9 March 2019

WISDOM ------ विचारों की शक्ति

  मनुष्य  जैसे  विचार  करता  है   उसकी  सूक्ष्म  तरंगे  विश्वाकाश   में  फैल  जाती  हैं  l  स्वामी  विवेकनन्द  ने  विचारों  की  शक्ति  का  उल्लेख  करते  हुए   बताया  है   कि---- " कोई  व्यक्ति  भले  ही  किसी  गुफा  में  जाकर  विचार  करे   और  विचार  करते - करते  ही  वह  मर  जाये  ,  तो  भी  वे  विचार  कुछ  समय  उपरांत   गुफा  की  दीवारों  का   विच्छेद  कर  बाहर  निकल  पड़ेंगे  ,  और  सर्वत्र  फैल  जायेंगे   l  वे  विचार  तब  सबको  प्रभावित  करेंगे   l  " 
रूस  की  जन क्रान्ति  के  नेता  महापुरुष  लेनिन  केवल  गर्मागर्म  भाषण  कर  के   लोगों  की  वाहवाही  से   संतुष्ट  होने  वाले  नेता  नहीं  थे  l  उन्होंने  लिखने  की  मेज  पर  बैठे  हुए   जो  स्वप्न  देखा  था  , वह  उन्हें  निरंतर  आगे  बढ़ने  को  प्रेरित  करता  रहता  था  l  उस  समय  अत्यंत  साधारण  और  गरीबी  की  दशा  में  रहने  पर  भी   लेनिन  एक  ऐसी  शक्तिशाली  संस्था  के   निर्माण  के  लिए  प्रयत्नशील  था   जो  रूस  में  उथल - पुथल  मचा  दे   और  जारशाही  का  तख्ता  पलट  दे   l   जिस  प्रकार  संसार  के  अन्य  प्रसिद्ध  योद्धा  --- सिकंदर , शिवाजी , नेपोलियन  आदि   छोटी  अवस्था  से  ही   एक  विशेष  भाव  से  अभिभूत  होकर   भावी  साम्राज्य  की  कल्पना  किया  करते  थे  ,  उसी  प्रकार  लेनिन  भी  ,  जिसने  एक  बड़ी  भारी  सल्तनत  को  पलटने  का  प्रण  किया  था  ,  लन्दन  के  हाईगेट  कब्रिस्तान  में   कार्ल  मार्क्स  की  कब्र  के  पास   घंटों  तक  बैठकर   असीम  शक्तिशाली  भावी  बोल्शेविक  दल  का  स्वप्न  देखा  करता  था  l  अन्तर  इतना  ही  था   कि  प्राचीन  काल  के  योद्धाओं  ने   देवताओं  अथवा  ईश्वर  का  नाम  लेकर  तलवार  उठाई  थी  ,   लेनिन  के  इस  कार्यक्रम  का  आधार   इतिहास  और  समाजशास्त्र  था   l 
  अधिकांश  सार्वजनिक  कार्यकर्त्ता  ख्याति  के  लोभ  को  रोक नहीं  पाते   और  किसी  न  किसी  प्रकार  अपने  को  जाहिर  कर  देते  हैं    पर  लेनिन  ऐसी   यश  की  लालसा  से  बहुत  ऊँचा  उठा  हुआ  था   और  वह  बराबर  एक    अँधेरी  कोठरी  में  बैठा  हुआ   गुप्त  रूप से  अपना  काम  करता  था  l  रुसी क्रांति  को   लेनिन  ने  कैसे  अपना  सर्वस्व  होम  कर  के  खड़ा  किया  --- यह  रुसी  इतिहास  की  अमर  गाथा  है   l  

8 March 2019

WISDOM ----- ---

 संसार  के  इतिहास  में  अनेक   ऐसी  महिलाएं  हुई  हैं  जिन्होंने  विभिन्न  क्षेत्रों  में  अपना  नाम  अमर  किया  है   l   देशभक्त  महिलाओं  की   सबसे  अधिक  संख्या  रूस  में  पाई  जाती  है  l  जब  रूस  में  जार  का  अत्याचारी  शासन  था  ,  प्रजा  दुःखी  थी   l  ऐसी  दशा  में   अनेक  स्वाभिमानी  युवक - युवतियों  ने  इस  अन्याय  का  खात्मा  करने  की  प्रतिज्ञा  की  l   वे  बम  और  पिस्तौल  लेकर  गुप्त  रूप  से  अत्याचारी  अधिकारियों  और  स्वयं  जार  पर  भी  हमला  करते  थे  l 
  द्वितीय  विश्व युद्ध  के  अवसर  पर   जब  जर्मन  सेना  ने  अकस्मात  आक्रमण  कर  के  रूस  के  एक  बड़े  भाग  पर  कब्ज़ा  कर  लिया   और  वहां  की  जनता  को  घोर  कष्ट  दिए   तब  वहां  अनेक  स्त्रियाँ  ऐसी   निकलीं  जिन्होंने  जर्मन  सेना  की  परवाह  न  कर  के  उनके  विरुद्ध  संघर्ष  किया  l  इनमे  ' जोया '  की  अठारह  वर्ष  लड़की  का  नाम  सबसे  अधिक   प्रसिद्ध  है   l  विभिन्न  रुसी  पत्रों  में  सैकड़ों  लेख  और  निबंध   इस  किशोरी  कन्या   की  बलिदान  कथा  पर  निकलते  हैं   l    एक  सामान्य  ग्रामीण  लड़की  की  इतनी  महिमा  इसलिए  है   कि  उसने  अपने  प्राणों  की  तनिक  भी   चिंता  किये  बिना  देश  के  शत्रुओं  को  नष्ट  करने  का  हर  तरह  से  प्रयत्न  किया  l   वह  पहले  तो  गुरिल्ला फौज  में  शामिल  होकर   जर्मन  सेना  को  तरह - तरह  से  हानि  पहुँचाने  की  कार्यवाही  करती  रही  l  फिर  एक  दिन  जर्मन  सेना  की  छावनी  के  पास  जाकर  उसमे  आग  लगाकर  चली  आई  ,  पर  जब  उसे  मालूम  हुआ  कि  उसकी  लगाई  आग  से   बहुत  थोडा  नुकसान  हुआ  ,  तो  फिर  वह  दूसरे  दिन  आग  लगाने  चली  l  उसके  साथियों  ने  उसे  रोका  की  आज  मत  जाओ  , जर्मन  सैनिक  सतर्क  होंगे  ,  लेकिन  वह  अपनी  प्रतिज्ञा  को  पूरा  करने   को चल  दी  और  आग   लगाते  हुए  पकड़  ली  गई   l  जर्मनों  ने  उसे पहले  गुरिल्ला  दल  का  भेद  पूछने  के  लिए  कोड़ों  से  बहुत  मारा  ,  अन्य  यातनाएं  दीं  फिर  फांसी  पर  चढ़ा  दिया   l     उसने  देश  की  आजादी  के  लिए  हँसते - हँसते  प्राण    न्योछावर   कर  दिए   l  तभी  से  जोया  के  जीवन - मृत्यु  की  अमर   गाथा  विश्व  भर  के  लिए   नवीन  चेतना  और  शक्ति  का  उद्गम  बन  गई  है   l   

7 March 2019

WISDOM ------ सत्य तथा सत्कर्मों का अवलंबन करने से मनुष्य की अंतरात्मा में प्रसुप्त शक्तियां स्वत: ही जाग्रत हो जाती हैं

   औरंगजेब  ने     गुरु  तेगबहादुर  का  सिर  काटने  का  आदेश   दिया  l  एक  भाई  जीवनदास  ने  गुरु  का  सिर  तो  उठा  लिया   किन्तु  औरंगजेब  ने  गुरु  का  शरीर  देने  से  इनकार  कर  दिया  l  यह  ह्रदय विदारक  घटना  जब  घटी  उस  समय   गुरु  तेग बहादुर  के  पुत्र  गुरु  गोविन्दसिंह  की   आयु मात्र  पांच -छह  वर्ष  की  थी   किन्तु  सच्ची  धार्मिकता   और  धर्म  व  जाति  की  रक्षा  की   सच्ची  भावना  ने   उनके  अन्दर  अपूर्व  शक्ति , शौर्य , प्रभाव  तथा  तेज  भर  दिया  था  l    इस  बाल योद्धा   ने  गुरु  की  मृत्यु  से  उदास  खड़े  सैकड़ों  लोगों  की  और  उन्मुख  होकर  कहा ---- " गुरु  के  बलिदान  ने  हमें  शिक्षा  दी  है  कि  हम  उनके  पद चिन्हों  पर  चलकर  देश , धर्म  और  जाति  की  रक्षा  करें  l   उन्होंने  कहा --- " आज  धर्म  की  रक्षा  में   मैं  संत  परंपरा  की  गद्दी  पर  होने  पर  भी  स्वयं  शस्त्र  उठाता  हूँ   और  सबको   आज्ञा    देता  हूँ    कि  वे  किसी  भी  जाति,  या  वर्ण  के   क्यों  न  हों   क्षत्रिय  धर्म  का  अंगीकरण  करें   और  अत्याचार  के  विरुद्ध  हथियार  उठायें   l 
  इतनी  छोटी  सी   उम्र  में  उन्होंने  विशाल  जन  शक्ति  को  संगठित  किया   और  उनके  मानसिक  और  बौद्धिक  विकास  के  लिए   सैकड़ों  विद्वानों  और  शिक्षकों  को  नियुक्त  किया  l  उन्होंने  स्वयं  हिंदी , संस्कृत  व  फ़ारसी   आदि  अनेक   भाषाएँ  पढ़ीं  और  जनता  को  भी   पढ़ने  को  प्रेरित  किया  l  सैकड़ों  अनुयायिओं  को  विद्दा अध्ययन  के  लिए  काशी  भेजा  ,  जहाँ  से  वे  विद्वान्  बनकर  आये  और  जनता  में  शिक्षण  करने  लगे   l   उन्होंने  जनता  में   चन्द्रगुप्त , समुद्रगुप्त ,  अशोक  आदि  महान  राजाओं  के  इतिहास  का  प्रचार  किया  ,  रामायण , भागवत  की  कथाओं   का  वाचन  कराया   जिससे  जाति  को  अपने  अतीत के  गौरव  का  ज्ञान  हो   और  सोया  हुआ  आत्मविश्वास  जागे  l  

6 March 2019

WISDOM ---- पहले स्वयं उत्तम गुण ग्रहण करने चाहिए और तब वे गुण दूसरों को सिखाने चाहिए ---- समर्थ गुरु रामदास

 समर्थ  गुरु  रामदास  के  धर्म ग्रन्थ  ' दासबोध '  की  शिक्षाएं   औरंगजेब  के  शासनकाल  में   जैसी  लाभदायक    थीं  वैसी  ही  इस  अणुयुग  में    भी  सुख  और  शांति  प्राप्त  करने  में  सहायक  हो  सकती  हैं   l           समर्थ  गुरु  रामदास  ने  अपने   अनुयायिओं  को  उस  राजनीति  की  शिक्षा  दी  जो  विवेक , सूझ - बूझ  और  सावधानी  पर  आधारित  होती  है   l  उनका  कहना  है --- " जो  डरकर  पेड़  पर  चढ़  जाये   उसे  दम - दिलासा  देना  चाहिए   और  जो  लड़ने  को  तैयार  हो  उसे  धक्का  देकर  गिरा  देना  चाहिए  "  इसका  आशय  यह  है  कि   सांसारिक  व्यवहार  में  भी  हमको  अकारण  किसी  का  अहित  नहीं  करना  चाहिए  ,  यथासंभव  समझौते  और  मेल - मिलाप   की  नीति  से  काम  लेना  चाहिए  l  लड़ना  तभी  चाहिए  जब  कोई   नीच  और  स्वार्थी  व्यक्ति   दुष्टता  करने  पर  उतारू  हो  l 
  शिवाजी  महाराज  ने  इसी    नीति   पर    चलकर  महाराष्ट्र  में  संगठन  शक्ति  उत्पन्न  कर  दी  और   औरंगजेब  जैसे  साम्राज्यवादी  के  छक्के  छुड़ा  दिए  l  वे  कहते  थे  कि  अकारण  देश  में  अशांति  या  रक्तपात  की   स्थिति   उत्पन्न  करना  श्रेष्ठ  नीति  नहीं  है  l  वे  कहते  थे  कि--- " सच्ची  राजनीतिवही  है  जिसमे  दुष्टों  के  दमन  के  साथ   शिष्ट  व्यक्तियों  के  रक्षण  और  पालन  का  भी  पूरा  ध्यान  रखा  जाये   l  "  

5 March 2019

WISDOM ---- जब भी कोई अपनी शक्ति और सामर्थ्य को पहचान लेता है तो प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच जाता है

 'मनुष्य  के  भीतर  असीमित  सामर्थ्य  है  ,  जब  वह  अपनी  इस  छिपी  हुई  शक्ति  को  पहचान  लेता  है   तो  सफलता  उसके  कदम  चूमती  है  l  इसी  बात  को  समझाने  वाली  एक  कथा  है ----  हंस  का एक  बच्चा  संयोग  से  बगुलों के  झुण्ड  में  जन्म  से  ही  पहुँच  गया  l  जब  वह  थोडा  बड़ा  हुआ  तो  अपनी  जाति  के  अनुसार  बगुलों  से   भिन्न  था   l  बगुलों  के  झुण्ड  में  पच्चीस - तीस  बगुले  थे  ,  जिनका  आकार,  रंग - रूप  एक  सा  था  l  पर  वह  हंस - शावक  उन  सबसे  अलग  था  l  अत:  सभी  बगुले  उसका  मजाक    उड़ाया   करते ,  उसकी  हंसी  करते   और  उसका  तिरस्कार  भी  करते  थे   l   इस  व्यवहार  से  वह  बड़ा  व्यथित  होता  था  l 
  एक  बार  वह  अपने  इन  दुष्ट  बगुला  साथियों  के  साथ   उड़  रहा  था  कि  ऊपर  नील  गगन  में   उसे     अपने  सामान  रंग - रूप  और  वर्ण  वाले   पक्षी  उड़ते  दिखाई  दिए   , वाज  बगुले  का  साथ  छोड़कर अपने उन  ,   जातिलोगों   से      जा    मिला  l   हंसों  ने  भी  अपने इस   भटके  सदस्य  का  स्वगत  किया  l
 ' वह  भटका  हुआ  हंस  का  बच्चा  था  l  तब  तक  उसे  दुःखी    रहना  पड़ा   जब  तक  उसे  अपने  स्वरुप    और  शक्ति  का  ज्ञान   नहीं  हुआ  l  और  जब  वह  अपने  आपको   पहचानने लगा   तो  आकाश  में इतनी  ऊंचाई  तक  उड़ा  ,  जहाँ  सामान्य  पक्षी  नहीं   पहुँच   पाता  l  '  यह  तथ्य    हर  व्यक्ति  के   सम्बन्ध  में     लागू     होता  है    l   '

3 March 2019

WISDOM ---- भाव - श्रद्धा ही उपासना को सार्थक बनती है , कर्मकांड नहीं

महाप्रभु  चैतन्य  के  जीवन काल  की  घटना   है  ---- वे  जगन्नाथपुरी  क्षेत्र  में  प्रचार   यात्रा   पर  निकले  थे  l मंडली  में  कई  विद्वान्  भी  थे  l  वटवृक्ष  के  नीचे  एक  किसान  को   उन्होंने  तन्मयता पूर्वक  गीता  पाठ  करते  हुए  देखा   l  उसकी  आँखों  से  आंसू  टपक  रहे  थे   l  मंडली  रूककर  पाठ  सुनने  लगी  l  नितांत  अशुद्ध  उच्चारण    था  l  अल्प   शिक्षित     था,  संस्कृत  नहीं  जनता  था   l  विद्वानों  ने  उसे  टोका  तो  वह  बोला ---  " मेरे  लिए  इतना  ही  बहुत  है  की  भगवन  जो  कह  रहे  हैं  , उसे  मेरी  आत्मा  अमृत  की  तरह  पी  रही  है  l  "   उस भक्त  को  नमन  करते  हुए  चैतन्य  महाप्रभु  ने कहा --- " भक्तों  !  इस  अशिक्षित  की  भावना  सराहनीय  है   l  यही  है  वह  तत्व  जो   भक्त  की  उपासना  को  सार्थक  बनता  है  l  समर्पण  का  भाव  नियोजित  किये  बिना  सारे  पूजा  उपचार  के  क्रम  खोखले  हैं   l  "

2 March 2019

WISDOM --- मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता सामूहिक जीवन के लिए सदा घातक रही है

  तक्षशिला  के  राजा   आम्भीक  के  निमंत्रण  प र   सिकंदर  ने  भारत  पर  आक्रमण  किया  l  जहाँ  आम्भीक  जैसे  देशद्रोही  थे  वहां  अनेक  देशभक्त  राजा  भी  थे  l  इन  राजाओं  में  देश भक्ति की  भावनाएं  तो  थीं  किन्तु   एकता  की  बुद्धि  का  सर्वथा  अभाव  था   l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने अपने  वाड्मय  ' महापुरुषों  के  अविस्मरणीय  जीवन  प्रसंग ' में  पृष्ठ  1. 35  पर  लिखा  है  ----- " सिकंदर  के  विरोधी  होने  पर  भी  वे  आपसी  विरोध  को  भुला  न  सके  l  किसी  एक  राष्ट्र  के  कर्णधारों  में   परस्पर  प्रेम  रहने  से  ही  कल्याण  की  संभावनाएं  सुरक्षित  रहा  करती  हैं  ,  फिर  भी  यदि  उनमे  किसी कारण  से  मनोमालिन्य   रहेगा   ,  तब  भी   किसी  संक्रामक  समय  में  उन्हें  आपसी  भेदभाव   मिटाकर  एक  संगठित   शक्ति  से  ही   संकट  का  सामना  करना  श्रेयस्कर  होता  है   अन्यथा  आया  हुआ  संकट    अलग - अलग  सबको  नष्ट  कर  देता  है l "
       देशद्रोही    आम्भीक  को  देखकर  अन्य  राजा  भी  देशद्रोही     बनते  जा  रहे  थे   l   जब  कोई  पापी   किसी   मर्यादा   की  रेखा  उल्लंघन  कर  उदाहरण  बन  जाता  है  ,  तब  अनेकों  को  उसका  उल्लंघन  करने  में   अधिक  संकोच  नहीं  रहता   l  
  भारत  के  प्रवेश  द्वार  पर  ,  एकमात्र  प्रहरी  के  रूप  में  महाराज  पुरु  रह  गए  थे   l  अनेक  अभागे  राजा   सिकंदर  की  सहायता  करते  हुए   उसकी  विजयों  में  अपने  लाभ  का  भाग  देखने  लगे  थे  l  
  जब  तक  पुरु  जैसे  वीर   भारत- भूमि  पर पैदा  होते  रहेंगे  ,  इसकी  गौरव  पताका  युग - युग  तक  आकाश  में  फहराती  रहेगी   l