8 August 2020

WISDOM ----- भय दासता है और साहस विजय

  वर्तमान  विश्व   में जिस  एक  वस्तु  का  व्यापार   सबसे  अधिक  हो  रहा  है  ,  वह  कोई  उत्पाद  नहीं  वरन  एक  प्रकार  का  भय  है   l   गरीब  और  अभावग्रस्त  लोगों  के  पास  खोने  के  लिए  कुछ  नहीं  होता   इसलिए   वे  भयभीत  नहीं  होते  l   जो  जितना  अधिक  संपन्न  और  जितना  शक्तिशाली  है  , वह  उतना  ही  भयभीत  है  l   आधुनिक  सभ्यता  में  भय   बिकता  है   और  यह  सारे  संसार   को  अपनी  चपेट  में  ले  लेता  है  l   भय  के  कारण  व्यक्ति  मानसिक  रूप  से  इतना  परेशान   हो  जाता  है   कि   दुर्घटना , आत्महत्या  , अपराध  बढ़  जाते  हैं   l  भय  मानवी  मनो - मस्तिष्क  को  प्रभावित  करने  वाला   एक  बड़ा  कारक  है  , इसलिए  भय  का  कारोबार  करने  वाले   मनुष्य  की  इस  कमजोरी   से  लाभ  उठाते  हैं  l     भय  पैदा  करने   वाली  फ़िल्में ,  कॉमिक्स   आदि  अब  पुराने   हो  चुके  l   आधुनिक  सभ्यता  ने  भय  को  भी  भयभीत  कर  दिया   और  लोगों  के  मनोमस्तिष्क  पर  छा  गया  है  l 

ईश्वर  विश्वास  से  ही  सब  प्रकार  के  भय  से  मुक्ति   संभव  है  l 

7 August 2020

WISDOM -----

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  अपने  जीवन  के  माध्यम  से   बहुत  ही   क्रांतिकारी    सन्देश  दिए  हैं  ,   जिनमे  से  एक  है ----'  शिक्षा  ही  नहीं  ,  विद्द्या  भी   l  मनुष्य  का  जीवन  अनगिनत   संभावनाओं     से  भरा  हुआ  है   और  ये   संभावनाएं  यह  तय  करती  हैं  कि   मनुष्य  श्रेष्ठताओं  का  चयन  कर  के    उत्कृष्टता   के  पथ  पर  आगे  बढ़ता   है  या  अपने  गलत  कार्यों  से    पतन  के  गर्त  में  गिरता  है  l   मनुष्य  के  पास  कंस  बनने  की   संभावना  तो  है  ,  लेकिन  उसके  पास   कृष्ण  बनने  का  अवसर  भी  है   l   उसमे  रावण  बनने  की   संभावना  तो  है  ,  राम  बनने  का  अवसर  भी  है  l    आचार्य श्री  ने  आगे  कहा  कि --- मनुष्य  के  जीवन  में  अवसर  का  प्रारम्भ  विद्दालय   से  होता  है   l   वर्तमान  की  शिक्षा  प्रणाली  अपूर्ण  है   और  उसे  पूर्णता  तक  पहुँचाने  के  लिए  विद्द्या  की  आवश्यकता  है  l   शिक्षा  हमें  साक्षरता   देती है   तो  विद्द्या  हमारे  जीवन  को  सार्थकता  देती  है  l        जीवन  में  त्याग , बलिदान  , समर्पण , सेवा   आदि  भावनाओं   का विकास   विद्दार्थियों  में   विद्दा  के  माध्यम  से  ही  किया  जा  सकता  है  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

WISDOM ----- यज्ञ का मर्म

 युगों  से  संसार  में  सभी  धर्मों  के  लोग   अपने - अपने  तरीके  से   अपने  ईश्वर  को  पूजते  हैं  , उन्हें  प्रसन्न  करने  के  लिए   बहुत  कुछ  करते  हैं  ,  लेकिन  इन  सब  के  बाद  भी  धरती  पर  पाप , अत्याचार  बढ़ता  ही  जा  रहा  है  ,  लोगों   का जीवन  पहले  से  अधिक  तनावग्रस्त  हो  गया  है  l    कारण  यही  है  कि   लोगों  की  भावनाएं  पवित्र   नहीं हैं  ,    संवेदना , करुणा  नहीं   है  l  स्वार्थ , लालच  और  अहंकार  बढ़  गया   है l ----
 महाभारत   में   राजसूय  यज्ञ  की  कथा  आती  है  , इसमें  नेवले  का  प्रसंग  है  ---पांडवों  द्वारा   किया  गया  राजसूय  यज्ञ  श्रीकृष्ण  की  उपस्थिति  में  संपन्न  हुआ  l  अब  पांडवों  में  बहुत  अहंकार  आ  गया   कि   हमने  इतना  दान  किया , इतने  यज्ञ  किये , इतना  भोजन  कराया  ----   भगवान  श्रीकृष्ण   ने  देखा  कि   पांडवों  में  अहंकार  पल  रहा  है  , यह  यज्ञ  यज्ञीय   भाव  से  नहीं  हुआ   l   श्रीकृष्ण  सभी  को  यज्ञ स्थल   के  पास  ले  गए  ,  वहां  देखा  एक  नेवला   लोट  रहा  है   जिसका  आधा  शरीर  सोने  का  था  और  आधा  सामान्य  था  l   भगवान  श्रीकृष्ण  ने    जानना   चाहा  कि   उसका  यह  शरीर  कैसे  हुआ   ?  नेवले  ने  बताया  ---- ' मैंने  पहले  भी  एक  महायज्ञ  भाग  लिया  था  ,  उसमे  मेरा  आधा  शरीर  सोने  का  हो  गया  l  यहाँ  भी  मैं  इसी  आशा  से  आया  हूँ  कि  बचा   हुआ शरीर  भी  सोने  का  हो  जाये  ,  लेकिन   यहाँ ऐसा  नहीं  हुआ  l "
पांडवों  की  उपस्थिति  में  श्रीकृष्ण  ने   नेवले  से  पूछा   कि   बताओ  पिछले  यज्ञ  कैसा  था   ?    नेवले  ने  बताया  ---- " एक  ब्राह्मण  परिवार  अनुष्ठान  कर  रहा  था , भयंकर  अकाल  की  स्थिति  थी   l  ऐसे  में  उन्होंने  नौ  दिन  पश्चात्  बचा  हुआ   भोजन  लेने  का  विचार  किया  था  l   साधन - सुविधा  कुछ  नहीं  थी  अत:  नवें  दिन   भावनात्मक  पूर्णाहुति  कर   वह  परिवार  ज्यों  ही  भोजन   करने  बैठा   कि   एक  चांडाल  आ  गया  ,  उसने  कहा  कि   हमें  भूख  लगी  है   l   ब्राह्मण   ने अपना  भोजन  उसे  दे  दिया  l   भोजन  करने  के  बाद  उसने  कहा  कि   पेट  नहीं  भरा  , तब  ब्राह्मण  की  पत्नी  ने  भी  अपना  भोजन  उसे  दे  दिया  l  लेकिन  तब  भी  उसका  पेट  नहीं  भरा  l  तब  अंतिम  आस  के  रूप  में   दोनों  पुत्रों  के  पास  जो  भोजन  था  , वह  भी  उन्होंने  चांडाल  को  दे  दिया  l   चांडाल  ने   भोजन  किया  और  तृप्त   हो गया  ,  उसने  पूछा  कि  अब  आप  लोग  क्या  खाएंगे   ?  ब्राह्मण  ने  कहा -- ईश्वर  की  जैसी  इच्छा , हम  पानी  पीकर  पारायण  कर  लेंगे  l  "
    नेवले   ने पांडवों  और  श्रीकृष्ण  को  बताया  --- "  चांडाल  ने    भोजन  कर  के   तृप्त  होकर  जिस  स्थान  पर  कुल्ला  किया  , वहां  कुछ  भोजन  के  कण  भी  गिर  गए  ,  मैंने   उसी में  लोट  लगाईं  थी   तो  मैं  आधा  सोने  का  हो  गया  l   फिर  मैंने  देखा  कि   ब्राह्मण  सपरिवार   चांडाल  रूपी  अतिथि  को  प्रणाम  करने  झुके   तो वहां  स्वयं  नारायण हरि   प्रकट   हो गए  l   भगवान  स्वयं  चांडाल   का रूप  धरकर   ब्राह्मण  परिवार  की  यज्ञीय   वृत्ति  को  परखने  आये  थे   l  "  नेवले  ने  कहा  -- में  युगों  युगों   से प्रतीक्षा  कर  रहा  हूँ  कि   ऐसा  यज्ञ   पुन:  हो  ,  यहाँ  भी  मैं  इसी  आशा  से  आया  था   लेकिन   मेरा दुर्भाग्य  है  कि   अधूरी  आशा   और  आधा  सोने  का  शरीर  लिए  जा  रहा  हूँ  l '
  भगवान  श्रीकृष्ण    ने  पांडवों से  कहा --- ' प्रतिकूलताओं  में  जिसका  यज्ञीय   भाव  जिन्दा   हो  ,  जो  देने  की  आकांक्षा  रखता  हो  ,  जिसकी  भावनाएं  पुष्ट  व  पवित्र  हों  वही  देवता  है   और  इस  भाव  से  किया   गया   यज्ञ  ही  सार्थक  है  l   भगवान  के   ऐसा कहते  ही  घनघोर  घटायें  बरसीं  और  अकाल  दूर  हुआ  l   यह  सब  सुनकर  पांडवों   का अहंकार  दूर  हुआ  l   भगवान  ने  कहा  कि   पहले  यज्ञ   के मर्म  को  समझो  ,  यज्ञमय   जीवन   का मर्म  समझो  ,  तभी  हवं - पूजन ,  यज्ञ  सार्थक  है  l '
  

5 August 2020

WISDOM -----

पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहा  करते  थे  -- मनुष्य  वही  है  जो  संवेदनशील  हो  ,  दूसरोँ   की  पीड़ा  जिसे  व्यथित  करती  है   l   वे  कहते  थे  हर  साधन - संपन्न   व्यक्ति  को  अपने  आप  से  पूछना  चाहिए  , जब  देश  में , दुनिया  में   करोड़ों  बच्चे  भूखे  हैं  ,   लेकिन    हमारे  बच्चों  को  अच्छा  भोजन , अच्छे  कपड़े   और  अच्छा  घर  प्राप्त  है    तो  अन्य  बच्चों  को  क्यों  नहीं   ?
 आचार्य श्री  ने  लिखा  है  ---जन्म  लेने  के  बाद  भी  मनुष्य  जीवन  को  प्राप्त  नहीं  करता  l  वह  जन्मते  ही  स्वार्थ  सीखता  है   और  फिर  बड़ा  होने  के  साथ - साथ   इसी  में  पारंगत  और  प्रवीण  हो  जाता  है  l   अपने  स्वार्थ  व  अहं   को  पूरा  करने  के  लिए   चतुराई  व  चालाकी  का  सहारा  लेता  है  l   जन्म  लेने  के  बाद  मनुष्यत्व  को  कैसे  प्राप्त  करें  ,  यही  समझाने   के  लिए   आचार्य श्री  ने  विशाल  साहित्य  रचा   और  इसे  जन - जन  तक  पहुँचाने  के  लिए  अखण्ड  ज्योति   का  आविर्भाव  हुआ  l 
  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---'  हमें  स्वाधीनता  मिले  कितने  ही  दशक  हो  गए  ,  पर  द्वेष , दुर्भाव  से  हम  आज  तक  स्वाधीन  नहीं  हो  सके  l    हम  मनुष्य  के  प्रति  विश्वास  और  सद्भाव  को  खो  चुके  हैं  l  हम  अपने   ही  समान  पड़ोसी   को   मनुष्य  रूप  में  देखने  से  पहले    उसे  कुल , बिरादरी , धर्म  व  सम्प्रदाय   के  हिस्सों  के  रूप  में  देखते  हैं  l   यह  मनुष्य  की  संकीर्णता  ही  है   कि   कुल ,  जाति  , धर्म , सम्प्रदाय  के  कारण  ही    एक  इनसान   दूसरे  इनसान   से  घृणा  करने  लगता  है  , इसी  प्रवृति  का  परिणाम  हैं  दंगे ,  जो  यदा - कदा   पूरे   देश  और  देशवासियों  को  दागदार  बनाते  हैं  l  '
 आचार्य श्री  ने  बार - बार  यही  समझाया  है   कि   हमें  जन्म  भले  ही  मनुष्य  शरीर  के  रूप  में  मिला  है ,  परन्तु  जीवन  का  आधार  आत्मचेतना  है   l    चेतना  जाग्रत  हो  ,  हम  सब  एक  माला  के  मोती  हैं  ,  सच्चे  इनसान   बने  l 

4 August 2020

WISDOM -----

  राम कथा  जिसे  हम  पीढ़ी  दर  पीढ़ी   सुनते  आये  हैं  ,  हमें  बताती  है  कि   राम  और  रावण  ,  दोनों  में  बुनियादी  फरक   बस   अहंकार  को  लेकर  था   l   श्रीराम  अहंकारशून्य  थे  ,  जबकि  रावण  के  अहंकार  की  कोई  सीमा  नहीं  थी   l   अहंकार  का  मतलब  है  --- ' मैं  '  को  प्राथमिकता  देना   l   राम  ने  ' मैं  '  को  कभी  प्राथमिकता  नहीं  दी  ,  जबकि  रावण  के  लिए  यही  उसके    अस्तित्त्व  का  आधार  था  l   इसी  अहंकर  के  कारण  रावण  का  अंत  हुआ  l 

WISDOM ------

  गुजरात  की  राजमाता  मीनल  देवी  ने   भगवान  सोमनाथ  का  विधिवत  अभिषेक  कर  के   उन्हें  स्वर्ण  दान  किया  l   राजमाता  के  मन  में  अहंकार   आ  गया  कि  भगवान  को  ऐसा  दान   किसी  ने  नहीं  किया  होगा  l   रात्रि  को  स्वप्न  में   भगवान  सोमनाथ  ने  राजमाता  से  कहा  --- " मेरे  मंदिर  में  आज  एक  गरीब  महिला  आई  है  l   उसका  आज  का  पुण्य   तुम्हारे  स्वर्णदान  की  तुलना  में  कई   गुना  ज्यादा  है  l "
   राजमाता  ने  उस  महिला  को  महल  में  बुलवा  लिया   और  उससे  बोलीं ---- " तुम  मुझे  अपने  संचित  पुण्य  दे  दो  उसके  बदले  में  जितनी  भी  धनराशि  लगेगी  , वह  मैं  देने  को  तैयार  हूँ   l  '
  वह  गरीब  महिला  बोली --- " राजमाता  ! मुझ  गरीब  से  भला  क्या   पुण्य कार्य  हुआ  होगा  ? मुझे  तो  यह  भी  नहीं  पता  कि   मैंने  क्या  पुण्य  किया  है   तो  मैं  क्या  अर्पित  करुँगी  ? "
राजमाता  ने   उसके  विगत  दिवस  के  क्रियाकलाप  के  विषय  में  पूछा  ,  ताकि  यह  पता  चल  सके   कि   उसे  किस  कार्य    हेतु  अपार  पुण्य  मिला  है  l   प्रत्युत्तर  में  वह  गरीब  महिला  बोली --- "  राजमाता  !  मैं  तो  अत्यंत  गरीब  हूँ  l   मुझे  कल  किसी  व्यक्ति  ने  दान  में  एक  मुट्ठी  बूँदी   दी  थी  l   उसमें  से  आधी  बूँदी  मैंने  भगवान   सोमेश्वर  को  भोग  में  चढ़ा  दी   और  शेष  आधी  खाने  चली  थी   तो  एक  भिखारी  ने  मुझसे  मांग  ली   तो  वह  मैंने  उसे  दे  दी  l  "  राजमाता  समझ  गईं   कि   उस  महिला  का  निष्काम  कर्म   उनके  स्वर्णदान  से  बढ़कर  है  l   भगवान   भावनाओं  का  मोल  समझते  हैं  l 

3 August 2020

WISDOM ------

 श्रीमद्भगवद्गीता  में  भगवान  अर्जुन  से  कहते  हैं --- तू  तो  केवल  निमित्त मात्र  बन  जा  l
इसका  अर्थ  है  कार्य  का   कर्ता    भगवान  को  मानना   और  स्वयं  को  उनकी  शक्ति  का  स्रोतवाहक  समझना  l      जब  व्यक्ति   कर्ता   बनकर  किसी  कार्य  को  करता  है   तो  उसका  अहं   जाग्रत  हो  जाता  है   और  यह  अहंकार  व्यक्ति  को   क्षुद्र  बना  देता  है  l
अहंकारी  व्यक्ति  बाहर  से  तो  बहुत  शक्तिशाली  दीखता  प्रतीत  होता  है   लेकिन  वह  अंदर  से  बहुत  कमजोर  होता  है   क्योंकि  उसका  अहंकार  बार - बार  चोटिल  होता  है   जिससे  वह  अपमानित  और  क्रोधित  होता  है  l
पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- इस  संसार  में  थोड़ा - बहुत  अहंकार   सभी  पालते  हैं   और   अहंकार  की  खास  बात  यह  होती  है   कि   वह  दूसरों  के  अहंकार  को  सहन  नहीं  कर  पाता  और  स्वयं  को  श्रेष्ठ  साबित  करने  में   उसके  लड़ाई - झगड़े   होते  हैं  l  श्रेष्ठता  इस  बात  में  नहीं   कि   किसका  अहंकार   कितना  बड़ा  है  ,  बल्कि  इस  बात  में  है  कि   किसका  व्यक्तित्व  ज्यादा  महान  है   l   जिस  व्यक्ति  में  अनगिनत  शक्तियों , विभूतियों   और  प्रतिभाओं   के  साथ  विनम्रता   होती  है , वही  सबसे  श्रेष्ठ  व्यक्ति  है   l