पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' वाणी को विराम देना मौन कहलाता है , परन्तु सार्थक मौन उसे कहते हैं , जब मन में सद्चिन्तन होता रहे l जिह्वा को बंद रखकर मन में ईर्ष्या -द्वेष का बीज बोते रहने को मौन नहीं कहा जा सकता l यह तो और भी खतरनाक एवं हानिकारक सिद्ध हो सकता है l मौन के साथ श्रेष्ठ चिंतन और ईश्वर स्मरण आवश्यक है तभी मौन की सार्थकता है l महर्षि रमण सदैव मौन रहते थे l वे बिना बोले ही हर एक की जिज्ञासा को शांत करते और हर कोई उनसे अपनी गंभीर समस्या का समाधान अनायास पा जाता था l महात्मा गाँधी के मौन का प्रभाव सर्वव्यापक था l महान दार्शनिक बंट्रेंड रसेल ने भी मौन की महत्ता को स्वीकार किया है l
13 February 2022
12 February 2022
WISDOM ----
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि संसार में समस्त जीव मेरे ही अंश है लेकिन अपनी इन्द्रियों के आकर्षण में वे इस सत्य को भूल गए हैं l ' यह सत्य है कि यदि हम विश्वास करें की हम ईश्वर के अंश हैं , उनसे हमारा निकट का रिश्ता है तो हमारे क्रिया - कलाप श्रेष्ठ होंगे , हम सन्मार्ग का ही चयन करेंगे l लेकिन यदि लोग यह समझेंगे कि हम पहले जंगली थे , हमारे पूर्वज बन्दर थे तो लोगों के क्रिया - कलाप ऐसे ही होंगे कि सब तरफ कोहराम मचा रहे l इस सत्य को समझाने वाली एक कथा है ------- एक सिंहनी गर्भवती थी , वह शिकार को निकली तभी एक शिकारी ने उस पर तीर चला दिया l सिंहनी की तो मृत्यु हो गई लेकिन उसने मरने से पहले एक शावक को जन्म दे दिया l बिन माँ के उस शावक को वन में भटकते देख हिरनों के एक झुण्ड को उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे अपने झुण्ड में सम्मिलित कर लिया l हिरनों के साथ पलते - खेलते वह शावक भूल ही गया कि वह सिंह है l जैसा हिरन करते , वैसा ही वह करता l एक दिन एक व्यस्क सिंह उस कोने में पहुंचा , जहाँ यह हिरनों का झुण्ड रहता था l उसको देख सारे हिरन भाग गए , वह सिंह शावक भी उनके संग भागा l उस व्यस्क सिंह के यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ l उसने हिरनों को छोड़कर उस सिंह शावक को पकड़ा और पूछा कि वह क्यों भाग रहा है ? वह डरते - घबराते बोला कि वह तो हिरन है l व्यस्क सिंह को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि सिंह शावक स्वयं को हिरन कह रहा है l उसके भ्रम को दूर करने के लिए वह उसे नदी के किनारे ले गया और कहा ---' पानी में झांक कर देख तुझमें और मुझमें क्या अंतर् है ? ' पानी में अपनी परछाई देखते ही उसे समझ आ गई कि वह एक सिंह है , उसकी दहाड़ वापस आ गई l सम्पूर्ण मानव जाति यह स्मरण रखे कि वह परमात्मा का अंश है
11 February 2022
WISDOM -----
जब तक लोगों के विचार परिष्कृत नहीं होंगे , ' जियो और जीने दो ' की भावना नहीं होगी , तब तक अत्याचार और उत्पीड़न समाप्त नहीं हो सकता l केवल स्वतंत्रता मिल जाने से अत्याचार समाप्त नहीं होता l केवल बाहरी ताम -झाम के आधार पर ये नहीं कहा जा सकता कि समाज बहुत संवेदनशील है l अत्याचार और उत्पीड़न ऐसा घृणित कार्य है जिसमे पीड़ित व्यक्ति का दिल छलनी हो जाता है , उसकी आत्मा रोती है l अहंकार एक मानसिक विकृति है और इसी विकृति से ग्रस्त लोग संवेदनहीन होते हैं , अपने अहंकार के पोषण के लिए अत्याचार करते हैं l अत्याचार , उत्पीड़न केवल नारी का ही नहीं है , जहाँ जो कमजोर है , वही उनका शिकार है , l यह उत्पीड़न तब और असहनीय होता है जब अपराध करने वाला समाज में खुला घूमता है l अपनी बुद्धि का दुरूपयोग कर कई लोग ऐसे अपराध करते हैं कि वे कभी कानून की पकड़ में आ ही नहीं सकते l कहते हैं प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है , यदि लोग कर्मफल से , ईश्वरीय न्याय से डरने लगें तो स्थिति में कुछ सुधार संभव है l
9 February 2022
WISDOM -----
पुरुष - प्रधान समाज में महिलाओं पर अत्याचार की गाथा कोई नई नहीं है l हर जाति और हर धर्म ने अपने तरीके से नारी को उत्पीड़ित किया है l इतिहास ऐसे उदाहरण से भरा पड़ा है l यह भी पुरुषों की मानसिकता ही है कि नारी को कमजोर , दुर्बल सिद्ध कर के उनके अहं को संतुष्टि मिलती है यही कारण है कि हमारे धर्म ग्रंथों का पाठ करने में भी नारी को दुर्बल बताया जाता है , उसके पीछे जो गूढ़ अर्थ है उसे छिपा देते हैं l जैसे रामायण का पाठ करने में असंख्य बार यही कहा कि रावण ने सीताजी का हरण किया , वहां वे राक्षसियों के बीच रहीं , फिर रावण के अंत के बाद अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए उन्होंने अग्नि परीक्षा दी , फिर धोबी ने उन पर इल्जाम लगाया , गर्भावस्था में वन में ऋषि के आश्रम में रहीं , जीवन भर कष्ट सहा l इतना कष्ट कि उन्होंने धरती माँ से निवेदन किया कि वे उन्हें अपनी गोद में ले लें , और फिर सीताजी धरती में समां गईं l ऐसी व्याख्या से सामान्य जनता यही समझती है कि औरत का जन्म तो कष्ट सहने के लिए हुआ है , उसे अपनी भावना को व्यक्त करने का अधिकार नहीं है , कष्ट सहो और मिटटी में मिल जाओ l ऐसे विचार रखने वाले महिलाओं को उत्पीड़ित करते हैं l सच तो यह है कि माता सीता साक्षात् जगदम्बा की अवतार थीं , उनके पास अपने पतिव्रत - धर्म की शक्ति थी l वो ऐसे एक क्या हजार रावण को फूँक से उड़ा देतीं लेकिन उन्हें नारी जाति को शिक्षा देनी थी कि तुम सहमी , सिमटी न रहो अन्यथा ऐसे ही रावण तुम्हारे व्यक्तित्व को मिटा देंगे ( अपहरण ) , तुम्हे राक्षसियों के बीच रखकर छल , कपट से अपना स्वार्थ सिद्ध करेंगे , ओछे लोग जिनका अपना कोई चरित्र नहीं होगा ' वे तुम पर इल्जाम लगाएंगे l इसलिए तुम अपनी शक्ति को पहचानों , देवी दुर्गा की तरह शक्तिशाली बनों , अपनी महत्वाकांक्षा पर अंकुश रखो , सोने के मृग के पीछे न भागो l कोई भी धर्म किसी को भी उत्पीड़ित करने का समर्थन नहीं करता l अपने आचरण से शिक्षा दो l जिओ और जीने दो l
8 February 2022
WISDOM -----
रावण प्रतिवर्ष जलाया जाता है , लेकिन फिर भी वह मरा नहीं , रावण एक विचार है जो लोगों के हृदय में आज भी जिन्दा है l यह कलियुग का असर है कि रावण की अच्छाई को कि वह वेद और शास्त्रों का ज्ञाता , महाबलशाली , परम शिवभक्त था --- इन गुणों को समझने व अपनाने वाले बहुत कम हैं लेकिन उसकी बुराई को ग्रहण करने वाले बहुत हैं l रावण का सबसे बड़ा दोष था कि वह कपटी था , उसने छल से , वेश बदलकर माता सीता का अपहरण किया l राम और सीता जंगल में भी खुश थे लेकिन रावण से उनकी खुशी नहीं देखी गई , उसने उनकी ख़ुशी को छीन लिया l रावण जैसा छल - कपट का आचरण करने वाले लोगों की इस युग में भरमार है इसलिए लोगों में तनाव है , परिवार टूट रहे हैं l छल , कपट करने के तरीके बदल गए l ------ हमारे महाकाव्य हमें जीवन जीना सिखाते हैं l छल -कपट , षड्यंत्र कभी एक व्यक्ति अकेले नहीं करता l जैसे रावण की एक विशाल सेना थी , मारीच , सुबाहु अनेक राक्षस उसने अपने अनैतिक कार्यों और निर्दोष ऋषियों को उत्पीड़ित करने के लिए लगा रखे थे , इसी तरह रावण जैसी मानसिकता के लोग भी बहुत बड़े समूह में रह कर ही अपने नापाक इरादों को अंजाम देते हैं l विभीषण का चरित्र भी एक शिक्षा देता है ---- यदि कभी कोई रावण जैसे शक्तिशाली और छल , कपट , षड्यंत्र करने वालों के बीच घिरा हुआ हो तो उनसे किसी प्रकार की लड़ाई कर के या उन्हें समझाकर नहीं जीता जा सकता , उससे अपनी रक्षा का एक ही उपाय है --- अपना कर्तव्य पालन करते हुए ईश्वर की शरण में जाना , ईश्वर के प्रति समर्पण l तब भगवान स्वयं न्याय करते हैं , रावण मारा गया और विभीषण का राज्याभिषेक l ईश्वर अपने भक्तों का मान बढ़ाते हैं , श्रीराम तो भगवान थे , उन्हें तो मालूम था कि रावण की नाभि में अमृत है लेकिन उन्होंने यह रहस्य विभीषण से पूछकर उसका मान बढ़ाया विभीषण भी सिर उठाकर कह सके कि अधर्म के नाश जैसे युग निर्माण के कार्य में वह भी भगवान का सहयोगी था l
7 February 2022
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' यदि समाज में संवेदनशीलता का गुण नहीं है तो उसमें केवल शोषण संभव है , उसमें मानवीय मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता l शोषण की मानसिकता है कि दूसरे की कमियों का लाभ लेकर उसे सदा नियंत्रण में रखो और अपना हित साधने के लिए उसका उपयोग करो l जब तक वह उपयोगी है , तब तक उसका उपयोग किया जाये और अनुपयोगी होने पर उसे उठाकर फेंक दिया जाये l शोषण के साथ एक प्रकार का क्रूरता का भाव है , जिसमें मानवीय संवेदनशीलता का कोई स्थान नहीं है l इसके लिए इनसान केवल उपभोग की वस्तु है और जब कोई उपभोग के लायक नहीं रहे तो उसे निर्ममता और क्रूरता के साथ उठाकर फेंक दिया जाये l यह सिद्धांत आज के अधिकांश संबंधों में कार्य करता नजर आता है l इसका परिणाम अत्यंत विनाशकारी होता है क्योंकि इसमें विकृति है , विकार है l अत: यह विनाश का प्रतीक है l " शोषण हमेशा शक्तिशाली कमजोर का करता है l विशेष रूप से जो कायर होते हैं , मानसिक रूप से विकृत होते हैं वे जोंक की तरह होते हैं l जब भी किसी समाज में वीरता और शौर्य जैसे सद्गुणों का अभाव हो जाता है तो वह समाज पतन के गर्त में गिरने लगता है l यदि हमें मानवता को जीवित रखना है तो मानवीय मूल्यों की शिक्षा देने वाली संस्थाएं हों l क्योंकि शोषण में केवल शोषित व्यक्ति ही दुःखी नहीं रहता , शोषण करने वाला भी मानसिक तनाव , अपराध - बोध और आत्म -प्रताड़ना से गुजरता है l अपनी आत्मा को कुचलकर किसी तरह इससे बच भी जाये , तो ईश्वर के दंड - विधान से नहीं बच सकता l
6 February 2022
WISDOM ----
काम , क्रोध , लोभ , मोह , मनुष्य की वो कमजोरियाँ हैं जिनमे फँसकर मनुष्य भटकता रहता है , उसे न मुक्ति मिलती है , न शांति l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी इसे स्पष्ट करने के लिए एक कथा कहते हैं ----- भँवरे को यों तो सभी फूलों से प्यार होता है , लेकिन उसे कमल के फूल से सबसे अधिक प्यार होता है l वह फूलों के पराग - रस का मतवाला होता है l कमल के फूल में जैसे उसके प्राण बास्ते हैं और इस अतिमोह में वह अपने प्राण गँवा देता है l सुबह से शाम तक कमल के सौंदर्य और स्वाद में खोया हुआ भंवरा सांझ होने पर भी उसके मोह से नहीं निकल पाता l सांझ होने पर सूर्य अस्त की वेला में कमल की पंखुड़ियाँ बंद होने लगती हैं , पर कमल की माया में बंधा भंवरा वहीँ जस का तस बैठा रहता है l कमल के पूरी तरह बंद होने पर भंवरा उसी में कैद हो जाता है l जो भ्रमर अपने पराक्रम से कठोर काष्ठ को भी काटकर चूर -चूर कर देता है , वही मोहवश कमल की कोमल पंखुड़ियों को नहीं काट पाता , बस , उन्ही के बीच सहमा , सिकुड़ा बैठा रहता है l उसे प्रतीक्षा रहती है सुबह होने की , पर यह सुबह उसके जीवन में कभी नहीं आती l कमल के अंदर प्राणवायु के अभाव में उसके प्राण ही निकल जाते हैं अथवा सरोवर में स्नान करने आये हाथी उस समूची कमलनाल को उखाड़ कर ही खा जाते हैं l उस भ्रमर के भाग्य में मृत्यु के अलावा और कुछ नहीं होता l