6 October 2017

WISDOM ------ अच्छे स्वास्थ्य के लिए परिश्रम जरुरी है















एक  बार   कन्फ्यूशियस  के  शिष्य   चांग हो चांग  भ्रमण  के  लिए  निकले   l  मार्ग  में  उन्होंने  देखा  कि  एक   युवा  माली  कुंए  से  बालटी  से  पानी  निकाल कर   एक - एक  पौधे  में  डाल  रहा  है   l   उन्हें  दया  आई  और  ऐसी  व्यवस्था  करा  दी  कि   एक  जगह  खड़े  होकर  पानी  निकाल  ले  जो  नाली  की  सहायता  से  पेड़ों  में  पहुँच  जाये  l  ऐसी  व्यवस्था  से  माली  को  आराम  तो  हुआ  किन्तु  चलना - फिरना   व  झुकने  आदि  कई  व्यायाम  नही  हो  रहे  थे   l  चांग  एक  बार  फिर  उसी  रास्ते  से  गुजरे  तो  उन्होंने  सोचा  कि  कुएं  में  भाप  से  चलने  वाली  मशीन  डाल  दी  जाये   तो  परिश्रम  बहुत  कम  होगा  और  सब  पेड़ों  को  पानी  भी  मिल  जायेगा  l   यह  प्रस्ताव  भी  स्वीकार  हो  गया , भाप  का  इंजन  लग  गया  और  माली  को  बहुत  आराम  हो  गया  l  
बहुत  दिन  बीत  गए  चांग    की    उस  बगीचे  को  देखने  की  इच्छा  हुई   l  वहां  जाकर  देखा  तो  स्तब्ध  रह  गए  पूरा  बगीचा   सूख    चुका  था  l  माली  को  देखा  तो  उसके  हाथ  सूख  गए ,  टांगे  पतली  हो  गईं,  भोजन  हजम  नहीं  होता  , चेहरा  पीला  पड़  गया  l  चांग  ने  उससे  कहा --- क्या  अभी  भी  बहुत  परिश्रम  करना  पड़ता  है ,  कोई  और  तरकीब  सोचें  ?  
  माली    की    पत्नी  ने  हाथ  जोड़कर  कहा ---' आप  तरकीब  न  सोचें  ,  ऐसी  सलाह   आप  इन्हें   दें  कि     फिर  से  परिश्रम  करने  लगें  l  यह  आराम  ही  बीमारी  का  कारण  है  l ' 
  माली  अपनी  पूर्व  जीवन पद्धति  में  आकर  पुन:  स्वस्थ  हो  गया  l 
  चांग  अपने  एकांगी  चिंतन  पर  बहुत  पछताए  l  यह  समझ  गए  कि  बिना  परिश्रम  के  जीवन  मूल्यहीन  और  नाकारा  हो  जाता  है   l 




















5 October 2017

युवाओं के मार्गदर्शक ----- सुभाषचंद्र बोस

  घटना  उन  दिनों  की  है -----  सुभाषचंद्र  बोस  ने   20  सितम्बर  1920  को   इंग्लैंड  में  आई. सी. एस.  की  परीक्षा  में  सफलता  प्राप्त  की  थी  ,  सफल  छात्रों    की    सूची  में  उनका  स्थान  चौथा  था  l  अंग्रेजी  कम्पोजिशन  में  उन्हें  प्रथम  स्थान  मिला  था ,  उन्होंने  अंग्रेजों  को  उन्ही  की  भाषा  में  धूल  चटा  दी   l   इसके  कुछ  ही  महीनों  बाद  समाचार   पत्र    में   मुखर  पृष्ठ  पर   यह  समाचार   प्रकाशित   हुआ कि   -----
  'सुभाषचंद्र  बोस  ने   आई. सी. एस.  पद  से  त्यागपत्र  दे  दिया ,   22  अप्रैल  1921  का  यह  दिन   भारतीय  इतिहास  में  अमिट  हो  गया  ---  स्वतंत्र  और  सशक्त  भारत  के  निर्माण  के  लिए  उन्होंने  स्वयं  को  समर्पित  कर  दिया  ----------
       एक  अंग्रेज    पुलिस  अधिकारी    जो   सुभाषचंद्र  बोस  से  इंग्लैंड  के  दिनों  से  परिचित  था  ,  उसने  उनके  कमरे  में  प्रवेश  किया  और  कहा ---- ' मिस्टर  सुभाष  ! मेरे  पास  तुम्हारी  गिरफ्तारी  के  लिए  वारंट  है  l " इतना  कहकर  उसने  विचित्र  नजरों  से  उन्हें  देखा  और  कहा ---- " तुम  क्या  हो  सकते  थे  और  क्या  हो  गए   ? "    इस  अंग्रेज  अधिकारी  को  यह  मालूम  था  कि  यदि  आज  वह  आई. सी. एस.  अधिकारी  होते  तो  वह  उनका  अधीनस्थ  होता   l
      उस  अंग्रेज  की  इस  बात  के  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---  "  ठीक  कहा  तुमने  मिस्टर  ग्रिफिथ  !  मैं  गुलाम  हो  सकता  था  ,  लेकिन  आज  मैं  अपने  देश  की  स्वाधीनता  का  सजग   सिपाही  हूँ  l  '
 अंग्रेज  अधिकारी  ने  कहा --- ' मुझे  तुम्हारे  कमरे  की  तलाशी  लेनी  है  l '    वह  उनके  कमरे  कि  हर  चीज  को  बड़े  ध्यान  से  उलटता - पुलटता   रहा   ---- एक  पुस्तक  थी  जिसमे  स्वामी  विवेकानन्द  के  पत्रों  का  संकलन  था  ,  एक  चांदी  की  डिब्बी  में  कुछ  चूर्ण  जैसा  था ,  उसने  पूछा ---- " यह  क्या  है   मिस्टर  सुभाष  ? '  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ----- "  यह  मेरे  देश  की  मिटटी  है ,  मैं  हर  रोज  इसकी  पूजा  करता  हूँ   इसे  अपने  माथे  पर  लगाता  हूँ   और  देश  की  स्वाधीनता  के   अपने  उद्देश्य  का  स्मरण  करता  हूँ   l  " 
  यह  बात   अंग्रेज  की  समझ  के  बाहर  थीं  l   उनके  चेहरे  पर  प्रसन्नता  के  भाव  देखकर  वह  बोला ---- " तुम्हे  गिरफ्तार  होने  का  जरा  भी  दुःख  नहीं  है  मिस्टर  सुभाष  ? "
  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---- " कष्ट  और  त्याग --- दोनों  स्वराज्य  की  नींव  हैं ,  मिस्टर ग्रिफिथ  l  यदि  देश  के   युवक  उसके  लिए  स्वयं  को  अर्पित  करने  के  लिए  तैयार  हों   तो  स्वतंत्रता  की  कल्पना  को  साकार  होने  में  देर  न  लगेगी  l  " 
  इस   गिरफ्तारी  के  बाद  उन्हें  बर्मा  की  मांडले  जेल  भेज  दिया  गया  l  जेल  की  यातनाएं  उनकी  साधनाओं  में  परिवर्तित  होने  लगीं  ,  यह  जेल  उनके  लिए  तपोभूमि  बन  गई   l   बीतते  समय  के  साथ  वे  सबके  प्रिय   महानायक   नेताजी  बन  गए  l
  भारत  के  युवाओं  ने    उनसे  कहा ---- " इस  विपदा  के  समय  में  जब  पूरा  देश  अंधकार  में  डूबा  है  ,  आपका  व्यक्तित्व   हम  सबके  लिए  प्रकाश  पुंज  है   l  "  नेताजी  सुभाषचंद्र  बोस  आज  भी  राष्ट्र  के  लिए  प्रेरणा  और  प्रकाश  का  अमर  स्रोत  हैं   l
      

2 October 2017

WISDOM ------ गांधीजी अहिंसा को कायरों का नहीं वीरों का भूषण कहा करते थे

 , अहिंसात्मक  प्रतिकार  से  उनका   आशय  था ---- बिना  किसी  को  कष्ट  दिए  ऐसा  नैतिक  दबाव  उत्पन्न  करना  कि  अत्याचारी  को  हारकर  सही  रास्ते  पर  आना  पड़े   l  इसके  लिए  बड़े  साहस ,  संतुलन  और  धैर्य  की  आवश्यकता  है   l
      घटना  1923    की    है  -----  तब  गुजरात  के  पंचमहल  एवं  गोधरा  में   भीषण  साम्प्रदायिक  उपद्रव  हुए  l  वहां  के  बहुसंख्यक  वर्ग  द्वारा  पीड़ित   व्यक्ति  भागकर   महात्मा  गाँधी  के  पास  पहुंचे   और  उन्होंने    अत्याचारियों    द्वारा  किये  गए  अत्याचार  की  शिकायत  उनसे  की   l  बापू  ने  सारी  बातें  ध्यानपूर्वक  सुनी    और  पूछा --- ' तुम  लोगों  ने  इसके  मुकाबले  क्या  किया   ? '
 आगंतुकों  में  से  एक  नेता  जैसे  व्यक्ति  ने  कहा --- '  करते  क्या  ?  आपकी  अहिंसा  का  अर्थ  सुनकर  ! '
 बापू   क्षुब्ध  मन  से  बोले ---- ' मेरी  अहिंसा  ने  यह  थोड़े  ही  कहा  था  कि  तुम  वहां  से   कायरों  की  तरह  भागकर   अपनी  बुजदिली  की   रिपोर्ट  देने  के  लिए  मेरे  पास  आओ  l  मेरी  अहिंसा  तो  साहसपूर्वक  मर - मिटने  का  सन्देश  देती  है  l  तुम  में  यदि  मर  मिटने  का  साहस  नहीं  था    तो  अपने  मन  के  अनुसार  उस  स्थिति  का  मुकाबला  करना  चाहिए  था  l   तुमने  मेरे  मत  को  समझा  नहीं  और  अपने  मत  पर  चलने  की  हिम्मत  नहीं  की  l    जहाँ  किसी  तरह  जान  बचा  लेने  की  भावना  है  ,  खतरों  से  मुंह  मोड़ने  या  भाग  जाने  की  संभावना  है  वहां  अहिंसा  नहीं  हो  सकती  l  अहिंसा   कायरों   की    नहीं   वीरों  की  है " l
        दुष्टता   या   अवांछनीयता    का  दमन  किसी  भी  प्रकार   किया  जाये  ,  ऐसा  ' मन्यु '     अहिंसा  के  अंतर्गत  ही  आता  है   l  क्योंकि    दुष्टों  का ,  अत्याचारी  का  दमन  करने  से   उसके  कारण  पीड़ित  होने  वाले   अधिक  लोगों  को  सुख - चैन  से  रहने  का  अवसर  मिलेगा   l 

1 October 2017

WISDOM ------ जब जागा आत्मबल ------

   विश्व  के  शक्ति भंडार  में  आत्मबल  सर्वोपरि  है  l   जो  अपने  मानवीय  विकारों  पर  नियंत्रण  रखता  है  ,  अपने  आंतरिक  और   बाह्य    जीवन  पर  शासन  करता  है    वही  आत्मबल  संपन्न  हो  जाता  है  और  तब  उस  पर  दैवी   अनुग्रह    अनायास  बरसता  है -------
       चन्द्रगुप्त  जब  विश्वविजय  की  योजना  सुनकर  सकपकाने  लगा   तो  चाणक्य  ने  कहा ----- "  तुम्हारी  दासीपुत्र  वाली  मनोदशा  को    मैं    जानता    हूँ   l   उससे  ऊपर  उठो   l  चाणक्य  के  वरद  पुत्र   जैसी  भूमिका  निभाओ  l  विजय  प्राप्त  कराने  की  जिम्मेदारी   तुम्हारी  नहीं ,  मेरी  है  l "
                     शिवाजी  जब  अपने  सैन्यबल  को  देखते  हुए  असमंजस  में  थे   कि  इतनी  बड़ी  लड़ाई  कैसे  लड़ी  जा  सकेगी  ,  तो  समर्थ  रामदास  ने  उन्हें  भवानी  के  हाथों   अक्षय  तलवार  दिलाई  थी    और  कहा  था ------- "तुम  छत्रपति  हो  गए ,  पराजय  की  बात  ही  मत  सोचो   l "
                     महाभारत  लड़ने  का  निश्चय  सुनकर  अर्जुन  सकपका  गया   और  कहने  लगा ----- "  मैं  अपने  गुजारे  के  लिए  तो  कुछ  भी  कर  लूँगा  ,  फिर  हे  केशव  !  आप  इस  घोर  युद्ध  में   मुझे  नियोजित  क्यों  कर  रहे  हैं  ? '  इसके  उत्तर  में  भगवान  ने  एक  ही  बात  कही ----    "  इन  कौरवों  को  तो  मैंने  पहले  ही   मार    कर   रख  दिया  है  l   तुझे  यदि  श्रेय  लेना  है    तो  आगे  आ ,  अन्यथा  तेरे  सहयोग  के  बिना  भी   वह  सब  हो  जायेगा ,  जो  होने  वाला  है   l   घाटे  में  तू  ही  रहेगा ---- श्रेय  गँवा  बैठेगा   और  उस  गौरव  से  भी  वंचित  रहेगा   ,  जो  विजेता  और  राजसिंहासन    के  रूप  में  मिला  करता  है   l  "
  अर्जुन  ने  वस्तुस्थिति  समझी   और   कहा कि  आपका  आदेश  मानूंगा   l 
    उच्चस्तरीय  प्रतिभाओं  का  पौरुष  जब  कार्यक्षेत्र  में  उतरता  है    तो  न  केवल  कुछ  व्यक्तियों   को ,  वरन  समूचे  वातावरण  को  ही  उलट - पुलट  कर  रख  देता  है   l 

30 September 2017

WISDOM

  आपत्तियों  का  कारन  है  ---- अधर्म  --- जब  मनुष्य  के  मन  में  सद्वृत्तियाँ  रहती  हैं  ,  तो  उनकी  सुगंध  से  दिव्यलोक  भरा - पूरा  रहता  है   और  जैसे  यज्ञ  की  सुगंध  से   अच्छी  वर्षा ,  अच्छा  अन्न  उत्पादन  होता  है  ,  वैसे  ही  जनता  की  सदभावनाओं   के  फलस्वरूप   ईश्वरीय   कृपा   की,  सुख - शांति    की    वर्षा  होती  है     l  यदि  लोगों  के  ह्रदय  छल कपट ,  द्वेष ,  छल  आदि   दुर्भावों  से    भरे   रहें  ,  तो  उनसे  अद्रश्य  लोक   एक  प्रकार  से   आध्यात्मिक    दुर्गन्ध  से    भर  जाते  हैं   l  जैसे   वायु  के  दूषित ,   दुर्गंधित   होने  से  हैजा  आदि  बीमारियाँ   फैलती  हैं   ,  वैसे  ही   पाप वृत्तियों  के  कारण  सूक्ष्म  लोकों  का  वातावरण    गन्दा  हो  जाने  से      युद्ध , महामारी  ,  दरिद्रता ,   अर्थ संकट ,  दैवी  प्रकोप  आदि    उपद्रवों  का   आविर्भाव     होता  है   l  

29 September 2017

शिक्षा - संत --------- स्वामी केशवानंद

   राजस्थान  प्रान्त  के  सीकर  जिले   के  मगलूणा  गाँव  में  एक  साधारण   किसान  परिवार  में  केशवानंद  का  जन्म  हुआ  ,  उनके  बचपन  का  नाम  ' वीरमा '  था  l  अपने  बचपन  और  किशोरावस्था  में  उन्होंने  गाँव  के  जीवन  का  दरद   और  बदहाली  देखी  l  उस  समय  गाँव  के  लोग   जागीरदारों - सामंतों ,  राजाओं - नवाबों  और  विदेशी  शासकों  की  तिहरी  गुलामी  में  जकड़े  थे  l  वीरमा   की    किशोरावस्था  राजस्थान  के  रेतीले  टीलों  के  बीच  लगभग  नंगे बदन  सरदी - गरमी  सब  कुछ  सहते  हुए  बीती  l   ऐसे  में  माता - पिता  भी  चल  बसे   l   तब  उन्हें   आर्य  अनाथालय  में  सहारा  मिला   l   पढने  की  लगन  में  उन्होंने  साधुवेश  धारण  किया  l    पंजाब  के  गुरु  कुशलदास   और  अवधूत  हीरानंद  के  संपर्क  में  आकर  ' केशवानंद '  बन  गए   l     फिर  तो  भारत  भर  के  तीर्थ  स्थानों , मंदिरों , मठों , शहर , गाँव , शिक्षण - संस्थानों ---- में  घूम - घूम  कर  दुनिया  की  पुस्तकें  पढ़  डालीं   l
     गुरु - सेवा ,  शिक्षण   और  भ्रमण  के  इस  अनुभव  में   उन्होंने  जाना  कि ----  व्यक्ति  का  जितना  शिक्षित  होना  जरुरी  है  ,  उससे  कहीं  अधिक  आवश्यक  है   जीवन  जीने  की  कला  का  अभ्यास  l  इसी  प्रयास  में  उन्होंने  राजस्थान , हरियाणा , पंजाब    में  प्राथमिक पाठ शालाएं ,  चल - पुस्तकालय , वाचनालय  आदि  स्थापित  और  संचालित   किये  l  उनके  द्वारा  स्थापित  संस्थाओं  में  सबसे  ज्यादा  नाम  व  चर्चा  ' ग्रामोत्थान  विद्दापीठ  सांगरिया  की  हुई   l   
    अनगिनत  संस्थाओं  के  संस्थापक    स्वामी  केशवानंद  अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  एवं  इसके  संचालक  परम  पूज्य   गुरुदेव  पं.  श्रीराम  शर्मा    आचार्य   से   प्रेरणा  ग्रहण  करते  थे  l  वह  कहते  थे   अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  में    प्रकाशित  जीवन  जीने  की  कला  आज  के  युग  की  ब्रह्म   विद्दा    है   l   इस  पत्रिका  में   प्रकाशित   अंशों   का  जिक्र    करते  हुए  कहते  थे  ---- "  जिन्दगी  जीना  एक  कला  है  l  यह  कला  तो  वास्तव  में  मानसिक  वृति  है  ,  जिसके  आधार  पर    साधनों  की  कमी  में  भी   जिन्दगी  को  खूबसूरती  के  साथ   जिया  जा  सकता  है   l   जिन्दगी  को  हर  समय  हंसी - खुशी  के  साथ   अग्रसर  करते  रहना  ही  कला  है   l  उसे  रो - पीटकर  काटना  ही     कलाहीनता  है   l   जो  जीवन  की  अनुकूलता  और  प्रतिकूलता   के  परिवर्तनों  का    समभाव  से  उपभोग   कर  लेता  है  , वही  कुशल  कलाकार  कहा  जायेगा   l 

28 September 2017

शहीद भगतसिंह ---- जिन्होंने आत्म बलिदान कर के क्रान्तिकारियों के कार्यों के पीछे जो गम्भीर विचारधारा और उच्च आदर्श था -- उसे संसार के सामने रखा

 ' नित्यप्रति  हजारों  मनुष्य  तरह - तरह  से  अकाल  मृत्यु  के  मुँह  में  चले  जाते  हैं  ,  पर  जो  भगतसिंह  की  तरह   दूसरों  के  लिए  जीवन  अर्पण  कर  देते  हैं   वही  इस  नश्वर  जगत  में  अमर  हो  जाते  हैं   l '  ऐसे  निर्भीक  और  कर्तव्यपरायण  युवकों  पर  भारतमाता  जितना  गर्व  करे  कम  है  l   
  उन्होंने   जीवन  के  अन्तिम  समय  तक  अन्याय  के  विरुद्ध  संघर्ष  किया  l ` 
            असेम्बली  बम  केस  में  अपने  कार्य  का  औचित्य  सिद्ध  करते  हुए   उन्होंने  कहा  था --- ' क्रान्ति  का  वास्तविक  मार्ग  मेहनत  पेशा  लोगों  को  जागृत  तथा   संगठित  करना  है  l  थोड़े  से  युवक  आतंकवादी  कार्य  कर  के   इस  महान  उद्देश्य  को  पूरा  नहीं  कर  सकते  l  यह  मेरा  दृढ़  विश्वास  है  कि  हमको  बमों  और  पिस्तौलों  से  लाभ  नहीं  होगा  l   ' ------
 उन्होंने  कहा ---- " समाज  में  सभी  के  लिए  अनाज  पैदा  करने  वाले   किसानों  के  परिवार  भूखों  मरते  हैं  ,  सारे  संसार  को  सूत  जुटाने  वाला   बुनकर  अपना  और  अपने  बच्चों  का  तन  ढकने  के  लिए  पर्याप्त  कपड़ा  नहीं  पाता  है  ,  शानदार  महल  खड़ा  करने  वाले  लुहार , बढ़ई,  कारीगर   झोंपड़ी  में  ही  बसर  करते   और  मर  जाते  हैं   और  दूसरी  तरफ  पूंजीपति  ,  शोषक  अपनी  सनक  पर  करोड़ों  रुपया  बहा  देते  हैं   l  l  समाज  में  एक  ऐसी  व्यवस्था  की  स्थापना  की  जाये   जिसमे  मजदूर  वर्ग  के  प्रभुत्व  को  मान्यता  दी  जाये   जिसके  फलस्वरूप  पूंजीवाद  के  बन्धनों ,  दुःखों   तथा  युद्धों  से  मानवता  का  उद्धार  हो  सके   l  "
     ' मृत्यु '  मानवमात्र  को  आतंकित  कर  देती  है   लेकिन  भगतसिंह  को  अंतिम  क्षण  तक   मृत्यु   की   भयंकरता    का  तनिक  भी  भय  नहीं  हुआ  l   मृत्यु  के  दिन  उनने  अपने  भाई  को  पत्र में  यह  अमर  वाक्य  लिखे  थे ----- "  एक  दीपक  की  लौ    की    तरह  मैं  सुबह  होने  से   पहले  ही  खत्म  हो  जाऊंगा  l  यह  मुट्ठी  भर  खाक  अगर  नष्ट  हो  जाये   तो  इससे    क्या  हानि   होगी  ? "  
  भगतसिंह  का   आत्मबलिदान   इतना  प्रभावशाली  सिद्ध  हुआ  कि  सर्वत्र  उनका  नाम  गूंजने  लगा  l   महात्मा  गाँधी  ने  कहा ---  "  हमारे  मस्तक  भगतसिंह  की  बहादुरी  और  बलिदान  के  समक्ष  झुक  जाते  हैं  l "