4 December 2020

WISDOM -----

  हमारे  देश  में  जाति -भेद   युगों  से  रहा  है   l  इस  बुराई  के  कारण  समाज  ने  अपना  ही  नुकसान  किया  है  l  जो   गुणों  में   और   अपने  कर्म  से  श्रेष्ठ   थे   वे   अपनी  श्रेष्ठता  का  प्रमाण  इस  संसार  को  देकर  और  अपना  नाम  इतिहास  में  स्वर्णाक्षरों  में  लिखाकर   चले  गए  ,  यह  समाज  ही  उनकी  योग्यता  और  श्रेष्ठता  से  लाभ  उठाने   से  वंचित  रह  गया  l   भगवान  परशुराम  ने  केवल  ब्राह्मण  बालकों  को  ही  धर्नुविद्या   सिखाने   की  प्रतिज्ञा  की  हुई  थी  l  कर्ण   बहुत  वीर  था   लेकिन  सब  लोग  उसे  ' सूतपुत्र  '  कहकर  अपमानित  करते  थे  ,  वह  भी  धनुर्विद्या   सीखना  चाहता  था  , विशेष  रूप  से  ब्रह्मास्त्र   का  ज्ञान  चाहता  था  ,  इस  कारण  उसने  ब्राह्मण  का  वेश  बनाकर  परशुराम  से  धर्नुविद्या  सीखनी  आरम्भ  कर  दी  l  परशुराम जी  जितना  सिखाते  ,  कर्ण   उसका  अभ्यास   बहुत  परिश्रम  और  पूर्ण  लगन  से  करता  l  कर्ण ,  परशुराम जी  के  स्नान  हेतु   उबटन  और  उत्तरीय  वस्त्र  लेकर  उनके  पीछे  जाया  करता  था   l   एक  दिन  परशुराम जी  स्नान  करने  निकले   तो  उन्होंने  कर्ण   की  परीक्षा  लेनी  चाही  l   उनके   मार्ग में  फूलों  से  लदा   एक  वृक्ष  था  l   उन्होंने  एक  ही  बाण  से   उस  वृक्ष  के   सभी  फूलों  को  आधा - आधा  काटकर  पृथ्वी  को  पाट   दिया  और  आगे  बढ़  गए  l   कर्ण   पीछे  से  आते  हुए  जब  वहां  पहुंचा    तो  वह  अपने  गुरुदेव  की   मंशा  को  समझ  गया  , परन्तु  उसके  हाथ  में  उबटन  का  कटोरा  था  जिसे  जमीन   पर  नहीं  रखा  जा  सकता  था  l   ऐसे  में  वह  बाण  कैसे  चलाए  ?  तो  उसने  कटोरे  को  आसमान  में  उछाला   और  जितनी  देर  कटोरा  आसमान  में  रहा  ,  उतनी  देर  में  उसने  शर संधान  कर  के   शेष  आधे  कटे  फूलों    को  पूरी  तरह  धरती  पर  पाट   दिया   l  लौटने  पर  परशुरामजी  ने   यह दृश्य  देखा  तो   अपने शिष्य  के  कौशल  पर  बहुत  प्रसन्न  हुए   l   वे  कर्ण  को  चाहते  भी  थे  ,  उस  दिन  दोपहर  को  कर्ण  की  जंघा  पर  सिर   रखकर  सो  रहे  थे   कि   एक  कीट   जमीन   से  आ  निकला   और  कर्ण  की   जंघा पर  बैठकर  उसे  काटने  लगा  l   कर्ण   की  जंघा  से   लहू   बहने  लगा  l   गुरुदेव  की  नींद  न  टूट  जाये   इसलिए  कर्ण  उस  पीड़ा  को  सहता  रहा   और  अपने  पाँव   को  टस - से - मस   नहीं  किया  l   रक्त  बहते - बहते  जब  परशुराम जी  के  शरीर  और  कान  से   स्पर्श किया  तो  वे  हड़बड़ा  कर  उठ  बैठे   l  कर्ण  की  जंघा  से  इतना  रक्त  बहते  देख   और  इस  असह्य  पीड़ा  को   उसे  धैर्य  और  शांति  के  साथ  सहते  देख   उन्हें  शक  हुआ  ,  उन्होंने  कहा  --- कर्ण    तुम  ब्राह्मण  पुत्र  नहीं  हो  !  सच  बताओ  तुम  कौन   हो  ?    तब  कर्ण  ने  उनको  सच  बता  दिया  कि   वह  ' सूतपुत्र ' है   l   तब  परशुराम जी  को  बहुत  क्रोध  आया   लेकिन  वो  कर्ण  के  सेवाभाव  से  प्रसन्न  भी  थे  l  उन्होंने  कहा  --- कर्ण  !  धर्नुविद्या  में  तुम  पारंगत  हो  चुके  हो  ,  यह  ज्ञान  तो  तुम्हारे  पास  रहेगा   लेकिन   तुमने गुरु  से  असत्य   बोलकर जो  ' ब्रह्मास्त्र  '  की  विद्या  सीखी  है  , उसे  ऐन  वक्त  पर  जब  तुम्हे  उसकी  जरुरत  होगी  ,  तुम  भूल  जाओगे  l   कर्ण  दुःखी   मन   से वापस  आ  गया  l   महाभारत  में  जब  अर्जुन  के  साथ  उसका  युद्ध  हो  रहा  था   तब   कर्ण  के  रथ  का  पहिया  कीचड़  में  धंस  गया    तब ब्रह्मास्त्र  चलाकर   वह  बच  सकता  था   लेकिन  गुरु  का  श्राप  फलित  हुआ   और  बहुत  याद  करने  पर  भी  उसे   ब्रह्मास्त्र  का  ज्ञान  याद  नहीं  आया   और  अर्जुन  के  हाथों   उसका    अंत  हुआ   l 

WISDOM ----- ईश्वर प्रत्येक प्राणी को नियत संख्या में श्वास प्रदान करते हैं

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  ---- ' प्रत्येक  जीवधारी  का  पूर्ण  आयु  प्राप्त  करना  , दीर्घजीवी  होना    उसकी  श्वास  क्रिया  पर  आश्रित  होता  है   l   ईश्वर  एक  नियत  संख्या   में प्रत्येक  प्राणी   को श्वास  प्रदान  करता  है   और  उस  श्वास  के  समाप्त  होने  पर  ही  प्राणांत  होता  है  l   ईश्वर  के  द्वारा  प्रदत्त  इस  खजाने  को  जो  प्राणी  जितनी  होशियारी  से  खर्च  करेगा  ,  वह  उतने  ही  अधिक  काल  तक  जीवित  रहेगा   और  जो  इसे  जितना  व्यर्थ  खोएगा ,  उतनी  ही  शीघ्र  उसकी  मृत्यु  हो  जाएगी  l '  आचार्य श्री  लिखते  हैं --- ------ ' सामान्यत:  हर  एक  मनुष्य   दिन - रात  में  21600  श्वास  लेता  है  l   इससे  कम    श्वास  लेने  वाला   दीर्घजीवी  होता  है  l   क्योंकि  अपने   धन का   जितना कम  व्यय  होगा  ,  उतने  ही  अधिक  काल  तक  वह   संचित  रहेगा  l  विश्व  के  समस्त  प्राणियों  में   जो  जीव   जितनी  कम  श्वास  लेता  है  ,  वह  उतने  ही  अधिक  काल  तक  जीवित  रहता  है  l  खरगोश  एक  मिनट  में  38  बार  श्वास  लेता  है  , वह  केवल  8 वर्ष  की  आयु  प्राप्त  करता  है   जबकि  19  बार  प्रति  मिनट   श्वास  लेने  वाला  घोड़ा   35  वर्ष  की  पूर्णायु  को  प्राप्त  करता  है  l  कछुआ  प्रति  मिनट  5   बार  श्वास  लेता  है    इसलिए उसकी  आयु   अन्य प्राणियों  की  तुलना  में   बहुत  अधिक  होती  है  l  '  आचार्य  श्री  लिखते  हैं --- विषयी  और  लम्पट   मनुष्य  प्रति  मिनट  बहुत  श्वास  लेते  हैं   इसलिए  उनकी  आयु  जल्दी  घट   जाती  है   और  प्राणायाम  करने  वाले   योगाभ्यासी  दीर्घकाल  तक  जीवित  रहते  हैं   l   आचार्य श्री  कहते  हैं  निष्क्रिय  रहने  से  अन्य  अंग  निर्बल  और  अशक्त  हो  जाते  हैं   तदनुसार  उनकी  श्वास  का  वेग  बहुत  बढ़  जायेगा   इसलिए  पर्याप्त  और  नियमित  श्रम  अति आवश्यक  है  l  आचार्य  श्री  लिखते  हैं --- 'श्वास  सदा  पूरी  व  गहरी  लेनी  चाहिए   तथा  झुककर  कभी  नहीं  बैठना  चाहिए  l   नाभि  तक  पूरी  श्वास  लेने  पर  एक  प्रकार  से  कुम्भक  हो  जाता  है   और  श्वासों   का  खर्च  कम  हो  जाता  है   l 

3 December 2020

WISDOM ----- अहंकार विवेकरूपी आँखों पर पट्टी बाँध देता है

    पुराणों  में  कथा  है --- भक्त  प्रह्लाद  की  --- प्रह्लाद  पांच  वर्ष  के  थे  ,  हर  पल  नारायण - नारायण  का  जप  करते  थे  l   इससे  उनका  पिता  हिरण्यकशिपु  बहुत  क्रोधित  होता  था   l   वह  चाहता  था  की  प्रह्लाद   भगवान  विष्णु  को  भूल  जाये   और  अपने  पिता  को  ही  परमात्मा  मान  कर  उनकी  पूजा  करे  l   परन्तु  प्रह्लाद  न  मानते  थे  और  न  डरते  थे  l   तब  हिरण्यकशिपु  के  कहने  से  असुरों  के  गुरु  शुक्राचार्य   जो  दैत्य गुरु  होने  के  साथ  महान  तांत्रिक  भी  थे  ,  प्रह्लाद  पर   तांत्रिक  क्रिया  की   l   इसके  पहले  वे  उन  पर  मारण   क्रिया  भी  कर  चुके  थे  ,  इससे  प्रह्लाद  को  तेज  बुखार  व  शरीर  में  पीड़ा  थी  l   तब  उनकी  माता  कयाधू   ने  देवर्षि  नारद  को  बुलाया   और  कहा  कि   इस  अबोध  बालक  पर  इतना  अत्याचार  क्यों  ?   तब  नारद जी  ने  कहा --- शुक्राचार्य  को  अपने  तंत्र  पर  बड़ा  गर्व  है  l   वे  इस  तंत्र  के  माध्यम  से  सब  कुछ  करने  का  दम्भ  भरते  हैं  l   वे  भूल  जाते  हैं  कि   परमात्मा  की  सामर्थ्य  सर्वोपरि  है  l   प्रह्लाद  की  परमात्मा  के  प्रति  अनन्य  निष्ठा   एवं   भक्ति  ही  उनका  सुरक्षा  कवच  है  l   शुक्राचार्य  का  बड़े  से  बड़ा  मारक  तंत्र   भी  उनको   डिगा  नहीं  सकेगा  l   दैत्य  कुल  में  जन्मे  प्रह्लाद  की  भगवान  ने   रक्षा  की    वे  भक्तराज  कहलाए  l 

WISDOM -----

   आतंकवादी  मानसिकता  कैसी  होती  है   इसे  एक  पौराणिक  आख्यान  द्वारा   समझा  जा  सकता  है -----  घटना  महाभारत  युद्ध  के  समय  की  है   l   द्रोणपुत्र  अश्वत्थामा  ने   अपने  ब्रह्मास्त्र  से   उत्तरा  के  गर्भस्थ  पुत्र  को  मार  डाला   l   इस  अमानवीय  कृत्य  से  सभी  चीत्कार   उठे  l   द्रोपदी  ने  इसका  बदला  लेने  के  लिए  अति  बलवान  भीम  से  निवेदन  किया   और  अश्वत्थामा  को  उचित  दंड  देने  को  कहा   ,  परन्तु  परम  नीतिज्ञ  भगवान  कृष्ण   ने   भीम  को  अश्वत्थामा  के  पास  जाने  से  रोका   और  कहा  कि   इस  समय  अश्वत्थामा  राक्षस  बन  गया  है  l   वह  अपनी  सभी  मर्यादाओं  और  नीतियों  को  भूलकर   दानव  की  साक्षात्  मूर्ति  बन  गया  है  l   वह  भीम  को  भी  मार  सकता  है   क्योंकि  इस  मन: स्थिति  में   उससे  दया   और  क्षमा  की  उम्मीद  नहीं  की  जा  सकती  है   l   पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ठीक  यही  मानसिकता  आतंकवादियों  की  होती  है  l   उनके  सामने  मानवता  की   करुण   चीत्कार  कोई  मायने  नहीं  रखती  l   आतंकवादी  राक्षस  एवं   दैत्य  के  समान   होते  हैं  ,  जिनके  अंदर  का  दिल   पथरा    गया  होता  है  l   इनकी  संवेदना  शुष्क  हो  जाती  है   और  इस  शुष्कता  में  क्रूरता  का  जन्म  होता  है  l  इनसे  किसी  प्रकार  के  रहम  और  दया  की  आशा  नहीं  की  जा   सकती है   l 

2 December 2020

WISDOM -----

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' हर  व्यक्ति  के  व्यक्तित्व  की   एक  संरचना  होती  है  ,  और  उसमें  अनेक  दृश्य  और  अदृश्य  तत्व  होते  हैं  l   जो  दृश्य  है  वह  हमारा  व्यवहार  है  और  जो  अदृश्य  है  उसमे  हमारी  आस्था , विश्वास , विचार  व  भाव   सम्मिलित  होते  हैं  l   सज्जन  और  श्रेष्ठ  व्यक्तियों  की  इमेज  ( छवि ) परिष्कृत  होती  है   क्योंकि  उनका  हृदय  संवेदनशील  होता  है  ,  वे  सबके  कल्याण  , सबकी  भलाई  के  बारे  में  सोचते  हैं  l  ऐसे  श्रेष्ठ  व्यक्तियों  से   जो  भी  मिलता  है  उसके   हृदय  में  उनकी  अमिट   छाप  पड़   जाती  है  l   लेकिन   अनेक  व्यक्ति   नकारात्मक  सोच  और  नकारात्मक   विचारों    वाले  होते  हैं  l  वे  किसी  को  सुखी    व  स्वस्थ  देख  नहीं  पाते  l   किसी  को  असफल  होते  देख   इनको  आंतरिक  प्रसन्नता  होती  है  l   इनके  पास  आसुरी  शक्तियों  एवं  अँधेरे  का  जमघट  होता  है  l   इनका  व्यक्तित्व  ही  आसुरी  शक्तियों  द्वारा  संचालित   होता  है  l   ऐसे  नकारात्मक   चिंतन  और  व्यवहार  से  जितनी  दूरी   बनाई  जा  सके  ,  उतना  ही  श्रेयस्कर  है   l '                                                                                                                                         रामायण   में  यदि  हम  रावण  के  चरित्र  को  देखें   तो  रावण   ऋषि  विश्रवा   का  पुत्र   और  ऋषि   पुलस्त्य  का  पौत्र  था   l   ऋषि   विश्रवा   के  सगे   भाई  थे  अगस्त्य  ऋषि  l   ऋषि  कुल  में   पैदा  होकर  भी  वह  स्वयं  को  गर्व  से  ' राक्षसराज  रावण  '  कहता  था  l   शिव भक्त  था  l  वेद  शास्त्रों  का  बड़ा  विद्वान्  था    लेकिन  उसने  दसों   दिशाओं  में  आतंक  फैला  रखा  था   l   ऋषियों  को  सताता  ,  उनके  यज्ञ  आदि  पवित्र  कार्यों  को  नष्ट  करता  l   लोगों  को  कष्ट  पहुँचाने  में  ही  उसको  आनंद  आता   था  l  अपने  आसुरी  कार्यों  के  लिए  उसने  हर  दिशा  में  अनेक  राक्षस  नियुक्त  कर  रखे  थे  ,  इसके  अतिरिक्त   लोगों  को  कष्ट  देने  के  लिए   अनेक  राक्षसियों  को  भी  नियुक्त  कर  रखा  था  l   जब  श्री  हनुमान जी  समुद्र  पार  कर  रहे  थे   तो  उनका  सामना   सुरसा   नामक    राक्षसी  से  हुआ   l   लंका  के  द्वार  पर  पहुंचे  तो  वहां  पहरा  देती  लंकिनी  मिल  गई  l   सीताजी  को  सताने  व  डराने  के  लिए  त्रिजटा  आदि  अनेक  राक्षसियों  को  रखा  था  l   मंदोदरी  जैसी  पतिव्रता  पत्नी  के  होते  हुए  भी  उसने  सीता -हरण  किया  l   उच्च   कुल में  पैदा  होकर  भी   उसका  व्यक्तित्व  आसुरी  था  l   भगवान  राम  से  युद्ध  से  पूर्व  जब  उसने  शक्ति   की  उपासना  की    तो देवी  ने  उसे  आशीर्वाद  दिया  ' कल्याण   हो '  l   क्योंकि  रावण   का  ,     राम  के  हाथों  मिट  जाने  में  ही   कल्याण  था  l   अपने  अंतिम  समय  में  वह  भी  समझ  गया    कि   राम  साक्षात्  भगवान  हैं   , वह  कहने  लगा  -- भगवन  !  मेरे  जीते  जी  आप  मेरे  धाम  लंका  नहीं  आ   सके   लेकिन   आपके  हाथों  मृत्यु  को  प्राप्त  कर  मैं   आपके  जीते  जी   आपके  धाम  जा  रहा  हूँ   l  '

WISDOM -----

   औरंगजेब  मुग़ल  सल्तनत  का  क्रूरतम  बादशाह  था   l   सत्ता  हथियाने  की   चाह    में   उसने  सर्वप्रथम    अपने  दोनों  भाइयों  शुजा  और  मुराद  को  मौत  के  घाट   उतरवा  दिया    और  फिर  अपने  बड़े  भाई  दाराशिकोह  को  गिरफ्तार  कर  लिया  l   पहले  तो  उसने  दारा   को  अमानवीय  यातनाएं  दीं   और  फिर  उसके  लहूलुहान  बदन  को  हाथी  की  पीठ   पर  डालकर   शहर  में  मजमा  दिखाने  के  लिए  छोड़  दिया  l   यह  दृश्य  देखने  के  लिए  बाजार  में  भारी   भीड़  इकट्ठी  हो  गई   l   दारा   नीची  नजरें  किए   लेटा   था  कि   उसे  एक  आवाज  सुनाई  पड़ी  --- " दारा  !  तू  जब  भी  यहाँ  से  गुजरता  था    तो  खैरात  बाँटता   हुआ  जाता  था  l   आज  क्या  इस  गरीब  को   तेरी  सखावत  का  मौका  नहीं  मिलेगा   l "  दाराशिकोह  ने  नजरें  उठाईं   तो  उसे  एक  फकीर   खड़ा  दिखाई  पड़ा  l   दारा   ने  अपने  कंधे  पर  पड़े   दुशाले  को  उठाया   और  फकीर   की  गोद   में  डाल   दिया  l   सारा  शहर    ' दारा   जिंदाबाद  '  और ' औरंगजेब   मुरदाबाद  '  के  नारों  से  गुंजायमान  हो  उठा   l 

1 December 2020

WISDOM -----

   चलते - चलते  शाम  हो  गई  तो  गुरु  नानक जी   पास  के  गांव  में  एक  निर्धन  किसान  के  यहाँ  ठहर  गए   l   उस  गाँव  के  सेठ  ने  यह  सुना  कि   आज  रात्रि  को  गुरु  नानक  यहीं  विश्राम  कर  रहे   हैं   तो  वह  भी  उनके  दर्शन  के  लिए  गया  l   उस  समय  नानक  भोजन  कर  रहे  थे  l   भोजन  में   सूखी   रोटी  और  दाल  थी  l   ऐसा  रुखा - सूखा  भोजन   करते  हुए  नानक  को  देखा    तो  उस  सेठ  को   बड़ा  बुरा  लगा  l   उसने  कहा ---" आप  ऐसा  भोजन  क्यों  कर   रहे  हैं  ?  इस  गाँव  में  तो  जो  भी  कोई  संत  महात्मा  आता   है ,  वह  मेरे  यहाँ  ही  ठहरता  है  l   भगवान  की  कृपा  से  मेरे  यहाँ  कोई  कमी  नहीं  है  l   मेरा  आपसे  निवेदन  कि   आप  भी  मेरे  यहाँ   चलकर  ही  निवास  करिए l  "   नानक  ने  बड़ी  शांति  से  उत्तर  दिया  --- " महोदय  !  मैं  तो  श्रम   की  कमाई  से  उत्पन्न  अमृत  खा  रहा  हूँ   l   निर्धन  व्यक्तियों  के  शोषण  से  बने  पकवान  मुझे  पसंद  नहीं  हैं  l  "