10 April 2018

WISDOM ----- जबतक कोई व्यक्ति अच्छा नागरिक न हो तब तक वह अच्छा जन - प्रतिनिधि या अच्छा राजनीतिज्ञ कैसे हो सकता है ?------ बंट्रेंड रसेल

  रसेल  कहते  थे  कि  राजनीतिक  प्रतिनिधि  आमतौर  पर  ऐसा  मानने  लगते  हैं  कि  राजनीति  में  सज्जनता  और  नैतिकता   की  कोई  गुंजाइश  नहीं  है   l  रसेल  ने  लिखा  है --- "  संसद  और  विधान  सभाओं  के  सदस्य  आराम  से  रहते  हैं,   मोटी - मोटी  दीवारें  और  असंख्य  पुलिस  जन  उनको  जनता  की  आवाज  से  बचाए  रखते  हैं  l  जैसे - जैसे  समय  बीतता  जाता  है   उनके  मन  में  उन  वचनों  की  धुंधली  सी  स्मृति  ही  रह  जाती  है   जो  निर्वाचन  के  समय   जनता  को  दिए  थे   l  दुर्भाग्य  यह  है  कि  समाज  के  व्यापक  हित   वास्तव  में  अमूर्त  होते  हैं    और   विधायकों  के   निजी  संकीर्ण  हितों  को  ही   जनता  का  हित  मान  लिया  जाता  है    l  "
  रसेल  लोकतंत्र  और  स्वतंत्रता  की  रक्षा  के  लिए   निरंतर  संगठित  प्रतिरोध  को  अनिवार्य  मानते  थे  l  इससे  समाज  में  अव्यवस्था  का    खतरा  पैदा  हो  सकता  है   परन्तु    यह  सर्वशक्तिमान   राजसभा  से  उत्पन्न  होने  वाली   जड़ता  की  तुलना  में   यह  खतरा  नगण्य  है  l 
 रसेल  गांधीजी  की  तरह  साम्राज्यवाद,  आर्थिक - विषमता  और  राजनीतिक  सत्ता  के  केन्द्रीकरण  के  प्रबल  विरोधी  थे  l   

9 April 2018

WISDOM----- अच्छी सरकार किसे कहते हैं ?

   एक  बार  कन्फ्यूशियस  से  किसी  शिष्य  ने  पूछा --- " अच्छी  सरकार  किसे  कहते  हैं  ? " 
कन्फ्यूशियस  ने  उत्तर  दिया ---- " जिसके  पास  पर्याप्त  अन्न  हो , पर्याप्त   अस्त्र - शस्त्र  हों  और  जिस  पर  जनता  का  विश्वास  हो   ? "
 शिष्य  ने  पुन:  पूछा ---- " मान  लीजिए  तीनो  बातें  न  मिल  सकें  ? "
गुरु  ने  कहा --- " इनमे  से  हथियार  निकाल  सकते  हो  l "
शिष्य  की  जिज्ञासा  शान्त  नहीं  हुई  और  उसने  फिर  प्रश्न  किया  --- " यदि  इन  तीनो  में  से  एक  ही  रखना  हो  तो    कौन  सी   पसंद  करेंगे   ? "
 कन्फ्यूशियस  ने  गम्भीर  मुद्रा  में  उत्तर  दिया ---- "  जनता    का    विश्वास   l  "
  चीन  के  एक  अत्याचारी  शासक  ने  कन्फ्यूशियस  की  मृत्यु  के  दो  सौ  वर्ष  बाद  ही   उनकी  लिखी  सब  पुस्तकों  को  जला  दिया  था   और  उनके  अनुयायी  विद्वानों  को   फाँसी  पर  लटकवा  दिया  था  ,  फिर  भी  उनके  सिद्धान्त  आज  भी  चीन  ही  नहीं   सारे  संसार  में  आदर  की  द्रष्टि  से  देखे  जाते  हैं   l 

8 April 2018

WISDOM ----- जीवन में सच्चाई हो तो प्रकृति रक्षा करती है

    यदा - कदा  मनुष्य  का  मोह  और   मानसिक   दुर्बलताएं   प्रवंचना  के  जाल  में   फंसा  कर   उसको  गलत  दिशा  की  ओर  प्रेरित  कर  देती  हैं   l  इस  मनोसंकट  के  समय  मनुष्य  को   सावधानीपूर्वक  विवेक  का  ही  अवलम्ब  लेकर   और  अपने  को  तटस्थ  बना  कर    परिणाम  की  महत्ता  के  प्रकाश  में   किसी  निर्णय  का  निर्धारण  करना  चाहिए    l  किंचित  कमजोरी  से  मनुष्य  का  व्यक्तिगत  मोह   ' सर्वजन  हिताय '  की  महानता   पर   आच्छादित    हो  जाता  है  l   लेकिन   जो  अपने  जीवन  में  सच्चे  होते  हैं   और  जिसका  संग  उत्तम  होता  है   उसके  डगमगाते   कदम  को  रोकने  वाले  संयोग  आ  ही  जाते  हैं   l  

6 April 2018

WISDOM ----- कर्म ही ईश्वर की सच्ची पूजा है ----- संत वसवेश्वर

   कर्नाटक  के  महान  संत  वसवेश्वर  ने   व्याख्यान  शैली  नहीं  अपनाई ,  वे  सुकरात  की  तरह  विचार विमर्श  और  मंत्रणा  करने  का  क्रम  अपनाकर  चले  l  उनके  सम्पर्क  में  आने  वाले  सच्चे  धर्म परायण  बनते  चले  गए ,  यह  संख्या  इतनी  बढ़ती  गई   कि  उनका  समूह   ' लिंगायत '  के  नाम  से  प्रसिद्ध  हुआ  l   सन्त  वसवेश्वर  ने  बताया  कि  केवल  पूजा - प्रार्थना , कर्मकांड  के  आधार  पर  भगवान  का  अनुग्रह  प्राप्त  नहीं  किया  जा  सकता  l  कर्तव्यहीन  व्यक्ति  ही  तथाकथित  धर्म - कृत्यों  को  सब  कुछ  मान  लेते  हैं  l 
 ईश्वर  की  प्राप्ति  उच्च  चरित्र ,  उदार  प्रकृति  और  परमार्थ परायणता  पर  निर्भर  है  l   उनका  कहना  था  कि  जो  व्यक्ति  अपने  व्यक्तिक  और  सामाजिक  कर्तव्यों  का  पालन   निष्ठापूर्वक  करता  है  वही  सच्चा  धर्म परायण  है   l  वे  पूजा - पाठ  द्वारा  पाप - फल  न  मिलने  का  बहकावा  नहीं  देते  थे   l  '
  उनका   कहना  था   कि  भक्ति  की  पूर्णता  और  सार्थकता  के  लिए   मनुष्य  का  व्यक्तिगत  और  सामाजिक  आचरण  शुद्ध ,  सच्चरित्र ,  ईमानदार ,  नेक  और  पवित्र   होना  चाहिए  l 

5 April 2018

WISDOM ----- जनता सदैव जागरूक रहे ----- कन्फ्यूशियस

  कन्फ्यूशियस  का  कहना  था  कि  अत्याचारी  शासक  चीते  से  भी  अधिक  भयंकर  होता  है  l  अत्याचारी  शासन  में  रहने  की  अपेक्षा   अच्छा  है  कि  किसी  पहाड़ी  अथवा  वन  में  रह  लिया  जाये  l  किन्तु  यह  व्यवस्था  सार्वजनिक  नहीं  हो  सकती   l  इसलिए  जनता  को  चाहिए  कि  वह  अत्याचारी  शासन  का  समुचित  विरोध  करे   और  सत्ताधारी  को   अपना  सुधार  करने  के  लिए   विवश  करने  का  उपाय  करे  l '
 कन्फ्यूशियस   का  स्पष्ट  मत  था  कि   --- अत्याचारी  शासन  को  भय  के  कारण  सहन  करने  वाला  समाज   किसी  प्रकार  की  उन्नति  नहीं  कर  पाता  l  विकासहीन  जीवन   बिताता  हुआ   वह  युगों  तक  नारकीय  यातना  भोगा  करता  है   तथा  सदा  सर्वदा   अवनति  के  गर्त  में  पड़ा  रहकर  जिस - तिस  प्रकार   जीवन  व्यतीत  करता  रहता  है   l   अत:  दु:शासन  को  पलटने  के  लिए  जनता  सदैव  जागरूक  रहे  l  '

4 April 2018

WISDOM ----- सत्ता और धन के सदुपयोग से ही मानव - जाति का कल्याण होगा

  प्राय:  ऐसा  देखा  जाता  है  कि  जब  कोई  साधारण  स्थिति  का  मनुष्य  संयोगवश  ऐसा  उच्च  स्थान  पा  जाता  है   तो  वह  अपनी  अवस्था  को  भूलकर  अभिमानी  और  स्वार्थी  बन  जाता  है  और  अपनी  सम्पति  और  साधनों  का  स्वयं  ही  अधिकाधिक   उपयोग  करना  चाहता  है   l  ऐसे  व्यक्ति  निश्चित  ही  बड़े  संकीर्ण  और  अदूरदर्शी  होते  हैं  l  वे  इतना  नहीं  सोच  पाते  कि   सौभाग्य  की  स्थिति  को  अविचल  या  अटल  समझ  लेना  बुद्धिमानी  नहीं  है  l  न  मालूम   कब  वह  बादल  की  छाया  की  तरह  विलीन  हो  जाये   l  इसलिए  स्वहित  की  बात  यही  है  कि   ऐसा  अवसर  पाकर  उसका  सदुपयोग   अधिकाधिक  परोपकार  और  दूसरों  के  साथ  भलाई  के  लिए  ही  किया  जाये  ,  जिससे  प्रत्येक  परिवर्तित  दशा  में   आत्मसंतोष  बना  रहे   l   
  महारानी   अहिल्याबाई  का  चरित्र  इस  द्रष्टि  से  आदर्श  था  l   एक  साधारण  ग्रामीण  कन्या  से  वे  इंदौर  की  महारानी  बनी   l  इतना  बड़ा  दर्जा  पा  लेने  पर  भी  उनमे  अहंकार  नहीं  था  l  उन्हें  जो  कुछ  धन , मान  मिला  उसका  उपयोग  उन्होंने  सदैव  दूसरों  के  हित  के  लिए  किया  l   दीन - हीन , विधवाएं , अनाथ , निर्धन   व्यक्ति  उनकी  करुणा  के  मुख्य  आधार  थे   l  धन  और  सत्ता  के  सदुपयोग  का   उन्होंने  एक  ऐसा  महान  आदर्श  उपस्थित  किया   जिसकी  गुण गाथा  हमेशा  गाई  जाएगी  l   यदि  हमारे  अनेक  छत्रधारी  इस  पथ  पर   चले  होते   तो  यह  पृथ्वी  क्लेश  और  कष्टों  के  बजाय  आनन्द  और  शान्ति  का  आगार  बनी  दिखाई  पड़ती   l   

3 April 2018

WISDOM --- जन - आन्दोलन प्राय: उसी स्थिति में गति पकड़ते हैं जब उसके द्वारा जनता की किसी समस्या का समाधान होता हो

   वर्ष  1905  जब  देश  पर  लार्ड  कर्जन  का  कूटनीति पूर्ण  शासन  चल  रहा  था  l  वे  जब  से  भारत  के  वायसराय  बन  कर  आये  थे  , तब  से  यहाँ  की  जन - जागृति  को  दबाने  की  तरकीबें  कर  रहे  थे  और  उनका  अंतिम  प्रहार  था -- 19  अक्टूबर  1905  को   बंगाल  का  विभाजन  l  उस  समय  जनता  में   विदेशी  शासकों  के  प्रति  विद्रोह  का  भाव  अपने  चरम  बिन्दु  पर  था  l  देश  भर  में  आन्दोलन  चला  l  ज्यों - ज्यों   आन्दोलन  गति  पकड़ता  गया   सरकार  का  दमन - चक्र  भी   क्रूर  और  दानवी  होता  गया  l 
     '  जन - भावनाओं  का  दमन   वह  भी  आतंक  के  बल  पर  ,  कोई  भी  सरकार  सफल  नहीं  रही  है  l   इतिहास  इस  बात  का  साक्षी  है   l  मन  की   पाशविक  प्रक्रिया  विद्रोह  की  आग  को   कुछ  क्षणों  के  लिए  भले  ही  कम  कर  दे  ,  परन्तु  वह  अन्दर  ही  अन्दर  सुलगती  रहती  है   और  जब  विस्फोट  होता  है   तो  बड़ी  से  बड़ी  संहारक  शक्तियां   और  साम्राज्य  ध्वस्त  हो  जाते  हैं  l  
  शताब्दियों  से    भारतीय  समाज  पर  किये  जाने  वाले  अत्याचारों  की   भी  प्रतिक्रिया   अन्दर  ही  अन्दर  सुलगती  रही    और  बंग - भंग  योजना  का  प्रतिरोध  करते  समय  फूट  पड़ी  l  उस  समय  देश  का  बच्चा - बच्चा   आततायी  के  सामने  खुल  कर  मुकाबला  करने  के  लिए   आ  खड़ा  हुआ   l