सोलहवीं शताब्दी में जन्में रहीम खानखाना ने बड़ी भक्ति पूर्वक राम कथा को गाया और अपनाया l रहीम मुसलमान थे , परन्तु प्रभु श्रीराम पर उनकी अटल श्रद्धा थी l वह कहा करते थे ---- ' रहिमन धोखे भाव से , मुख तें निकसे राम l पावन पूरन परम गति , कामादिक को धाम l ' उन्होंने स्पष्ट कहा कि संसार सागर से पार उतरने का एकमात्र उपाय प्रभु श्रीराम की शरणागति है l वे कृपामय प्रभु जगत की विषय - वासना से प्राणी को मुक्त कर उसे अपनी भक्ति प्रदान कर निर्भय कर देते हैं l उनका कथन है ---- ' गहि सरनागति राम की , भवसागर की नाव l रहिमन जगत उधार कर , और न कछु उपाय l
26 August 2020
WISDOM ----
एक बार एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्व परोपकार में लगाकर संन्यास ग्रहण किया l वह सभी प्रकार से ईश्वर के लिए समर्पित हो गया l उसके समर्पण के कारण भगवान को उसके योग व क्षेम का भार उठाने के लिए सहर्ष ही बाध्य होना पड़ा l उसके लिए नित्य प्रति एक देवदूत एक थाली में सुस्वादु भोजन लाता और उसे करा कर लौट जाता l यह देख एक अन्य व्यक्ति ने भी अपना सब कारोबार लड़कों को सौंपकर , गेरुए वस्त्र पहन कर उस स्थान पर तप करने लगा l अब देवदूत दो थालियाँ लगाकर लाया -- एक में सूखी रोटी थी तो दूसरे में स्वादिष्ट भोजन l दूसरे व्यक्ति ने अपनी थाली में सूखी रोटी देख देवदूत से प्रश्न किया --- ' मुझे ही सूखी रोटी क्यों मिल रही है ? ' देवदूत ने उत्तर दिया --- " इस थाली में भोजन व्यक्ति के संचित पुण्य के अनुसार ही मिलता है l उस व्यक्ति ने अपना जीवन परोपकार में लगा दिया और उसके उपरांत उसकी ईश्वर शरणागति के पुण्य के रूप में उसका जीवन भगवान की धरोहर हो गया , इसलिए उसे सुस्वादु भोजन मिलता है l जबकि आपने जीवन में मात्र एक बार एक व्यक्ति को अहंकार से भरकर सूखी रोटी दी थी , वही सूखी रोटी आज आपकी थाली में आपके लिए लौटकर आई है l अब आपकी सूखी रोटी भी समाप्त होने को है , कल से आपको कुछ नहीं मिलेगा l " अब उस व्यक्ति की चेतना जाग्रत हुई , उसने अपनी वह सूखी रोटी भी दान में दे दी और स्वयं भूखा रहा l इसके बाद उसने परोपकार के कार्य किये फिर वह भी प्रभु की कृपा का अधिकारी बना l
25 August 2020
WISDOM -----
इस संसार में अनेक लोग ऐसे हैं जो अपने अधिकारी , अमीरों और शक्ति संपन्न लोगों की खुशामद किया करते हैं ताकि कम समय और कम परिश्रम में उन्हें अधिक लाभ मिल जाये लेकिन जो कर्मयोगी हैं , ईश्वर विश्वासी हैं , उनके लिए ' परमात्मा पर्याप्त है l ' पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---' जिनके पास सब कुछ है , सारा ऐश्वर्य है , ईश्वर के बिना वे दरिद्र दिखाई देते हैं l ऐसे संपत्तिशाली भी मिले , जिनके पास कुछ भी नहीं है , केवल परमात्मा है l '
एक पुरानी कथा है ---- किसी चारण ने एक सम्राट की बहुत तारीफ की l उसकी स्तुति में अनेक सुन्दर गीत गाये l यह सब उसने कुछ पाने की लालसा से किया l उसकी प्रशंसाओं से सम्राट हँसता रहा फिर उसने स्तुतिगान करने वाले उस चारण को सोने की बहुत सी मुहरें भेंट की l उस चारण ने जब इन मुहरों पर निगाह डाली तो उसके अंदर कुछ कौंध गया l उसने आकाश की और कृतज्ञता भरी नज़रों से देखा l उन मुहरों को देखकर उसमें न जाने कैसी क्रांति हो गई , अब वह चारण न रहा , संत बन गया l बहुत वर्षों बाद किसी ने उससे पूछा --- 'ऐसा क्या था उन मुहरों में ? ' वह हँसा और बोलै --- मुहरें नहीं , वह वाक्य जादुई था , जो उसमे लिखा था l उस पर लिखा था ---- 'जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए परमात्मा पर्याप्त है l '
24 August 2020
WISDOM ----- दोष एवं गलतियों का निराकरण - परिमार्जन सबसे बड़ी साधना है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
आचार्य श्री लिखते हैं --- ' महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें दोष अपना देखना चाहिए , दूसरों का नहीं l दूसरों की ओर ताक - झाँक हमें आत्मविमुख कर देती है और घोर पतन की राह पर धकेल देती है l
अपने दोषों को खोजना और दूसरों से अपनी कमियाँ - खामियाँ सुनना बहुत कठिन काम है l इन सब में हमारा अहंकार आड़े आता है l आचार्य श्री लिखते हैं --- ' मनुष्य होने के नाते हम सब से गलतियाँ होना स्वाभाविक है l हम जीवन के प्रति होश में रहें l यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हमें अपनी छोटी सी गलती भी साफ - साफ दिखाई दे l भूल को स्वीकार करने का साहस हो l अगर कभी गलती हो जाये तो अपने को तथा औरों को कोसने के बजाय शांतिपूर्वक परिस्थिति व कारण की खोज करनी चाहिए तथा इसे न दोहराने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए l अपनी कमजोरी के छोटे पक्ष को , एक छोटी सी गलती को अत्यंत धैर्य और साहस के साथ सुधारने का प्रयास करना चाहिए l हमें हमारे दोष बार - बार गिराते हैं और हम गिरते हैं , पर गिरकर हमें उठना नहीं आता l हर गलती से सीख लेकर अगर हम उठ सकें तो हमारा जीवन पवित्रता को पा सकता है , यही अध्यात्म का प्रवेश द्वार है l "
23 August 2020
WISDOM -----
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---- " जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है , वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है , वह एक ही इन्द्रिय इस पुरुष की बुद्धि को हर लेती है l "
जब इंद्रिय व मन मिल जाते हैं तो उनका पक्ष प्रबल हो जाता है , तब अकेली रह जाने के कारण बुद्धि अपना काम नहीं कर पाती , और बुद्धि कुबुद्धि बनकर अनर्थकारिणी बन जाती है l एक विचारक का कथन है --- " जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहते हैं , उनको अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए l आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाखों - करोड़ों रूपये से भी अधिक है l जो मनुष्य अपना स्वामी है और इंद्रियों को इच्छानुसार चलाता है , वासना से नहीं हारता है , आर्थिक दृष्टि से सुखी रहता है l प्रलोभन एक तेज आंधी के समान है , जो मजबूत चरित्र को भी , यदि वह सतर्क न रहे , गिराने की शक्ति रखता है l जो जागरूक है , वही संसार के नाना प्रलोभनों - आकर्षणों और मिथ्यादंभ से मुक्त रह सकता है l
WISDOM -----
अनावृष्टि से संकटग्रस्त जनता की सहायता के लिए छत्रपति शिवाजी एक बाँध बनवा रहे थे l मजदूरी करके सहस्त्रों व्यक्तियों के भरण - पोषण की व्यवस्था हो रही थी l छत्रपति शिवाजी ने एक दिन यह देखा तो गर्व से फूले न समाये कि वे ही इतने लोगों को आजीविका दे रहे हैं l यदि वे ये प्रयास न करते तो उतने लोगों को भूखे मरना पड़ता l समर्थ गुरु रामदास उधर से निकले l शिवाजी ने उनका सम्मान - सत्कार किया और अपने उदार - अनुदान की गाथा कह सुनाई l समर्थ गुरु उस दिन तो चुप हो गए , पर जब दूसरे दिन चलने लगे तो शांत भाव से एक पत्थर की ओर संकेत कर के शिवाजी से कहा --- ' इस पत्थर को तुड़वा दो l ' पत्थर तोडा गया तो उसके बीच एक गड्ढा निकला , उसमें पानी भरा था l एक मेढ़की कल्लोल कर रही थी l समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी से पूछा --- " इस मेढ़की के लिए संभवत: तुमने ही पत्थर के भीतर यह जीवन रक्षा की व्यवस्था की होगी ? " शिवाजी का अहंकार चूर - चूर हो गया , वे समर्थ के चरणों में गिर पड़े l समर्थ गुरु रामदास ने उन्हें अपनी भूमिका का बोध कराया और आततायियों से संघर्ष हेतु नीति बनाने के लिए बाध्य किया l समर्थ गुरु का मार्गदर्शन एवं कृपा ही थी जिसने शिवाजी को समय - समय पर सही सूत्र देकर आपत्ति से बचाया व श्रेयपथ पर अग्रसर किया l
22 August 2020
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " कहावत है कि अपनी अक्ल और दूसरों की संपत्ति चतुर को चौगुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई पड़ती है l संसार में व्याप्त इस भ्रम को महामाया का मोहक जाल ही कहना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने को पूर्ण निर्दोष एवं पूर्ण बुद्धिमान मानता है l न तो उसे अपनी त्रुटियाँ सूझ पड़ती हैं और न अपनी समझ में कोई दोष दिखाई देता है l इस एक ही दुर्बलता ने मानव जाति की प्रगति में इतनी बाधा पहुंचाई है , जितनी संसार की समस्त अड़चनों ने मिलकर भी नहीं पहुंचाई होगी l "
आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " अध्यात्म - विद्द्या का प्रथम सूत्र यह है कि प्रत्येक भली - बुरी परिस्थिति का उत्तरदायी हम अपने आप को मानें l बाह्य समस्याओं का बीज अपने में ढूंढें और जिस प्रकार का सुधार बाहरी घटनाओं , व्यक्तियों और परिस्थितियों में चाहते हैं , उसी के अनुरूप अपने गुण , कर्म , स्वाभाव में हेर - फेर प्रारम्भ कर दें l "
वैचारिक प्रदूषण से भरे इस समाज में कम - से - कम अपने चिंतन को ऊर्जावान बनाये रखें l अपना सुधार ही संसार की सर्वश्रेष्ठ सेवा है l