8 December 2020

WISDOM -----

  एक  नीति   कथा  है -----  दो  बाज  एक  ही  पेड़  पर  रहते  थे  l   दोनों  शिकार  मार  कर  लाते   और  लौट  कर  उसी  पेड़  पर  बैठकर  खाते   l   एक  दिन    बाज  ने  साँप   पकड़ा    दूसरे  के  हाथ  चूहा  लगा   l   दोनों   अधमरे  थे  l   दोनों  ने  सुस्ताकर  खाने   के   लिए   पंजों  को  ढीला  छोड़  दिया  l   तनिक  सा  अवसर  मिला    तो  साँप   घायल  चूहे  को  निगलने  का   पैंतरा  दिखाने  लगा   l   दोनों  बहुत  हँसे ,  वे  सोचने  लगे   कि   देखो  इन   मूर्ख   प्राणियों  की  हालत    स्वयं  मरने  जा  रहे  हैं  ,  पर  फिर  भी    द्वेष  का  स्वभाव   और  पाने  का  लोभ  छूटता   नहीं  है   l   

7 December 2020

WISDOM------- दुर्योधन की मेवा त्यागी , साग विदुर घर खायो

       विदुर जी  ने  जब  देखा    धृतराष्ट्र    और  दुर्योधन  अनीति  करना  नहीं  छोड़ते  ,  तो  सोचा  कि   इनका  अन्न   और  इनका  सान्निध्य   मेरी  वृत्तियों  को  भी  प्रभावित  करेगा  ,  इसलिए  वे  नगर  के  बाहर   वन  में  कुटी  बनाकर   पत्नी  सहित  रहने  लगे   l   जंगल  से  भाजी  तोड़  लेते      ,  उबाल   कर खा  लेते     और  अपना  समय  सत्कार्यों  और  प्रभु  - स्मरण  में  लगाते  l   श्रीकृष्ण  जब  संधि  दूत  बनकर  गए   और  वार्ता  असफल  हो  गई  ,  तो  वे  धृतराष्ट्र , दुर्योधन, द्रोणाचार्य  आदि  सबका  आमंत्रण  अस्वीकार  कर  के   विदुर  जी  के  यहाँ  जा  पहुंचे   और  वहां  भोजन  करने  की  इच्छा  प्रकट  की  l   विदुर  जी  को  यह  संकोच  हुआ  कि  प्रभु  को  शक - भाजी  परोसने  पड़ेंगे  ?  पूछा  , ' आप  भूखे  भी  थे  ,  भोजन  का  समय  भी  था   और   उनका आग्रह  भी  ,  फिर  आपने  भोजन  क्यों  नहीं  किया   ? "  भगवान  बोले  ---- " चाचाजी  !  जिस   भोजन  को  करना   आपने  उचित  नहीं  समझा  ,  जो  आपके  गले  नहीं  उतरा  ,  वह  मुझे  भी  कैसे  रुचता   ?  जिसमें  आपने  स्वाद  पाया  ,  उसमे  मुझे  स्वाद  न  मिलेगा  ,  ऐसा  आप  कैसे  सोचते  हैं   ?  "    विदुर जी  भाव  - विह्ल   हो  गए   l   प्रभु   तो   प्रेम  और  भावना  के  भूखे  हैं   l                                                                             

WISDOM ----- अहंकार व्यक्ति को पतन के मार्ग पर ले जाता है

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' जब  सृष्टि  का  सृजेता   शाश्वत  ईश्वर  स्वयं  को  श्रेष्ठ  सिद्ध  करने  का  कभी  कोई  प्रयास  नहीं  करता  ,  तब  हम  मरणधर्मा  होते  हुए   स्वयं  को   श्रेष्ठ   मानने   व  सिद्ध  करने  का  अहंकार  किस  आधार  पर  कर  सकते  हैं   ? '   अहंकार  व्यक्ति  को  पतन  के  मार्ग  पर  ले  जाता  है  , इसलिए  मनुष्य  को  जो  कुछ  भी  विशेषता  प्राप्त  हो   उसके  आधार  पर  स्वयं   को  श्रेष्ठ  सिद्ध  करने  के  बजाय   इसका  सदुपयोग   स्वयं  के  विकास  में    एवं    दूसरों  के  कल्याण  के  लिए  करना  चाहिए  l  उसे  यह  सदैव  स्मरण  रखना  चाहिए   कि    जिन  उपलब्धियों  के  कारण   आज  वह  गर्वोन्मत   हो  रहा  है  ,  उन्हें  नष्ट  होने  में   क्षणमात्र  भी  नहीं  लगेगा   l '     पुराण    में  एक  कथा  है  ------  सम्राट  भरत   ने  जब  सम्पूर्ण  भूमण्डल  को  जीत   लिया  तो  उसने  देवराज  इंद्र  के  पास  जाकर  कहा  ---- " अब  मुझे  अपनी   कीर्ति  को   अक्षय - अमर  रखने  के  लिए     वृषभाचल    पर  अपना  नाम  अंकित  करना  है  l  "  इंद्र  ने  इसमें  अपनी  सहमति  व्यक्त  की  l   सम्राट  भरत  वृषभाचल  पर  पहुंचे  ,  पर  यह  देखकर  अचंभित  रह  गए   कि   पूरा  पर्वत   चक्रवर्ती    सम्राटों  के  नामों  से  भरा  है  ,  उसमे  इतना  स्थान  भी  खाली   नहीं  है  कि   एक  नाम  और  लिखा  जा  सके  l   बहुत  खिन्न    मन  से   वे  इंद्र  के  पास  लौट  आए   और  बोले  ---- " उसमें  तो  मेरा  नाम  लिखने   योग्य  स्थान  ही  नहीं  है  ,  अब  मैं  अपना  नाम  कैसे  लिखूं   ? "  इंद्र  बोले  ---- " तुम  किसी  का  नाम  मिटाकर  अपना  नाम  लिख  दो  l  सहस्त्रों - सहस्त्रों  वर्षों  से   यही  परंपरा   चली  आ  रही  है  l  "   इस  पर  भरत   ने  कहा  --- " तो  फिर  भविष्य  में   मेरा  नाम  मिटाकर   कोई  अन्य  व्यक्ति   अपना  नाम  लिख  सकता  है  l  "                                  इंद्र  ने  कहा  --- " हाँ ,  ऐसा  हो  सकता  है   l "   तब  भरत   बोले  ---- " तो  फिर  ऐसी  उपलब्धि  पर   अहंकार  करने   से   क्या  लाभ  ,  जिसका  कोई  स्थायी  अस्तित्व  न  हो  l  "  वे  अनुभव  करने  लगे   कि   इस  विराट  जगत  में   अपना  अस्तित्व  ,  अपना  स्थान  है  ही  कितना  l   यह  सोचना  कितना  गलत  है   कि   जो  मैंने   किया ,  वह   कोई  कर  ही  नहीं  सकता  l   यह  सोचकर  भरत  इंद्रलोक  से   वापस  लौट  आए   l 

6 December 2020

WISDOM -----

   रामायण   में एक  चौपाई  है --- 'उधरहिं  अंत  न  होइ  निबाहु  l   कालनेमि  जिमि  रावन   राहू  ll     अर्थात  जब  धर्म  का  ढोंग  करने  वाले   अधर्मीजनों  की  पोल  खुलती  है  ,  तो  उनका  कहीं  निर्वाह  नहीं  होता  ,  उन्हें  कहीं  ठिकाना  नहीं  मिलता   l   उनका  वही  हाल  होता  है  ,  जो  संन्यासी  बनकर  भिक्षा  मांगने  वाले   रावण  का  हुआ  l   वह  अपने   परिवार सहित  दुर्गति  को  प्राप्त  हुआ   l   जो  हाल  साधु  बनकर  रामनाम  जप  का  आडम्बर  करने  वाले  कालनेमि  असुर  का  हुआ   l   वह  महावीर  हनुमान  के  हाथों  मारा  गया    l  और  जो  हाल  राहु  का  हुआ   l   देवता  बनने   का  स्वांग  भरने  वाले   इस  असुर  को  अपना  सिर   कटवाना  पड़ा  l   ढोंगियों  का  ऐसा  हाल  होता  रहेगा  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं   धर्म  की  सम्पूर्ण  रचना  ' तमसो  मा   ज्योतिर्गमय  '  का  महान  उद्देश्य  लेकर   विकसित  हुई  है   l   धर्म  की  वैज्ञानिक  दृष्टि  अति  आवश्यक  है   l 

WISDOM ----

   किसान  और  उसकी  पत्नी  साथ - साथ  खेत  पर  जा  रहे  थे   l   पत्नी  राजमहल  की  शोभा  देखती  पीछे  रह  गई   l   किसान  ने  पुकारा  --- " व्यर्थ   क्यों समय  खराब   करती  हो  ?   इस  महल  से  तो  हमारा  महल  सौ   गुना  अच्छा  है  l '    राजा  ऊपर  बैठा  यह  वार्तालाप  सुन  रहा  था   l   उसने  बुलाकर  पूछा  --- "  भला  तुम्हारा  महल  कहाँ  है  ? '  किसान  ने  कहा  ---- " हरे - भरे  खेतों  का  फला - फूला   क्षेत्र  ही  हमारा  महल  है  ,  जिससे  असंख्यों  का  पेट  भरता  है  ,  आपके  महल  में  यह  विशेषता  कहाँ  है  ? "  राजा   नतमस्तक  हो  गया  l 

WISDOM------

 इतिहास  में  ऐसे  बहुत  कम  उदाहरण   हैं   , जहाँ    किसी  ने  भगवान  को  इस  तरह  अपने  जीवन  में  घोल  लिया  हो  ,  जैसे   वे  कभी  उनसे  पृथक  ही  न  हुए  हों  l  मीरा  की  भक्ति  अद्वितीय  थी   l   मीरा  का  व्यक्तित्व  ऐसा  था   जिसने  अपने  जीवन  में   भगवान  श्रीकृष्ण   की  मूर्ति  में   श्रीकृष्ण  को  जीवंत   कर  लिया  था   l   उन्होंने  स्थूल  दृष्टि  से   न  तो  कभी   भगवान  श्रीकृष्ण  को  देखा  ,  न  उनकी  वाणी  सुनी  ,   न उनका  सान्निध्य  पाया ,  लेकिन   फिर  भी  अपने  मन  में   श्रीकृष्ण  की  मूरत  को  ऐसा  बैठाया   कि   भगवान  को  हर  पल   उनके  साथ  रहना  पड़ा  l   उनकी  सुरक्षा  का  पूरा  दायित्व  भी  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अपने  ऊपर  ले  लिया  था  l   इसी  कारण  विष   का प्याला  ,  साँप   की  पिटारी   आदि  भी    मीरा  के    प्राण   न  ले  सके   l   मीरा  को  जिसने  जन्म  दिया  ,  वह  माँ  उसे  बचपन  में  ही  छोड़कर  चली  गई ,  मीरा  की  जिससे  शादी  हुई  वह  कुंवर  भोजराज  भी   ज्यादा  दिन  जीवित  न  रहे  l   उनके  बाबा  राव  दूदा ,  जिन्हे  वह  अपना  बहुत  मानती  थीं , पिता  रतन सिंह  ,  सह उम्र  का  भाई  --ताऊ जी  का  बीटा  जयमल  --- एक - एक  कर  के  सब  उन्हें  छोड़कर  चले  गए   और  इस  संसार  में  ऐसे  लोगों  से  उनका  पाला   पड़ा  ,  जो  उनका  अपमान  करते ,  उन्हें  तिरस्कृत  करते   और  यहाँ  तक  कि   उनके  प्राण  लेने  के  लिए   तरीके  सोचते  और  उसके  लिए  प्रयास  करते  l   ऐसे  लोगों  के  बीच  रहकर  भी   मीरा  के  मन  में  कभी  द्वेष , घृणा  ,  छल , कपट  ,  झूठ   और  बदला  लेने  का  भाव  नहीं  आया   l    वे तो  सदैव  ही  प्रेम  और  भक्ति  रस   में  डूबी  रहीं   और  सब  कुछ  भगवान  पर  छोड़कर   निश्चिंतता   व   निर्भीकता  के  साथ  रहीं   l   वे  केवल   कृष्णोपासिका  और  कृष्णप्रेमिका   नहीं  थीं  ,  बल्कि  उन्होंने  अपने  भक्तिरस  से   अनेकों  हृदयों  का   मैल   धो  दिया   और  बदले  की  आग  में  डूबे   हुए  ,  युद्ध , लूटमार , छल , कपट  के  साये  में   जीने  वाले  राजवंश   और  समाज  को   भक्ति का  पाठ  पढ़ाया   l 

5 December 2020

WISDOM -----

   अपने  को  अमर  मानता  हुआ  मनुष्य  कभी   अपनी  मृत्यु  की   कल्पना  भी  नहीं  कर  पाता  l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' संसार  का  आकर्षण  हमें  प्रतिपल   खींचता  है  l  संसार  के  सुखों  के  प्रति  यह  आकर्षण  इतना  ज्यादा  है   कि   मनुष्य  का  समय , श्रम  और  ऊर्जा   इन्हे  पाने  में  चुकते   जाते  हैं   और  फिर  भी  उसे  लगता  है  कि  आगे  कुछ  और  है  ,  जो  पाने  योग्य  है   और   उसे पाने  की  लालसा  कभी  समाप्त  नहीं  होती  l  जीवन  में  सुख  पाने  की  लालसा  हमें  भटकाती   है   l   एक  जगह  से  सुख  की  कामना  पूर्ण  नहीं   होती   कि  मन  कहीं  और  से  सुख  पाने  का  सपना   सँजो   लेता  है   और  मनुष्य   उस  दूसरे  सपने  को  पूर्ण  करने  की  यात्रा  पर  निकल  पड़ता  है  l   यक्ष  के  यह  पूछने  पर  कि   संसार  का  सबसे  बड़ा  आश्चर्य  क्या  है  ?  युधिष्ठिर  ने  कहा  ---- ' हजारों  लोगों  को  मरते  हुए  देखकर  भी   अपनी  मृत्यु  से  अनजान  बने  रहना  ,  खुद  को  मृत्यु  से  मुक्त   मान    लेना  ,  स्वयं   को अमर  मान  कर  अनेकों  दुष्कर्म  करना  , इस  संसार  का  सबसे  बड़ा  आश्चर्य  है   l '    नादिरशाह , सिकंदर , औरंगजेब , हिटलर  ने  कभी  अपनी  मृत्यु  की  कल्पना   ही नहीं  की  ,  स्वयं  को  अमर  मान  कर  इतने  अत्याचार  किए   l '  काल '  से  कोई  नहीं  बच   पाता  l