26 October 2018

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता l नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ll

  ऋषियों  का ,  आचार्य  का  मत है  कि    जो   व्यक्ति  प्रत्येक  रात्रि  को   सोते  समय   गायत्री  मन्त्र  का  जप  करे  ( भगवत्स्मरण )   करे   तो  उसके  जीवन  की  निद्रा   से  सम्बंधित  समस्याएं ,  अनिद्रा  आदि  व्याधियाँ,  बीमारियाँ  समाप्त  हो  जाती  हैं    और  अध्यात्म  के  क्षेत्र  में  भी  आगे  बढ़ते  हैं   l
  इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है -----  एक  व्यापारी  था  ,  वह   व्यापार    के  सिलसिले  में   एक  नगर  से  दूसरे  नगर  जाता  था   l  इस  बार  वह  अमरकंटक  जा  रहा  था ,  रास्ते  में  सोच  रहा  था  -- " मैंने  जीवन पर्यंत  पाप  ही  पाप  किये  हैं  ,  मदिरापान , वेश्यागमन , मिथ्या भाषण  में  मैं  सबसे  आगे  रहा  l "  ऐसा  चिन्तन  करते  हुए  वह  अमरकंटक  पहुँच  गया   l  संयोगवश  उस  दिन शिवरात्रि  थी   l  मंदिरों  में  अभिषेक , पूजन ,  अर्चन   देखकर  उसे  विचित्र  अनुभव  हुए   क्योंकि  उसने  कभी  इस  तरह  के  कार्य  नहीं  किये  थे   l  यह  सब  देखकर  उसे  विलक्षण  शांति  का  अनुभव  हुआ   l  रात्रि  का  समय  था  ,  वह  मंदिर  के  बाहर  ही     जमीन  पर  लेट  गया   l    उसे  अपने  दूषित  कर्मों  पर  दुःख  हो  रहा  था  ,  साथ  ही  मंदिर  में  होने  वाले   अभिषेक , अर्चन  आदि  से  ईश्वर  का  पवित्र  नाम  उसके  कानों  से  ह्रदय  में  जा  रहा  था  l  शीघ्र  ही  उसे  गहरी  नींद  आ  गई  l  वहां  उसे  एक  काले नाग  ने  काट  लिया   l  लोगों  ने  उसकी  चेतना  लौटाने  के  लिए  अभिषेक  का  पवित्र  जल   उसके  मुँह  पर  छींटा, किन्तु  उसके  प्राण  निकल  चुके  थे  l
      चित्रगुप्त  महाराज  ने  उसके  कर्मों  का  लेखा  पढ़ते  हुए  यमराज  से  कहा  ---- "  यह  महान  पापी  है  ,  इसे  घोर  नरक  में  कष्ट  सहने  के  लिए  डाला  जाये  l  "  किन्तु  चित्रगुप्त  , यमराज  व  दूतों  को  बहुत  आश्चर्य  हुआ   कि  नरक  के  कष्टों  से  उसे  कोई कष्ट  ही  नहीं  हुआ  ,  वह  तो  शांत  और  सुरक्षित  है  l
उसी  समय  नारदजी  आ  गए  ,  उन्होंने कहा --- "   इसमें  आश्चर्य  की  कोई  बात  नहीं  है   l  उसने  निद्रा  में  भगवन   शिव  का  चिंतन   करते  हुए  प्राण  त्यागे ,   उसके  मन  में   अभिषेक , पूजन   अर्चन  के  पवित्र  भाव  के  साथ  अपने  दूषित  कर्मों  के  लिए   प्रायश्चित  भाव  होने  के  कारण  उसका  मन  पवित्र  है l  इसलिए  अब  उसे  नरक  का  कोई  कष्ट  नहीं  है   l  "  रात्रि  को  और  अपने  जीवन  की  अंतिम  निद्रा  को  संवार  लेने  के  कारण  उसका  कल्याण  हुआ  l 
  आचार्य  कहते  हैं -- ईश्वर  को    पवित्र  भावना   प्रिय  है ,  लेटे - लेट  भी  मानसिक  जप  किया  जा  सकता  है   l   

25 October 2018

WISDOM ---- नियत से नियति का निर्माण होता है

 ' नियति  व्यक्ति  के  कर्मों  का  परिणाम  होती  है   l  नियत  के  अनुसार  नियति  होती  है   l  व्यक्ति  का  उद्देश्य  क्या  है  ?  वह  जैसा  सोचता  है , करता  है   ,  वैसी  ही  उसकी   नियति  होती  है  l
  महाभारत  के  उदाहरण  से  इसे  समझा  जा  सकता  है  -----  धृतराष्ट्र   के  पुत्र  ' कौरव '   सदा  ही  षड्यंत्रकारी , फरेबी ,  झूठे   एवं  अहंकारी  थे  l  उनके  जीवन  का  उद्देश्य  अपने  को  स्थापित  करना   और  दूसरों  को  परेशान  करना  था   l  वे  घोर  अधर्मी  थे   l  पाप पूर्ण  आचरण  ही  उनकी  नीति  थी  l
     इसके  विपरीत  पांडु पुत्र   ' पांच  पांडव '  सदाचारी , , सत्य , न्यायप्रिय , त्यागी   एवं  परोपकारी  थे  l  औरों  की  रक्षा  के  लिए  वे  अपने  प्राणों  की  बाजी  लगा  देते  थे  l  धर्म  पर  उनकी  अगाध  आस्था  थी , उनकी  नीति  धर्म  पर  आधारित  थी   l  इसी  नीति  और  आचरण  के  कारण  उनकी  नियति  का  निर्माण  हुआ  l 
   महाभारत  के  युद्ध  में  पांडवों  के  साथ  भगवान  कृष्ण  स्वयं  थे   और  कौरवों के  साथ  महा  पराक्रमी  भीष्म ,  द्रोंण, कर्ण   आदि  महारथी  थे  l   परन्तु  इतने  सारे  महारथी  भी  दुर्योधन  को  विनाश  की  नियति  से  उबार  नहीं  सके  l  जबकि  पांडवों  की  नियति  धर्म  के  साथ  खड़े  होकर  विजय  प्राप्ति  की  थी   l   नियति  के  अनुसार  कौरव  मिट  गए  और  पांडवों  को  विजय पताका  फहराने  का  सुअवसर  प्राप्त  हुआ  l
     सतत  सत्कर्म ,   सदाचरण   एवं  सदभाव  के  द्वारा  हमारी  नियति   श्रेष्ठता  से  परिपूर्ण  हो  जाती  है    और  इसके  विपरीत    आचरण ,  व्यवहार  से   नियति   अत्यंत  कष्ट साध्य  बन  जाती  है  l  

24 October 2018

करुणा के महासागर ----- महर्षि वाल्मीकि

 महर्षि  वाल्मीकि  के  सन्दर्भ  में  एक  प्रसिद्ध  घटना  है  ---- एक  बार महर्षि  वाल्मीकि   तमसा  नदी  जिसे  अब  टोंक  नदी  कहते हैं  ,  के  तट  पर  अपने  शिष्य   स्नान के  लिए  गए  l   वहां  नदी  के  किनारे  पेड़  पर  क्रौंच  पक्षी  का  एक  जोड़ा   प्रेममग्न   था  l  तभी  व्याध  ने  इस  जोड़े में  से   नर  क्रौंच  पक्षी  को  अपने  बाणों  से  भेद  दिया  l  रोती  हुई  मादा  क्रौंच  भयानक  विलाप   करने  लगी   तो  करुणा  के  महासागर   महर्षि   वाल्मीकि  का  ह्रदय  इतना  द्रवित हुआ  कि  उनके  मुख  से  अचानक  यह  श्लोक  फूट  पड़ा ----
     मा  निषाद   प्रतिष्ठाम  त्वमगम:  शाश्वतीः  समा:  l
     यत  क्रौंचमिथुनादेकम वधी:  काममोहितं   l l      ( वाल्मीकि  रामायण )
 अर्थात   हे  निषाद  !  तुम  चिरस्थायी  प्रतिष्ठा  को  प्राप्त  नहीं  हो  सकोगे  ,  क्योंकि  तुमने  काममोहित   क्रौंच  का  वध  कर  दिया  l   उनकी  इस  करुणा  से  एक  महाकाव्य  ' रामायण '  का  उदय  हुआ  , जिसके  कारण  महर्षि  वाल्मीकि  विश्व  के  प्रथम  कवि     के  रूप  में  प्रतिष्ठित  हुए    l 
  रामायण  एक  अलौकिक ,  प्रेरणादायी  और  उत्कृष्ट  रचना  है  ,  जिसमें  हमें  मानवता  की  प्रतिष्ठा , दुष्टों  का  दमन , अनीति  का  प्रतिकार , नारी शोषण  का  विरोध ,  प्रकृति  चिंतन , युद्ध  कौशल  की  रणनीति ,  जीवन  प्रबंधन   और  जीवन  जीने  की  कला   व  अध्यात्म  के  गूढ़  रहस्य  आदि  के  दर्शन  होते  हैं  l 
  महर्षि  वाल्मीकि  जी  की  प्रासंगिकता  इसलिए  भी  है  कि  उन्होंने  ही  इस  धरती  से  ' वसुधैव  कुटुम्बकम '  का   उद्घोष  किया  ---
                अयं  निज:  परो  वेति  गणना  लघुचेतसाम
                उदारचरितानाम   तु  वसुधैव  कुटुम्बकम   l
 वाल्मीकि  रामायण  में  केवल  राष्ट्रहित  की  उद्घोषणा  नहीं  है  ,  बल्कि  उसमे  सम्पूर्ण  मानव  समाज   एवं   विश्व शांति  की  परिकल्पना  सन्निहित  है  l  वर्तमान  समय  में  जब  चारों  और   अशांति , असुरक्षा , भ्रष्टाचार ,  अनाचार  व  आतंकवाद  रूपी  रावण  का  आतंक  फैला  हुआ  है  ,  ऐसे  में  वाल्मीकि  रामायण  की  प्रासंगिकता  और  उपादेयता   और  भी  बढ़  जाती  है   l  

23 October 2018

WISDOM ---- जिसके जीवन की बागडोर भगवान के हाथ में हो , उसको कैसी चिंता !

 महाभारत  के  युद्ध  में  भगवान  श्री कृष्ण  अर्जुन  के  सारथी  बने  l  वे  सर्वप्रथम  अर्जुन  को  सम्मान  के  साथ  रथ  में  चढ़ाने  के  साथ  फिर  वे  रथ  में  आरूढ़  होते  और  अर्जुन  के  आदेश  की  प्रतीक्षा  करते  l   और  संध्या  को  जब  युद्ध  से  वापस  शिविर  में  लौटते  तो  पहले   भगवान श्रीकृष्ण  उतरते  फिर  अर्जुन  को  उतारते  l
 महाभारत  का  युद्ध  समाप्त  हो  गया   l  इस  बार  श्रीकृष्ण  ने  अर्जुन  से  कहा --- " पार्थ ! आज  तुम  पहले  रथ  से  उतर  जाओ  l  तुम  उतर  जाओगे  तब  मैं  उतरता  हूँ  l  " अर्जुन  के  रथ  से  उतरने  के  बाद   भगवन  कृष्ण  उतरे  और  अर्जुन  के  कंधे  पर  हाथ  रखकर  रथ  से  दूर  ले  गए  और  उसी  पल  भयानक  विस्फोट  के  साथ  रथ  जलकर  खाक  हो  गया  l   अर्जुन  को  बहुत  आश्चर्य  हुआ  l 
  भगवान  कृष्ण  ने   कहा ---- पार्थ !   पितामह  भीष्म ,  द्रोण और  कर्ण  के  दिव्यास्त्र  के  प्रहारों  से  इस  रथ  की  आयु  तो  बहुत  पहले  ही  समाप्त  हो  चुकी  थी   लेकिन  अधर्म  के  नाश  और  धर्म  की  स्थापना  में  इसके    महत्वपूर्ण  योगदान  के  कारण  मेरे  संकल्प  बल  से  यह  अभी  तक  चल  रहा  था   l  "
  भगवान  का  यह  सन्देश  आज  भी  उतना  ही   महत्वपूर्ण  है   l  हम  अपने  इस  शरीर  रूपी  रथ  का  उपयोग  संसार  में  सत्प्रवृतियों  के  प्रसार  ,   धर्म  की  स्थापना  और  ईश्वर  की  इस  बगिया  को  सुन्दर  बनाने  में  करे  l   ईश्वर  के  हाथों  का  यंत्र  बनकर  निश्चिन्त  रहें   l  

22 October 2018

WISDOM ---- क्रोध की स्थिति में व्यक्ति स्वयं अपना नुकसान करता है

 क्रोध  हर  व्यक्ति  की  शारीरिक  व  मानसिक  सेहत  के  लिए   बहुत  नुकसानदायक  है  l   जैसे  दूध  उबलने  पर   उसकी मलाई  बर्तन  से  बाहर  गिर  जाती  है  ,  ठीक  इसी  तरह  क्रोध  की  अवस्था  में  हम  अपनी  ऊर्जा  को    अन्य   परिस्थितियों  की  तुलना  में  अधिक  गंवाते  हैं   l 
  भगवान  बुद्ध अपने  शिष्यों  को  क्रोध  न  कर  के  शांत  रहने  का पाठ  पढ़ाते थे   l   एक  बार  गौतम  बुद्ध  अपने  शिष्यों  के  साथ  एकदम  शांत  बैठे  थे  l  शिष्य  चिंतित  थे   कि  इस  तरह  मौन  रहने  की  क्या  वजह  है  ?  थोड़ी  देर बाद  कुछ  दूर  पर  खड़ा  एक  व्यक्ति  जोर  से  चिल्लाया  --- " आज  मुझे  सभा  में  बैठने  की  अनुमति  क्यों  नहीं  दी  गई  ? "    इससे  अप्रभावित  भगवान  बुद्ध  मौन  बैठे रहे  l  वह  व्यक्ति  पुन:  जोर  से  चिल्लाया  l  एक  शिष्य  ने  उसका  पक्ष  लेते  हुए  कहा  कि  उसे  सभा  में  आने  की  अनुमति  प्रदान  की  जाये  l  बुद्ध  ने  आँखें  खोली  और  बोले ---- " नहीं ,  वह  अस्पृश्य  है  ,  उसे  आज्ञा  नहीं  दी  जा  सकती  l  "  शिष्यों  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  ,  वे  बोले --- " पर  हमारे  धर्म  में  जात -पांत  का  कोई  भेद  नहीं  फिर  वह  अस्पृश्य  कैसे  हो  गया  ? "
  बुद्ध  ने  स्पष्ट  किया ---- " आज  वह  क्रोधित  होकर  आया  है  l  क्रोधी  व्यक्ति  मानसिक  हिंसा  करता  है ,  इसलिए  वह  अस्पृश्य  होता  है  l  उसे कुछ  समय  एकांत  में  ही  खड़ा  रहना  चाहिए  l  पश्चाताप  की  अग्नि  में   तपकर  वह  समझ लेगा   कि  अहिंसा  ही  महान  कर्तव्य और  धर्म  है  l "
  शिष्यों  ने  एक  नया  पाठ  सीखा  और  उस  व्यक्ति  ने  क्रोध  न  करने  की  शपथ  ली  l  

21 October 2018

WISDOM ----- ईर्ष्यालु व्यक्ति अपना ही अहित करता है

 ईर्ष्यालु  व्यक्ति  न  खुद  चैन  से  रहता  है  और  न  दूसरों  को  चैन  से  रहने   देता   है  l    वह  व्यक्ति  जिससे   किसी  को  ईर्ष्या  है ,    यदि  आत्मबल  संपन्न  है ,   उसमे  विवेक बुद्धि  है   तो  वह  विभिन्न  षडयंत्रों  का  , आक्रमण  का   साहस  के  साथ  सामना  करता  हुआ  आगे  अपने  लक्ष्य  की  और  बढ़ता  जाता  है  और  सफल  होता  है  l  लेकिन  ईर्ष्यालु  व्यक्ति    अपने  हाथों  अपना  ही  नुकसान  करता  है  l  उसका  सारा  समय  व  उर्जा  व्यर्थ  के  ताना -बाना  बुनने  में  ही  खर्च  हो  जाती  है  l  दूसरों  को  देखकर  चिढ़ना -कुढ़ना  उसका  स्वभाव  बन  जाता  है  ,  ईर्ष्या  की  आग  में  जलकर  वह  स्वयं  अपना  सुख - चैन  समाप्त  कर  लेता  है   l 
 श्रीरामचरितमानस  में  एक  प्रसंग  है  ----- जब  श्री हनुमानजी  सीताजी  का  पता लगाने  के  लिए  आगे   बढ़ते  हैं  तो  उन्हें  सिंहिका  नामक  राक्षसी  मिलती  है  ,  जिसे  उन्होंने  मार  डाला    क्योंकि  वह  ईर्ष्या  का  प्रतीक  थी  l  वह  उड़ते   हुए  लोगों  की  परछाई  पकड़कर   उन्हें  खा जाती  थी   l  ऋषियों  का  मत  है  कि  ईर्ष्या  को  जिन्दा  नहीं  रहने  देना  चाहिए  l  ईर्ष्यालु  लोग  अपनी  पूरी  उर्जा  दूसरों  से  लड़ने  में   लगा  देते  हैं ,   जबकि  यदि  मनुष्य  को  लड़ना  है   तो  उसे  अपनी  किस्मत  से  लड़ना  चाहिए  ,  ताकि  वह  उसे  बेहतर  बना  सके   l    ईर्ष्या  छोड़कर  मन  को  शांत  रखने  से   जीवन  की  अनेक बड़ी - बड़ी  समस्याएं  आसानी  से  हल  हो  जाती  हैं   l 

20 October 2018

WISDOM ------ स्वयं को श्रेष्ठ व बड़ा सिद्ध करने के प्रयास में मनुष्य अपने लक्ष्य से भटकना नहीं चाहिए

 हम  सब  अपनी  जिन्दगी  में   स्वयं  को  श्रेष्ठ  व  बड़ा  सिद्ध  करने  के  लिए    आपस  में  लड़ने - भिड़ने  में  अपनी   ऊर्जा  व  समय   दोनों  को  बरबाद  कर  देते  हैं   और  अपने  लक्ष्य  से  भटक  जाते  हैं  l  रामचरितमानस  का एक  प्रसंग  है   जिससे  हमें  शिक्षा  मिलती  है  कि  हमें  व्यर्थ  के  झगड़ों  में   अपना  समय  व  ऊर्जा  बर्बाद  न  कर  ,  लक्ष्य  पर  ध्यान  केन्द्रित  करना  चाहिए  ----------  जब  श्रीहनुमानजी  सीता माता  की  खोज  के  लिए  जाते  हैं   तो  उनके  सामने  सुरसा  नाम  की  राक्षसी  आती  है  l  इन्हें  खाने  के  लिए  उसने  अपना  मुंह  बड़ा  कर के    खोला   तो  हनुमानजी  ने  भी  अपना  रूप  बड़ा  कर  लिया   और  फिर छोटे बनकर   उसके  मुँह  में  प्रवेश  कर  बाहर  निकल  गए  l  इस  आचरण  से  उन्होंने  यह  बताया  कि  वे  चाहते  तो  सुरसा  से  युद्ध  कर  के  उसे  पराजित  कर  सकते  थे  किन्तु  ऐसा  कर  के  उनका  समय  व  ऊर्जा  बर्बाद  होती  l  उनका  लक्ष्य  सुरसा  को  पराजित  करना  नहीं  था ,  उनका  लक्ष्य  था  सीता माता  की  खोज  करना  l  इसके  साथ  ही  उन्होंने   अपने  आचरण  से  यह  भी  बताया  कि  लघुरूप  अर्थात  नम्रता  ,  सदैव  विजय  दिलाती  है   l