14 April 2021

WISDOM -----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  ---- ' अत्याचार  और  अन्याय  के  विरुद्ध  प्राणों  की  बाजी  लगा  देने  वाले  को  परमात्मा  अपनी  शक्ति  दे  देता  है   l  '   जो  अत्याचारी  है , निर्दयी  है   उसे   कमजोर  को  सताने  में  ही  आनंद   आता  है  लेकिन  यह  भी  सत्य  है  कि   यदि  हम  चुपचाप  अत्याचार  को  सहन  करते  जाएंगे  तो  अत्याचारी  की  हिम्मत   और  बढ़  जाएगी ,  असुरता  और  प्रबल  होगी  l  धर्म - कर्म  रुक  जाने   असुरता  और  अधिक  मजबूत  होती  है   l   अत्याचार  तो  हर  युग  में  होता  है  l   समय  के  साथ  उसका  रूप  बदल  जाता  है  l   जो  वीर  होते  हैं   वो सामने  से  और  चुनौती  देकर   ही वार  करते  हैं   लेकिन  जब   संसार  में  कायरता  बढ़  जाती  है   तब  छुपकर  वार  होते  हैं   और   हम  जागरूक  और   निर्भय  होकर  ही  समझ  सकेंगे   की   बाह्य  रूप  से  सबके   हित   की  बात  करने  वाला   वास्तव  में  हितैषी  है    या  उसकी  मंशा  कुछ   और  है   ?   महाभारत  में  एक  कथा  है  -----  जब  पांचों  पांडव  माता  कुंती   समेत वनवास  में  थे  , तब  उन्होंने  एक  ब्राह्मण    परिवार के  घर  में  आश्रय  लिया  था  l   एक  दिन  उन्हें  ब्राह्मण  परिवार  के  रोने  की  आवाज  आई  l   तब  माता  कुंती  ने   भीम  से  कहा  कि   जाओ  पता  करो   कि   यह  ब्राह्मण  परिवार  इतना  दुःखी    क्यों है   ?  माता  कुंती  भी  भीम  के  साथ  गईं   और  ब्राह्मण  परिवार  को  सांत्वना  दी   तथा  दुःख  का  कारण  पूछा  l   तब  ब्राह्मण  ने   कहा  ---- माता  !   इस  क्षेत्र  में  एक  बहुत  भयानक  दैत्य  का  आतंक  है  l   वह  पहले  प्रतिदिन  जहाँ  से  जिसको  चाहता   था  खाने  के  लिए  पकड़  ले  जाता  था  l   जिससे   सम्पूर्ण  क्षेत्र  में  , प्रत्येक  घर   में  भय   व्याप्त  था  l   शिक्षा , चिकित्सा , धर्म - कर्म , सामान्य  जीवन क्रम , सामाजिक  जीवन  सभी  कुछ  अस्त - व्यस्त  हो  गया  था  l  इसलिए  जनता  ने   पंचायत  कर  के  दैत्य  से  यह  समझौता  कर  लिया   कि   वह  बस्ती  में  न  आये   ,  प्रतिदिन   क्रम  से  एक  घर  से  एक  आदमी   और  भोजन  का  सामान  उसके  पास  पहुँच  जाया  करेगा   l  इसी   क्रम में  आज  उसके  परिवार    की  बारी  है   l   हम  पुत्र  वियोग  का  दुःख  सहन  नहीं  कर  सकते  इसलिए  हम  सबने  एक  साथ  दैत्य   के पास  जाकर  मरने  का  निश्चय  किया  है  l  "  कुंती  ने  उन्हें  सांत्वना  दी   और कहा  कि ----  आप  निश्चिन्त  रहें  ,  आपने  अपने  घर  में  हमें  आश्रय  दिया  है  ,  आपकी  रक्षा  करना  हमारा  कर्तव्य  है  l   आज  मेरा  पुत्र  भीम   जायेगा l  भीम  बहुत  बलवान  थे  ,  फिर  सत्प्रयासों  में  बहुत  शक्ति  होती  है   l   भीम  ने  दैत्य  का  वध  कर  दिया   और  वह  क्षेत्र  दैत्य  के  आतंक  से  मुक्त  हो  गया   l 

13 April 2021

WISDOM ------

   विचारों  में  परिवर्तन  और  परिमार्जन  होते  ही  जीवन  कैसे  बदल  जाता  है  ,  इसके    उदाहरण  हैं  --- महात्मा  टालस्टाय   l   टालस्टाय  जन्मजात  महात्मा  नहीं  थे  l   वे  एक   सामन्तवंशी    राजकुमार  थे  l   रुसी  सेना   में सेना नायक  के  पद  पर  कार्य  करते  रहे  l   सामंत  सेनापतियों  की   सारी   बुराइयां  उनमे  भरी  पड़ी  थीं  l  जीवन  के  कई  वर्ष  उन्होंने  मद्दपान , क्रूरता , हत्या  तथा  भोग - विलास  में  बिताये  l   जब  वे  रुसी   तोपखाने  में  थे   तब  युद्ध  में  जाकर  हजारों  मनुष्यों  का  वध  किया  करते  थे  , गांव  और  नगर  वीरान  कर  देते  थे  l  तब  उन्हें  अनाथ  हुए  बच्चों , विधवाओं   और  पुत्रहीन  माताओं  का  क्रंदन   और  घायलों  की  कराह  सुखद  लगती  थी  l   खेत  और  खलिहानों  को  जलाती   हुई  आग  की  लपटें   सुहावनी  लगती  थीं  l  टालस्टाय  के  जीवन  की  यह   अंधकार  की  स्थिति  बहुत  समय  तक  न  चल  सकी  l   उन्होंने  महात्माओं , संतों  और  सज्जनों  के  जीवन  से   अपनी  तुलना  की   तो  उन्होंने  अनुभव  किया  कि   वे  मानों  मनुष्य  हैं  ही  नहीं  ,  वे  पशु  हैं  l   व्यसन  और  विलासिता  के  दास   हैं  l   ऐसे  विचार   आते ही  उन्हें  अपने  जीवन  पर  ग्लानि  होने  लगी  l   वे  जब  सेना  में  थे  ,  उन   दिनों को  याद  कर  के  रो   देते  थे  l  सत्य   का  प्रकाश   आते  ही  उन्होंने  अपने  जीवन  की  धारा   बदल  दी   और  अब  वे  बुरे  से  अच्छे  बनकर   प्रेम , करुणा ,  सहृदयता ,  सहानुभूति    तथा  त्याग - तपस्या  की  मूर्ति  बन  गए  l   आत्म ग्लानि  की  वेदना  को  कम  करने  के  लिए   उन्होंने  कलम  का  सहारा   लिया  और  ' बचपन '  नामक  उपन्यास  लिखा  , जिसकी  बहुत  प्रशंसा  हुई   l  उन्होंने  रूस  में  विद्द्या  प्रसार  का  बहुमूल्य  कार्य  किया   l 

12 April 2021

WISDOM -----

   रवीन्द्रनाथ  टैगोर   सागर  की  तरह   धीर  और  गंभीर  व्यक्ति  थे  l   वे  असामान्य  व्यक्ति  थे  ,  उनको  न  लाभ  का  लोभ  था   और  न  घाटे  में  अप्रसन्नता  l   बात  उन  दिनों  की  है   जब  उनके  जूट   के  व्यवसाय  में    कई  लाख  रूपये  का  घाटा   हो  गया  था   l   कोई  सामान्य  व्यक्ति   होता तो   रोते , कलपते ,  बीमार  पड़ते  ,  -भाग  दौड़  मचाकर  घाटे  को   पूरा  करने  का  प्रयत्न  करता    लेकिन  ऐसी  विषम  घड़ी   में   वह  एक  ऐसे   प्रतिष्ठान  की  स्थापना  की    बात  सोच  रहे  थे    जो  अपनी  भारतीय  कला  व  संस्कृति  को   सुरक्षित  व  ज्योतिर्मय   रख  सके   l   कई   लाख  रूपये  की  प्रस्तावित  योजना  थी   l     किसी  ने  पूछा  --- प्रारूप  तो  तैयार  है  पर  पैसा  कहाँ  से  आएगा   ?  उन्होंने    बोलपुर  में  शांतिनिकेतन  की  स्थापना  के  लिए  अपनी  सारी   सम्पति ,   जगन्नाथपुरी     वाला  मकान  ,  पत्नी  के  आभूषण  ,  अपने  पास  की  कई   कीमती  वस्तुएं , पुस्तकों  का  स्टॉक   आदि   बेच   डाला      अपनी  बहुमूल्य  रचना  ' गीतांजलि '  के  लिए   नोबेल  पुरस्कार   में  मिले  सवा लाख  रूपये  भी   खर्चा  चलाने   के  लिए  संस्था  को  दे  दिए  l   फिर  जब  धन  की  कमी  पड़ी     तो  वे   एक  ' अभिनय  मंडली '  बनाकर   भ्रमण  करने  के  लिए  निकले    और  अनेक  बड़े  नगरों    में   प्रदर्शन   कर  के  संस्था  के  लिए  धन  एकत्रित  किया   l    महाकवि  के  परिश्रम  एवं   त्याग  भावना  से    इस  संस्था  की   निरंतर  उन्नति  होती  गई   l   फिर  इसी  के  अंतर्गत  एक  और  शाखा  ' विश्व भारती '   की  स्थापना  की  गई   ,  जिसमें  संसार  भर  के   विभिन्न  देशों  के  विद्दार्थी  आकर    उसी   प्रकार ज्ञान  प्राप्त  करने  लगे   जिस  प्रकार  प्रकार   प्राचीन  काल  में   नालंदा  और  तक्षशिला   आदि  विद्दालयों  में    विद्दार्थी  ज्ञान  प्राप्ति  के  लिए  आया  करते  थे   l  पं. जवाहरलाल  नेहरू   ने  इस  शिक्षा  संस्था   के संबंध   में  कहा  था  ----- " जिसने  शान्ति - निकेतन   नहीं  देखा  उसने  हिंदुस्तान   नहीं  देखा  l  "                                                               

11 April 2021

WISDOM -----

  विश्व प्रसिद्ध   संत  खलील  जिब्रान  धनाढ्य  और  प्रतिभा संपन्न  थे   l   उन्होंने  गरीब  और  असभ्य  लोगों  तथा   समाज  के  पीड़ित  शोषित  वर्ग   में  चेतना  जाग्रत  की  ,  सामाजिक  क्रांति  का  बिगुल  बजाया   इसके  फलस्वरूप   उन्हें  जागीरदारों  और  शासक  वर्ग  का  कोपभाजन  बनना   पड़ा  l   इन  स्वार्थपरायण  लोगों   ने उन्हें   स्वदेश  से  निष्कासित   करा  दिया   ,  उस  वक्त  उन्होंने   कहा था ----  ' लोग  मुझे   पागल  समझते  हैं  कि   मैं  अपने  जीवन  को    उनके  सोने - चांदी   के  कुछ  टुकड़ों  के  बदले   नहीं  बेचता   l   और  मैं   इन्हे  पागल  समझता  हूँ  कि   वे  ,  मेरे  जीवन  को   बिक्री  की  एक  वस्तु  समझते  हैं   l '  उन्होंने   धार्मिक कर्मकांड ,  आडंबर   आदि  का  विरोध  किया   l   वे  कहते  थे   जो  धार्मिक  सिद्धांत  , कर्मकांड ,  आचार - व्यवहार    मनुष्यता   से परे  है  ,  जिसने  मानवता  को   विकसित  होने  के  द्वार  बंद  कर  दिए  ,  वह  धर्म  नहीं  पाखंड  है   l 

10 April 2021

WISDOM --------

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' दीन  - दुर्बल  वे  नहीं  जो   गरीब  अथवा  कमजोर  हैं   वरन  वे  हैं  जो  कौड़ियों  के  मोल   अपने  अनमोल  ईमान  को   बेचते  हैं  ,  प्रलोभनों  में  फँसकर   अपने  व्यक्तित्व  का  वजन  गिराते   हैं  l  तात्कालिक  लाभ  देखने  वाले  व्यक्ति   उस  अदूरदर्शी  मक्खी   की  तरह  हैं  ,  जो  चासनी  के  लोभ  को  संवरण  न  कर  पाने  के  कारण   उसके  भीतर  जा  गिरती  है    तथा  बेमौत  मरती   है   l   मृत्यु  शरीर  की  ही  नहीं  व्यक्तित्व  की  भी  होती  है   l   गिरावट  भी  मृत्यु  है   l '   लोभ , लालच ,  तृष्णा   आदि     दुर्गुणों  से  ग्रस्त  व्यक्ति   कितना  ही  धन , वैभव  और  शक्ति संपन्न   हो  , वह  मन  का  दरिद्र  होता  है  और   अपनी  असीमित  इच्छाओं  को  पूरा  करने  के  लिए   वह    अपना  स्वाभिमान ,  आत्मविश्वास  ,  अपना  चरित्र  सब  कुछ  खो   देता  है  l 

WISDOM -----

   प्राचीन   समय  की  बात  है  ,  जब  धरती  विभिन्न  सीमाओं  में  नहीं  बँटी   थी  और  सुविधानुसार   योग्य  व्यक्ति   अपने साधनों  और   समझ  के  अनुसार  एक  भूभाग  की  देखभाल  किया  करते  थे   l  प्रजा  सुखी व  संपन्न  थी  ,  कोई  अपराध  नहीं  थे  l    वक्त   बीतता  गया  ,  उस  योग्य  व्यक्ति  को  . राजा ' नाम  दे  दिया  गया  ,  खुशियां  तब  भी  थीं  l   प्रत्येक  भूभाग  के  धन - संपन्न  व्यक्ति    विभिन्न  प्रशासकीय  कार्यों  के  लिए  मदद  करते   थे   और  प्रजा  के  हित    के  लिए  शिक्षण  संस्थाएं , अस्पताल ,  कुएं   व  पशुओं  के  लिए  चारागाह   आदि  विभिन्न  लोक कल्याण  के  कार्य  करते   थे  l   सब  दिन  एक  से  नहीं  होते  l   विभिन्न  भूभागों  में  से  एक  में  एक  व्यक्ति  बहुत   संपन्न  था  ,  उसका   व्यापार    दूर - दूर  तक  था  , वह   विभिन्न  क्षेत्रों  में  लोगों  की  , और  राजा  की  मदद   भी   करता  था  l  इस  बात  का  उसे  बड़ा  अहंकार  था  ,  वह  सोचने  लगा  कि   जब  हम  इतना  धन   सब की  मदद  में  देते  हैं   तो  हुकूमत  भी  हमारी  चलनी  चाहिए  l   उसने  विभिन्न  भूभाग  के   धनिकों  से  संपर्क  किया    और  संगठन   बनाकर   यह  निश्चय  किया   कि   प्रत्येक  भूभाग  में   सभी  नियम - कानून   उनकी  सहमति  और  स्वीकृति  से  ही  लागू   होंगे  l   ऐसा  करने  के  लिए   उन्होंने   अपने  भूभाग  के  राजा  को  आश्वासन  दिया  कि   यदि  वे  उनकी  कठपुतली  बन  कर  रहेंगे  तो   हमेशा     गद्दी  पर  बने  रहेंगे   l   एक  कहावत  है ---- ' तेली   का काम  तमोली  नहीं  कर  सकता  ' l  जब  व्यापार  करने  वाले   प्रशासनिक  कार्य  में   दखल  करने  लगे    तब   सभी  नियम - कानून  में  उनका  स्वार्थ  प्रमुख  हो  गया  l   ऐसे  नियम बने  कि    उनकी अमीरी  में कमी   न आए   और  जनता   गरीब    और  मजबूर  हो  जाये   ताकि   उसमे  विद्रोह  की  हिम्मत  ही  न  रहे  l   अपने  अस्तित्व  को  बचाने   के  लिए  बड़ी  मछली  ने  छोटी  मछली  को  निगल  लिया  l   जो  श्रम  का  महत्त्व  समझते  थे  उन्हें  भी  आलसी  बना  दिया  l   विभिन्न  भूभागों  के  राजा  जिन्होंने   सत्ता  और  धन  के  लालच  में  अपना  स्वाभिमान  गिरवी  रख  दिया  था  ,  धरती  से  उनके  भी  जाने  के  दिन  आ  गए   लेकिन  तब  तक  बहुत  देर  हो  गई  थी   l   श्रम   से   दूरी   के  कारण   लोग आलसी   और  भिखारी  हो  गए    और  पेट  की  आग  के  कारण   आपस   में  ही लड़  मरे  l   अराजकता  और  अव्यवस्था  ने  सब  को  निगल  लिया   और  अनेक  गुणों  की  खान    वह  सभ्यता  और  संस्कृति     विभिन्न  आपदाओं  को  सह  न  सकी  और   धूल  में  मिल  गई  l   

8 April 2021

WISDOM ------

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   ने  लिखा  है ---- " सच्ची  राजनीति   वही  है    जिसमे  दुष्टों  के  दमन  के  साथ - साथ   शिष्टों  के   रक्षण  और  पालन  का   पूरा -पूरा  ध्यान    रखा  जाए  l  ' महात्मा  ईसा  ने  भी  लिखा  है ----  जो  तलवार  की  धार   पर     रहते  हैं  ,उनका  अंत  भी  तलवार    से  ही  होता  है   l  "  समर्थ  गुरु  रामदास  ने   अपने  अनुयायिओं  को   उस  राजनीति   की  शिक्षा  दी  जो   विवेक ,   सूझबूझ  और  सावधानी  पर  आधारित  होती  है   l   उनका  कहना  था  कि ---- ' सांसारिक  व्यवहार  में  भी  हमको  अकारण  किसी  का  अहित  नहीं  करना  चाहिए  ,   यथासंभव समझौते   तथा  मेलमिलाप  की  नीति   से  ही  काम  लेना  चाहिए   l   लड़ना  तभी  चाहिए  जब  कोई  नीच   या  स्वार्थी  व्यक्ति   दुष्टता  करने  पर  उतारू  हो   l  "  श्री  समर्थ  के  सभी  विचार   उनके   ग्रन्थ  ' दासबोध ' में  हैं  ,  उनका  कहना  था  ---- "  हमें  दूसरों  के  मन  की  बात  को   समझना  चाहिए   l   सदैव  किसी  के  अवगुणो  को  कहते  रहना  अच्छा  काम  नहीं  है  l   छत्रपति  शिवाजी   महाराज  ने  इसी  नीति   पर  चलकर   महाराष्ट्र  में   अद्भुत  एकता   और   संगठन शक्ति  उत्पन्न  कर  दी    और  औरंगजेब  जैसे  साम्राज्यवादी    के  छक्के  छुड़ा  दिए   l