पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ---- ' प्रौढ़ता का संबंध आयु से नहीं विवेक से है l बड़प्पन होना चाहिए l ' एक कहानी है ----- एक बार नदी के किनारे की रेत पर कुछ बच्चे खेल रहे थे l उन्होंने उस रेत पर ही रेत के मकान बनाए थे , और उन बच्चों में से हर एक यह कह रहा था , यह वाला घर मेरा है , कोई कह रहा था वह वाला मेरा है और वही सबसे अच्छा है , उसके जैसा दूसरा कोई भी नहीं है l इसे कोई नहीं पा सकता l ऐसे ही कई तरह की बातें करते हुए वे बच्चे खेलते रहे l जब उनमें से किसी ने किसी का घर तोड़ दिया तो उनमे लड़ाई - झगड़ा भी खूब हुआ l लेकिन तभी सांझ का अँधेरा घिरने लगा l अब तो बच्चों को अपने घर की याद सताने लगी l अपने घर की याद आते ही उन्हें झूठे घरों से तनिक भी मोह न रहा l पूरे दिन जिन घरों के लिए उन्होंने न जाने कितने इंतजाम किए थे , सरंजाम जुटाए थे , वे सभी जैसे के तैसे पड़े रह गए l इन सारे रेत के घरों में उनमें से किसी का कोई मेरा - तेरा न रहा l वहीँ पास में कुछ दूर खड़े एक साधु बच्चों का यह सारा घटना प्रसंग देख रहे थे l वह सोचने लगे कि संसार के प्रौढ़ लोग भी क्या बच्चों की तरह रेत के घर - भवन - महल नहीं बनाते रहते ! इन बच्चों को तो फिर भी सूरज डूबने के साथ अपने घर की याद आ गई , परन्तु जिन्हें प्रौढ़ कहा जाता है , उनका तो जिंदगी की सांझ ढलने पर भी विवेक जाग्रत नहीं होता और ज्यादातर लोग अपने अहंकार और अपने स्वार्थ के साथ मेरा- तेरा कहते हुए संसार छोड़ देते हैं l इसलिए कहते हैं कि प्रौढ़ता का संबंध आयु से नहीं , विवेक से है l
27 December 2020
25 December 2020
WISDOM -----
मार्टिन लूथर ईसाई धर्म के प्रसिद्ध एवं विचारक हुए हैं l जब उन्होंने कुछ प्रचलित रूढ़िवादी मान्यताओं के विरुद्ध आवाज उठाई तो कुछ पुरातन पंथियों ने न केवल उनका विरोध करना शुरू किया , बल्कि उनको व उनके सहयोगियों को भाँति - भाँति से प्रताड़ित करना भी प्रारम्भ कर दिया l इन सबसे दुःखी होकर उनके एक शिष्य ने उनसे एक दिन कहा ---- " अब बहुत हो चुका ! आपकी प्रार्थना तो भगवान सुनते हैं , आप उनसे इन दुष्टों की मृत्यु का आशीर्वाद मांग लीजिए l " मार्टिन लूथर बोले ---- " यदि मैं भी ऐसी कामना करूँ तो मुझमें और इन नासमझों में क्या अंतर रह जायेगा ? " उनका शिष्य पुन: बोला ---- " पर आप इन जल्लादों की प्रवृति तो देखिए l ये आप जैसे संत , दयालु और परोपकारी के साथ कैसा दुर्व्यवहार करते हैं ? " मार्टिन लूथर बोले ----- " इनके और मेरे कर्मों का हिसाब उसे ही रखने दो , जिसने यह दुनिया बनाई है l हमारा कार्य है राग व द्वेष से मुक्त होकर शुभ व श्रेष्ठ कर्मों को करना l धर्म की राह पर चलने वाला अंतत: विजयी ही होता है l " यह सुन कर उनके शिष्य का माथा स्वत: ही उनके चरणों में झुक गया l
WISDOM -----
रामतनु लाहिड़ी कलकत्ता के प्रसिद्ध समाज सुधारक थे l एक बार वे अपने मित्र के साथ कहीं जा रहे थे कि उनकी दृष्टि सामने से आते एक व्यक्ति पर पड़ी l अभी तक उस व्यक्ति ने लाहिड़ी जी को नहीं देखा था l वे तुरंत एक पेड़ की आड़ में छिप गए और उस व्यक्ति के निकल जाने के बाद ही वहां से निकले l उनके मित्र को उनका यह व्यवहार कुछ विचित्र सा लगा l उसने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो वे बोले ---- " उन सज्जन ने मुझसे कुछ रुपयों का उधार लिया है , हर बार मेरे सामने पड़ने पर वे अनेक प्रकार के झूठे बहाने बनाते हैं , जिससे मेरा मन बड़ा दुःखी होता है l धर्म सिर्फ स्वयं द्वारा किए गए सत्कर्मों को नहीं कहते , वरन दूसरे के अनीतिपूर्ण आचरण को न होने देना भी धार्मिकता की सच्ची पहचान है l " उनका उत्तर सुनकर उनके मित्र बड़े प्रभावित हुए l
24 December 2020
WISDOM -----
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि गुण मानवीय व्यक्तित्व का आधार है l वे कहते हैं व्यक्तियों में अंतर मात्र गुणात्मक है , उनके अंदर उपस्थित गुणों के प्रभुत्व का है l जिस गुण का प्रभाव बढ़ जाये , व्यक्ति के व्यक्तित्व की संरचना वैसी ही हो जाएगी l एक व्यक्ति जीवन भर एक ही व्यक्तित्व नहीं रहता है l तभी तो अनेक हत्याएं करने के बाद भी अंगुलिमाल भिक्षु बन जाता है और वर्षों तपस्या करने के बाद भी रावण असुर बन जाता है l भगवान कहते हैं जिस गुण का आधिक्य हुआ , वह गुण , अन्य गुणों को दबाकर आगे बढ़ता है l
WISDOM ----- काल ! सर्वोपरि है
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " काल ही काली है , सबकी माता और सबका संहार करने वाली काली वह शक्ति है , जो इनसान , उसके द्वारा निर्मित समस्त संस्थानों और आंदोलनों की शाश्वत तरंग में स्वयं को अभिव्यक्त करती है l काल का प्रवाह प्रचंड होता है , इस प्रवाह के संग जो बहता है , वह विकसित होता है , परन्तु जो इसमें बाधा डालता है , वह अनंत शक्तिशाली होने के बावजूद मिट जाता है l ' आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- ' इस संसार में हर व्यक्ति की अपनी भूमिका होती है l बुद्धिमत्ता तो यही है कि काम पूरा होते ही उससे विदा ले लेनी चाहिए l काम के बाद एक पल भी ठहरना अच्छा नहीं है l उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए लिखा है -- फ़्रांस की राज्य क्रांति में चार व्यक्तियों ---- मीराबो , दांते , रोब्सवियर और नेपोलियन का योगदान था l मीराबो ने फ़्रांस की राज्य क्रांति को जन्म देने में बहुत सहायता की , परन्तु वही उसका विरोधी भी था l उसने फ्रांसीसी राज्य क्रांति के पहिये को रोकने का प्रबल प्रयत्न किया किन्तु क्रांति काल की अभिव्यक्ति थी , क्रांति थी ईश्वर की इच्छा l क्रांति तो रुकी नहीं , काली ने मीराबो को नष्ट कर दिया और क्रांति जारी रही l काली ने दांते और रोब्सवियर को भी समाप्त कर दिया l लेकिन नेपोलियन ने बड़ी भारी गलती की , वह काली के निर्देश को न समझ सका l ' आचार्य श्री लिखते हैं --- ' जो अपनी महत्ता की निश्चित अवधि के बाद भी ठहरे रह जाते हैं उनका भाग्य सुखमय नहीं होता l नेपोलियन ने अनेक महान कार्य किये किन्तु उसका अवसान अत्यंत दर्दनाक हुआ l अहंकार के कारण महाप्रतापी सम्राट और महान कार्य करने वाले भी काल की गहरी खाई में जा गिरते हैं , उनकी ख्यातियों और उपलब्धियों को रौंदते हुए काली आगे बढ़ती है परन्तु जो लोग स्वयं को भगवान का यंत्र मानकर काम करते हैं , समाज में उन्ही की प्रतिष्ठा होती है l वही महाकाली का यंत्र बनता है l काली उन्ही को माध्यम बनाकर कार्य करती है l '
23 December 2020
WISDOM ------
जब कभी गाँव के लोगों का कोई समूह पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी से मिलने आता , तो वे उन्हें उत्साहपूर्वक बताते कि वे भी गाँव के हैं l ग्रामीण जीवन के प्रति व किसानों के प्रति उनमें एक विशेष लगाव था l ऐसे ही एक बार जब किसानों का एक समूह उनसे मिलने आया , तो उन्होंने कहा ---- " बेटा ! किसान होना कोई छोटी बात नहीं है l किसान है , गाँव है , तो जीवन है l जितना किसान समृद्ध होंगे , गाँव विकसित होंगे , उतना ही जीवन विकसित और समृद्ध होगा l "
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ---- ' विपत्तियों को हँसकर तप करने के निमित्त स्वीकार करना चाहिए l कभी उनसे डरना नहीं चाहिए l ' ----- द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति बने l पहले दिन का युद्ध बहुत कौशल के साथ लड़े , तो भी उस दिन की विजय अर्जुन के हाथ लगी l यह देखकर दुर्योधन बड़ा निराश हुआ l हताश और क्रोध से भरी मन:स्थिति के साथ वह गुरु द्रोण के पास गया और बोलै --- " गुरुदेव ! अर्जुन तो आपका शिष्य मात्र है l आप तो उसे एक क्षण में परास्त कर सकते हैं l फिर ऐसा कैसे हुआ ? " द्रोणाचार्य गंभीर मुद्रा में बोले ---- " तुम ठीक कहते हो , पर एक तथ्य नहीं जानते हो l अर्जुन मेरा शिष्य अवश्य है , पर उसका सारा जीवन कठिनाइयों से संघर्ष में , वनवास में , अज्ञातवास में बीता l मैंने राजसी सुख में जीवन काटा है l कुधान्य खाया है l विपत्ति ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया है l "