यदा - कदा मनुष्य का मोह और मानसिक दुर्बलताएं प्रवंचना के जाल में फंसा कर उसको गलत दिशा की ओर प्रेरित कर देती हैं l इस मनोसंकट के समय मनुष्य को सावधानीपूर्वक विवेक का ही अवलम्ब लेकर और अपने को तटस्थ बना कर परिणाम की महत्ता के प्रकाश में किसी निर्णय का निर्धारण करना चाहिए l किंचित कमजोरी से मनुष्य का व्यक्तिगत मोह ' सर्वजन हिताय ' की महानता पर आच्छादित हो जाता है l लेकिन जो अपने जीवन में सच्चे होते हैं और जिसका संग उत्तम होता है उसके डगमगाते कदम को रोकने वाले संयोग आ ही जाते हैं l
8 April 2018
6 April 2018
WISDOM ----- कर्म ही ईश्वर की सच्ची पूजा है ----- संत वसवेश्वर
कर्नाटक के महान संत वसवेश्वर ने व्याख्यान शैली नहीं अपनाई , वे सुकरात की तरह विचार विमर्श और मंत्रणा करने का क्रम अपनाकर चले l उनके सम्पर्क में आने वाले सच्चे धर्म परायण बनते चले गए , यह संख्या इतनी बढ़ती गई कि उनका समूह ' लिंगायत ' के नाम से प्रसिद्ध हुआ l सन्त वसवेश्वर ने बताया कि केवल पूजा - प्रार्थना , कर्मकांड के आधार पर भगवान का अनुग्रह प्राप्त नहीं किया जा सकता l कर्तव्यहीन व्यक्ति ही तथाकथित धर्म - कृत्यों को सब कुछ मान लेते हैं l
ईश्वर की प्राप्ति उच्च चरित्र , उदार प्रकृति और परमार्थ परायणता पर निर्भर है l उनका कहना था कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करता है वही सच्चा धर्म परायण है l वे पूजा - पाठ द्वारा पाप - फल न मिलने का बहकावा नहीं देते थे l '
उनका कहना था कि भक्ति की पूर्णता और सार्थकता के लिए मनुष्य का व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण शुद्ध , सच्चरित्र , ईमानदार , नेक और पवित्र होना चाहिए l
ईश्वर की प्राप्ति उच्च चरित्र , उदार प्रकृति और परमार्थ परायणता पर निर्भर है l उनका कहना था कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करता है वही सच्चा धर्म परायण है l वे पूजा - पाठ द्वारा पाप - फल न मिलने का बहकावा नहीं देते थे l '
उनका कहना था कि भक्ति की पूर्णता और सार्थकता के लिए मनुष्य का व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण शुद्ध , सच्चरित्र , ईमानदार , नेक और पवित्र होना चाहिए l
5 April 2018
WISDOM ----- जनता सदैव जागरूक रहे ----- कन्फ्यूशियस
कन्फ्यूशियस का कहना था कि अत्याचारी शासक चीते से भी अधिक भयंकर होता है l अत्याचारी शासन में रहने की अपेक्षा अच्छा है कि किसी पहाड़ी अथवा वन में रह लिया जाये l किन्तु यह व्यवस्था सार्वजनिक नहीं हो सकती l इसलिए जनता को चाहिए कि वह अत्याचारी शासन का समुचित विरोध करे और सत्ताधारी को अपना सुधार करने के लिए विवश करने का उपाय करे l '
कन्फ्यूशियस का स्पष्ट मत था कि --- अत्याचारी शासन को भय के कारण सहन करने वाला समाज किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता l विकासहीन जीवन बिताता हुआ वह युगों तक नारकीय यातना भोगा करता है तथा सदा सर्वदा अवनति के गर्त में पड़ा रहकर जिस - तिस प्रकार जीवन व्यतीत करता रहता है l अत: दु:शासन को पलटने के लिए जनता सदैव जागरूक रहे l '
कन्फ्यूशियस का स्पष्ट मत था कि --- अत्याचारी शासन को भय के कारण सहन करने वाला समाज किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता l विकासहीन जीवन बिताता हुआ वह युगों तक नारकीय यातना भोगा करता है तथा सदा सर्वदा अवनति के गर्त में पड़ा रहकर जिस - तिस प्रकार जीवन व्यतीत करता रहता है l अत: दु:शासन को पलटने के लिए जनता सदैव जागरूक रहे l '
4 April 2018
WISDOM ----- सत्ता और धन के सदुपयोग से ही मानव - जाति का कल्याण होगा
प्राय: ऐसा देखा जाता है कि जब कोई साधारण स्थिति का मनुष्य संयोगवश ऐसा उच्च स्थान पा जाता है तो वह अपनी अवस्था को भूलकर अभिमानी और स्वार्थी बन जाता है और अपनी सम्पति और साधनों का स्वयं ही अधिकाधिक उपयोग करना चाहता है l ऐसे व्यक्ति निश्चित ही बड़े संकीर्ण और अदूरदर्शी होते हैं l वे इतना नहीं सोच पाते कि सौभाग्य की स्थिति को अविचल या अटल समझ लेना बुद्धिमानी नहीं है l न मालूम कब वह बादल की छाया की तरह विलीन हो जाये l इसलिए स्वहित की बात यही है कि ऐसा अवसर पाकर उसका सदुपयोग अधिकाधिक परोपकार और दूसरों के साथ भलाई के लिए ही किया जाये , जिससे प्रत्येक परिवर्तित दशा में आत्मसंतोष बना रहे l
महारानी अहिल्याबाई का चरित्र इस द्रष्टि से आदर्श था l एक साधारण ग्रामीण कन्या से वे इंदौर की महारानी बनी l इतना बड़ा दर्जा पा लेने पर भी उनमे अहंकार नहीं था l उन्हें जो कुछ धन , मान मिला उसका उपयोग उन्होंने सदैव दूसरों के हित के लिए किया l दीन - हीन , विधवाएं , अनाथ , निर्धन व्यक्ति उनकी करुणा के मुख्य आधार थे l धन और सत्ता के सदुपयोग का उन्होंने एक ऐसा महान आदर्श उपस्थित किया जिसकी गुण गाथा हमेशा गाई जाएगी l यदि हमारे अनेक छत्रधारी इस पथ पर चले होते तो यह पृथ्वी क्लेश और कष्टों के बजाय आनन्द और शान्ति का आगार बनी दिखाई पड़ती l
3 April 2018
WISDOM --- जन - आन्दोलन प्राय: उसी स्थिति में गति पकड़ते हैं जब उसके द्वारा जनता की किसी समस्या का समाधान होता हो
वर्ष 1905 जब देश पर लार्ड कर्जन का कूटनीति पूर्ण शासन चल रहा था l वे जब से भारत के वायसराय बन कर आये थे , तब से यहाँ की जन - जागृति को दबाने की तरकीबें कर रहे थे और उनका अंतिम प्रहार था -- 19 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन l उस समय जनता में विदेशी शासकों के प्रति विद्रोह का भाव अपने चरम बिन्दु पर था l देश भर में आन्दोलन चला l ज्यों - ज्यों आन्दोलन गति पकड़ता गया सरकार का दमन - चक्र भी क्रूर और दानवी होता गया l
' जन - भावनाओं का दमन वह भी आतंक के बल पर , कोई भी सरकार सफल नहीं रही है l इतिहास इस बात का साक्षी है l मन की पाशविक प्रक्रिया विद्रोह की आग को कुछ क्षणों के लिए भले ही कम कर दे , परन्तु वह अन्दर ही अन्दर सुलगती रहती है और जब विस्फोट होता है तो बड़ी से बड़ी संहारक शक्तियां और साम्राज्य ध्वस्त हो जाते हैं l
शताब्दियों से भारतीय समाज पर किये जाने वाले अत्याचारों की भी प्रतिक्रिया अन्दर ही अन्दर सुलगती रही और बंग - भंग योजना का प्रतिरोध करते समय फूट पड़ी l उस समय देश का बच्चा - बच्चा आततायी के सामने खुल कर मुकाबला करने के लिए आ खड़ा हुआ l
' जन - भावनाओं का दमन वह भी आतंक के बल पर , कोई भी सरकार सफल नहीं रही है l इतिहास इस बात का साक्षी है l मन की पाशविक प्रक्रिया विद्रोह की आग को कुछ क्षणों के लिए भले ही कम कर दे , परन्तु वह अन्दर ही अन्दर सुलगती रहती है और जब विस्फोट होता है तो बड़ी से बड़ी संहारक शक्तियां और साम्राज्य ध्वस्त हो जाते हैं l
शताब्दियों से भारतीय समाज पर किये जाने वाले अत्याचारों की भी प्रतिक्रिया अन्दर ही अन्दर सुलगती रही और बंग - भंग योजना का प्रतिरोध करते समय फूट पड़ी l उस समय देश का बच्चा - बच्चा आततायी के सामने खुल कर मुकाबला करने के लिए आ खड़ा हुआ l
30 March 2018
WISDOM
वे सारे कर्म जिनसे आत्मा का विकास हो , परमात्मा का सामीप्य प्राप्त हो और संसार का हित साधन हो --- जीवन का सदुपयोग है l जिसका फल पुण्य, पावनता और अनन्त शान्ति के रूप में मनुष्य को मिलता है l
इसके विपरीत सारे कर्म और सारे मंतव्य जीवन का दुरूपयोग है , उसको नष्ट करना है l
संसार की सुख शान्ति तथा सुन्दरता बढ़ाने के लिए ही परमात्मा ने यह मानव जीवन प्रदान किया है l इस मंतव्य में ही इसको लगाये रखना जीवन की तथा सम्मान करना है l
इसके विपरीत सारे कर्म और सारे मंतव्य जीवन का दुरूपयोग है , उसको नष्ट करना है l
संसार की सुख शान्ति तथा सुन्दरता बढ़ाने के लिए ही परमात्मा ने यह मानव जीवन प्रदान किया है l इस मंतव्य में ही इसको लगाये रखना जीवन की तथा सम्मान करना है l
29 March 2018
सजग पत्रकार , समर्थ समाज सेवी ------- पं. इन्द्र विद्दावाचस्पति
इन्द्र जी कहते थे ---- " इस समय आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी कर्मचारियों , मंत्रीमंडल और पत्रकारों तथा जनता सबका चरित्र का स्तर ऊँचा हो l यदि ऐसा न होगा तो स्वराज्य ताश के पत्तों के मकान की तरह ढह जायेगा l "
इस अनिष्टकारी स्थिति से परित्राण पाने का मार्ग भी उन्होंने सुझाया ---- " शिक्षण , द्रष्टान्त और प्रचार से हम स्थिति को सुधार सकते हैं l शिक्षा में सुधार हुआ ही नहीं है l नैतिक और आचरण सम्बन्धी बातों के प्रचार की आवश्यकता है l सबसे बड़ी बात है द्रष्टान्त की l जनता वही करेगी जो बड़े करेंगे l त्याग ऊपर से ही आरम्भ होना चाहिए , इसके लिए उपदेश निरर्थक है l "
' आज देश में सबसे बड़ी आवश्यकता चरित्र निर्माण और नैतिक जागरण की है l
इन्द्र जी निर्भीक पत्रकार और निष्ठावान देशभक्त थे l उनके पत्रों ने राष्ट्रीय जागरण का जो कार्य किया वह अपने आप में अनूठा है l आज तो पत्रकारिता के क्षेत्र में स्वतंत्र विचारों की हत्या हो गई है l यह कला आज पूंजीपतियों की क्रीतदासी बनती जा रही है l
इन्द्र जी का जीवन पत्रकारों , आचार्यों और समाज सेवियों के लिए आदर्श है l
इस अनिष्टकारी स्थिति से परित्राण पाने का मार्ग भी उन्होंने सुझाया ---- " शिक्षण , द्रष्टान्त और प्रचार से हम स्थिति को सुधार सकते हैं l शिक्षा में सुधार हुआ ही नहीं है l नैतिक और आचरण सम्बन्धी बातों के प्रचार की आवश्यकता है l सबसे बड़ी बात है द्रष्टान्त की l जनता वही करेगी जो बड़े करेंगे l त्याग ऊपर से ही आरम्भ होना चाहिए , इसके लिए उपदेश निरर्थक है l "
' आज देश में सबसे बड़ी आवश्यकता चरित्र निर्माण और नैतिक जागरण की है l
इन्द्र जी निर्भीक पत्रकार और निष्ठावान देशभक्त थे l उनके पत्रों ने राष्ट्रीय जागरण का जो कार्य किया वह अपने आप में अनूठा है l आज तो पत्रकारिता के क्षेत्र में स्वतंत्र विचारों की हत्या हो गई है l यह कला आज पूंजीपतियों की क्रीतदासी बनती जा रही है l
इन्द्र जी का जीवन पत्रकारों , आचार्यों और समाज सेवियों के लिए आदर्श है l
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