7 February 2019

WISDOM ----- मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात दमन करने की शक्ति हूँ ----- श्रीमद् भगवद्गीता

 भगवान  श्रीकृष्ण  अर्जुन  को  यह  सच  समझा  रहे  हैं   कि  जहाँ  भी  श्रेष्ठता  का  फूल  खिलता  है  ,  वहां  मेरी  ही  उपस्थिति  है   l    इस  क्रम  में  वे  स्वयं  को  दमन  करने  वालों  का  दंड   घोषित  करते  हैं   l  
        आज  हरेक  दूसरे  को  दबाना  चाहता  है  l   थोड़ी  सी  ताकत  का  एहसास  हुआ  कि   व्यक्ति  औरों  को  दबाने  का  ,  उनको  दमित  करने  का  ख्वाब  देखने  लगता  है   l  संसार  में  , शासन  में  , समाज  में  और  घरेलू  जिन्दगी  में  दमन  के ,  दूसरे  को  दबाने  के , दंड  देने  के  सैकड़ों  उदाहरण  मिल  जाते  हैं   l   यह  दमन   पाशविक  है  , नीतिहीन  है , पशुता  है   l       ऐसे  में  जब  भगवान  स्वयं  को  दमन  की  शक्ति   कहते  हैं     तो  यहाँ  ईश्वरीय  भाव  है -- अन्याय , अनीति , अत्याचार ,  अनाचार , दुराचार , शोषण ,  भ्रष्टाचार  का  दमन  किया  जाता  है  ,  तो  दमन  ईश्वरीय  विभूति  बनता  है    और  जो  इसे करने  का  साहस  दिखाते  हैं  ,  दंड  उनके  हाथों  में  ईश्वरीय   शक्ति  के  रूप  में  सुशोभित  होता  है  l  

6 February 2019

WISDOM --- -- समय को सार्थक करना जरुरी है

  यह  बात  विचार  करने  की  है  कि    हमने  अपनी  जिन्दगी  में  जो  कुछ  भी  किया  ,  जिस  दिन  जीवन  का  अंत  होगा   ,  उसमे  से   कितना  सार्थक  रह  जायेगा  l   आज  संसार  में  अनेक  लोग  ऐसे  हैं  जो     निरर्थक  कामों जैसे  ताश  खेलना , शराब  पीना  ,  षड्यंत्र  रचना  आदि  में  समय  गँवा  देते  हैं    और  स्वाध्याय  , सत्संग  आदि  ऐसे  कार्य  जिनसे  स्वयं  के  जीवन  का  निर्माण  होता  है ,  उसके  लिए  उनके  पास  समय  नहीं  है   l  भौतिक  तरक्की  के  साथ  आत्मिक  विकास  जरुरी  है   l  

5 February 2019

WISDOM ----- शुभारम्भ हमेशा छोटे - छोटे कदमों से होता है

  छत्रपति  शिवाजी  उन  दिनों  मुगलों  के  विरुद्ध    छापामार  युद्ध  लड़  रहे  थे  l  रात  को   थके - मांदे  एक  बुढ़िया  की  झोंपड़ी  में  जा  पहुंचे  और  कुछ  खाने - पीने  की याचना  की  l  बुढ़िया  के  घर  में  कोंदों  थी  ,  सो  उसने  प्रेमपूर्वक  भात  पकाया  और  पत्तल  पर  उनके  सामने  परोस  दिया  l  शिवाजी  बहुत  भूखे  थे  l  सो  सपाटे  से  भात  खाने  की आतुरता  में  उँगलियाँ  जला  बैठे  , मुंह  से  फूंककर  जलन  शांत  करनी  पड़ी  l   बुढ़िया  बोली --- सिपाही  तेरी  शक्ल  शिवाजी  जैसी  लगती  है    और  साथ  ही  यह  भी  लगता  है  कि   तू  उसकी  तरह  मूर्ख  भी  है  l 
 शिवाजी  स्तब्ध  रह  गए  l  उनने  बुढ़िया  से  पूछा ---- भला  शिवाजी  की  मूर्खता  तो  बताओ  और  मेरी  भी  l    बुढ़िया  ने  कहा --- तूने  किनारे - किनारे  से  थोड़ी - थोड़ी  ठंडी  कोंदो  खाने  की  अपेक्षा   बीच  के  सारे  भात  में  हाथ  मारा   और  उँगलियाँ  जला  डालीं  l  यही  बेअकली  शिवाजी  करता  है  l  वह  दूर  किनारों  पर  बसे   छोटे - छोटे  किलों  को  आसानी  से  जीतते  हुए   अपनी  शक्ति बढ़ाने  की  अपेक्षा   बड़े किलों  पर  धावा  बोलता  है   और  मार  खाता  है  l 
  शिवाजी  को  अपनी   रणनीति   की   विफलता  का   कारण  समझ  में  आ  गया  l  उन्होंने  बुढ़िया  की  सीख  मानी   और  पहले  छोटे - छोटे  लक्ष्य बनाये   और  उन्हें  पूरा करने  की  रीति - नीति  अपनाई  l  छोटी  सफलताएँ  पाने  से   उनकी  शक्ति  बढ़ी   और  अंततः  बड़ी  विजय  पाने  में  समर्थ  हुए  l  शुभारम्भ  हमेशा  छोटे - छोटे  कदमों  से  होता  है   और  ज्ञान  कहीं  से  भी मिले  ,  उसे  समझने  और  जीवन  में  उतारने  से  सफलता  मिलती  है  l  

4 February 2019

WISDOM ----- न दैन्यं न पलायनं ----- श्रीमद् भगवद्गीता

 अर्जुन  महाभारत  के  महासमर  से  भागना  व  बचना  चाहते  थे   l  भगवान   श्रीकृष्ण  ने  उन्हें  समझाया ---- ऐसा  कर  के  तुम  कहीं  भी  चैन  से  न  बैठ  सकोगे   l  पाप  को  हम  न  मारें , अधर्म ,  अनीति  का  संहार  हम  न  करें  ,  तो  निर्विरोध  स्थिति  पाकर  ये  पाप ,  अधर्म ,  अनीति   हमें ,  हमारी  सामाजिक  व्यवस्था  को  मार  डालेंगे   l  इसलिए  जीवित  रहने  पर  सुख  और  मरने  पर   स्वर्ग    का   उभयपक्षीय   लाभ  समझाते  हुए   उन्हें  उठ  खड़े  होने  का  उद्बोधन  देते  हैं   l   आना - कानी   की  स्थिति  आने  पर   उन्होंने  अर्जुन  को  अनुशासनात्मक   निर्देश  दिया  ---- ' युद्धाय  कृतनिश्चय: '  अर्थात   अर्थात   निश्चित  रूप  से  युद्ध  करना  ही  चाहिए   l  
  कायरता  का   त्याग   अनिवार्य  है  l 
    नीतिशास्त्र  में    साम   की  तरह  दंड  को  भी   औचित्य   की  संज्ञा   दी  गई  है   l  समझाने  और  सज्जनता  की  नीति  हमेशा  सफल  नहीं   होती   l  दुष्टता  को  भय  की  भाषा  ही  समझ  में   आती  है   l 
  गुरु  गोविन्दसिंह  ने   अपने  समय  की  दुर्दशा  का  कारण  जन - समाज  की   आंतरिक  भीरुता  को  ही  माना   l  उनका  निष्कर्ष  था  कि   जब  तक  जन  आक्रोश  न  जागेगा   ,  शौर्य  व   साहस  की  पुन:  प्राण  प्रतिष्ठा   न  होगी  ,   तब  तक  पद दलित  स्थिति  से  उबरने  का  अवसर  न  मिलेगा   l  

3 February 2019

WISDOM ---- महान आत्माएं अपनी मृत्यु से भी संसार को शिक्षा देती हैं

  संत  सुकरात  को  वहां  के   कानून  से  मृत्यु दंड  की  सजा  दी  गई  l    सुकरात  के  शिष्य  अपने  गुरु  के  प्राण  बचाना  चाहते  थे  l  उन्होंने  जेल  से  भाग  निकलने  की  एक  सुनिश्चित  योजना  बनाई   और  उसके  लिए  सारा  प्रबंध  भी  कर  लिया  l  प्रसन्नता  भरा  समाचार  देने   और  योजना  समझाने  को  उनका  एक  शिष्य  जेल  पहुंचा  और  सारी   व्यवस्था  उन्हें  कह  सुनाई  l  शिष्य  को  आशा  थी  कि  प्राण  रक्षा  का  प्रबंध  देखकर  गुरु  प्रसन्न  होंगे  l  सुकरात  ने  सारी  बात  सुनी  और  दुखी  होकर  कहा  ---- " मेरे  शरीर  की  अपेक्षा  मेरा  आदर्श  श्रेष्ठ  है  l मैं  मर  जाऊं  और  मेरा  आदर्श  जीवित  रहे ,  वही  उत्तम  है  , किन्तु  यदि  आदर्शों  को  खोकर  जीवित  रहा   तो  वह  मृत्यु  से  भी  अधिक   कष्टकारक  होगा  l  न  तो  मैं  सहज  विश्वासी    जेल  कर्मचारियों   को  धोखा  देकर   उनके  लिए  विपत्ति  का  कारण  बनूँगा   और  न  जिस देश  की  प्रजा  हूँ ,  उसके  कानून  का  उल्लंघन  करूँगा   l  कर्तव्य  मुझे  प्राणों  से  भी  अधिक  प्रिय  है  l  ' 
   योजना  रद्द  करनी  पड़ी   l  सुकरात  ने  हँसते  हुए   विष  का  प्याला  पिया  और  मृत्यु  का  संतोष  पूर्वक  आलिंगन   करते  हुए  कहा  ----- " हर  भले  आदमी   के  लिए  यही  उचित  है  कि   वह  विपत्ति  आने  पर  भी   कर्तव्य  धर्म  से  विचलित  न  हो   l  "  

2 February 2019

WISDOM ---- सभी प्राणी परमेश्वर में ही स्थित हैं ----- श्रीमद्भगवद्गीता

  जब  कृष्ण भक्त  मीरा  ने  दिया  बोध --- एक   कथा  है ----   तीर्थाटन   के  दौरान  जब  मीरा  वृन्दावन  आईं   तब   कण - कण  में  अपने   आराध्य  प्रीतम  का  वास  देखकर    निहाल  हो  गईं  l   मीरा  बिहारीजी  के  मंदिर   में  पहुंची  l  स्वामी  जीव  गोस्वामी  वहां  विराजते  थे  l   लोगों  ने  कहा  स्वामीजी स्त्रियों  से  नहीं    मिलते  ,  वे  स्त्री      की  ओर  देखते  भी  नहीं  हैं  l     मीरा  ने  कहा ----- "  ऐसा  क्यों  ?   पूरे   संसार  में   तो   पुरुष  मात्र  श्रीकृष्ण  हैं   l  यह  कौन  नया  पुरुष  के  नाम  का  पट्टीदार  आ  गया   l   हम  सब  स्त्रियाँ  हैं --- आप  भी , हम  भी   l  जहाँ  तक  प्रकृति  है ,  वहां  तक  हम  सब  हैं   l प्रकृति  के  पार  तो  एक  ही  पुरुष  है ---- श्रीकृष्ण  l "   जीव  गोस्वामी   तक  संवाद  पहुंचा  ,  उन्हें   आत्मबोध  हुआ  l   तुरंत  मीरा    मिलने  आये   और  अपनी  भूल  स्वीकार  की   l उसके      बाद  उनके  मन  से  यह  भेद  मिट  गया  l 
  आज  इक्कीसवीं  सदी  में भी   भारत  में  ऐसे  मंदिर  हैं  जहाँ  स्त्रियों  के  जाने  की मनाही  है ,  ऐसे  सम्प्रदाय  हैं  ,  जहाँ  स्त्रियों  को  महात्माजी  नहीं  देखते  l  उनके  प्रवचन  होते  हैं   तो  स्त्रियों  को  पीछे  बैठाया  जाता  है    l   उस  समय  कोई   सामयिक  कारण  रहा  होगा  ,  लेकिन  यह  प्रथा  अब  भी चली  आ  रही  है   l  यह  कथा  प्रेरणा  प्रदान  करती  है   l  

WISDOM ----- ह्रदय की पवित्रता जरुरी है

 एक  दिन  कबीर  गंगा  के  घाट  पर  गए  हुए  थे  l  उन्होंने  एक  ब्राह्मण  को   किनारे  पर  हाथ  से  अपने  शरीर  पर  पानी  डालकर  स्नान  करते  हुए  देखा   तो  अपना  पीतल  का  लोटा   देते  हुए  कहा --- " लीजिये , इस  लोटे  से  आपको  स्नान  करने  में  सुविधा  होगी   l "  लेकिन  ब्राह्मण  ने  कबीर  को  घूरते  हुए  --- " रहने  दे  l  ब्राह्मण  जुलाहे  के  लोटे  से  स्नान  करने  से   भ्रष्ट  हो जायेगा  l " इस  पर  संत  कबीर  हँसते  हुए  बोले ---- " लोटा  तो  पीतल  का  है,   जुलाहे  का  नहीं  ,  रही  भ्रष्ट  और  अपवित्र  होने  की  बात   तो   मिटटी  से  साफ कर  गंगा  के  पानी  से  इसे  कई  बार  धोया  है   और   यदि  यह  अभी  भी  अपवित्र  है   तो  मेरे  भाई  ! दुर्भावनाओं  और  विकारों  से  भरा  मनुष्य   क्या  गंगा  में  नहाने  से  पवित्र  हो  जायेगा   ?  "
 कबीर  के  इस  जवाब  ने  ब्राह्मण  को  निरुत्तर  कर  दिया  l