7 September 2018

WISDOM ------ मानसिक गुलामी से आजादी जरुरी है

  केवल  शारीरिक  द्रष्टि  से  आजाद  होना  पर्याप्त  नहीं  है  l  यदि  कोई  व्यक्ति , समाज  अथवा  देश  अपने  को  गुलाम  बनाने  वाले  की  नीतियों पर  चल  रहा  है ,  उनकी  भाषा ,    उनके  तौर - तरीके  और  उनकी संस्कृति  को  अपना  रहा  है  ,  तो  इसका  अर्थ  है  कि  वह  अभी  तक  गुलाम  है  l 
 अंग्रेजों  ने  भारत  में  '  फूट  डालो  और  राज  करो  '  की  नीति  अपनाई  l   उन्होंने  भारत  की  जिन  रियासतों  अथवा  प्रान्तों  पर  विजय  पाई , वह  उन  पर  खुला  आक्रमण  कर  के  अर्जित  नहीं  की  ,  बल्कि  आपस  में  फूट  डालकर   और  बाद  में  किसी  एक  दल  का  पक्ष  लेकर  अपनी  कुटिल  नीति  के  सहारे  अपनी  जड़ें   जमाई  l   फ्रेडरिक जॉन  शीअर  नामक  एक  अंग्रेज   ने   1835  में  अपने  एक  लेख  ' इंडियन  आर्मी ' में  लिखा  था ---- " हिन्दुस्तानियों  में  राष्ट्राभिमान  तो  है  ,  पर  वे  कभी  एक  नहीं  हो  सकते  l  यही  हमारे  साम्राज्य  की  सामर्थ्य  है   l "
 अंग्रेजों  की  भेद  नीति  यानि  की  संगठन  को  विघटन  में  बदलने  की  कुटिल  नीतितीव्र  गति  से  चलती  गई  और  उसी  गति  से  उनका  साम्राज्य  भी  बढ़ता  गया  l   भारत  में  1857  में  हुए  स्वतंत्रता  संग्राम   से  ब्रिटिश  राज  कैसे  बच     गया  ,  इसकी  मीमांसा  सर  जॉन  सीली ने  इस  प्रकार की  है  ----"एक  जाति  के  खिलाफ  दूसरी  जाति  को  लड़ाकर  ही  बहुतांश  में  यह  गदर  मिटाया  गया  l "  जॉन  सीली  ने   अपने  एक  ग्रन्थ  'द  एक्सपैंशन  ऑफ  इंग्लैंड '  में  व्यक्त  किये  l  उन्होंने  आगे  लिखा  है ---- " जब  तक  यहाँ  के  लोग   सरकार  की  आलोचना  करने  और  उसके खिलाफ  बगावत  करने   के  आदी  नहीं  हो  जाते  ,  तब  तक  इंगलैंड  में  बैठकर  मजे  से  हिंदुस्तान  पर  हुकूमत की  जा  सकती  है   लेकिन  यदि  यहाँ  के  लोगों  में  संघर्ष  करने  की  भावना  पैदा  हो  गई  ,  उन्हें  संगठित  होकर  रहना  और संगठित  रहकर  काम  करना  आ  गया   तो उसके  आगे  हमें  अपने  प्रभुत्व  के  कायम  रहने  की  आशा   बिलकुल  छोड़  देनी  चाहिए  l  "
                          जब  तक  जागरूकता  न  हो  पुरानी   आदतें  छूटती नहीं  है   l   युगों  तक  भारतीय  आपस  में   लड़ते  रहे  ,  बिना  जागरूकता  के  आपस  में  लड़ने  की  यह  आदत  कैसे  छूटे   ?

5 September 2018

WISDOM -----

 नवयुवकों  को  स्वार्थ  एवं  ईर्ष्या  से  बचे  रहने  की  सलाह  देते  हुए  स्वामी  विवेकानंद  कहते  हैं ----- "  केवल  वही  व्यक्ति  सब  की  अपेक्षा  उत्तम  रूप  से कार्य  करता  है  ,  जो  पूर्णतया  निस्स्वार्थी  है ,  जिसे  न  तो  धन  की  लालसा  है  ,  न  कीर्ति  की   और  न  एनी  किसी   वस्तु  की  l  मनुष्य  जब  ऐसा  करने  में  समर्थ  हो  जाता  है   तब  वह  भी  एक  बुद्ध  स्तर  का  बन  जाता  है   और  उसके  भीतर  एक  ऐसी  शक्ति  प्रकट  होती  है  ,  जो  संसार  की  अवस्था  को  सम्पूर्ण  रूप  से  परिवर्तित  कर  सकती  है   l  "
  स्वामीजी  कहते  हैं ---- लेकिन  इसके  लिए  तुम   पहले  से  ही  बड़ी - बड़ी  योजनायें  न  बनाओ  ,  धीरे - धीरे  कार्य  प्रारम्भ  करो  ,  जिस  जमीन  पर  खड़े  हो  ,  उसे  अच्छी  तरह  से  पकड़  कर   क्रमशः  ऊँचे  चढ़ने  का  प्रयत्न  करो   l  एकाएक  मंजिल  को  पाने  का  प्रयास  मत  करो   l  '
 उन्होंने कहा --- " यदि  भारत  का  भविष्य  उज्ज्वल  करना  है   तो  इसके  लिए  आवश्यकता  है  संगठन  की ,  शक्ति  संग्रह  की  और  बिखरी  हुई  इच्छा  शक्ति  को  एकत्र  कर  उसमे  समन्वय  लाने  की  l  इसलिए  तुम  सब   एक  मत ,  एक  विचार  के  बन  जाओ  l  '

4 September 2018

WISDOM ----- मन को सशक्त बनाकर प्रतिकूलताओं में भी हम अपना अस्तित्व बनाये रख सकते हैं और स्वस्थ बने रह सकते हैं

पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने   लिखा  है     ---- " मन  मुख्य   है     और  शरीर  गौण  l  मन   की    समझदारी  से  ही  शरीर  की  अस्त व्यस्तता  दूर  हो  सकती  है  l     शरीर  के  परिपुष्ट  होने  से   मनोविकार  दूर   नहीं  किये  जा  सकते  l  शरीर की  सामर्थ्य  तुच्छ  है  ,   मन की  महान   l   मन  का  शासन शरीर  पर  ही  नहीं ,  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र  पर  है  l  "
पुस्तकीय  ज्ञान ,  भाषण ,  सेमिनार  आदि   की  अपनी  उपयोगिता  है   लेकिन   यह  बहिरंग  की  शिक्षा  है  ,  इससे मन  की  शक्ति  को  नहीं  बढाया  जा  सकता   l  भगवान  गीता  में  कहते  हैं  कि  अपने  मनोबल  को  बढ़ाने के  लिए  मनुष्य  को  स्वयं  ही  प्रयास  करना  होगा  l  अपनी  आदतों , कामना , वासना ,  ईर्ष्या , द्वेष  आदि  विकार ,  जो  मनुष्य  को  पतन  की  और  ले  जाते  हैं  ,  इन्ही  विकारों  से  स्वयं  को  बचाना  होगा  l  
         जिनका  भोगवादी  चिंतन  हैं  वे  कहते  हैं ---- परिस्थितियां  ठीक  कर  दो ,  मन  स्वत:  ही  ठीक  हो  जायेगा  l  यदि  ऐसा  होता  तो  वे  देश  जहाँ  सारी  भौतिक  सुख  सुविधाएँ  हैं  ,  अनुकूल  वातावरण  है ,  स्वच्छता  है ,  वहां  लोगों  का  मन  इतना  अशांत  क्यों  है  ?  इतने  मनोरोग ,  डिप्रेशन  के  रोगी  क्यों  बढ़  रहे  हैं   ?      चाहे  कितने  भी  अनुकूल  साधन  हमें  जुटाकर  दे  दो  ,  लेकिन  यदि   हमारी  मन:  स्थिति  कमजोर  है   तो  इनसे  कुछ  भी  लाभ  न  होगा  l    ये  सब  सुख सुविधाएँ  कमजोर  मन: स्थिति  के  लोगों  को  अपयश  और  वासनात्मक  जीवन  की  और  धकेल  देंगी   l 
 हमारा  मन  ही  हमारा  मित्र  है  ,  अपने  आपको  नीचे  नहीं  गिरने  देना  चाहिए  l  

3 September 2018

WISDOM ---- ईश्वर हमारे सामने हों तब भी मनुष्य अपने अज्ञान के कारण उन्हें पहचान नहीं पाता

 मनुष्य  देह  धारण  कर   ईश्वर  धरती  पर  आते  हैं  लेकिन  मनुष्य   अपने  स्वार्थ ,  अहंकार  और  अपने  ही  संसार  में  इस  तरह  डूबा  रहता  है  कि  वह  उन्हें  पहचान  नहीं  पाता  l   बड़ी - बड़ी  अवतारी  लीलाएं  करने  के  बाद  भी  लोग   भगवान  श्रीकृष्ण  को    समझ  नहीं  पाए   l  दुर्योधन  हो  ,  शिशुपाल  हो  या  धृतराष्ट्र   सभी  उन्हें  मनुष्य  भाव   में  ही  मानते  रहे   l  किसी  ने  उन्हें   यादव पुत्र  कहा ,  किसी  ने  ग्वाला ,  किसी  ने  मायाजाल  फ़ैलाने  वाला  कहा  l   दुर्योधन  ने  तो  संधि  के  लिए  गए   श्रीकृष्ण  के  लिए  सारा  जाल  ही  बुन  दिया  था  कि  यहीं  इस  ग्वाले  के  बेटे  को  खत्म  कर  दिया  जाये  l  भगवान  ने  जब   अपना   विराट   रूप  दिखाया ---  ' हाँ   दुर्योधन  बाँध  मुझे ,  जंजीर  बढ़ा  कर  साध  मुझे
                            यह  देख गगन  मुझमे  लय  है ,  यह  देख  पवन  मुझमे  लय ----------
 विराट  रूप  को  भी  अहंकारी  दुर्योधन  ने  मायाजाल  कहा   l  बाद  में  जब   थोड़ा  होश  आया   तो  कहता  है --- जानामि  धर्म  न  च  मे  प्रवृति  ,  जानामि  अधर्म  न  च  मे  निवृति  l
 दुर्योधन ने  कहा --- मैं  धर्म  को  जानता  हूँ  किन्तु  उस   ओर  मेरी  प्रवृति  नहीं  है  ,  मैं  अधर्म  को  भी  जानता  हूँ  पर  उससे  मैं  मुक्त  नहीं  हो  पा  रहा  हूँ l l 

  अज्ञानी  ऐसा  ही  होता  है    l 

2 September 2018

WISDOM ----- संत कबीर --- मानव - मात्र एक समान

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         iksFkh if<+&if<+ tx eqvk] iafMr Hk;k u dks; A
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  कबीर  की  ख्याति  चारों  ओर  सिद्ध पुरुष की थी ] एक शिष्य ने पूछा --- आप जब साधारण थे तब कपड़ा बुनना ठीक था ] पर अब आप एक सिद्ध पुरुष हैं ] निर्वाह की कमी नहीं फिर कपड़ा क्यों बुनते हैं \ कबीर ने सरल भाव से कहा --- पहले मैं पेट पालने के लिए बुनता था ] पर अब मैं जन समाज में समाए भगवान का तन ढकने और अपना मनोयोग साधने के लिए बुनता हूँ   
 
 
  

1 September 2018

WISDOM ----- चाणक्य और कूटनीति

  चाणक्य  का  नाम  कूटनीति  के  लिए  विश्व विख्यात  है  l   एक  बार  एक  राजा  उनसे  मिलने  पहुंचे  और   राजनीति  से  संबंधित  प्रश्न  करने  लगे  l  उन्होंने  पूछा ---- " कोई  राज्य कैसे  अपराजित   रह  सकता
 है  ?"  चाणक्य  ने  उत्तर  दिया  ---- " चरित्र  बल  से  l  यदि  शासन  करने  वाले  का   चरित्र  श्रेष्ठ  होगा   तो  उसकी  कही  गई   बातों  का  प्रभाव  पड़ेगा  ,  अन्यथा   राजपाट  की  लिप्सा  वाले  लोग   उसके  आसपास   जम  जायेंगे  और  कुराज  प्रारंभ  हो  जायेगा   l  " 
  राजा  ने  आगे  पूछा ---- "  शासन   सँभालने  वाले  में   क्या  गुण  होने  चाहिएं  ? "
 चाणक्य  बोले  ---- " उनमे  आपस  में   मतभेद   नहीं  होना   चाहिए   और  यदि  हो ,  तो  दीखना  नहीं  चाहिए  l  उनमे  प्रजा  के  दुःख - दरद  का  भान ,  मित्र - शत्रु  का  बोध   और  राष्ट्रीयता  की   भावना  होनी  चाहिए   l   यही  गुण  किसी  भी  शासन  को  स्थायित्व  प्रदान  करते  हैं   l  

28 August 2018

WISDOM ----- अध्यात्म का अर्थ है -- अपने आपको सुधारने , अपने आपको समुन्नत करने की विधा ----- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

    अध्यात्म  का  अर्थ  है --- अपने  आपको  सही  करना ----- साइंस  ऑफ  सोल   l   चमत्कार ,  जादूगरी  व  सिद्धियों  का  विज्ञान नहीं  है  l   यदि  मनुष्य  अपने  आपको  सही  कर  ले    तो  सभी  समस्याओं  का  हल  स्वत:  ही  हो  जाता  है   l  अध्यात्म  हमें  प्रशिक्षण  देकर  जीवन  जीना  सिखाता  है   l   केवल  धैर्य  और  संयम  की  जरुरत  है  ------ गांधीजी  जब  तीस  वर्ष  के  थे   , उनकी  आंते  सूख  गईं  थीं   l  रोज  एनीमा   लेकर  पेट  साफ  करते  थे  l  उनने  लिखा  है   कि  जब  वे  दक्षिण  अफ्रीका  में  थे   तो  सोचते  थे  कि  यही  कोई  पांच  वर्ष   और  जियेंगे  l  एनीमा  सेट  कोई  उठा  ले  गया   व  जंगल  में  फंस  गए   तो  बेमौत  मारे  जायेंगे   l  जिन्दगी का  अब  कोई  ठिकाना  नहीं  है   l  लेकिन  ऐसा  नहीं  हुआ  l  गांधीजी  ने   आहार -  विहार  का  संयम    कर   अपने  आपको  ठीक  कर  लिया ,  सुधार  लिया  ,  तो  आंते  भी  उसी  क्रम  से  ठीक  होती  गईं  l   80  वर्ष  की  उम्र  में  उनकी  मृत्यु  हुई   l  मृत्यु  से  पहले  वे कहते  थे   कि  अभी  हम  120  साल  तक  जियेंगे  l   यदि  गोली  न  लगी  होती  तो  अवश्य  इतने  वर्ष   जिए  होते   l 
  आचार्य  जी  का  मत  है  कि  ---- मनुष्य  अपनी  बीमारी  के  लिए  स्वयं  जिम्मेदार  है   l  यदि  वह  अपनी  जीभ  को  छुट्टल  सांड  की    तरीके  से    न  छोड़कर  उस  पर  काबू  करना     सीख  जाये  तो  कभी   बीमारी  नहीं  होगी   l