17 May 2021

WISDOM -------

   कायरता   मनुष्य   का  सबसे  बड़ा  कलंक  है   l   कायर  व्यक्ति  ही  संसार  में   अन्याय , अत्याचार  तथा  अनीति  को  आमंत्रित  किया  करते  हैं   l   संसार  के  समस्त  उत्पीड़न  का  उत्तरदायित्व  कायरों  पर  है  l '   शक्ति  और  वैभव  के  अहंकार  के  कारण  संसार   को  अनगिनत  बार  युद्ध  की  त्रासदी  झेलनी  पड़ी  l   पहले  युद्ध  होते  थे  तो   राजा स्वयं   हाथी   पर  बैठकर   युद्ध  का  संचालन   करते  थे   l   राणा  सांगा   के  शरीर  पर  अस्सी  घाव  हो  गए  ,  लेकिन  वे  युद्ध  के  मैदान  से  पीछे  नहीं   हटे  l   महाराणा  प्रताप ,  पृथ्वीराज  चौहान  आदि   अनेक वीर  राजाओं  की  वीरगाथा  से  इतिहास  भरा  पड़ा  है  l   लेकिन  अब  विज्ञानं  ने  युद्ध  का  स्तर  बदल  दिया  l   आचार्य श्री  कहते  हैं ---- ' अहंकारी  एक  प्रकार  का  उन्मादी  होता  है  l "                                            जिनके  उन्माद  की  वजह  से  युद्ध  होते  हैं  ,  अनेक  मुसीबतें  आती  हैं  वे   सुरक्षा   गार्ड  से  घिरे  अपने  महलों  में  सुरक्षित  रहते  हैं   और  निर्दोष  प्रजा ,  मासूम  बच्चे     जिनका  कोई  अपराध  नहीं  है  बेमौत  मारे   जाते  है  l   वीरता  की  नई   परिभाषा   विज्ञान   की  देन   है  l 

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "  वाक् चातुरी   और  छल -बल  से   व्यक्ति  को  भले  ही  अपने  वश  में   कर  लिया  जाये  ,  पर  हृदय   अवश   ही  रहता  है  ,  किसी  के  मन  को  अपने  वश  में    नहीं किया  जा  सकता  है  ,  जो  और  ज्यादा  अनर्थ  उत्पन्न  करता  है  l  "  महाभारत  का  प्रसंग  है  ----   महाबली  शल्य   महाराज  पाण्डु  की  दूसरी  पत्नी  माद्री   के भाई  थे  और  युद्ध  में  पांडवों  का  सहयोग  करना  चाहते  थे   किन्तु  दुर्योधन  के  छल - बल  और  वाक् चातुर्य  से  वे  वचनबद्ध  हो  गए   और  उन्हें  कौरवों  के  साथ  सहयोग  करने      को    विवश  होना  पड़ा   l   वे  कर्ण   के  सारथि  बने  ,  शल्य  सोच  रहे  थे  कि   पूरी  तरह  से   अन्याय  को   सहयोग  देने   की  अपेक्षा   यह  विवशता  है   l   किस   तरह मैं   धर्म  और  न्याय  का  समर्थन  करूँ   ?   उन्हें  अपने  वचनबद्ध  होने  का  बड़ा  पश्चाताप  था   l   उन्हें  कोई  उपाय  समझ  में  नहीं  आ  रहा  था  कि   उनके  वचन  की  भी  रक्षा  हो  जाए   और  हृदय  भी  इस  अपराध- बोध  से  मुक्त  हो  जाए  l    इसी   मानसिक  द्वन्द  में  वह  भगवान  श्रीकृष्ण  के  पास  गए  l  '     कृष्ण जी   ने  कहा  ---- ' कर्ण    बड़ा  शूरवीर  है  ,  तुम  उसके  सारथि  हो  l   इसलिए  युद्ध  में  तुम    कर्ण  को  निरुत्साहित    करते  रहना   l   निरुत्साहित  व्यक्ति  की  आधी  सामर्थ्य   समाप्त  हो  जाती  है   l   इस  तरह    तुम  कौरवों  के  पक्ष  में  रहते  हुए  भी   हमारे  सहयोगी  बन  सकते  हो   l   '      युद्ध  में  शल्य  ने  ऐसा  ही  किया  l   अर्जुन  को  सामने  देखकर  जब  कर्ण   ने हुंकार  भरी   और  कहा --- " मैं  अर्जुन  को  आज  ही  समाप्त  कर  दम   लूंगा  l  "  तो  शल्य  ने  कहा  --- "  अर्जुन  को  मारना  टेढ़ी  खीर  है  l   अर्जुन  ने  इंद्र  से  युद्ध  करना  सीखा  है   और  भगवान  शंकर  से  धर्नुविद्दा  सीखी  है  l   वनवास  के  तपस्वी  जीवन  ने  उसे  बहुत  मजबूत  बना  दिया  है  l   तुम  उसे  क्या  हराओगे  ?   शल्य  इसी  तरह  की  बात  कर  कर्ण   को हतोत्साहित  करते  रहे   l   दूसरी   ओर    महावीर , महादानी    कर्ण  को  अपने  सामने  देख   अर्जुन   ने  कहा  --- " भगवन  !  मैं  कर्ण  के  सामने  किस  प्रकार    टिक  सकूंगा  ? "  तब  कृष्ण  ने  अर्जुन  को  प्रोत्साहित  करते  हुए  कहा  -- " अर्जुन  !  तुम  जानते  हो  कि   कर्ण  को  शंकर जी  का  शाप  है   कि   वह  अन्य  वीरों  के  लिए  भले   ही  अजेय  हो  ,  पर  अर्जुन   के सामने   उसकी  धर्नुविद्दा  कोई  काम  नहीं  करेगी   l   कर्ण  चाहे  शूरवीर  है   किन्तु  वह  अधर्म , अन्याय  के  साथ  है   इसलिए  उसकी  पराजय  निश्चित  है   l  "  भगवान  कृष्ण  के  वचन  सुनकर   अर्जुन  के  हौसले  बढ़  गए  , बड़े  उत्साह  से  उसने  युद्ध  किया   और  कर्ण   को  अर्जुन  के  हाथों  परास्त  होना  पड़ा   l  

14 May 2021

WISDOM ------

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- 'चिंतन   परिक्षेत्र  बंजर  हो  जाने  के  कारण  कार्य  भी  नागफनी  , बबूल   जैसे  हो  रहे  हैं   l   इससे  मानवता  का  कष्ट  पीड़ित  होना  स्वाभाविक  है  l   कार्य  में  श्रेष्ठता  की  अभिव्यक्ति   होना  तभी  संभव  है  ,  जब  उसके  मूल  में  चिंतन  की   उत्कृष्टता  हो   l  '--------एक  बार  की  बात  है  --- राजा  भोज  गहरी  निद्रा  में   सो  रहे  थे  l   उन्हें  स्वप्न     एक  तेजस्वी  वृद्ध  पुरुष  के  दर्शन  हुए  l   भोज  ने  उससे  पूछा  ---- '  भगवन  !  आप  कौन  हैं  ? '  वृद्ध  ने  कहा --- " हे  राजन  !  मैं  सत्य  हूँ  l   तुझे  तेरे  कार्यों  का  वास्तविक  स्वरुप  दिखाने   आया  हूँ   l   मेरे  पीछे - पीछे  चला  आ   और  अपने  कार्यों   की  वास्तविकता  को  देख   l  "  राजा  भोज  अपने  आपको  लोक कल्याणकारी  और  बहुत  बड़ा  धर्मात्मा  समझते  थे ,  प्रसन्नता पूर्वक  उस  वृद्ध  के  पीछे  चल  दिए  l   वृद्ध  पुरुष  के  रूप  में  सत्य  ,  राजा  भोज  को   उसकी  कृतियों  के  पास  ले  गया  , जिनके  लिए  भोज  को  बड़ा  अहंकार  था  --- सर्वप्रथम  वह  उन्हें    फल - फूलों  से    लदे     बगीचे  में  ले  गया  l    सत्य    के  छूते       ही  वे  सब  पेड़  ठूंठ  हो  गए  l   फिर  राजा  द्वारा  बनवाये    मंदिर आदि  कृतियों  की  और  ले  गया  l  सत्य  के   छूते    ही  वे  सब  खंडहर  होकर  गिर  गए   l   यह  सब  देख  राजा   जड़वत  हो  गया  l   सत्य  ने  कहा  --- राजा  विषाद   मत  करो  ,  मेरे  साथ  आओ  , मैं  तुम्हे  तुम्हारे  कार्यों  की  वास्तविकता   दिखाता   हूँ   l  सत्य  उन्हें    उसके  द्वारा  किये  गए  लोक कल्याण  के  कार्यों ,  दान  की  बड़ी  राशियों  आदि  के  निकट  ले  गया ,  सत्य  के   छूते   ही  वे  सब  कंकड़ - पत्थर  हो  गईं   l   राजा  को  अपने  जिन  कार्यों   पर अभिमान  था  वे  सब   झूठे  और  निष्फल  साबित  हुए   l   अपने   कार्यों  की  ऐसी   दुर्गति  देख    राजा  हतबुद्धि  होकर  वहीँ  बैठ  गया   l  तब  सत्य  ने  कहा ---- " राजन  !  कर्म  के  राज्य  में  भावना  का  सिक्का  चलता  है   l   यश  की  इच्छा  से , लोक दिखावे  के  लिए  जो  कार्य   किये  जाते  हैं  ,  उनका  फल  इतना  ही  है  कि   दुनिया  की  वाहवाही  मिल  जाती  है   l   सच्ची  सद्भावना  से  , नि:स्वार्थ  होकर  , कर्तव्य  भाव  से   जो  कार्य  किये  जाते  हैं  ,  उन्ही  का  पुण्य  फल  होता  है   l  '  इतना  कहकर  वृद्ध  पुरुष  अंतर्धान  हो  गया  l  राजा  भोज  की  निद्रा  टूटी   l   वृद्ध  की  बातों  से  राजा   ने  समझा   कि   अंत:करण   पवित्र  होना  चाहिए   क्योंकि  धर्म - अधर्म  की  जड़  मन  में  है  , बाहर  नहीं   l 

13 May 2021

WISDOM ----- साधनों के अभाव से मनुष्य दुःखी नहीं है , संसार के दुःख का कारण है --- भावनाओं का अभाव

  इस  संबंध   में  एक  कथा  है  ----- नारद जी   को    स्वास्थ्य   बहुत  प्रिय  था  , इस    लिए   वे  हमेशा   टहलते  और    क्रियाशील  रहते  थे   l   एक  बार  वे  धरती  पर  भ्रमण  कर  रहे  थे  , उन्होंने  एक  विचित्र  वृक्ष  देखा   l   इस  वृक्ष  में  तना  था , डालियाँ  थीं  , पर  सब  ठूंठ  थे  , एक  भी  पत्ती   नहीं  थी ,  हाँ , फल  अवश्य  थे   , पर  वे  सब  काले   थे  l  उस  वृक्ष  के  नीचे  सैकड़ों  जीव - जंतु  और  पक्षी  मरे  पड़े  थे  l  नारद जी  ने  अनुमान  लगा  लिया  कि   ये  फल  विषैले  होंगे  , इन्हें  खाने  के  प्रयास  में  ही   ये  जीव  अपनी  जान  गँवा  बैठे   l   अब  नारद जी  सीधे  ब्रह्माजी  के  पास  गए  और  कहा  --- ' भगवन  !  आपकी  सृष्टि  में  यह  विषफल  l  कहाँ  से  आया  यह  वृक्ष  , जिसमे  एक  भी  पत्ता  नहीं  है  और   मृत्यु - मुख  में  पहुँचाने  वाले  फल  !  क्या  ये  कभी   शीतल  और  मधुर  नहीं  हो  सकते   ? '     विधाता  बोले  ---- " तात  !  बहुत  दिन  हुए  यहाँ  एक  युवक  आया  l  वह  जिससे  मिलता  तो  भक्ति  और  वैराग्य  की  बातें  करता , परमार्थ  की  सन्मार्ग  पर  चलने  की  बात  कहता   l   लोगों  ने  कहा  ये  पागल  हो  गया  l  उसका  एक  हाथ  ख़राब  हो  चुका  था  , उसे  पिता , भाई , पत्नी   सब ने  त्याग  दिया  l  कोई  उसे  खाना - पानी  कुछ  नहीं  देता  , उस  पर  व्यंग्य  करते ,  हँसी   उड़ाते  l   वह  सोचता   कि   संसार  में  प्रेम  और  दया  के  स्रोत  न  सूखें   तो  संसार  कितना  खुशहाल  हो  सकता  है   l  वह     युवक  बहुत  स्वाभिमानी  था  ,  उसने  देखा   जिस  तरह  सृष्टि   के अन्य  जीवों  की   आहार  संबंधी   आवश्यकताएं  सीमित   हैं  ,  उसी  प्रकार  मनुष्य   भी   थोड़े  में  अपना  काम  चला  सकता  है   और  शेष  समय  परमार्थ  में  लगा  सकता  है  l   उसने  अपने  लिए   कुछ  फलों  के  पौधे  लगाने  और  उनसे  आहार  प्राप्त  करने  का  निश्चय  किया   l   उसे  ईश्वरीय  सत्ता  पर  विश्वास  था  ,  भूखा -प्यासा  रहकर  बिना  किसी  साधन  के  एक  हाथ  से   गड्डा   खोदता  था  l   एक  प्रात:काल  उसने   जैसे ही  मिटटी  का  ढेला  हटाया   कि   एक  बहुमूल्य  मणि  का  टुकड़ा  उसके  हाथ  आ  गया  ,  वह  मणि   लेकर खड़ा  हुआ  तो  लोग  चौंक  गए  कि   आज  सूर्योदय   समय  से  पहले  कैसे  हो  गया  l   उसके  पिता , भाई  , बहिन , पत्नी   सब आ  गए  l   उसके  चन्दन  का  लेप  किया , बहुमूल्य  वस्त्र  पहनाये  , पकवान  से  भरा  थाल  ले  आये  l  युवक  को  इस  मिथ्या  मोह  और  जग - प्रपंच  पर  हँसी   आ  गई  l   उसने  सब  वस्त्र -आभूषण  उतार  फेंके , भोजन  भी  नहीं  लिया   और  मणि  लिए  हुए  जाने  कहाँ  चला  गया  ,  उस  दिन  से  उसे  किसी  ने  नहीं  देखा  l  हाँ ,  उसका  रोपा  हुआ  वृक्ष  कुछ  दिन  में  मीठे   फल देने  लगा  l   धीरे - धीरे  उस  युवक  का  यश  सारे  विश्व  में   गूँजने   लगा  और  सैकड़ों  लोग  आ  गए  पहाड़  खोदने  कि   उन्हें  भी  मणि  मिल  जाये  l  मणि  तो  मिली  नहीं  एक  दिन  खोदते  हुए   बहुत  बड़ा  पत्थर  निकल  आया  l  सबने  एकजुट  होकर  पत्थर  हटाया   तो  उसके  पीछे  भयंकर  नाग  छुपा  बैठा  था  l  वह  फुँकार   मार  कर  दौड़ा  , लोग  भागे  , उसने  अधिकांश  को  डस   लिया  l   भागते  समय  ये  लोग  उस  वृक्ष  से  टकराए ,  उस  विषधर  का  विष  उस  वृक्ष  में  भी   व्याप    गया  l   उस  दिन  से  उसके  सब  पत्ते  झड़   गए  और  फल  विषैले  हो  गए   l  ' नारद  जी  ने  बड़े  विस्मय  से  पूछा  ---" भगवन  ! क्या  यह   वृक्ष  फिर  से  हरा - भरा  नहीं  हो  सकता   ? '  ब्रह्मा जी  ने  कहा ---- " असंभव  कुछ  भी  नहीं  l   पर  आज   धरती  के  सारे  लोगों  को  ही   स्वार्थ  और  प्रपंच  के  नाग  ने  डस   लिया  है   l   जितने  लोग   इस  वृक्ष  से  टकराते  हैं  ,  उतने  ही  फल  और  अधिक  विषैले   हो जाते  हैं   l     उस  युवक  की  तरह  कोई   नि:स्वार्थ  , प्रेमी   संत आए   और  उस  वृक्ष  का  स्पर्श  करे   तो  यह  फिर  से   शीतल , सुखद   और  मधुर   फलों  वाला   वृक्ष  बन  सकता  है   l   '

12 May 2021

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है ----- " विचारशील  और  सत्तारूढ़  का  पाप    सारे  समाज  को  पापी  बना  देता  है  l   जिनके  ऊपर  समाज  को  दिशा  और  प्रेरणा  देने  का  उत्तरदायित्व  है  ,  उनके  छोटे  से  छोटे  आचरण  भी  शुद्धतम  होने  चाहिए  l "     ' प्रेरणाप्रद  दृष्टांत '  में  एक   दृष्टांत  है  ------   ' राजनर्तकी  मृदाल  के  सौंदर्य   की ख्याति    सारे  उरु   प्रदेश  में  थी  l  उसे  पाने  के  लिए  राजधानी  के  बड़े - बड़े  विद्वानों , सामंतों , राजघरानों  तक  के  लोगों  में  कुचक्र  चल  रहा  था  l   मृदाल  सोच  रही  थी   कि   देश  के  कर्णधार ,  मार्गदर्शक   और  प्रभावशाली  लोग  ही   चरित्र  भ्रष्ट    हो  गए   तो  फिर  सामान्य  प्रजा  का  क्या  होगा   ?  वह  चिंता  में  डूबी  थी , उसी  समय  किसी  ने  दरवाजे  पर   दस्तक  दी   l   मृदाल  ने  दरवाजा  खोला   तो  सामने  खड़े  महाराज  करूष  को  देखते  ही   चौंक  गई    और  असमय  आने  का  कारण  पूछा   l   महाराज  ने  कहा  ---- ' तुम्हारे  रूप  और  सौंदर्य  पर  सारा  उरु   प्रदेश  मुग्ध  है   ,  फिर  मेरे  आने  का  कारण  क्यों  पूछती  हो  ? '    मृदाल  ने  कहा  ---- " महाराज  !   सामान्य  प्रजा  की  बात  छोड़िये  l   आप  इस  देश  के  कर्णधार  हैं  ,  प्रजा  मार्ग -भ्रष्ट  हो  जाये   तो  उसे  सुधारा  जा  सकता  है  ,  पर  यदि  समाज  के  शीर्षस्थ   लोग  ही  चरित्र  भ्रष्ट   हो जाएँ   तो  वह  देश  खोखला  हो  जाता  है  ,  ऐसे  देश , ऐसी  जातियाँ   अपने  अस्तित्व  की  रक्षा  भी  नहीं  कर  पातीं  l   महाराज  !  इसलिए   आपका  इस  समय  यहाँ  आना    अशोभनीय  ही  नहीं  ,  सामाजिक  अपराध  भी  है   l  "                    आचार्य श्री  लिखते  हैं ----- 'अधिकार  और  अहंकार  मनुष्य  के  दो  प्रबल  शत्रु  हैं  l   वह  जिस  अंत:करण   में  प्रवेश  कर  जाते  हैं  ,  उसमे  उचित   और  अनुचित  के  विचार  की  शक्ति  भी  नहीं  रह  जाती  l  "      मृदाल    के शब्द  महाराज  को  बाण  की  तरह  चुभे   ,  उन्होंने  कहा  --- ' हम  तुम्हारा  उपदेश  सुनने  यहाँ  नहीं  आए   l   तुम   राजनर्तकी  हो   ,  कीमत  मांग  सकती  हो   l "    मृदाल  ने  गंभीरता  से  कहा  ---- " किन्तु  हम  मनुष्य  भी  हैं   और  मनुष्य  होने  के  नाते   समाज  के  हित ,  अहित   की बात  सोचना  भी  हमारा  धर्म  है   l   हम  सत्ता  को  दलित  करके   अपने  देशवासियों  को   मार्ग - भ्रष्ट  करने  का  पाप   अपने  सिर   कदापि    नहीं ले  सकते   l  "     महाराज  के  रौद्र  रूप  को  देखकर   मृदाल  ने  बात  सँभालते  हुए  कहा  ---- ' महाराज  !  आज  से  चौथे  दिन   आप  मुझे  ' चैत्य  सरोवर '   के  निकट  मिलें  l "  निश्चित  दिन  जब  महाराज    चैत्य - विहार '  पहुंचे  ,  तो  वहां  जाकर  उन्होंने  जो  देखा   उससे  उनकी  तृष्णा  और  कामुकता  स्तब्ध  रह  गई  l   मृदाल   का शरीर  तो  वहां  पर  उपस्थित  था  किन्तु  उसमें  जीवन  नहीं  था  ,  उसने  विषपान  कर  लिया  l   एक पत्र  पास  ही  पड़ा  हुआ  था   जिसमे  लिखा  था  --- सौंदर्य  राष्ट्र  के  चरित्र  से  बढ़कर  नहीं  ,  चरित्र  की  रक्षा  के  लिए  सौंदर्य  का  बलिदान  किया  जा  सकता  है  ,  चरित्र  को  वैभव  के  सामने  झुकाया  नहीं  जा  सकता   l '

11 May 2021

WISDOM ----- यदि मनुष्य की आँख खुल जाए तो वह चापलूसी से किसी व्यक्ति को खुश करने के बजाय सत्कर्मों से ईश्वर को प्रसन्न करे

   एक  प्रसंग  है  ----  सुल्तान  महमूद  का  दरबार  कवियों  और  कलाकारों   के  लिए  शरण - स्थल  था   l   वे  सुल्तान  की  प्रशंसा  में  गीत - गज़ल   लिखते - सुनाते    थे  ,  उसके  बदले  उन्हें  पुरस्कार  मिलता  था  l   यह  एक  व्यवसाय  बन  गया  था   l  सुल्तान  महमूद  के  दरबार  में   एक उच्च  कोटि  के  शायर  थे , उनका  नाम  था  'सनाई ' l  वे  सुल्तान  की  प्रशंसा  में  नए - नए  शेर  रचते , गज़ल   लिखते   और  राजदरबार  में  गाकर  सुनाते , इसके  बदले  उन्हें  बहुत  पुरस्कार  मिलता  , प्रतिष्ठा  होती  l   एक  बार  की  घटना  है  --- उन्होंने  सुल्तान  की  प्रशंसा  में   कुछ  शेर  लिखे   l   उन्हें  सुनाने  के  लिए   वे  राजदरबार  की  ओर   चले  l  मार्ग  में  एक  मदिरालय  था  जिसमे   पियक्क्ड़   नशे  में  थे  l   एक  आवाज  सुनकर  वे  रुक  गए  l   एक  पियक्क्ड़  अपने  साथी  से  कह  रहा  था ----- " सुल्तान  महमूद  के  अंधेपन  की  गमजोई   में  ला  एक  पैग  दे  l "  साकी   कह  रहा  था ---- " बेवकूफ  !  कोई  सुन  लेगा  तो  तेरा  सिर   सीधा  कलम  हो  जायेगा   l   क्यों  अपनी  मौत  को  दावत  दे  रहा है ?' शराबी  बोला --- " सच  बात  कह  रहा  हूँ  l  सुल्तान  अँधा  नहीं  तो  क्या  है  ? "        "  अंधेपन  की  क्या  निशानी  देखी   तूने  सुल्तान  में  ? "        पीने  वाले  ने  कहा --- "  बहुत  कुछ  देखा  है  l   सुल्तान  के  पास  सुख  से  रहने   के लिए    धन - दौलत , वैभव  सब  कुछ  है  l   जो  चीजें  उसके  पास  हैं   उन्हें  ही  और  बटोरने  के  लिए   वह  पडोसी   राज्यों पर  हमले  करता  है  l   वहां  लूटमार  मचाता   है  l   हजारों  बेगुनाहों  को  मौत  के  घाट  उतारता   है   l   यह  अंधापन  नहीं  तो  क्या  है  ? "    सनाई  वहीँ  खड़े  रहे  , तभी  एक  आवाज  आई  --- " ला , एक  और  जाम  दे  ,  सनाई  की  बेवकूफी  पर  l "    अब  तो  साकी  को  चिढ़   सी  आ  गई  , सनाई  भी   कान  लगाकर  सुनने  लगे   l  साकी  कह  रहा  था  --- "  तुमने   यह क्या  बकवास  लगा  रखी   है  ?  सनाई  जैसे  उम्दा  शायर  के  लिए  यह  बोलते  तुम्हे  शर्म  नहीं  आती   l  "  पीने  वाला  कह  रहा  था  ---- "   मानता  हूँ  दोस्त ,  सनाई  बहुत  उम्दा  शायर  है  ,  परन्तु  उस  सा  बेवकूफ   दुनिया  में  खोजे   नहीं  मिलेगा  l  मालिक  ने  उसे  बहुत  बड़ा  हुनर   दिया   और  वह  उसकी  दी  हुई  काबलियत   को  अंधे  सुल्तान  की   तारीफ  करने  में  ही  खर्च  कर  रहा  है   l  "  शराबी  की  इन  बातों  को  सुनकर  सनाई   की आँखें  खुल  गईं ,  उसके  हृदय  में  जैसे  तीर  चुभने  लगे  ,  वह  उल्टे   पाँव   अपने  घर  वापस  आ  गया  l सुल्तान  की   प्रशंसा  में  जो  नए  शेर  तैयार  किए   थे  , उन्हें  रास्ते  में  ही  फाड़कर  फेंक   दिया  l   दो - चार  दिन  जब  सनाई  दरबार  में  नहीं  आये   तो  सुल्तान  ने  संदेशवाहक  भेजे  ,  उन्होंने  आकर  बताया  कि   सनाई  घर  पर  नहीं  हैं  l   लोग  सकते  में  आ  गए  जब  बाद  में  पता  चला  कि   सनाई  फकीर   के  वेश  में  अमुक  स्थान  पर   रूहानी  गीत  गाते  देखे  गए   l 

10 May 2021

WISDOM ------

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- "  मरने  के  लिए  हर  मानव  को  हर  घड़ी   तैयार  रहना  चाहिए  l   यह  शरीर  कभी  न  कभी   विनष्ट  होना  ही  है  ,  लेकिन  आत्मा  कभी  नहीं  मरती  l  आत्मा  को  ऊँचा  उठाने  के  प्रयास    जीवनपर्यन्त   किये   जाते  रहें   तो  भावी   जन्म सार्थक  किया  जा  सकता  है   l  "    पुराण  की  एक  कथा  है -----  राजा  परीक्षित  को  ऋषि  ने  श्राप  दिया  था  कि  सातवें  दिन   सर्प  के  काटने  से  उनकी  मृत्यु  हो  जाएगी  l   मृत्यु  का  कष्ट  न  हो  मोक्ष  मिले  इस  उद्देश्य  से  वे  शुकदेव जी  से  भागवत  कथा  सुन  रहे  थे  l   छह  दिन  बीत  गए  l  मरने  की  घड़ी   निकट  आती  देख  राजा  क्षुब्ध  हो  रहा  था  , तब  शुकदेव जी  ने  राजा  को   एक कथा  सुनाई ------ ' एक  राजा  जंगल  में  शिकार  खेलने  गया  l   घने  जंगल  में  वह  रास्ता  भटक   गया l  तेज  वर्षा  होने  लगी , सिंह , व्याघ्र  बोलने  लगे  l   राजा  डर   गया  और  रात्रि  में  विश्राम  का  स्थान  ढूंढ़ने   लगा  l  कुछ  दूर  उसने  दीपक  जलता  देखा  , वहां  गया   ,  वह  एक  बहेलिए   की  झोंपड़ी  थी  l   बहेलिया  बीमार  था  , चल - फिर  नहीं  सकता  था  l   झोंपड़ी  में  ही  एक  कोने  में  मलमूत्र  त्यागने  का  स्थान  था  ,  खाने  के  लिए  जानवरों   का मांस   झोंपड़ी  की  छत  से  लटका  था  l  बहुत  गन्दी , अँधेरी  और  दुर्गन्धयुक्त  झोंपड़ी  थी  l  कोई  और  आश्रय  नहीं  था  इसलिए  विवशतावश  राजा  ने  बहेलिये  से  उस  की  झोंपड़ी  में  रुकने  की  प्रार्थना  की  l   बहेलिये ने  कहा  --- आप  यह  प्रतिज्ञा  करो  कि  सुबह  इस  झोंपड़ी  को  खाली   कर  चले  जाओगे  क्योंकि  और  भी  राहगीर  यहाँ  आते  हैं , रुकते  हैं  ,  फिर  उन्हें  झोंपड़ी  की  गंध  इतनी  भा  जाती  है  कि   वह  इसे  छोड़ना  ही  नहीं  चाहते  ,  इस  पर  अपना  कब्ज़ा  जमाते  हैं  l ' राजा  ने  प्रतिज्ञा  की  , कसम  खाई  कि   वह  सुबह  इस  झोंपड़ी  को  खाली   कर  देगा   l   प्रात:काल  राजा  और  ठहरने  के  लिए  बहेलिये  से  आग्रह  करने  लगा  l  उसे  वह    गंध  इतनी  अच्छी  लगी  कि   झोंपड़ी  को  त्यागने  के   नाम से  उसे  बड़ा  कष्ट  और  दुःख  होने  लगा  l  राजा  की  बहेलिये  से  बहुत  बहस  हुई  ,  बड़ा  झंझट  हुआ  ,   उपद्रव  और  कलह   हो  गया  ,  राजा  मरने - मारने  पर   उतारू  हो  गया  l   शुकदेव  जी  ने  पूछा  ---- " परीक्षित  !  बताओ  ,  क्या  यह  झंझट  उचित  था  ? ' परीक्षित  ने  कहा --- ' भगवान  !  वह  कौन  सा  राजा  था  ,  बड़ा  मुर्ख  था  , जो  अपनी  प्रतिज्ञा  तोड़कर ,  नियत  अवधि  से  अधिक  रहना  चाहता  था  l   उसकी  मूर्खता  पर  मुझे  क्रोध  आता  है  l  "  शुकदेव जी  के  कहा --- " वह  और  कोई  नहीं  स्वयं  तुम  हो  l  इस  मलमूत्र  की कोठरी  देह  में  ,  जितने  समय  तुम्हारी  आत्मा  को  रहना  आवश्यक  था  , वह  अवधि   पूरी  हो  गई   l   अब  तुम  झंझट  कर  रहे  हो  , मरने  का  शोक   कर रहे  हो   , क्या  यह  उचित  है   ? "  राजा  ने  कथा  का  मर्म  समझा   और  मृत्यु भय   को   भुलाते   हुए    मानसिक  रूप  से   निर्वाण  के  लिए   तैयारी   की  l  कथा  का  यही   शिक्षण है  -- हम  भयभीत   न हों  , सत्कर्म  करें  और  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  की  प्रार्थना  करें   l