ऋषि वचन है -----' हित चाहने वाला पराया भी अपना है और अहित करने वाला अपना भी पराया है l रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है और औषधि वन में पैदा होकर भी हमारा लाभ ही करती है l " ईर्ष्या -द्वेष , लोभ - लालच , कामना - वासना , अहंकार ये सब ऐसी मानसिक विकृतियां हैं जो अपने पराये के भेद को समाप्त कर देती हैं l कुछ पाप तो अनजाने में हो जाते हैं लेकिन इन दुष्प्रवृतियों से ग्रस्त व्यक्ति जानबूझकर पापकर्म करता है l अत्याचार में भी एक आकर्षण होता है , ये दुष्प्रवृत्तियाँ ही व्यक्ति को असुर बना देती हैं , यदि ऐसे व्यक्ति के अहंकार पर चोट पहुँचती है तो अत्याचार का स्तर कितना होता है --- भगवान कृष्ण की बाल्यावस्था में उन पर सबसे ज्यादा अत्याचार मामा कंस ने ही किया l प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकश्यप ने ही सताया l महाभारत में दुर्योधन ने अपने ही भाइयों पर अत्याचार किया , उन्हें वन में भटकने को विवश किया , अपनी ही कुलवधु द्रोपदी को अपमानित किया l यही संसार है l जो पापकर्म करता है , उसे देर - सवेर अपने अपने कर्मों की सजा अवश्य मिलती है , प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l जो बुद्धि और विवेक से इन अत्याचारियों की हर चुनौती का सामना करता है वह अर्जुन आदि पांडवों की तरह शक्तिशाली होकर जीवन में सफल होता है l
25 October 2021
24 October 2021
WISDOM -------
एक संस्मरण है ----- भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री और न्यायविद स्वर्गीय करीम भाई छागला एक बार अपनी रूस यात्रा से वापस आये तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघसंचालक श्री गोलवलकर जी उनसे मिलने गए l दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत हुई l गोलवलकर जी ने उनसे पूछा --- ----- " छागला जी , आपको भारत और रूस में क्या अंतर दिखाई दिया l उत्तर में छागला जी ने एक घटना सुनाई कि वे मास्को में एक खेल के मैदान में गए , वहां खेल रहे युवकों से पूछा ---- " तुम प्रतिदिन कितने घंटे यहाँ खेलते और व्यायाम करते हो ? " उत्तर मिला --- " छह - सात घंटे l " छागला जी आश्चर्य से भर उठे --- " इतना समय खेल पर क्यों खर्च करते हो भाई ? " जवाब मिला --- " दुनिया के देशों में अपने देश की शान बढ़ाने के लिए l हम चाहते हैं हमारा देश हर खेल में विजय प्राप्त करे l " अर्थात वहां का हर व्यक्ति खेल के मैदान से लेकर विज्ञान की प्रयोगशाला तक में अपने देश के लिए खेलता , शोध करता हुआ मिला l यही हाल अमेरिका , जापान , जर्मनी , फ़्रांस और इंग्लैण्ड का भी है l व्यक्तियों से मिलकर समाज और समाज से मिलकर राष्ट्र बनता है l देश के लोगों का उत्साह और राष्ट्रीय चरित्र ही उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं l
23 October 2021
WISDOM -----
सत्संग से कैसे रूपांतरण होता है , इस सन्दर्भ में कथा है ---- जब महर्षि वाल्मीकि दस्यु रत्नाकर हुआ करते थे l इस अपकर्म को करते हुए जीवन के कितने ही वर्ष बीत गए थे l ईश्वर की कृपा से एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिले l नारद जी ने उनसे पूछा -- ' तुम यह सब क्यों करते हो , क्या तुम्हारे परिवार के स्वजन तुम्हारे इस कर्मफल के भी भागीदार होंगे ? " उन्होंने कहा --- ' अवश्य ' l तब देवर्षि ने कहा --- " ऐसे नहीं , तुम उन लोगों से पूछकर मुझे अपना उत्तर दो l " तब वे देवर्षि को एक पेड़ से बांधकर उत्तर पूछने अपने परिवार के पास गए l सभी लोगों ने एक स्वर से मना करते हुए कहा --- " अपने कर्मफल का भोग तुम्हे स्वयं भोगना पड़ेगा l तुम्हारे कर्म को हम क्यों भोगेंगे l " यह सुनकर उन्हें बहुत निराशा हुई और वे भागकर देवर्षि की शरण में आये l तब देवर्षि ने उन्हें ' राम नाम जपने को कहा l दस्यु कर्म के कारण ' राम ' जपना बहुत कठिन लगा , तब देवर्षि ने कहा --- ' कोई बात नहीं तुम ' मरा - मरा ' जपो l भगवान का यह उल्टा नाम उनका अमोघ मन्त्र बन गया , साधना शुरू हुई l ' मरा - मरा ' कब ' राम - राम ' में बदल गया पता ही नहीं चला l अनेकों बाधाएं आईं , देवर्षि धीरज बंधाते रहे कि तुम प्रभु को पुकारते रहो सब बाधाएं दूर होंगी l समय बीतता गया , अंधकार दूर हुआ , रूपांतरण हुआ और संसार को महर्षि वाल्मीकि मिले l उनके जीवन ने सिखाया कि महापुरुषों का पल भर का सत्संग भी दुर्लभ और अमोघ होता है l
22 October 2021
WISDOM-------
रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे ---- मनुष्यों में कुछ देवता होते हैं , शेष तो नर पिशाच ही होते हैं l नरेंद्र ने पूछा --- भला इन नरपिशाचों और मनुष्य तथा देवताओं की पहचान क्या है ? परमहंस ने कहा ---- वे मनुष्य देवता हैं जो दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए स्वयं हानि उठाने के लिए तैयार हैं l मनुष्य वे हैं जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी l नर पिशाच वे हैं जो दूसरों की हानि ही सोचते हैं और करते हैं , भले ही इस प्रयास में उन्हें स्वयं ही हानि सहनी पड़े l "
21 October 2021
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20 October 2021
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ऋषियों का कहना है ---- जिस प्रकार हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को पहचान लेता है , उसी प्रकार मनुष्य के कर्म उसे ढूंढ़ ही लेते हैं l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' आप चाहते यह हैं कि आपको अच्छे कर्मों का फल मिले , पर बुरे कर्मों के बारे में इतने लापरवाह क्यों हैं कि हम राम -नाम ले लेंगे , पंचामृत पी लेंगे , गंगा जी में डुबकी मार लेंगे तो इन दिल्लगी - मजाकों मात्र से पाप से छूट जायेंगे l यह मुमकिन नहीं है l जहर खाया है तो आपको मरना होगा l आपने गलतियां की हैं तो उनका फल भुगतना होगा या फिर प्रायश्चित कीजिए , जितनी खाई खोदी है उतनी भरिये l आध्यात्मिक क्षेत्र की सच्चाई आपको समझनी होगी कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें भूतकाल के कर्मों का आपका जो डिपॉजिट है , वह ज्यों का त्यों है l वह चिन्ह पूजा से नहीं मिटेगा , उसका भी विधि - विधान है l "
18 October 2021
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' क्रोध एक ऐसा विष है , जो मनुष्य के चिंतन और व्यक्तित्व को विषाक्तता में बदल देता है l क्रोध करने पर हित अनहित में , शुभ अशुभ में , शांति अशांति में , हिंसा अहिंसा में , परमार्थ स्वार्थ में , विनम्रता अहंकार में , बदल जाता है l क्रोध एक ऐसे विकार के रूप में है जो कई तरह की बीमारियों को जन्म देता है l चिकित्सकों के अनुसार कैंसर , उच्च रक्त चाप , सिरदर्द और मानसिक रोगों की एक मुख्य वजह क्रोध ही है l क्रोध एक ऐसा मनोविकार है जो बुद्धि , विवेक और भावनाओं सबको नष्ट कर देता है l '