2 March 2020

WISDOM --- विकास की प्रक्रिया की सबसे बड़ी त्रुटि --- मनुष्य की आक्रामक मनोवृत्ति में जरा भी परिवर्तन नहीं आया

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- ' मनुष्य  मूलत:  संवेदनशील  प्राणी  है   l   उसमे  भाव - संवेदना  लबालब भरी  हुई  है   l   यह  संवेदना  किसी  कारणवश  जब  गलत   दिशा  में   मुड़    जाती  है    तो  मनुष्य  को  चोर , डकैत , लुटेरा , हत्यारा ,  आतंकवादी  बना  देती  है   l   हीन   परिस्थिति  और  संगति   में  पढ़कर   आदमी   अपने  भीतर  के   ईश्वरत्व  के  ऊपर  पर्दा  डाल   देता  है  l  '
  आचार्य श्री  लिखते  है ----  ' इन  दिनों  परिस्थिति   एकदम  विपरीत  है   l   सामाजिक  विषमता  इस  कदर  बढ़ी  है   की  आज    मनुष्य     अपने  देवत्व  को   धारण  करना  चाहकर  भी  नहीं  कर  पाता   और  विवशता  में  पढ़कर   असुरता  और  आक्रामकता  की  ओर   फिसल  पड़ता  है  l   कोई  आदमी  कुबेर  जैसी  सम्पति  एकत्रित   कर  के  अपने  कोठार  भरे  है  ,  तो  कहीं  विपन्नता  की  इतनी  गहरी  खाई  है   कि   उसमे   डूब  मरने   के  अतिरिक्त  और  कोई   चारा  नहीं  l   कहीं  अन्न  के  पहाड़   खड़े   हुए  हैं  तो  कहीं   भूखों  मरने  की  नौबत  है   l     पेट  की  ज्वाला  और   उन्नत  बनने  का  सपना    उसे  बुरे  कार्यों  की  और  घसीट  ले  जाता  है    तथा  इनसान````` को  शैतान  बना  डालता   है  l   वह  शक्ति  का , क्रूरता  का  सहारा  लेने  लगता  है   l 
  मनुष्य  में  ईर्ष्या , द्वेष  ,  आक्रमण  आदि  के  जो  तत्व   दिखलाई  पड़ते  हैं  ,  वे  वस्तुत:  दमन , शोषण ,  उत्पीड़न   और    अत्याचार  का  परिणाम  है   l 

1 March 2020

वैज्ञानिक युग / पत्थर - युग

  असुरता  कितनी  नृशंस  हो  सकती  है  ,  आये  दिन  इसके  उदाहरण  हमें  देखने  को  मिल  सकते  हैं  l   इतिहास  का  पन्ना  तो  इससे  भरा  पड़ा  है  l   यह  बर्बरता  सामूहिक  रूप  से  बड़े  पैमाने  पर    और  मात्र  सनक  की  पूर्ति  के  लिए  भी  की  जाती  है   l   छूट - पुट   लड़ाई - झगड़ों  से  लेकर    विश्व  युद्ध  तक  में    जितनी  भी  क्रूरताएं  हुईं    और  विनाश  लीलाएं  रची  गईं   उन  सबके  मूल   में    असुरता  ही  प्रधान  रही  l   क्रूर  कृत्य  में  संलग्न  व्यक्तियों  का  चिंतन  भी    अन्याय  एवं   अनाचारपूर्ण  होता  है   l   चिंतन  के  अनुरूप  आसुरी  तत्व  उन  पर  हावी  हो  जाते  हैं   l
जब  क्रूरता  का  भूत   किसी  पर  सवार  होता  है  तो  वह  उसे  कुछ  भी  कर  गुजरने  की  प्रेरणा  देता  है  ,  पर  अंत  में   वह  भी  उस   क्रूर  प्रवाह  का  शिकार  हुए  बिना  नहीं   रह   पाता  l   इतिहास  में  इसके  अनेकों  जग  प्रसिद्ध   उदाहरण  है   l
  इसलिए  हमारे  ऋषियों  का , आचार्यों  का  कहना  है    कि   चिंतन - चेतना  को  परिष्कृत  किये  बिना   समाज  का  कल्याण  और  संसार  में  शांति   संभव  नहीं  है   l   ' बड़ा  आदमी ' बनने  से  पहले   इनसान   बनना     जरुरी  है   l 
   आज  मनुष्य  ' पत्थर - युग '  में  पहुँच  कर  आदि - मानव  बन  गया   l 

29 February 2020

WISDOM-------

   पुरुषार्थ  की  दिशा   यदि  सही  नहीं  है  ,  तो  धुंआधार  काम  कर  के  भी  परिणाम  ' नहीं ' के  बराबर  रहता  है  --- कुछ  व्यक्ति  ऐसे  होते  हैं  , जिन्हे  अपने  प्रयत्न  का  सार्थक  पक्ष  यही  दीखता  है   कि   अपनी  अवांछनीय  परिस्थिति  के  लिए  किसी  अन्य  को  दोषी  ठहरा  दें  l   भगवान   से  लेकर   अपने  आसपास  के  किसी  व्यक्ति  को  उसका  लांछन  देने  ,  उसका  कारण  सिद्ध  करने  में  ही  वह  अपना  सारा  समय  और  सारी    अकल   खर्च  कर  देते  हैं  l
   कुछ  ऐसी  मनोभूमि  के  व्यक्ति  होते  हैं   जो  समस्याओं  के  मूल  कारणों  को  देखते  हैं   और  उन्हें  ठीक  करने  के  लिए  दमखम  के  साथ  उतर  पड़ते  हैं  l   उनके  समय , श्रम  और  सूझबूझ  की  सार्थकता  अधिक  होती  है  l   एक  कारण  का  निवारण  हो  जाने  पर   उनकी  अनेक  कठिनाइयां   अनायास  ही  सरल  होती  चली  जाती  हैं  l
 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  --- बड़े  परिवर्तन  सदैव  सही  दिशा  में  कार्य   करने  वाले  पुरुषार्थियों  द्वारा  संभव  हुए  हैं  l   समझदारी  इसी  में  है  कि   पुरुषार्थ  की  सही  दिशा  तय  कर  लेनी  चाहिए  l  

28 February 2020

WISDOM ---- प्रतिभा का अर्थ है -- वह क्षमता जिसकी दिशा सृजन की ओर हो ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

  आचार्य  श्री  लिखते  हैं ---- '  प्रतिभा  की , कला  की , कुशलता  की , विद्दा - ज्ञान - शक्ति  व  सामर्थ्य  की  इस  सृष्टि  में  कमी  नहीं  है  l   अनेकों  ने  अनेक  तरीकों  से  इनका  अर्जन  किया  है  ,  परन्तु  इनमें  से  किसी  का  भी  वे  सदुपयोग  नहीं  कर  पा  रहे   l  सारा  ज्ञान ,  उनकी  समूची  सामर्थ्य   उनके  अहंकार  की  तुष्टि ,  उनके  लिए  भोग - विलास  के   संसाधन  जुटाने  में  खप   रही  है   l  जहाँ  ऐसा  हो  रहा  है  वहां  समझो  असुरता  का  बोलबाला  है  l   असुरों  से  श्रेष्ठ  तपस्वी  इस  सृष्टि  में  अन्यत्र  कहीं   भी  नहीं  मिलते  ,  परन्तु  उनके  तप  का  परिणाम  सदा  ही  विनाशक  होता  है  l   '  
  द्वितीय  विश्व  युद्ध  में    जापान  में  हुए  भीषण  विध्वंस  के  बाद    आइंस्टीन  ने  विश्व  की  सर्वोच्च  वैज्ञानिक  प्रयोगशाला  से  संन्यास  ले  लिया   और  एक  छोटे  से   बाल विद्दालय  में   बच्चों  को  पढ़ाने  लगे  l   उनका  कहना  था  कि   उनकी  ऐसी  मंशा  नहीं  थी  ,  यह  आविष्कार   तो  इसलिए  किया  था  कि   परमाणु     ऊर्जा से  नगर - ग्राम  जगमगा  उठेंगे   l 
  जब   जापान  के  वैज्ञानिकों  का  एक   प्रतिनिधि  मंडल     पहुंचा  ,   तो  उन्होंने  महान  वैज्ञानिक  को  एक  ऋषि   के रूप  में  देखा   l   आइन्स्टीन   ने  उनको  विद्दालय   घुमाना   शुरू  किया   तो  प्रतिनिधि  मंडल  के  मन   में  यह  प्रश्न  उठना  स्वाभाविक  था  कि   क्या  यह  आपकी   प्रतिभा   का दुरूपयोग  नहीं   हो  रहा  है  ?
   आइन्स्टीन   ने  कहा ---- " प्रतिभा  के  बारे  में  बहुत  भ्रम   फ़ैल गया  है , मित्र  l  प्रतिभावान  वह  नहीं  है  जिसने  कोई  बड़ा  पद   हथिया लिया  है  ,  जिसकी  शारीरिक  और  बौद्धिक  क्षमताएं  बढ़ी - चढ़ी  हों  l     एक  शर्त  यह  भी     कि   उसकी  दिशा  क्या  है  l   दिशा  विहीनता  की  स्थिति  में  व्यक्ति   क्षमतावान  तो  हो  सकता  है  ,  किन्तु  प्रतिभावान  नहीं   l  अंतर्  उतना  ही  है  जितना   वेग   गति  में  l  उन्होंने  भौतिक  विज्ञान   की  भाषा  में  समझाया  l   सामर्थ्य  दोनों  में  है , क्रियाशील  भी  दोनों  हैं    पर  एक  को     गंतव्य  का  कोई  पता   ठिकाना  नहीं   और  दूसरा  प्रतिपल  अपने  गंतव्य  की  ओर   बढ़  रहा  है  l 
 क्षमताएं  सभी  के  पास  हैं  ,  इनके  वेग  को  सृजन   की  और  बढ़ती  गति  में  बदलकर    हर  कोई  प्रतिभाशाली  बन  सकता  है  l  "
 प्रश्नकर्ता   ने  पूछा ---  आपकी  प्रतिभा  का  उपयोग ----- ? 
उनका  कहना  था ---- " वह  तो  मैं   मानवीय  जीवन  की  प्रथम  आवश्यकता  की  पूर्ति  में  कर  रहा  हूँ  l   प्रथम  आवश्यकता   स्वादिष्ट भोजन ,  सुख - सुविधाएँ , अणु , परमाणु , रॉकेट लांचर आदि  नहीं  है  l  जीवन   की  प्रथम  आवश्यकता  है    ,  जीवन   कैसे  जिया  जाये ,  इस   बात  की  जानकारी  l   समूची  जिंदगी  कैसे   अनेक  सद्गुणों  की  सुरभि  बिखेरने  वाला  गुलदस्ता   कैसे   बने  ,  इस  बात  का  पता  l 
  इसके  बिना    सभी  कुछ  बन्दर  के  हाथ  में   उस्तरे  जैसा  है  ,  जिसका  उपयोग  वह   सिवा   अपनी  और  दूसरों  की  नाक   काटने  के   और  कुछ  नहीं  करेगा   l   अच्छा  हो  बन्दर  पहले  नाई   बने    फिर  उस्तरा  पकडे  l    अभी  तक  के   अनुभव  के  आधार   पर  प्रतिभा  का  जो   स्वरुप  समझ  में  आया  है  ,  वह  है    प्रकाश  की  ओर   गतिमान  जीवन   l   उसी  के  अनुरूप   इन  बच्चों  को  प्रतिभाशाली  बना  रहा  हूँ    l   उन्हें  मनुष्य  होने  का  शिक्षण  दे  रहा  हूँ  l  "      ' तमसो   मा   ज्योतिर्गमय  '   l 
       

27 February 2020

WISDOM ------

  चरित्र  मनुष्य  की  श्रेष्ठता  का  बहुत  बड़ा  प्रमाण  है  l   चन्द्रशेखर   आजाद  का  सबसे  बड़ा  सम्बल  उनका  चरित्र  था  l   इसको  उन्होंने  सदा  महत्व   दिया   और  इस  धारणा  पर  जीवन  के  अंत  तक  दृढ़   रहे  l   चरित्रहीन  व्यक्ति  से  वे   सदा  घृणा  करते  थे  l   उनके  इस  महान  गुण   की  कुछ  स्वार्थी  तत्वों  ने  खिल्ली  उड़ाई  ,  उसे  आजाद  की  भूल  बतलाया  ,  परन्तु  स्वार्थियों  का  यह  प्रयत्न   अपने  अवगुण  छिपाने  का  प्रयास  मात्र  था  l
   चन्द्रशेखर   आजाद  कहा  करते  थे --- "     ' अपने  प्रति  कठोरता  , दूसरों  के  प्रति  उदारता '   की  नीति   के  अनुरूप    संगठन  के  जिम्मेदार   लोग    व्यवहार   करते  हैं  तभी  तक  संगठन   जीवित  रहता    है   l   सामूहिकता    तभी   बरकरार   रह  सकेगी   जब  तक  किफायतशारी  को  अपनाया   और  महत्वाकांक्षाओं  को  ठुकराया  जाता  रहेगा  l   बड़प्पन  सुविधा  संवर्द्धन  का  नहीं   सद्गुण  संवर्द्धन  का  नाम  है  l   अच्छाई  का  महत्व   समझो  ,  देश  को  हम  लोगों  से  कितनी  आशा  है  l   हम  क्रांतिकारी   माने  जाते  हैं  ,  एक  बड़े  परिवर्तन  के  लिए  प्रयत्नशील  हैं  l  "
  आजाद  अपने  साथियों  से  कह  रहे  थे --- "  क्रान्तिकारी   का  मतलब  जानते  हो   ?  कुछ  चुप  रहकर  वे  बोले ---  जो  वर्तमान  में  भी   भविष्य  में  होने  वाले  परिवर्तन  के  अनुरूप   जी  रहा  हो  l  जिसकी  जिंदगी  के  छोटे - छोटे   क्रियाकलाप  को  देखकर   हर  कोई  कह  सके  ,  अहा  !  ऐसा  होगा  स्वर्णिम  भविष्य   जिसके  लिए  वे  लोग  प्रयासरत  हैं  l  "
   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  वाङ्मय ' महापुरुषों  के  अविस्मरणीय  जीवन  प्रसंग '  में  लिखा  है -----
 "  गुणों  को  हृदय  में  धारण  कर  के   आपत्तिकालीन  धर्म  के  रूप  में   तोड़ - फोड़  भी  स्वीकार  करने  वाले   क्रांतिकारी   देश  के  निर्माण  में  कभी  बाधक  नहीं  बने   और  शान्ति   की  दुहाई  देने  वाले   अंत:करण   के  हीन   व्यक्तित्वों  के  कारनामे   हमारे  सामने  रोज  आया  करते  हैं  ,   फिर  भी  नयी  पीढ़ी  को  बनाने  ढालने  में   हम  उनके   आंतरिक  गठन  की  उपेक्षा  कर  के    अपने  मानसिक  दिवालियेपन  का  नमूना   प्रस्तुत  किये  जा  रहे  हैं   l   "

26 February 2020

WISDOM ----- ईर्ष्या की आग

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- '   ईर्ष्या  की  आग   औरों  का  अहित  तो  करती  है  , समाज  का  भी  अमंगल  ही  होता  है    किन्तु  इससे  ईर्ष्यालु  को   तो  कोई  लाभ  होता  नहीं   l   स्वयं  ईर्ष्यालु  को  यह  आग  हर  क्षण   उसी  प्रकार  जलाती   रहती  है   जैसे  अंगीठी  की  आग  संपर्क  में  आने  वाली  वस्तु  को  कभी - कभी  ही  जला  पाती  है    किन्तु स्वयं  अंगीठी  के  कलेजे  में   हर  क्षण  तपन  भरी  रहती  है  l  इसी  ताप  से  लोहे  की  अँगीठियाँ   भी  थोड़े  ही  समय  में  जल - जलकर   बेकार  होकर  झड़   जाती  हैं   l   ईर्ष्यालु  भी    ईर्ष्या  की  दाहकता  से  निरंतर  तप्त  रहता  है  ,  उसका  मन  व  शरीर   डाह  से  झुलसकर   नि: शक्त   हो  जाता  है  l '
   आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' ईर्ष्या  का  जन्म  एक  तरह  की  निराशा  से  होता  है   l   यह  निराशा  दूसरे  की  सफलता   को  देखकर   अपने  पीछे  रह  जाने  की   भावना  से    होती  है   l    दूसरे  की  सम्पन्नता  - श्रेष्ठता    के  प्रति  बढ़ी  हुई  ईर्ष्या   स्वयं  की  समृद्धि  और  उत्कृष्टता  का  विचार   नहीं  करती   बल्कि  ईर्ष्यालु  व्यक्ति  दूसरे  के  मार्ग  में  रोड़े   अटकाने   और  उन्हें  किसी  प्रकार  हानि  पहुँचाने  का  प्रयास  करने  में  ही  अपनी  शक्ति   का  अपव्यय  करता  है  l ' 
  समाज  में  फैले  संघर्षों  का  मूल  मुख्यत:  ईर्ष्या  होती  है  l   आज  की  परिस्थितियों  पर  दृष्टिपात  करें  तो  चारों  ओर   ईर्ष्या  का  ही  साम्राज्य  फैला  दिखेगा  l   ईर्ष्या  मन  की  कुटिलता  का    परिणाम  है  l   अन्य  सभी  नष्ट  हो  जाएँ  हम  अकेले  ही  जीवित  रहें   यह  सोचना  ओछापन   है  l
  ' परस्पर  सहयोग  तथा  ' जियो  और  जीने  दो  '    की  नीति   अपनाने  में  ही  सबकी  भलाई  है  l 

WISDOM ----

  स्वामी  विवेकानन्द   ने  अपने  गुरु भाइयों   को  संबोधित   करते  हुए   राखाल   महाराज  से  कहा  था  ---- " राखाल  ! आज  रात्रि    हमें  दिव्य  दर्शन  हुआ  है   l   इस  दिव्य  दर्शन  में  हमने   अपने  देश  भारत  के  अभ्युदय  को  देखा  है  l   भारत  के  समुज्ज्वल  भविष्य  का  साक्षात्कार  किया  है  ------- '  स्वामीजी  जब  ये  सब  बात  कर  रहे  थे  , तब  उनकी  मुख   मुद्रा   वर्तमान  को  पार  कर   भविष्य  को  स्पष्ट  देख  रही  थी   l   वह  बोल  रहे  थे ---- " एक  नवीन   भारत  निकल  पड़ेगा  --- हल  पकड़कर  , किसानों  की  कुटी  भेदकर  ,  मछुए , माली , मोची , मेहतरों   की  कुटीरों  से  l   निकल  पड़ेगा  --- बनिये   की  दुकानों  से  ,  भुजवा  के  भाड़  के  पास  से ,   कारखाने  से , हाट  से  ,  बाजार  से   l   अपना  नवीन   भारत  निकल  पड़ेगा  --- झाड़ियों , जंगलों , पहाड़ों , पर्वतों  से   l   इन  लोगों  ने  हजारों  वर्षों  तक  नीरव  अत्याचार  सहन  किया  है  ,  उससे  पाई  है  अपूर्व  सहनशीलता   l   सनातन  दुःख  उठाया  है  ,  जिससे  पाई  है  ,  अटल  जीवनी  शक्ति  l   यही  लोग  अपने  नवीन   भारत  के  निर्माता  होंगे  l   "