16 September 2018

WISDOM ------ सम्पति का सदुपयोग जरुरी है

' आवश्यकता  से  ज्यादा   एकत्रित  सम्पदा   स्वयं  के  लिए  और  परिवार  के  लिए   पतन  का  कारण  बनती  है   I  '      आज    के  समय  में   भोग - विलास  का  जीवन   जीना  और  उसके  लिए  हर  तरह  के  अनैतिक  प्रयासों  में   निरत  रहना  ही   लोगों  की  मानसिकता  है  I इस  कारण  जीवन  मूल्य  तो  गिरते  ही  हैं  ,  शोषण ,  लूट - खसोट ,   ,  अपराध ,  आर्थिक  विषमता ,  आतंक ,  अपराध ,  लाइलाज  बीमारियाँ    आदि   समस्याएं  उत्पन्न  हो  जाती  हैं 
      एक  शिष्य  ने  गुरु  से  पूछा  ----  "  सम्पति  का  सदुपयोग  न  करने  पर  क्या   होता    है  I "
  गुरु  ने  उत्तर दिया --- वत्स  !  तुमने  रेशम  का  कीड़ा  देखा  है  ?  एक  रेशम  का  कीड़ा  रेशम  इकट्ठी  कर  के  भारी - भरकम  हो  जाता  है   और  अपने  ही  बनाये  जाल  में  जकड़कर  मर  जाता  है  I  उसके  पास  की  जमा  पूंजी   दूसरों  का  जी  ललचाती  है   और  वे  लालची  उसके  ही  जीवन  का  नाश  करते  हैं   I
             धन  का  सदुपयोग  न  करने  वाले  सम्पतिवान   भी  उस  रेशम  के  कीड़े  की  तरह  हैं  ,  जो  स्वयं  तो   आवश्यकता  से  अधिक  सम्पति  का  उपयोग  कर  नहीं  पाते,  परन्तु  इसके  कारण  मात्र  लालचियों  और  दुष्टों  के  भरण - पोषण  का  माध्यम  बनते  हैं   I

15 September 2018

WISDOM ----- बड़े आदमी बढ़ रहे हैं , लेकिन महामानव अब नहीं मिलते

 अब  ऐसे  व्यक्तियों  को  ढूंढ  पाना  बहुत  मुश्किल  है  , जिन्हें  सच्चे  अर्थों  में  मनुष्य  कहा  जा  सके   I  अपराध  तो  अपराध  है  चाहे  छोटा  हो  या बड़ा  I   जो  जितना  ज्ञानवान  है  वो  इस  ढंग  से  अपराध  करेगा
  कि  वह   बच   जाये ,  उसका  कहीं  नाम  भी  न  आये   और  उसके  किये  अपराध  में    सोची   समझी  योजना  के  अनुसार   दूसरा  फंस  जाये   l अब  अपराध   एक  शानदार   कृत्य ,  एक  फैशन     बन  गया  है  ,  इसे  कर  के  अब  कोई  लज्जित  नहीं  होता  ,  बल्कि  अपनी  चतुरता  की  प्रशंसा    पाने  की  आशा  करता  है   और  जो  इसमें  सम्मिलित  नहीं  होता  वह  बुद्धू  और  त्यागने  योग्य  है   l  इसी  वजह  से   समाज  में  अनेक  कठिनाइयाँ  और  समस्याएं  बढ़  गईं  हैं   I  

14 September 2018

WISDOM ------

 मनुष्य  के  व्यक्तित्व  की  पहचान  उसके  ऊँचे  उद्देश्यों एवं  धार्मिक  मूल्यों  के  प्रति  निष्ठां  से  होती  है    प्रतिकूल  परिस्थितियों  में   सच्चे  आदर्शों    के  प्रति  अडिग  निष्ठा  दिखाने  का  साहस  विरले  ही   कर  पाते  है    l   महात्मा  गाँधी  ने     स्वतंत्रता  आंदोलन   में  मूल्यों  को  जीवित  रखा  I  आजादी  के  बाद      अहिंसा और  अपरिग्रह   का  जो  मूल्य  अपनाया   उसे  अंत  तक  जीवित  रखा   l

13 September 2018

WISDOM- --- भजन - उपासना भावनाओं से करें

 भजन - जप - उपासना  का   लाभ  और  आनंद  उन्ही  को   मिलता    है   जो  उसे  अपने  अन्दर  आत्मसात  करते  हैं  ,  ह्रदय  की गहराई  के  साथ  करते  हैं  l  शब्द  कुछ  भी  हों  , लेकिन  यदि  भावनाएं  पवित्र  हैं , सच्ची  हैं   तो  उसका  लाभ  व  आनंद  अवश्य  मिलता  है   l 
   एक  प्रसंग  है ----  एक  बार  गुरु  गोविन्द सिंह  के  शिष्यों  ने   उनसे   पूछा  ---- "  हम  प्रतिदिन    भगवान  का  भजन करते  हैं  , पर  हमें  कोई लाभ  नहीं  होता   " l     गुरु  गोविन्द सिंह  जी  बोले --- "  इस  प्रश्न  का  उत्तर  मैं  कुछ  समय  बाद  दूंगा  l 
  कुछ  दिनों  बाद  उन्होंने  अपने  शिष्यों  को  बुलाकर  कहा ---- " तुम  सभी मिलकर  एक  बड़े  मटके  में  ताड़ी  भरकर  लाओ  और  फिर  उससे  कुल्ला   कर    के  मटका  खाली  कर  दो  l  "   शिष्यों  ने  आज्ञानुसार  वैसा  ही  किया l    पहले   मटके  में  ताड़ी  भरकर  लाये   फिर  उससे  कुल्ला  कर  के  पूरा  मटका  खाली  कर  दिया   और  गुरु  के  पास  पहुंचे   l 
  गुरु  ने  पूछा ---  " क्या  तुमने पूरी   ताड़ी  समाप्त  कर  दी   ? "    शिष्यों  ने  कहा  --- आपकी   आज्ञा  नुसार    हमने  ताड़ी  से  कुल्ला  कर  के  पूरा  मटका  खाली   कर  दिया   l "
  अब  गुरूजी  ने कहा ---- "  "  इतनी  ताड़ी  थी  तुम  लोगों  को  नशा  नहीं  हुआ   l  "
 शिष्यों  को  आश्चर्य  हुआ  ,  वे   बोले  --- "  गुरुदेव  !   हमने  ताड़ी  से  केवल  कुल्ला किया  ,  उसको  गले  से  नीचे   नहीं  उतारा,   तो  नशा  कैसे  होगा   ?  " 
गुरु  गोविन्द सिंह  ने  उनकी  इस  बात से    उनके  प्रश्न  का  उत्तर  देते  हुए  कहा   ---"  शिष्यों  !  तुमने  भगवान  का   भजन  तो  किया  लेकिन   ऊपर - ऊपर  से  ,  उसे  गले  से  नीचे  नहीं   उतारा  l  जब  तक  भगवद  भजन  के  साथ  तुम्हारा  मन  नहीं  जुड़ेगा  ,  तब  तक  तुम्हे  कोई  लाभ  नहीं  होगा  l  "

12 September 2018

WISDOM ---- जो पूर्णतया निस्स्वार्थ है वही सच्चा प्रजापालक हो सकता है

   एक  प्रसंग  है ----  राजा  अश्विनी दत्त  को  अपने  महल ,  धन - सम्पति  व  रानी  से  अत्यंत  मोह  था  l  उसका  यह  मोह  शनै; - शनै:  बढ़ता  ही  जा  रहा  था   और  इस  कारण  उन्होंने  राज कार्य  पर  ध्यान  देना  बंद  कर  दिया  था  l  यह  देखकर  प्रधानमंत्री  बहुत  परेशान  हुए   और  वे  अपनी  चिंता  कुलगुरु  संत  नागानंद  के  समक्ष  रखने  पहुंचे   l  मंत्री  के  अनुरोध  पर   कुलगुरु  राजा  से  मिलने  राजमहल  आये   l    राजा  ने  उनका  भव्य  स्वागत   किया  l  उन्हें  अनेक  उपहार  भी  भेंट  किये  l 
             प्रत्युतर  में   कुलगुरु  ने   राजा  को  एक  कमल  का पुष्प  भेंट  किया   और  कहा  ---- "  राजन  !  तुम्हारा  उपहार  कमल  की  पंखुड़ियों  के  भीतर  है  l  "  राजा  ने  कमल  कि  पंखुड़ियाँ   हटाईं  तो  उन्हें  वहां  एक  भौंरा   मरा   दिखाई  पड़ा  l  राजा  कुलगुरु  के   इस  उपहार  का   अर्थ  समझ  नहीं  पाए  l  उनकी  उत्सुकता  को  भांपकर   कुलगुरु  बोले ---- "  राजन  !  यह  साधारण  भौंरा  नहीं  है  ,  यह  राजभौंरा   है   l   राजभौंरे  में  इतना  सामर्थ्य  होता  है   कि  वह  चाहे  तो  कठोर  लकड़ी  को  छेदकर   निकल  जाये  ,  परन्तु  वही  भौंरा   कमल   पर  आसक्त  हो  जाता  है   तो  उसकी  पंखड़ियों   के  मध्य  फंसकर   अपनी  जान  गँवा  बैठता  है   l  "    राजा  को  कुलगुरु  का  कथन  समझ  में  आ  गया   और  वह  मोह  छोड़कर  प्रजापालन - कर्तव्य   में  जुट  गए  l 

11 September 2018

WISDOM ----- भारतीय संस्कृति का सम्बन्ध संवेदना से है , इस कारण यह 'आध्यात्मिक संस्कृति ' है

   प्रसिद्ध  कवि  इकबाल  ने  कहा  है ---- यूनान , मिस्र  और  रोमा ,  सब  मिट  गए  जहाँ  से  l 
                                                          अब  तक  मगर  है  बाकी,  नाम - ओ--निशाँ  हमारा   l l 
                                                           कुछ  बात  है  कि  हस्ती  मिटती  नहीं  हमारी   l 
                                                            सदियों  रहा   है  दुश्मन , दौर - ए - जहाँ  हमारा  l l 
  भारतीय  संस्कृति  को  मिटाने  के  लिए  बहुतों  ने  प्रयत्न  किये ,  षड्यंत्र  किये   परन्तु  इसे  मिटाया  जा  सकना  संभव  नहीं      क्योंकि     भारतीय  संस्कृति  का आधार    आध्यात्मिक  है  l  इसकी  नींव  ऋषियों  की  तपस्या  की  ऊर्जा  से   रखी  गई  है   l   यही  कारण  है  कि   भारत  के  गुलाम  होने  पर  भी   स्वामी  विवेकानंद   अमेरिका  में  भारतीय  संस्कृति  का  डंका  बजा  सके   l 
 स्वामी  विवेकानंद  कहा  करते  थे ---- आदर्श  को  पकड़ने  के  लिए   एक  सहस्त्र  बार  आगे  बढ़ो   और  यदि  फिर  भी   असफल  हो  जाओ   तो  एक  बार  नया  प्रयास  अवश्य  करो  l  इस  आधार  पर  सफलता  सहज  ही  निश्चित  हो  जाती  है   l  

10 September 2018

WISDOM ---- धर्म का मर्म है ----- अन्याय का प्रतिकार , अनीति का विरोध और आतंक का उन्मूलन

 ऋषियों  ने  ,  आचार्य  ने  कहा  है ---- कर्तव्य  ही  धर्म  है ,  यही  सच्चा  कर्मयोग  है  ,  लेकिन  यह  विवेकपूर्ण  होना  चाहिए   l 
  महाभारत काल  में   भीष्म  पितामह   की  धर्म  पर  गहरी  आस्था  थी ,  वे  समर्थ  और  शक्तिशाली  योद्धा  थे   लेकिन    धर्माचरण   करने  वाले  भीष्म   ने    अत्याचार  करने  वाले ,  पांडवों  के  विरुद्ध  हमेश  षड्यंत्र  रचने  वाले  दुर्योधन  का ,    अधर्म  का  साथ  दिया ,  द्रोपदी  के   चीर   हरण  पर  मूक  दर्शक बन  सिर  झुकाए  बैठे  रहे  l   अधर्म  का  साथ  देकर   न  तो  दुर्योधन  की  रक्षा  कर  सके  और  न  स्वयं  की   l 
         इसी  तरह   कुलगुरु  कृपाचार्य  थे   l  कुलगुरु  का  कर्तव्य  होता  है  --- कुल  में  धर्म  की  प्रतिष्ठा   l  कुल   के   सभी  व्यक्ति  धर्म  का  आचरण  करें ,  शुभ  कर्म  करें  l  लेकिन  धर्म  के  जानकार  होते  हुए  भी  वे    कौरवों  के    अधर्म आचरण   के    मौन  साक्षी  रहे  ,  उनका  साथ  त्यागने  की  हिम्मत  नहीं   जुटा   सके   l 
   इसी  तरह  कर्ण  महान  योद्धा  और  महादानी  था   लेकिन  उसने  भी   मित्र  मोह  में      अधर्म  का  आचरण  करने  वाले  दुर्योधन  का  साथ  दिया   l  महारानी  द्रोपदी  के  चीर - हरण  जैसी  दुर्भाग्य पूर्ण  घटना   को  भी  रोकने  का  प्रयास  उसकी  वीरता  ने  नहीं  किया  ,  वह  भी  अधर्म  के  साथ  खड़ा  रहा   l 
  इन  सभी  महारथियों  का  अत्याचार  व  अन्याय  के  सामने  प्रतिक्रिया विहीन  रहना ,  उन्हें  अधर्म  की  कसौटी  पर  खड़ा  कर  देता  है   l 
  सामान्य  अर्थ  में  पूजा - पाठ ,  कर्मकांड  करने  को  धर्म  कहा  जाता  है   लेकिन  यह  करने   की   और  धर्म  की  सार्थकता   पीड़ा  और  पतन   निवारण  करना ,  सदभाव,  सद्विचार   और  सत्कर्म  करना  है  ,  अत्याचार  और  अन्याय  से  कमजोर  की  रक्षा  करना  है   l