुरु - सेवा ,  शिक्षण   और  भ्रमण  के  इस  अनुभव  में   उन्होंने  जाना  कि ----  व्यक्ति  का  जितना  शिक्षित  होना  जरुरी  है  ,  उससे  कहीं  अधिक  आवश्यक  है   जीवन  जीने  की  कला  का  अभ्यास  l  इसी  प्रयास  में  उन्होंने  राजस्थान , हरियाणा , पंजाब    में  प्राथमिक पाठ शालाएं ,  चल - पुस्तकालय , वाचनालय  आदि  स्थापित  और  संचालित   किये  l  उनके  द्वारा  स्थापित  संस्थाओं  में  सबसे  ज्यादा  नाम  व  चर्चा  ' ग्रामोत्थान  विद्दापीठ  सांगरिया  की  हुई   l   
    अनगिनत  संस्थाओं  के  संस्थापक    स्वामी  केशवानंद  अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  एवं  इसके  संचालक  परम  पूज्य   गुरुदेव  पं.  श्रीराम  शर्मा    आचार्य   से   प्रेरणा  ग्रहण  करते  थे  l  वह  कहते  थे   अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  में    प्रकाशित  जीवन  जीने  की  कला  आज  के  युग  की  ब्रह्म   विद्दा    है   l   इस  पत्रिका  में   प्रकाशित   अंशों   का  जिक्र    करते  हुए  कहते  थे  ---- "  जिन्दगी  जीना  एक  कला  है  l  यह  कला  तो  वास्तव  में  मानसिक  वृति  है  ,  जिसके  आधार  पर    साधनों  की  कमी  में  भी   जिन्दगी  को  खूबसूरती  के  साथ   जिया  जा  सकता  है   l   जिन्दगी  को  हर  समय  हंसी - खुशी  के  साथ   अग्रसर  करते  रहना  ही  कला  है   l  उसे  रो - पीटकर  काटना  ही     कलाहीनता  है   l   जो  जीवन  की  अनुकूलता  और  प्रतिकूलता   के  परिवर्तनों  का    समभाव  से  उपभोग   कर  लेता  है  , वही  कुशल  कलाकार  कहा  जायेगा   l 

28 September 2017

शहीद भगतसिंह ---- जिन्होंने आत्म बलिदान कर के क्रान्तिकारियों के कार्यों के पीछे जो गम्भीर विचारधारा और उच्च आदर्श था -- उसे संसार के सामने रखा

 ' नित्यप्रति  हजारों  मनुष्य  तरह - तरह  से  अकाल  मृत्यु  के  मुँह  में  चले  जाते  हैं  ,  पर  जो  भगतसिंह  की  तरह   दूसरों  के  लिए  जीवन  अर्पण  कर  देते  हैं   वही  इस  नश्वर  जगत  में  अमर  हो  जाते  हैं   l '  ऐसे  निर्भीक  और  कर्तव्यपरायण  युवकों  पर  भारतमाता  जितना  गर्व  करे  कम  है  l   
  उन्होंने   जीवन  के  अन्तिम  समय  तक  अन्याय  के  विरुद्ध  संघर्ष  किया  l ` 
            असेम्बली  बम  केस  में  अपने  कार्य  का  औचित्य  सिद्ध  करते  हुए   उन्होंने  कहा  था --- ' क्रान्ति  का  वास्तविक  मार्ग  मेहनत  पेशा  लोगों  को  जागृत  तथा   संगठित  करना  है  l  थोड़े  से  युवक  आतंकवादी  कार्य  कर  के   इस  महान  उद्देश्य  को  पूरा  नहीं  कर  सकते  l  यह  मेरा  दृढ़  विश्वास  है  कि  हमको  बमों  और  पिस्तौलों  से  लाभ  नहीं  होगा  l   ' ------
 उन्होंने  कहा ---- " समाज  में  सभी  के  लिए  अनाज  पैदा  करने  वाले   किसानों  के  परिवार  भूखों  मरते  हैं  ,  सारे  संसार  को  सूत  जुटाने  वाला   बुनकर  अपना  और  अपने  बच्चों  का  तन  ढकने  के  लिए  पर्याप्त  कपड़ा  नहीं  पाता  है  ,  शानदार  महल  खड़ा  करने  वाले  लुहार , बढ़ई,  कारीगर   झोंपड़ी  में  ही  बसर  करते   और  मर  जाते  हैं   और  दूसरी  तरफ  पूंजीपति  ,  शोषक  अपनी  सनक  पर  करोड़ों  रुपया  बहा  देते  हैं   l  l  समाज  में  एक  ऐसी  व्यवस्था  की  स्थापना  की  जाये   जिसमे  मजदूर  वर्ग  के  प्रभुत्व  को  मान्यता  दी  जाये   जिसके  फलस्वरूप  पूंजीवाद  के  बन्धनों ,  दुःखों   तथा  युद्धों  से  मानवता  का  उद्धार  हो  सके   l  "
     ' मृत्यु '  मानवमात्र  को  आतंकित  कर  देती  है   लेकिन  भगतसिंह  को  अंतिम  क्षण  तक   मृत्यु   की   भयंकरता    का  तनिक  भी  भय  नहीं  हुआ  l   मृत्यु  के  दिन  उनने  अपने  भाई  को  पत्र में  यह  अमर  वाक्य  लिखे  थे ----- "  एक  दीपक  की  लौ    की    तरह  मैं  सुबह  होने  से   पहले  ही  खत्म  हो  जाऊंगा  l  यह  मुट्ठी  भर  खाक  अगर  नष्ट  हो  जाये   तो  इससे    क्या  हानि   होगी  ? "  
  भगतसिंह  का   आत्मबलिदान   इतना  प्रभावशाली  सिद्ध  हुआ  कि  सर्वत्र  उनका  नाम  गूंजने  लगा  l   महात्मा  गाँधी  ने  कहा ---  "  हमारे  मस्तक  भगतसिंह  की  बहादुरी  और  बलिदान  के  समक्ष  झुक  जाते  हैं  l "   

27 September 2017

WISDOM

जो  लोग  वर्तमान  में  ही  भविष्य  की  तैयारी  नहीं  करते   वे  अदूरदर्शी  होते  हैं   और  एक  तरह  से  जीवन - पथ  पर  असफलता  के  बीज   बोने  जैसी   भूल  करते  हैं  l   समय  रहते  पहले  से  तैयारी  कर  लेने  पर  निर्धारित  योजनाओं  में   सौभाग्य  का  समावेश  होना  स्वाभाविक  ही  होता  है   l  असफलता  तो  उन  अदूरदर्शी  व्यक्तियों  को  मिलती  है   जो  तैयारी  के  समय   आलस्य  और  उपेक्षा  में  पड़े   सपने  देखा  करते  हैं   और  कर्तव्य काल  में   व्यस्तता , व्यग्रता ,  त्वरा  और   अव्यवस्था  के  शिकार  बनकर   शक्ति  तथा  संतुलन  को  जीर्ण - शीर्ण  करते  रहने   विवश  होते  हैं    l 

26 September 2017

धर्मप्राण - महामना पं. मदनमोहन मालवीयजी

  '  मालवीयजी  ने  हिन्दू  विश्वविद्यालय    की    सफलता   और  वहां  के  विद्दार्थियों  तथा  अध्यापकों    को  कर्तव्यपरायण   तथा  उन्नतिशील  बनाने  के  लिए   अपना  जीवन  ही  अर्पण  कर  दिया   l '
     मालवीयजी  केवल  लड़कों  की  शिक्षा    लिए  ही  प्रयत्नशील  नहीं  रहे   वरन  लड़कियों    की    शिक्षा   को  भी    वे  उतना  ही  आवश्यक   और  महत्वपूर्ण  समझते  थे   l  उन्होंने  हिन्दू विश्वविद्यालय  में  लड़कों   की शिक्षा   की   तरह  कन्या -  शिक्षा    की  भी  उचित  व्यवस्था     की  l  उस  समय  में  भी  उन्होंने  लड़कियों  को  वेद  पढ़ने  की  अनुमति  दी  l
  स्त्री - शिक्षा  के  महत्व  पर  उन्होंने  कहा  था ----- " हमारा  सच्चरित्र  होना , ब्रह्मचारी  बनना   अथवा  अन्धविश्वास  का  परित्याग  करना  तभी  हो  सकता  है   जब  हम  अपने  स्त्री - वर्ग   का  सुधार  कर   उसे  अपने  अनुकूल  बना  लें  l  जब  तक  हम  नारी - शक्ति  को  अपने   साथ  लेकर  नहीं  चलते , तब  तक  हम   कभी  जातीय - जीवन  की   लहलहाती  लता  को   देखकर  आनन्दित  नहीं  हो  सकते  l  क्योंकि  मनुष्य  समाज  का  कल्याण   अथवा  अकल्याण ,  उच्च  अथवा  नीच  होना   स्त्रियों  के  ही  हाथ  में  है   l ------ यदि  स्त्रियाँ  पुरुषों  के   साथ  रहकर  उनके  लाभ  अथवा  सुख  की  सहायक  न  हों  ,  तो  पुरुष  कभी  सुखी  अथवा  आनन्दित  नहीं  रह  सकते   l  पुरुषों  की  उन्नति  अथवा  अवनति  वास्तव  में  स्त्रियों  के  हाथ  में  है  l --------- स्त्रियों  को  ईश्वर  की  दी  हुई  विपुल  शक्ति  को   जीवन  के  उच्च  आदर्श  के   सामने  लाकर  सुगठित  करना   और  कर्मशील  बनाना  ही  हमारा  उद्देश्य  है   और  वही  हमारे  जातीय  जीवन  का   मूल  और  कर्तव्य - कर्म  है   l  " 

25 September 2017

पं . दीनदयाल उपाध्याय ----- निरंतर आत्मनिरीक्षण करते थे

 पं. दीनदयाल  उपाध्याय  राष्ट्रीय  स्वयं सेवक  संघ  के  कार्यकर्ताओं  के  साथ   मुंबई  से  नागपुर  तीसरे  दरजे  में  रेल  द्वारा   जा   रहे  थे  l  उन  दिनों  वे  भारतीय  जनसंघ  के  अध्यक्ष  थे   l  उसी  ट्रेन   की  प्रथम  श्रेणी  में   गुरु  गोलवरकर  जी   भी   जा  रहे  थे  l  उन्होंने  किसी  महत्वपूर्ण  विषय  पर   विचार - विमर्श    के  लिए  उपाध्याय  जी  को  अपने  पास  बुलाया  l  दो  स्टेशन  तक  उनका  प्रथम  श्रेणी  के  डिब्बे  में  ही  वार्तालाप  होता  रहा   l   अपने  डिब्बे  में  आने  के  बाद   वह  टी. टी.  को  खोजने  का  प्रयास   करने  लगे  और  हर  स्टेशन  पर  नीचे  उतर  कर  उसे  खोजते   l
  श्री  उपाध्याय जी  को  टी. टी.  की  खोज  करते  देख  उनके  साथी  यह  जानने  के  उत्सुक  थे  कि  आखिर  उन्हें  टी. टी.  से  क्या  काम  है  l  पंडितजी    की   दौड़ - धूप  का  प्रयास  सफल  हुआ   l  उन्हें  शीघ्र  ही  टी. टी.  सामने  आता  दिखाई  दिया  l
  दो स्टेशन  वे  वार्तालाप  हेतु  प्रथम  श्रेणी  में  बैठे  थे  , अत:  उन्होंने  उससे  अपना  अधिक  किराया  जमा  करने  को  कहा  l   उसे  बहुत  आश्चर्य  हुआ  किन्तु  उसने  चुपचाप  हिसाब  से  पैसे  ले  लिए  और  पूछा  --- "  क्या  आप  रसीद  भी  चाहते  हैं  ? "  पंडितजी  ने  कहा --- ' अवश्य  l '    बिना  रसीद  दिए  वह  राशि टी. टी.  स्वयं  ही  रखना  चाहता  था   किन्तु  उपध्याय जी  ने  कहा ----  "  मेरे  टिकट  के  पैसे  न  देने   और  टी. टी.  के  जेब  में  रख  लेने   के     दोनों  अपराध  समान  हैं  l  दोनों  से  ही  देश  खोखला  होता  है  l  "

24 September 2017

WISDOM ----- आप दूसरों से स्नेह , सम्मान और सहानुभूति चाहते हैं तो उनकी आलोचना , बुराई न करें

  यदि  किसी  के  मन  में  स्वयं  के  प्रति  विद्वेष  पैदा  करना  है  , जो  दशकों  तक  पलता  रहे  और  मौत  के  बाद  भी  बना  रहे  ,  तो  इसके  लिए   उसकी   कुछ  चुने  हुए  शब्दों  में   चुभती  हुई   आलोचना  करनी  होती  है  l  जाने - अनजाने  में  ज्यादातर  लोग  ऐसा  ही  करते  हैं   और  दूसरों  के  मन  में  खुद  के  लिए  विषबीज  बो  देते  हैं  l
              बॉब हूवर  एक  प्रसिद्ध  टेस्ट  पाइलट  थे  जो  एयर  शो  में  अक्सर  प्रदर्शन  किया  करते  थे  l  एक  बार  वे  सैनडीएगो   से  एयर  शो  में  हिस्सा  लेने  के  बाद  लास एंजिल्स  में  अपने  घर  को  लौट  रहे  थे  कि  अचानक  हवा  में  तीन  सौ  फीट  की  ऊंचाई  पर  उनके  हवाई  जहाज  के  दोनों  इंजन  बंद  हो  गए   l  कुशल  तकनीक  से  उन्होंने  जहाज  को   उतारा  l  हवाई  जहाज  का  तो  बहुत  नुकसान  हुआ  परन्तु  किसी  को  चोट  नहीं  आई   l  उन्होंने  हवाई  जहाज  के  ईंधन  कि  जाँच  की  तो  पाया  कि   द्वितीय  विश्व युद्ध  के  प्रसिद्ध  हवाई  जहाज  में  किसी  ने  गैसोलीन  कि  जगह  जेट  का  ईंधन  डाल  दिया   l
  उन्होंने  उस  मैकेनिक  को  बुलाया  जिसने  हवाई  जहाज   की    सर्विसिंग  की  थी    l  युवा  मैकेनिक   अपनी  गलती  पर  बहुत  शर्मिंदा  था   किन्तु   बॉब     हूवर   ने  उसे  कोई फटकार  नहीं  लगाई,  इसके   बजाय अपने   हाथ  उसके  कंधे  पर  रखकर  कहा ----- "  मुझे  पूरा  भरोसा  है  अब   तुम  दोबारा  ऐसा  नहीं  करोगे  l  मैं  चाहता  हूँ  कि  कल  तुम  मेरे   एफ--51  हवाई  जहाज  की  सर्विसिंग  करो   l  "
  उनके  इस  व्यवहार   से  उस  मैकेनिक   के  अन्दर  हूवर  के  प्रति   श्रद्धा - विश्वास  का  भाव  पनपा   और  फिर  कभी  भी   उसने  अपनी  पुरानी  गलती  नहीं  दोहराई  l
 लोगों   की   आलोचना  करने  के  बजाय  उन्हें  समझने    की    कोशिश  करनी  चाहिए   l